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गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 26


 गोपेश जायसवाल जी के तठस्थ विचारों का ब्लॉग है, जिसे पढ़ते हुए आप परमराओं की गलियों से गुजरने का सुकून ले सकते हैं। 
मेरी फ़ोटो   




 यह किस्सा मुझे मेरे मौसाजी, स्वर्गीय प्रोफ़ेसर बंगालीमल टोंक, जो कि आगरा कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर थे, उन्होंने सुनाया था.

नेहरु जी की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री आवास, 'तीन मूर्ति' को नेहरु पुस्तकालय और संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया था (सरकारी भवन का दुरूपयोग).
सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में यह भारत का सर्वश्रेष्ठ पुस्तकालय कहा जा सकता है.

प्रोफ़ेसर टोंक एक रिसर्च-प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे और इस सिलसिले में उन्हें शोध-सामग्री एकत्र करने के लिए तीन मूर्ति पुस्तकालय के चक्कर लगाने पड़ते थे.

प्रोफ़ेसर टोंक को पुस्तकालय में आते-जाते और रीडिंग रूम में अक्सर एक सज्जन दिखाई देते थे – गोरा रंग, चेहरे पर सफ़ेद, छोटी सी दाढ़ी,  सर पर एक विशिष्ट प्रकार की टोपी, शेरवानी, चूड़ीदार पजामा पहने और आँखों पर काला चश्मा लगाए वह सज्जन, उन्हें एक देवदूत से दिखाई देते थे. प्रोफ़ेसर टोंक अपने काम में इतने व्यस्त रहते थे कि उन सज्जन से कई बार आमना-सामना होने के बाद भी उनका आपस में परिचय नहीं हुआ था.

एक दिन अपना कार्य समाप्त करके प्रोफ़ेसर टोंक चाय पीने के लिए कैंटीन जा रहे थे कि वह सज्जन उन्हें रास्ते में मिल गए. बिना आपसी परिचय के दोनों में बातचीत शुरू हो गयी. प्रोफ़ेसर टोंक को बात करते समय लग रहा था कि इन सज्जन को मैंने तीन मूर्ति लाइब्रेरी के अलावा भी कहीं देखा है, लेकिन कहाँ, यह उन्हें याद नहीं आ रहा था. खैर, उन सज्जन ने प्रोफ़ेसर टोंक से उनका परिचय प्राप्त किया. प्रोफ़ेसर टोंक ने संकोच करते हुए उन सज्जन से उनका परिचय प्राप्त नहीं किया.
वह सज्जन मुस्कुरा कर प्रोफ़ेसर टोंक की इस गफ़लत का कुछ देर तक मज़ा लेते रहे फिर उन्होंने कहा -
'मैं अपना तार्रुफ़ भी आपको करा दूं. मुझे ज़ाकिर हुसेन कहते हैं.'


यह सुनकर प्रोफ़ेसर टोंक को अपने पैरों के नीचे की ज़मीन सरकती हुई दिखाई दी. उन्होंने हाथ जोड़कर ज़ाकिर हुसेन साहब से कहा -
'मेरी जहालत के लिए मुझे माफ़ कीजिएगा डॉक्टर साहब, मैं आपको पहचान नहीं पाया था. मुझे लग रहा था कि मैंने आपको पहले भी कहीं देखा है पर मैं उसे लोकेट नहीं कर पा रहा था.'

उप-राष्ट्रपति जी ने प्यार से उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा -
मैं भी तो आपके जैसे स्कॉलर को आज से पहले नहीं जानता था, लेकिन मैं तो इसके लिए आपसे माफ़ी नहीं मांग रहा हूँ.'
अपने उप-राष्ट्रपति काल के दौरान डॉक्टर ज़ाकिर हुसेन तीन मूर्ति पुस्तकालय में आकर अक्सर ऐसे ही प्रोफ़ेसरान से अपनी तरफ़ से दोस्ती करते थे और अपनी तरफ़ से उनके शोध-कार्य के लिए कुछ टिप्स भी दे दिया करते थे.
नेहरु पुस्तकालय में बनाए गए अपने नए दोस्तों को वो एक बार अपने बंगले पर जलपान के लिए ज़रूर बुलाते थे. प्रोफ़ेसर टोंक को भी यह सु-अवसर प्राप्त हुआ था.
राष्ट्रपति के रूप में भी डॉक्टर ज़ाकिर हुसेन अपनी व्यस्तता के बावजूद विद्वानों से हमेशा बहुत प्यार और ख़ुलूस से मिलते रहे.

इस प्रसंग के बाद मुझे तीन मूर्ति पुस्तकालय का 1987 का, अपना खुद का, एक वाक़या याद आ रहा है.
उन दिनों मैं भी शोध-कार्य के सिलसिले में अक्सर तीन मूर्ति पुस्तकालय जाया करता था.
एक बार मैं अपने जैसे ही शोध-कार्य हेतु तीन मूर्ति पुस्तकालय की खाक छानने वाले तीन मित्रों के साथ वहां से बाहर निकल ही रहा था कि ज़ोर-ज़ोर से साइरन बजने की आवाज़ आई. हम चारों जब तक कुछ समझें, एक स्टेनगन-धारी जवान दौड़ता हुआ और चिल्लाता हुआ हमारी तरफ़ आया और उसने सड़क के किनारे पीठ करके हम सबको अपने-अपने हाथ पीछे बाँध कर खड़े होने का हुक्म दे दिया.
कुछ देर बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी का, पचास गाड़ियों का काफ़िला गुज़रा और तब कहीं जाकर हम सबको इस अपमानजनक सज़ा से छुटकारा मिला.

इस अपमानजनक और कष्टदायक स्थिति में खड़ा-खड़ा मैं, न जाने क्यों, मन ही मन ‘तस्मै श्री गुरुवे नमः’ का जाप कर रहा था और इसके साथ-साथ यह भी सोच रहा था कि काश हम चारों गुरुजन भी डॉक्टर ज़ाकिर हुसेन जैसी किसी महान विभूति के समकालीन होते तो मुदर्रिसी करते हुए हमको भी ज़िन्दगी में किसी महान हस्ती के साथ जलपान करने का मौक़ा मिलता, थोड़ी-बहुत इज्ज़त भी मिलती और बिना कुसूर हाथ बाँध कर, सबकी तरफ़ पीठ करके, यूँ अपराधियों की तरह, दंड भी नहीं भुगतना पड़ता. 

5 टिप्पणियाँ:

विश्वमोहन ने कहा…

गोपेश जी को पढना एक अद्भुत अहसास है.

Abhilasha ने कहा…

बेहतरीन

Digvijay Agrawal ने कहा…

सलाम भाई गोपेश जी को..
एक बेहतरीन बुलेटिन...
आभार...
सादर..

Meena Bhardwaj ने कहा…

गोपेश जी का लेखन अपने आप में अनूठा है। विविध विषयों पर इनकी लेखनी का जादू बेमिसाल है । और प्रतिक्रियाओं के जवाब तो अपने आप में इतने अनूठे कि पाठक बँधा रहता है लेखनी की डोर से ।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

आदमी भी खरे हैं

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