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सोमवार, 3 दिसंबर 2018

यादगार मुलाक़ातें - 2250 वीं ब्लॉग बुलेटिन

पाओलो कोएल्हो कह गये हैं कि अगर आप किसी को बहुत सिद्दत से चाहते हैं त सारा कायनात उसको आपको मिलाने का साजिस में जुट जाता है. एही बतवा साहरुख खान भी एगो सिनेमा में बोल गये. मगर ई सब एतना आसान भी नहीं होता है.

आज से 18 साल पहले हम जिनके फैन हैं और जिनको हम अपना गुरु मानते हैं,  उनको मजाक मजाक में फोन लगा दिये, ई सोचकर कि ऊ फोन त नहिंये उठाएंगे जैसा सब बड़ा लोग करता है. मगर संजोग देखिये, ऊ फोन उठाए भी अऊर हमसे दू मिनट बतियाए भी. बस तब से बहुत इच्छा था उनसे मिलने का, उनको देखने का, उनको सुनने का. दू-चार बार मौका भी मिला त हमरे पास समय नहीं था. मगर असल में बात एही था कि कभी संजोग नहीं हुआ.

अभी पीछे लगातार तीन दिन का छुट्टी था त हम बनारस का प्रोग्राम बना लिये थे. अपने ऑफिस के दोस्त नवीन जी के घर गये त ऊ बोले - 24 नवम्बर को उनका आगमन हो रहा है, आपके पास मौका भी है, अपना गुरुदेव का दर्सन करने का. अब हम पसोपेस में पड़ गये कि का करें. एक तरफ बाबा बिश्वनाथ अऊर दूसरा तरफ हमारे गुरु. संजोग कुछ अइसा हुआ कि बलिहारी गुरु आप की जो गोबिंद दियो भुलाए! बनारस का प्रोग्राम कोनो कारन से नहीं बन पाया अऊर हम नवीन जी के साथ अपना प्रोग्राम पक्का कर लिये.



त 24 नवम्बर को जाकर हमारा बरसों का साध पूरा हुआ. गुलज़ार साहब को सामने बइठकर सुनने का मौका अऊर हमको उनका चरन स्पर्स करके उनसे जीते रहो सुनने का मौका. आज एतना साल हो गया हमको यहाँ रहते हुये, लेकिन अब जाकर ई जगह हमरे लिये तीरथ से कम नहीं है. गुलज़ार साहब का ओही स्टाइल, ओही सादगी, आवाज का ओही जादू अऊर उनके नज्म सब में ओही रोमांटिसिज्म अऊर ओही आध्यात्म. प्रोग्राम का संचालन भले कमजोर था, मगर हमरे लिये त बस उनको देखना, उनको सुनना अऊर उनके बात को दिल में उतारते जाना, ओही बहुत था. एक साम, जो हमरे लिये जीवन भर का यादगार साम बन गया.


ऊ दिन अचानक हमको मेसेज मिला उनका – 28 को दिल्ली आ रहा हूँ आपसे मिलना है. आप ऑफिस में रहेंगे न?
अब हम का बताएँ कि हम कऊन हालत में रहते हैं. उनको जवाब दिये कि 28 को ही बता पाएँगे कि हम मिलेंगे कि नहीं. अक्सर लोग इस तरह का जवाब देने पर समझता है कि बड़ा सेलेब्रिटी बनता है. मगर हम ही जानते हैं कि कइसे करेजा पर पत्थर रखकर हमको ई बात कहना पड़ता है. खैर 28 तारीख को हम कनफर्म किये कि हमारा कोनो ब्यस्तता नहीं है, हम चार बजे साम में ऑफ्फिस में मिलेंगे. सब फाइनल हो गया. अचानक बारह बजे फोन आया कि आज चार बजे मीटिंग है. ओही हुआ जिसका डर था. फिर से करेजा पर पत्थर रखकर उनको मेसेज किये कि माफ कीजियेगा, हमको अचानक मीटिंग में जाना है.

मीटिंग के लिये निकले अऊर आधा रस्ता गये होंगे कि फोन आया – वर्मा सर! आज चार बजे की मीटिंग के लिये आपको इंफ़ोर्मेशन है? हम बोले – हाँ, मैं वहीं के लिये निकल चुका हूँ. उधर से जवाब मिला – मीटिंग कल तीन बजे के लिये पोस्ट्पोन हो गयी है! हम आधा रस्ता से लौट आए अऊर उनको फोन करके बोले कि चार बजे का मुलाकात का समय पक्का है. लगभग आठ दस साल में पहिला बार मिलना हो रहा था हमारा अऊर इधर दू साल में केतना बार मिलना होते होते नहीं हुआ.  फाइनली हमलोग मिले, बहुत सा बातचीत हुआ.



ऊ जनाब हैं सानदार व्यंग्यकार डॉ. एस. के. त्यागी जिनका ब्लॉग है “त्यागी उवाच. जब ऊ रिटायर हुये त उनका परिवार का सबलोग उनके ब्लॉग का पूरा पोस्ट कम्प्युटर प्रिंट करवाकर एगो किताब के सकल में उनको भेंट किया. तब उनके मन में आया कि किताब का प्रकासन करवाया जाए. अऊर उनका जिद एही था कि उनके पुस्तक का प्रस्तावना ई नाचीज सलिल वर्मा जबतक नहीं लिखेगा, तब तक ऊ किताब नहीं छपेगा. हमारे तरफ से भी देर हुआ लिखने में अऊर उनके तरफ से प्रकासन में. अऊर सबके बावजूद प्रकासित हुआ “लोकतंत्र की जचगी”. प्रकासित होने के बाद हमतक पहुँचाने में भी बहुत तरह का पेंचोख़म. खैर उनके व्यंग्य लेखन के पेंच के तरह, यह किताब भी हमारे हाथ में आइये गया. उनसे मुलाकात में उनका ऑटोग्राफ लिये अऊर ऊ मुलाकात जो बरसों से पेण्डिंग था, जाकर पूरा हुआ.

ई नवम्बर का महीना जाते जाते हमको हमारे दू गो गुरुदेव से मिला गया. अऊर ई साल भी जाते-जाते हमको आपलोगों से मिला गया, आज का 2250 वाँ पोस्ट के बहाने. नहीं त पता नहीं हमरा बारी साल 2018 में आता भी कि नहीं. 

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15 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

एक अपना अलग रुचिकर अंदाज, मुझे बाध्य करता है कि अपने छोटे भाई को गुरु मान लूँ

yashoda Agrawal ने कहा…

वाहहहह...
बेहतरीन
सादर...

Anita Saini ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीय
सादर

SKT ने कहा…

एक ही पोस्ट में गुलज़ार साहब के साथ खाकसार के लिए भी जगह निकाल पाने का करिश्मा आप की लेखनी ही कर सकती थी! किसी जासूसी उपन्यास की तरह तमाम उतार चढ़ाव के बाद हुई मुलाक़ात पर एक यादगार पोस्ट लिख कर आपने इसे हमारे लिए एक दस्तावेज़ बना दिया।
ब्लॉग बुलेटिन को इस अहम पड़ाव पर हमारी दिली मुबारकबाद!

Abhilasha ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

हमेशा की तरह। सलिल जी का अचानक आना और एक दमदार प्रस्तुति ब्लॉग बुलेटिन की दे जाना। पता नहीं हर हफ्ते क्यों नहीं आ जाते? उसपर 'उलूक' की बकबक को जगह दे जाना। धन्यवाद आभार थैंक्यू सब बनता है और वैसे अऊर कहने का मन हो रहा था लेकिन रुक गया। साथ में ब्लॉग बुलेटिन परिवार को भी शुभकामनाएं बधाइयाँ 2250वें बुलेटिन के लिये । सफर इसी तरह जारी रहे कारवाँ बढ़ता रहे। जय हो।

Digamber Naswa ने कहा…

मज़ा आया पढ़ कर आपकी यादगार मुलाकात का और इस बुलेटिन का भी ...
कभी कभी तो ब्लॉग जगत में आते रहे ...

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

अब आ जाइए बनारस। 2 दिन बहुत है दर्शन के लिए। शुक्रवार की रात का रिजर्वेशन कराइए। शनिवार की सुबह पहुँच जाइए। ऐसे ही रविवार शाम का रिजर्वेशन करा कर सोमवार को दफ्तर।

यह पोस्ट आनन्द दायक है।

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

लोकभाषा में भी आभिजात्य का निर्वाह देखना हो तो सलिल की संयत भाषा और अर्थगर्भित शैली का गद्य उदाहरणीय है. विषय को उत्कर्ष देने के साथ व्यक्तित्व की आभा से युक्त लेखन मन को आनन्दित कर देता है.

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति

Meena Sharma ने कहा…

आदरणीय सलिल वर्मा जी की बुलेटिन प्रस्तुति में अपनी पोस्ट को देखना सुखद आश्चर्य है। बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सभी पाठकों और पूरी बुलेटिन टीम को 2250 वीं पोस्ट की हार्दिक बधाइयाँ |

ऐसे ही स्नेह बनाए रखिए |



सलिल दादा को सादर प्रणाम |

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सभी सुधि पाठकों का आभार!

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

आप आते हैं तो बुलेटिन और भी शानदार हो जाता है . बहुत दिनों बाद यह बोली सुनने मिली .

anuradha chauhan ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति

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