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मंगलवार, 9 जनवरी 2018

ऐतिहासिकता को जीवंत बनाते वृन्दावन लाल वर्मा : ब्लॉग बुलेटिन

हिन्दी उपन्यासों के वाल्टर स्कॉट कहलाने वाले वृन्दावनलाल वर्मा की आज 129 वीं जयंती है. आज ही 9 जनवरी सन 1889 को उनका जन्म झाँसी जिले के मऊरानीपुर में हुआ था. उनका बचपन अपने चाचा के पास ललितपुर में बीता. चाचा के साहित्यिक-सांस्कृतिक रुचि के होने के कारण उनकी भी रुचि पौराणिक तथा ऐतिहासिक कथाओं के प्रति बचपन से ही थी. लेखन प्रवृत्ति बचपन से ही होने के कारण उन्होंने नौंवीं कक्षा में ही तीन छोटे-छोटे नाटक लिखकर इण्डियन प्रेस प्रयाग को भेजे. जहाँ से उनको पुरस्कार स्वरूप 50 रुपये भी प्राप्त हुए. प्रारम्भिक शिक्षा भिन्न-भिन्न स्थानों पर संपन्न करने के बाद उन्होंने बी.ए. और क़ानून की परीक्षा पास की. इसके बाद वे झाँसी में वकालत करने लगे.

वृन्दावन लाल वर्मा 
 पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि होने के चलते और लेखन के द्वारा भारतीय इतिहास की सत्यता सबके सामने लाने की उनकी प्रतिज्ञा ने मात्र बीस साल की अल्पायु में सन 1909 में उनसे सेनापति ऊदल नाटक लिखवा लिया. इसके राष्ट्रवादी तेवरों से बौखलाकर अंग्रेज़ सरकार ने इस नाटक पर पाबंदी लगा कर इसकी प्रतियाँ जब्त कर लीं. बचपन में भारतीय समृद्ध इतिहास के प्रति नकारात्मक भाव देखकर वृन्दावन लाल वर्मा देश का वास्तविक इतिहास सबके सामने लाने की प्रतिज्ञा कर चुके थे. इसी के चलते उन्होंने ऐतिहासिक विषयों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया. इसके साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की प्रेरणा उनको प्रसिद्द ऐतिहासिक उपन्यासकार वाल्टर स्काट से मिली.

उनका ऐतिहासिक उपन्यास लेखन की तरफ प्रवृत्त होना उस समय बहुत ही साहसिक कदम कहा जायेगा क्योंकि उस दौर में प्रेमचंद उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति हिन्दी साहित्य में बनाये हुए थे. इसके बाद भी उनके पहले ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार को जबरदस्त प्रसिद्धि मिली. इसके बाद तो वृन्दावन लाल वर्मा ने विराटा की पद्मिनी, कचनार, झाँसी की रानी, माधवजी सिंधिया, मुसाहिबजू, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में इतिहास जीवन्त होकर बोलता है. इसके साथ-साथ उन्होंने सामाजिक उपन्यास, नाटक, कहानियाँ भी लिखीं. उनकी आत्मकथा अपनी कहानी  भी सुविख्यात है.


भारतीय ऐतिहासिकता को साहित्यिक जगत में जीवंत स्वरूप में प्रदान करने वाले साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा सन 23 फ़रवरी 1969 में हमसे विदा हो गए. उनकी मृत्यु के 28 साल बाद 9 जनवरी सन 1997 को भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया.

आज उनके जन्मदिन पर बुलेटिन परिवार की ओर से उनकी पुण्य स्मृतियों को नमन...

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शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

दो सितारों की चमक से निखरी ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आज, 9 सितम्बर को दो सितारों, शहीद विक्रम बत्रा का तथा साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्मदिन है. दोनों ने ही अल्पायु में अपने-अपने हथियारों से अप्रत्याशित कारनामे किये. एक ने बन्दूक उठाकर देश के दुश्मन को खदेड़ा तो दूसरे ने कलम के सहारे हिन्दी विरोधियों को परस्त किया. आइये विनम्र श्रद्धांजलि सहित जाने अपने इन सितारों के बारे में.
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कैप्टन विक्रम बत्रा 
विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को पालमपुर में हुआ था. जी.एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा के यहाँ जुड़वां बच्चों के रूप में जन्म हुआ. माता कमलकांता की श्रीरामचरितमानस में गहरी श्रद्धा होने के कारण विक्रम को लव और विशाल को कुश के नाम से पुकारा गया. अध्ययन हेतु विक्रम चंडीगढ़ गए और विज्ञान विषय में स्नातक की पढ़ाई की. इस दौरान वह एनसीसी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुने गए और गणतंत्र दिवस की परेड में भी भाग लिया. स्नातक करने के बाद उनका चयन सीडीएस के जरिए सेना में हो गया. शिक्षा समाप्त होने पर उन्हें 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली. 1999 को कारगिल युद्ध में श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा उनकी टुकड़ी को दिया गया. बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों सहित इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया. जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष यह दिल मांगे मोर कहा तो पूरे भारत में उनका नाम छा गया. इसी दौरान विक्रम के कोड नाम शेरशाह के साथ ही उन्हें कारगिल का शेर की भी संज्ञा दी गई. मिशन लगभग पूरा हो चुका था. लड़ाई के दौरान घायल लेफ्टीनेंट नवीन को बचाने के प्रयास में विक्रम बत्रा की छाती में गोली लगी और वे जय माता दी कहते हुये वीरगति को प्राप्त हुये. अदम्य साहस और पराक्रम के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को 15 अगस्त 1999 को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.
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भारतेंदु हरिश्चंद्र 
आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को काशी में हुआ. उनके पिता गोपालचंद्र अच्छे कवि थे और गिरधर दास उपनाम से कविता करते थे. बचपन में ही भारतेंदु माता-पिता के सुख से वंचित हो गए थे. बनारस में उन दिनों अंग्रेजी पढ़े-लिखे और प्रसिद्ध लेखक राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द थे. भारतेन्दु शिष्य भाव से उनके यहाँ जाते रहते. उन्होंने उन्हीं से अंग्रेजी सीखी तथा स्वाध्याय से संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू भाषाएँ सीख लीं. हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेंदु से ही माना जाता है. भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया. हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया. भारतेन्दु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे. इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे. हिन्दी में नाटक उनके पहले भी लिखे जाते थे किंतु नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेन्दु ने ही हिन्दी नाटक को सुदृढ़ बनाया. उन्होंने हरिश्चंद्र पत्रिका, कविवचन सुधा और बाल विबोधिनी पत्रिकाओं का संपादन भी किया. भारतेन्दु जी का देहावसान मात्र 34 वर्ष की अल्पायु में ही 7 जनवरी 1885 को हुआ. अल्पायु में उन्होंने विशाल साहित्य की रचना की तथा मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा, इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया है.
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शहीद विक्रम बत्रा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को ब्लॉग बुलेटिन परिवार की तरफ से हार्दिक श्रद्धांजलि सहित आज की बुलेटिन.

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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

देश का संकट, संकट में देश - ११११ वीं बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
कलाम साहब को नमन करते हुए आज की बुलेटिन आपके सामने प्रस्तुत है.
देश विगत कुछ समय से अजब से हालातों में घिरता दिख रहा है. कभी गाय के नाम पर हत्याकांड होता है तो फिर उस हत्याकांड पर राजनीति होने लगती है. बाघ बचाने की मुहिम छेड़ने वाले लोग ‘बीफ पार्टी’ देने की होड़ में शामिल होने लगते हैं.  कितनी विद्रूपता है कि जिस गाँव में तनाव उत्पन्न होता है वहाँ आपसी सामंजस्य से माहौल सुधर जाता है और समाज के जिस वर्ग पर माहौल सुधारने का दायित्व है वे माहौल बिगाड़ने का कार्य करने लगते हैं. जिन साहित्यकारों को सामाजिक सन्देश देने वाला समझा जाता है मगर उनके पूर्वाग्रही कदम सरकार को नहीं वरन सम्पूर्ण देश को वैश्विक स्तर पर बदनाम करने में लगे हैं.

किसी भी हत्या का विरोध होना चाहिए, किसी भी हत्यारे का खुला टहलना मंजूर नहीं होना चाहिए मगर जब मौत पर भी राजनीति होने लगे तो समझना चाहिए कि देश संकट में घिरने वाला है. जब हत्या हिन्दू या मुस्लिम हो जाये; जब सहायता हिन्दू या मुस्लिम आधार पर की जाये; जब समर्थन का आधार हिन्दू या मुस्लिम हो जाये तो समझना चाहिए कि समाज में विघटन का संकट आने वाला है. वर्तमान में अकादमी के पुरस्कारों की वापसी अपने आपमें एक कहानी समेटे है वो एक अलग विषय है किन्तु जिस तरह वर्तमान समय को हिंसक, असहिष्णु, अराजक सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है वो देश के विकास को ही नहीं वरन देश की गति को वैश्विक स्तर कमजोर करेगा.

बहरहाल, जिनकी जिम्मेवारी समाज के दिशा-निर्देशन की मानी गई है, वे तो राजनीति में मगन हैं ऐसे में हम-आप की, आम आदमी की जिम्मेवारी बन जाती है कि न केवल ऐसे लोगों को सही रास्ते पर लायें वरन समाज को भी सही दिशा दिखाएँ. इस हेतु सामने आई कुछ पोस्ट आपके सामने हैं, शायद रास्ता बना सकें... शायद..!!

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इस पोस्ट के साथ एक संजोग भी जुड़ गया.... ब्लॉग बुलेटिन की ये ११११ वीं पोस्ट है. जब अंक में इतनी साम्यता स्फूर्त रूप से बन गई है तो हम सबको भी समवेत रूप से इसी तरह 'एकसाथ एक' बन जाना होगा. देश की, समाज की समस्याएँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी. 

लेखागार