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शनिवार, 19 जनवरी 2019

ये बदलते हुए नकाबों का मौसम है



पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में इतना बदलाव तो यकीनन ही आया है कि , अब लोगों को वो राजनीति स्पष्ट दिख रही है और शायद समझ भी आ रही है जिससे कभी आम लोगों का दूर दूर तक यदि वास्ता था तो सिर्फ इतना की वोटिंग वाले दिन एक छुट्टी मिलेगी | अब न सिर्फ मतदाताओं का मतदान के प्रति रुझान बढ़ा है बल्कि खुद सारे राजनीतिक दल भी बखूबी समझने लगे हैं कि आम मतदाता अब न सिर्फ जागरूक हो रहा है बल्कि सही गलत की पहचान भी कर रहा है |  ये वर्ष देश के लिए नई सरकार नए प्रतिनिधि चुनने का समय है , 

इसलिए सजग रहिये और सतर्क रहिये। .....


स्वाभिमान -लघुकथा 

अजब गजब मान्यताएं 

हीन भावना से ग्रस्त हैं हम 

सांची के स्तूप 

जमीन को तरस रहे गुम्बद 

गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय 

गोवा में दो दिन 

संतरा और कीनू 

अब आज्ञा दीजिये। ..खूब पढ़िए और खूब लिखिए 

सोमवार, 7 जनवरी 2019

आर्थिक आधार पर मिलेगा आरक्षण




सरकार ने आखिरकार आरक्षण के भूत की एक बार फिर से चुटिया पकड़ ली है | हालांकि मेरे जैसे एक साधारण व्यक्ति जो सिर्फ अपने श्रम और संघर्ष पर अपना मुकाम हासिल कर पाया के लिए किसी भी तरह का आरक्षण , ठीक उस बैसाखी की तरह है जो दो पाँव से चलने दौड़ने वाले तक को जबरन थमाया जा रहा है ताकि उन्हें अपने पैरों की शक्ति से अधिक भरोसा उसकी कमजोरी (जो सरकारें एहसास कराती रहती हैं ) पर यकीन बना रहे और सरकारें , राजनीतिक दल , और ऐसे तमाम मुखौटे लगाने वाले इसका समय समय पर उपयोग और दुरूपयोग कर सकें | 


कल संभवतः सरकार इस आशय का एक विधेयक संसद में पेश करके एक नई बहस को जन्म देगी हालांकि बहस (टीवी पर चल रही भौं भौं को यदि आप बहस मानते हैं तो ) आज से ही शुरू हो चुकी है | आने वाले समय में ये आरक्षण का जिन्न इस देश का कितना भला बुरा करेगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा तब तक तेल देखिये और तेल की धार देखिये .....

चलिए इन सबसे आगे बढ़ते हैं और देखते हैं की   आज किसने अपने ब्लॉग में किस विषय पर  क्या कहा सुना ,लिखा पढ़ा .........


यह विदाई है या स्वागत : गौतम राजऋषि

दिल मचल उठा : अनुराधा चौहान

चौबे गए छब्बे  बनने दूबे बनकर आ गए : हरेश कुमार

लम्हे इश्क के : दिगंबर नासवा

मैंने ढूंढा तेरा चेहरा :डॉ. वर्षा सिंह

छत से टपकती माँ बाबूजी  की आहट :श्याम बिहारी श्यामल

ये ज़िंदगी भी ख़ाक है : रेवती रमण झा


शुभरात्रि ...खूब लिखें , खूब दिखें |

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

इस देश में बीमार पड़ने का हक़ किसी गरीब को नहीं है



धंधे में शामिल होने जाता एक एम्बुलेंस 


आज फिर वही छ: साल पुरानी वाली तल्ख़ स्थतियों से गुजरा जिनसे मैं और परिवार तब गुजरे थे जब मैं अचानक ही बहुत अधिक अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती हो गया था और तब से लेकर आज तक जाने कितनी ही बार ऐसी अनेकों परिस्थितयों हालातों घटनाओं को अपने आसपास , मित्रों ,और उनके आसपास भी घटते हुए देखा सुना , उससे यही निष्कर्ष निकला कि , 

इस देश में बीमार पड़ने का हक़ मध्यमवर्ग/गरीब वर्ग को नहीं है , क्योंकि अस्पताल देश की राजधानी समेत सारे छोटे नगरों कस्बों तक में सिर्फ और सिर्फ इसलिए खुले हैं कि तीमारदारों की अस्थि तक चूस कर बीमार को लाश में तब्दील करके आपको वापस कर दें | 

सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने का अड्डा बन चुके ऐसे तमाम अस्पताल , उनमें चिकित्सा के नाम संगठित लूट इंसान से हैवान बन चुके चिकिस्तक ,उनके सहयोगी सब के सब संगठित अपराध के दोषी हैं जिन्हें तत्काल सूली पर चढाया जाना चाहिए | 

सबसे आखिरी बात , अपने परिवार को सबसे बड़ा अनमोल धरोहर जो आप दे सकते हैं और जो देना चाहिए  वो है खुद को बीमार होने से बचाना | 

हो सकता है कि ,ऐसा सबके साथ न हुआ हो , तो आप खुशकिस्मत हैं और अपवाद हैं , अस्पताल से लौटा हूँ , क्षुब्ध भी हूँ और बेहद व्यथित भी , आप आज की ये पोस्टें पढ़िए

पहले पढ़िए ये पोस्ट , बाकी सब है इसके बाद
धूमिल के संग बैठ लीजिये आप लोहे का स्वाद 


अरे रुकिए महाराज , आप आखिर चले किधर
मुकेश सिन्हा कह रहे मेरा नदी सा है ये सफर 


कोई देखता होगा ,कोई बोलता होगा
डा शरद कह रहीं , कोई सोचता होगा


रुक जा प्यारे , अभी तो यहीं रह ,
रश्मि जी के साथ ,बीती बात की तरह


कोई फूला गुमान में , कोई घमंड में ऐंठा
अनुराधा कह रही हैं ,जमाना बैरी बन बैठा 


चलिए अब इससे थोड़ा इतर पढ़ के आएं
जानिये आखिर क्या राफेल के मार्ग में बाधाऐं 


घूम फिर के जीवन अपना तुम भी सवारो
कह रहे नीरज जाट ,मैं मुसाफिर हूँ यारों

शुभ रात्रि | अपना ख्याल रखिये तभी आप अपनों का ख्याल रख पाएंगे 


सोमवार, 14 जनवरी 2013

मकर संक्रान्ति की ढेरों शुभकामनाएं संग चंद पोस्टें - ब्लॉग बुलेटिन

इस देश को शायद ये श्राप मिला हुआ है कि जख्मों के भरने से पहले ही उसे दूसरा जख्म मिल जाता है । अभी पूरे देश को दिल्ली बलात्कार कांड ने झकझोरा ही हुआ था कि इस बीच खबर आई कि पडोसी मुल्क पाकिस्तान ने अपनी फ़ितरत दिखाते हुए  न सिर्फ़ युद्ध विराम का उल्लंघन किया बल्कि कायरता से वार करके हमारे देश के दो वीर सैनिकों का न सिर्फ़ कत्ल कर दिया बल्कि उनमें से एक का सिर भी काट कर ले गए । पाकिस्तान की घटिया मनसिकता और ओछी हरकतों को देखते हुए इस बार पर कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए , मगर उस परिवार का , जिसका वो बेटा था जिसे अपने शहीद बेटे का शव भी मिला तो वो बदनसीब मां अपने मृत बेटे का चेहरा भी आखिरी बार भी नहीं देख पाई , उस परिवार का सोच कर भी मन सिहर उठता है । हमारे हुक्मरान हमेशा की तरह अपनी सियासी बिसात बिछा के बैठ गए हैं अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए ।


इस बीच देश के बेटियों , के प्रति लगातार कलम चल रही है , और बहुत से अन्य मुद्दों पर भी

लड़ना जानती हैं बेटियाँ

मंजू अरुण की एक कविता की पंक्तियाँ हैं-

 ‘‘बेटियाँ
    यदि ताड़ की तरह बढ़ती हैं तो,
    छतनार की तरह फैलती भी हैं।’’

    और सच आज वह फैल गयी हैं, चारों तरफ़, मुट्ठी भींचे सीना ताने। क्षोभ, क्रोध, आवेश और आहत भाव से कुछ पश्चाताप से भी कि वह बचा नहीं पायीं दरिन्दगों की दरिंदगी की निशाना बनी अपनी एक साथी को। फिर भी एक, थोड़ा झीना ही सही एक आश्वस्त भाव है उनके पास कि वह सत्ता के मद से डूबे लोकतांत्रिक तानाशाहों को कुछ तो झुका पायीं, जो कह रहे थे, सरकारें जनता के पास नहीं जाया करतीं, वह जनता की बेटी का शव लेने एयरपोर्ट तक पहुँच गये, शमशान घाट भी। अब वह जनता के पास जाने के अवसर की तलाश में है। जनता जब सरकार के द्वार पर जम की गयी, तब वह थोड़ा विचलित हुए। जनता यदि सरकार चुनती है, तो उसे उखाड़ भी फेंकती है। हालाॅकि सरकारंे तो सिर्फ़ चुनने का अधिकार देना चाहती हैं। जैसे पुरुष (अधिकांश) अपनी वासनाओं की तुष्टि, स्वादिष्ट भोजन, ढेर सारे सुखों, अपनी नस्ल चलाने तथा स्त्री को स्त्री बने रहने के लिये विवाह करता है, उसे एक घर देता है। पुरुष ज़्यादातर उस स्त्री को बहुत पसन्द करता है जो घर में रहे। उसी तरह जैसे सरकारें घर में रहने वाली जनता को बहुत पसन्द करती हैं। जनता को घर में रखने के लिये ही तो उसने इतने सारे मादक टी0वी0 चैनल्स दिए हैं, नेट का रोमांच दिया है। स्त्री जो जनता ही का हिस्सा है, कात्यायनी की एक कविता के अनुसार ‘‘यह स्त्री सब कुछ जानती है/पिंजरे के बारे में/जाल के बारे में/यंत्रणा गृहों के बारे में।’’ इसलिये कभी-कभी ही सही वह निकलती हैं घरों से बाहर। इस बार बेटियों के साथ बेटे भी थे। बहुत से लोग इस कारण चिंतित हैं कि बेटियाँ स्कर्ट और जींस में बाल लहराते हुए निकलीं। उन्होंने दुपट्टे तक नहीं ओढ़ रखे थे। वह दिन में मोमबत्तियाँ जलाती हैं, रात में डिस्को जाती हैं।  हिंसा के विरुद्ध सड़कों पर निकलती बेटियों के प्रति यह शब्द कम वीभत्स हिंसा नहीं है। इसमें अवमानना का दंश भी है। जिसकी चुभन आज भी जारी है।

फिर कोई नहीं रोक सकता लड़की को



बड़े शहर की लड़कियाँ 


-लाल्टू


शहर में


एक बहुत बड़ा छोटा शहर और

निहायत ही छोटा सा एक

बड़ा शहर होता है


जहाँ लड़कियाँ 

अंग्रेज़ी पढ़ी होती हैं

इम्तहानों में भूगोल इतिहास में भी 

वे ऊपर आती हैं

उन्हें दूर से देखकर

छोटे शहर की लड़कियों को बेवजह 

तंग करने वाले आवारा लड़के

ख्वाबों में - मैं तुम्हारे लिए 

बहुत अच्छा बन जाऊँगा - 

कहते हैं

फँसा आदमी

कभी दफ्तरों में कभी कठघरों में
फँसा आदमी कागजी अजगरों में 
तमन्ना रही आसमानों को छूएं 
मगर ठोक रक्खी हैं कीलें परों में 
कहाँ से उगेगी नई पौध कोई 
घुने बीज बोये हुए बंजरों में 
अगर मर गईं सारी संवेदनाएं 
रहा फर्क क्या वनचरों में नरों में 


कोहरा और कुहासा

fog
र्दियों में शाम से ही धुंध छाने लगती है जिसे कोहरा या कुहासा कहते हैं । ठंड के मौसम में आमतौर पर हवा भारी होती है जिसकी वजह वातावरण में नमी का होना है । धरती की ऊपरी परत जब बेहद ठण्डी हो जाती है तो हवा की नमी सघन होकर नन्हें-नन्हें हिमकणों में बदल जाती है इसे ही कोहरा जमना कहते हैं । कोहरा बनने की प्रक़्रिया लगभग बादल बनने जैसी ही होती है । कभी-कभी बादलों की निचली परत भी पृथ्वी की सतह के क़रीब आकर कोहरा बन जाती है । कुल मिलाकर कोहरे में कुछ नज़र नहीं आता । धुँए में जिस तरह से दृश्यता कम हो जाती है उसी तरह हवा की नमी हिमकणों में बदल कर माहौल की दृश्यता को आश्चर्यजनक रूप से कम कर देती है । कोहरे के आवरण में समूचा दृश्यजगत ढक जाता है । देखी जा सकने वाली हर शै गुप्त हो जाती है, लुप्त हो जाती है, छुप जाती है, छलावे की तरह ग़ायब हो जाती है । कोहरा की अर्थवत्ता के पीछे भी गुप्तता या लुप्तता का भाव ही प्रमुख है ।



कार्टून :- दूसरा गाल आगे करने वाली प्रजाति



यह शुरुआत है, आगे लंबी लड़ाई

आधुनिकता का मतलब अंगरेजी गीत गाना और जींस पहनना नहीं है। यह हल्की सोच है। आधुनिकता का अर्थ है, सामाजिक और राजनीतिक समानता। भारत ने इस दिशा में पहला कदम उठाया है। उथल-पुथल, संघर्ष और अनैतिक बातें साबित करती है कि रूढ़िवादी आसानी से अपनी पकड़ को नहीं जाने देंगे। बदलाव दिख रहा है, लेकिन लंबी लड़ाई अभी शुरू ही हुई है। यह शांत है। यह जटिल है। वहां बेचैनी है, लेकिन शोर नहीं है। वहां आत्मसंशय और अनिश्‍चिय है, क्योंकि ऐसा लगता है कि उसमें बंदिश है, धर्म की नहीं बल्कि कुछ धार्मिक लोगों की। भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति नि:संदेह विश्‍व के सबसे प्रमुख मत हिंदुत्व और अंत में इसलाम से प्रभावित रही है। धर्म की शुरुआत सामाजिक आंदोलन, असमानता से छुटकारे के तौर पर होती है। संतों और मौलवियों की वाणी में धर्म प्रेरणादायक लगता है। सदियों के बाद स्वयंभू रक्षकों के नियंत्रण में यह कैसा रूप धरता है, यह एक अलग कहानी है।
एक अंगरेजी अखबार के दो जनवरी के दिल्ली संस्करण में इस धुंध को चीर कर ऐसे ही एक सत्य को पकड़ने की कोशिश की गयी। ख़बर के मुताबिक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लाऊ ने एक लड़की को अगुवा करने के आरोपी नदीम खान को मदद देने और शादीशुदा खान और लड़की के बीच निकाह कराने के आरोप में मौलवी मुस्तफा खान को जमानत देने से इंकार कर दिया। निकाह के लिए न लड़की की रजामंदी ली गयी थी, न यह माता-पिता की मौजूदगी में किया गया था। मौलवी ने दलील दी की मुसलिमों को चार शादी करने की इजाजत है। कामिनी लाऊ ने कहा कि इसलाम बहुविवाह की इजाजत केवल कुछ हालातों में ही देता। यह इसे बढ़ावा नहीं देता है। कोई भी निकाह बिना लड़की की रजामंदी के मान्य नहीं है। उन्होंने कहा तुर्की और ट्यूनीशिया जैसे मुसलिम देशों ने बहुविवाह को गैर कानूनी बना दिया है।

निदा फ़ाज़ली के पलड़े पर अमिताभ-कसाब...खुशदीप

आंध्र प्रदेश विधानसभा में एआईएमआईएम विधायक दल के नेता अक़बरुद्दीन ओवैसी ने 24 दिसंबर 2012 को  निर्मल, आदिलाबाद में जो कुछ भी कहा, उसकी वजह से 14 दिन की न्यायिक हिरासत में है...अक़बर ने क्या-क्या कहा, इस पर मैं  जाना नहीं चाहता...लेकिन जाने-माने शायर और फिल्म गीतकार निदा फ़ाजली ने एक साहित्यिक पत्रिका को चिट्ठी  में जो लिखा है, उसने मुझे ये लेख लिखने पर मजबूर कर दिया...निदा फ़ाज़ली ने मुंबई हमले के गुनाहग़ार मोहम्मद अज़मल आमिर कसाब और बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन की बिल्कुल अलग-अलग संदर्भ में तुलना की  है...उन्होंने दोनों को किसी और का बनाया हुआ खिलौना बताया है...




नारी मन


वो ख्वाब किसी की आंखों का, वो शब्द किसी की बातों का,

जीवन के हर क्षण में वो, वो आधार  सभी की सांसों का

रूप बदल बदल वो आये, हर रूप में सबका साथ निभाये

बिन उसके जीना असम्भव, पर सभी को ये समझ ना आये
ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को मकर संक्रान्ति की ढेरों शुभकामनाएं।

रविवार, 9 दिसंबर 2012

संडे सन्नाट : पोस्टें झन्नाट


अब धीरे धीरे पूरे देश में शीत ऋतु अपना प्रभाव बढा रही है , हालांकि अब भी धूप की उष्मा ने लोगों को कंपकपाना शुरू नहीं किया है । इधर देश की राजनीति में आई गर्मी ने जैसे सब कुछ पिघला कर रख छोडने की जिद पकड ली है और ऐसे माहौल में आने वाले दिनों में गुजरात में होने जा रहे विधानसभा चुनावों पर सबकी नज़र रहेगी । वर्षांत पर निश्चिय ही वर्ष भर की राजनीति , खेल , फ़िल्म , उद्योग , अपराध आदि सबका आकलन विश्लेषण किया जाएगा , शुक्र और सुकून की बात ये है कि , जैसा कि पिछले दिनों बडा शोर शराबा मचा हुआ था कि माया कैलेंडर के अनुसार इस साल के अंत तक विश्व ऐसी प्रलय और तबाही की चपेट में आएगा कि सब कुछ खत्म हो जाएगा , वैसा कुछ हुआ नहीं । माया कलेंडर की भविष्यवाणी भी बहन मायावती की सरकार से समर्थन वापसी के फ़ैसले की तरह पलट गई । चलिए अब चलते हैं इन सबसे अलग ब्लॉग पोस्टों की दुनिया में और देखते हैं कुछ चुनिंदा पोस्टों की झलकियां ….

हम हमेशा शिवरानी - वे हमेशा प्रेमचंद
हे भगवान! आज मैं बहुत खुश हूँ कि मैं महुआ माजी की तरह खूबसूरत नही। हिन्दी जगत में खूबसूरत लेखिका होना मतलब- उसके चरित्र की धज्जियों का उड़ जाना है।  हिन्दी जगत में स्त्री का होना ही फांसी पर चढ़ा जानेवाला अपराध है। खूबसूरत लेखिका होना भयंकरतम अपराध है। इसकी सज़ा उसके चरित्र की खील -बखिया उधेड़ कर दी जा सकती है। ऐ औरत! एक तो तू हव्वा!। सारे फसादात की जड़! दूसरा फसाद- कि तू सुंदर भी है। यह ऊपरवाला भी- बहुत हरामी है। उसकी कमीनगी देखिये कि वह इस दो टके की औरत को दिमाग नाम की चीज़ भी दे देता है। अब भला कहिए तो! रूप दे दिया तो दे दिया। उससे हमारा मन सकूँ पाता है। आँखों को ठंढक पहुँचती है। दिल को राहत मिलती है। अगर वह पट गई तो देह की पोर-पोर खिल जाती है। नहीं भी पाती तो उसे गाली देकर, बदनाम करके हमारी जीभ और रूह सकून पाती है। ए कम अक्लों ! कितने खुश हैं हम यह स्थापित करते हुए कि ऐसों-ऐसों की अक्कल घुटने में होती है। घुटने पर साड़ी अच्छी लगती है। दिमाग को भी हमने घुटने पर देकर हमने उनकी इज्ज़त ही बढाई है। असल में उनके पास दिमाग तो होता ही नही! और ज़रूरत भी क्या है भला! वे रूपसी है, कामिनी हैं, दामिनी हैं, मतवारी हैं, छममकछल्लो हैं, छमिया हैं। ये सब हमारे रस-रंजन के लिए हैं। उनकी खुशकिस्मती कि हम उन्हें अपने साथ होने-सोने-खोने के लिए रख लेते हैं। अब इनकी यह मजाल कि लिखने भी लगें, बोलने भी लगें, हुंकारने भी लगें। दुर्गा-काली कैलेंडरों और शास्त्रों में अच्छी लगती हैं। जीवन में नही। महुआ हो कि कमलेश, गीता हो कि विभा- जो बोलेगी, भाड़ में जाएगी। यह भाड़ हमने बनाया है, इसमें हिंसा, कामुकता, रासलीला की आग हम सदा जला के रखते हैं। हम एक छींटे से अपने ही अन्य लोगों का भी खात्मा करने की ताकत रखते हैं, जिनकी नज़र में स्त्री सम्माननीय है। अरी ऐ औरत!  संभाल जा! तू मादा है, मादा रहेगी। मादा बनकर हमारे साथ रहेगी तो तेरे रूप पर तनिक दिमाग का दान भी कर देंगे।


कार्टून कुछ बोलता है- राज को राज रहने दो !



उचित है !?

ऐसा प्रकाश मे आया है कि ब्लॉग जगत मे कुछ लोग विभिन्न वेब साइट्स का सहारा लेते हुये चित्रो को कार्टून का रूप दे कर खुद को जबरन कार्टूनिस्ट बता रहे है ... जितना मैं जानता हूँ ऐसे लोगो को कार्टूनिस्ट तो कहा नहीं जा सकता ... आप के हिसाब से यह कहाँ तक उचित है !?


कैसे भूलूं 'पक्का जामुन तोड़ो नहीं'-पीनाज़ मसानी

बचपन में जब भी कोई अच्छा गाना सुनती तो मेरी आंखों में आंसू आ जाते थे। घर में संगीत का माहौल था, मैंने छोटी उम्र से ही गाना शुरू कर दिया था। कॉलेज के दिनों में ‘सुर-सिंगार’ प्रतियोगिता में संगीतकार जयदेव ने मुझे गाते हुए सुना। उन्हें बहुत अच्छा लगा कि एक पारसी लड़की, जिसकी मातृभाषा हिंदी नहीं है, वह हिंदी में इतनी सहजता से गा रही है।

आत्मसंकल्प या बलपूर्वक
किसी भी कार्य को करने के लिये संकल्प चाहिये होता है, अगर संकल्प नहीं होगा तो कार्य का पूर्ण होना तय नहीं माना जा सकता है। जब भी किसी कार्य की शुरूआत करनी होती है तो सभी लोग आत्मसंकल्पित होते हैं, कि कार्य को पूर्ण करने तक हम इसी उत्साह के साथ जुटे रहेंगे।
परंतु असल में यह बहुत ही कम हो पाता है, आत्मसंकल्प की कमी के कारण ही दुनिया के ५०% से ज्यादा काम नहीं हो पाते, फ़िर भले ही वह निजी कार्य हो या फ़िर व्यापारिक कार्य । कार्य की प्रकृति कैसी भी हो, परंतु कार्य के परिणाम पर संकल्प का बहुत बड़ प्रभाव होता है।
कुछ कार्य संकल्प लेने के बावजूद पूरे नहीं कर पाने में असमर्थ होते हैं, तब उन्हें या तो मन द्वारा हृदय पर बलपूर्वक या हृदय द्वारा मन पर बलपूर्वक रोपित किया जाता है। बलपूर्वक कोई भी कार्य करने से कार्य जरूर पूर्ण होने की दिशा में बढ़ता है, परंतु कार्य की जो मूल आत्मा होती है, वह क्षीण हो जाती है।

Sunset from Ganges Rajghat Bridge top,Varanasi.



मन है, तनिक ठहर लूँ
मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।
बैठ मिटाऊँ क्लेश, रहा जो शेष, सहजता भर लूँ ।।
देखो तो दिनभर, दिनकर संग दौड़ रही,
यश प्रचण्ड बन, छा जाने की होड़ रही,
स्वयं धधक, अनवरत ऊष्मा बिखरा कर,
प्रगति-प्रशस्था, प्रायोजन में जोड़ रही ।
अस्ताचल में सूर्य अस्त, अब निशा समान पसर लूँ ।
मन फिर है, जीवन के संग, कुछ गुपचुप बातें कर लूँ ।।१।

ये सर्दियां और तुम्हारे प्यार की मखमली सी चादर...

आज मौसम ने फिर करवट ली है, ज़रा सी बारिश होते ही हवाओं में ठण्ड कैसे घुल-मिल जाती है न, ठीक वैसे ही जैसे तुम मेरी ज़िन्दगी के द्रव्य में घुल-मिल गयी हो... तुम्हारी ख़ुशबू का तो पता नहीं लेकिन तुम्हारा ये एहसास मेरी साँसों के हर उतार-चढ़ाव में अंकित हो गया है... आज शाम जब ऑफिस से निकला तो ठंडी हवा के थपेड़ों ने मेरे दिल पर दस्तक दे दी... इस ठण्ड के बीच तुम्हारे ख्यालों की गर्म चादर लपेटे कब घर पहुँच गया पता ही नहीं चला...


प्यार प्यार है
प्यार अँधा होता है सब जानते हैं
प्यार गूँगा होता है सब जानते हैं 
प्यार बहरा होता है सब जानते हैं
प्यार गहरा होता है सब जानते हैं
प्यार को न चाहिये हाथ और पैर
प्यार नही जानता अपना या गैर
प्यार प्यार चाहता है न कोई बैर
प्रेम करना है स्वर्ग की सुखद सैर

घर तो आने दो!
न दोष दो इन आँखों को न गाल पसरी बेशर्म लाली को
है खास कुछ इस जगह में, हवाओं में भी कुछ जहर है।
आँखें होंगी पाक गाल होंगे सफेद फिर, घर तो आने दो!

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 2


afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.
अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

माँ तो माँ है ...
मैंने देखा तुम मुस्कुरा रही हो
देख रही हो हर वो रस्म
जो तुम्हारी सांसों के जाने के साथ ही शुरू हो गयी थी
समझ तो तुम भी गयीं थीं
अब ज्यादा देर तुम्हें इस घर में नहीं टिका सकेंगे हम
अंतिम संस्कार के बहाने
बरसों से जुड़ा ये नाता
कुछ पल से ज्यादा नहीं सहा जाएगा  
कुछ देर तक
दूर से आने वालों का इंतज़ार
अंतिम दर्शन
फिर चार कन्धों की सवारी

चाय चाय चाय…
चाय का कोई वक्त नहीं
चाय तो बस मस्त कर देती है
सख्त दिमाग को खुशनुमा कर देती है
कई दर्द भाप बन उड़ जाते हैं
चाय संग कई बात बन जाते हैं
चाय पर कई जज़्बात खिल जाते हैं
बन चुकी है अब ये आदत
कि चाय हमारी मेहमान-नवाजी
और हमारे तहजीब में आती
कि बातों बातों में बन जाती है चाय
और बातों बातों में उड़ जाती है चाय
कई फलसफे बन जाते हैं चाय पर
कई किस्से उभर आते हैं चाय पर
कई अफसानों का गवाह बनता है चाय
और कई रिश्तों की शुरुआत होती है चाय


टेंगर


[टेंगर, और यह कि सोंइस (मीठे जल की डॉल्फिन) रोज दिखती है यहां।]
लल्लन, बायें और राकेश खड़ा हुआ, दायें।
लल्लन, बायें और राकेश खड़ा हुआ, दायें।
एक नाव पर वे दो थे – बाद में पता चला नाम था लल्लन और राकेश। लल्लन के हाथ में पतवार थी और राकेश जाल डाल रहा था गंगा नदी में।
हम – मैं और मेरी पत्नीजी – गंगा किनारे खड़े देख रहे थे उनकी गतिविधियां। उनकी नाव कभी बीच धारा में चली जाती और कभी किनारे आने लगती। इस पार पानी काफी उथला था, सो पूरी तरह किनारे पर नहीं आती थी। नाव के कुछ चित्र भी लिये मैने। एक बार जब किनारे से लगभग बीत पच्चीस गज की दूरी पर होगी, मैने उनसे बात करने की गर्ज से चिल्ला कर कहा – कितनी मिल रही हैं मछलियां?


गणित छोड़, सब विषयों में फेल
इस चिट्ठी में रामनुजन के द्वारा बिताये स्कूल के जीवन की चर्चा है।

गॉवर्मेन्ट कॉलेज कुम्बाकोनम जहां रामानुजन फेल हो गये - चित्र यहां से

रामानुजन ने प्राइमरी परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। स्कूल में प्रवेश लेते समय, इनकी ख्याति गणित के जानकार के रूप में हो चुकी थी। 
एक दिन स्कूल में, उनके वरिष्ठ विद्यार्थी ने यह जानने के लिये कि उन्हें वास्तव में गणित की जानकारी है अथवा नहीं, निम्न समीकरण हल करने के लिए कहा:
√क + ख = ११
क + √ख = ७


ब्‍लागरी का बाइ-प्रोडक्‍ट
आप सभी वेब परिचित, प्रत्‍यक्ष मुलाकात तक अन्‍तरिक्षीय देवों की तरह होते हैं, इसलिए यहां, आपके 'सामने' ईमानदार बना रह सकना आसानी से संभव हो जाता है, ज्‍यों कन्‍फेशन बाक्‍स की सचबयानी।
पड़ोसी और अजनबी-परदेसी से बात छुपाने का औचित्‍य नहीं होता, पड़ोसी को पता चलनी ही है, अजनबी को क्‍या लेना-देना बातों से और उसके साथ सब बातों को परदेसी हो जाना है। आप सब तो बगल में होकर भी परदेसी हैं, फिर आपसे क्‍या दुराव-छिपाव।
माना कि दीवारों के भी कान होते हैं मगर 'आनेस्‍टी इज द बेस्‍ट पालिसी' ... कभी सच भी तो सर चढ़कर बोलने लगता है, प्रियं ब्रुयात से अधिक जरूरी सत्‍यं ब्रुयात हो जाता है।
वैसे सच और ईमानदारी के पीछे अगर कोई कारण होते हैं, वह सब लबार के लिए भी लागू हो जाते हैं, ज्‍यों शराबी बाप के दो बेटों में एक शराब पीने लगा, क्‍योंकि उसका बाप शराबी था और दूसरा शराब से नफरत करता, कारण वही कि उसका बाप शराबी था। या दार्शनिक वाक्‍य- 'जो सुख का कारण है, वही दुख का कारण बनता है।' बहादुरशाह ज़फर की कही-अनकही है-
कहां तक चुप रहूं, चुपके रहे से कुछ नहीं होता,
कहूं तो क्‍या कहूं उनसे, कहे से कुछ नहीं होता।

अकहानी.

                                                                  (चित्र गूगल से साभार)             
"सबके सामने कमिश्नर साहब ने मुझे इतना डाँटा, सिर्फ़ आपकी लापरवाही के कारण। फ़ाईलों का गट्ठर साथ रख लिया  लेकिन उन्होंने मौके पर जो रिपोर्ट माँगी, वही साथ लेकर नहीं गये।"
बड़े बाबू ने मिमियाते हुये कहा, "साहब, मीटिंग की तैयारियों का जायजा लेते हुये आपने ही कहा था कि ये सब फ़ालतू की रद्दी यहीं रख दो। मैंने तो कहा भी था कि कमिश्नर साहब मीटिंग  के अजेंडे से बाहर भी कुछ पूछ सकते हैं। आपने ही कहा था कि मीटिंग है कोई इंटरव्यू.."


ये क्या हो रहा है राष्ट्रपति महोदय???

इस तस्वीर पर क्या लिखा जाए? मौका था, संविधान निर्माता भीमराव बाबा साहेब आम्बेडकर की पुण्यतिथि पर आयोजित समारोह का और जगह था लोकतंत्र का मंदिर, यानि कि संसद भवन। बाबा साहेब को इस दुनिया से रूखसत हुए 57 साल हो गए। अपने पूरे जीवनकाल में बाबा साहब ने असमानता  का विरोध किया और उनका मूल मर्म था, हर इंसान को उसका वाजिब हक दिलाना। उनको सच्ची श्रद्धांजलि भी यही होती कि उनके बताए रास्ते पर चला जाए और इंसानों के बीच हो रहे भेद को समाप्त करने काम किया जाए लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसा हो नहीं रहा है और उनकी पुण्यतिथि के मौके पर  आयोजित समारोह के ठीक बाद ही उनके आदर्शों की धज्जियां उड़ाई गईं और यह तस्वीर सामने आई।

बट टाइम माय फ्रेंड, इज लीनियर

कोई नयी भाषा है जो मेरे और तुम्हारे दरमियान उगने लगी है. नीले आसमान से लेकर दूर नीले समंदर तक एक नया व्याकरण रच रहा है. शरद, वसंत, ग्रीष्म और पावस, सारे मौसम हमारे लिए सिर्फ कुछ शब्द बन जाना चाहते हैं. नदियों में इकठ्ठा हो रहा है मेरे तुम्हारे बीच का संवाद...पक्षी सुना रहे हैं तुम्हें मेरी याद का गीत.


ग्राम यात्रा : कुछ यादें तस्वीरों में

“  कौन सी वो रात है गुज़री , जो तुझे याद कर ये आंखें रोई नहीं हैं ,
  होंगी कायनातें कई कयामत सी खूबसूरत , मेरे गांव तुझसा कोई नहीं है “
मुद्दत बात गांव जाना हुआ और इस बार ऐसा बहुत सारे कारणों से हुआ । मां फ़िर बाबूजी का एक के बाद एक अचानक हमें छोड कर चले जाना इनमें से एक बडा कारण रहा । पिछले दिनों जब अस्वस्थ हुआ और बुरी तरह हुआ तो यकायक यूं लगा मानो जीवन का एक हिस्सा जो बहुत पीछे छूटा जा रहा था वो आंखों और दिमाग में चलचित्र की तरह चलने लगा । मैंने उसी समय ये फ़ैसला किया कि ठीक होते ही सबसे पहले गांव की ओर भाग निकलूंगा । अब शहर की इस घुटन से थोडी सी आज़ादी के लिए मन छटपटाने लगा । और पहली फ़ुर्सत मिलते ही मैं निकल भी लिया । लौटा हूं तो लग रहा है कि जीवन का एक नया टुकडा जी कर आया हूं । चचेरे भाई के गौने के कारण , सब पहले से ही जुटे हुए थे सो जाने कितनी ही यादें , प्यार समेट लाया । सब कुछ तफ़सील से बताउंगा आपको । फ़िलहाल आप मेरे द्वारा खींचे गए लगभग पांच सौ से ज्यादा तस्वीरों में से कुछ को देखें । शेष अगल पोस्टों की श्रंखला में



एक ज़िंदा प्रेत का बयान

आज से ठीक बीस साल पहले यानि, 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्ज़िद ढाह दिया गया. देश को एकबार फिर धर्मान्धता की अंधी सुरंग में झोंकने की कोशिश की गई. जिसमें लोग कामयाब होते भी दिखे पर भला हो इस देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरुप का जो देर सवेर ही सही पर कारगर तरीके से प्रकट होता रहता है. एक तरफ़ कुछ पगलाए नेताओं के बहकावे में आकर लोग कानफाडू शोर के साथ हत्याओं में संलग्न होतें हैं वहीं दूसरी तरफ़ बहुतेरे लोग चुपचाप धर्मनिरपेक्ष होकर दूसरे धर्म के लोगों को यथासंभव संरक्षण देते रहतें हैं. ये भारत का एक अजीब विरोधाभासी सत्य है. किसी दूसरे मज़हब के कब्र पर अपने मज़हब का जश्न मानना अभी भारतीय परम्परा में शामिल नहीं हुआ है, पर ऐसा भी नहीं कि ऐसे उदाहरण नहीं मिलते. हर काल में धार्मिक कट्टरवाद ने अपने स्वार्थ के लिए फन उठाया है और हज़ारों बेगुनाहों का रक्तपान करके अपने बिल में समा गया. धर्म, जाति आधारित राजनीति से शायद ही कोई चुनावी दल अछूता हो. हाँ कोई खुलके बोलता है तो कोई कम्बल के नीचे घी पीने का मज़ा लेता है. कोई दलित का दल है, कोई अल्पसंख्यक का, कोई हिंदुओं का तो कोई यादवों का, कोई कुर्मी का, कोई इसका तो कोई उसका. हर किसी के पास अपना घोषित-अघोषित नकाब है जिसका इस्तेमाल समय के हिसाब से होता रहता है.

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

यारों सब दुआ करों ... ब्लॉग बुलेटिन

अजय झा से मिल कर आया .... सो रहे थे... तबीयत बहुत खराब लग रही थी ... पंद्रह दिन से पीलिया था... टेस्ट मे लीवर मे पस आ जाने से स्थिति खराब हो गयी है ... डाक्टर ने छह से सात हफ्ते के लिए बेड पर रहने की संभावना व्यक्त की है और फिलहाल 48 घण्टे तक स्थिति बेहतर होने की उम्मीद करनी चाहिए... पहले दवाओं से ही स्थिति नियंत्रण मे करने की कोशिश की जा रही है ॥

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