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शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

इस देश में बीमार पड़ने का हक़ किसी गरीब को नहीं है



धंधे में शामिल होने जाता एक एम्बुलेंस 


आज फिर वही छ: साल पुरानी वाली तल्ख़ स्थतियों से गुजरा जिनसे मैं और परिवार तब गुजरे थे जब मैं अचानक ही बहुत अधिक अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती हो गया था और तब से लेकर आज तक जाने कितनी ही बार ऐसी अनेकों परिस्थितयों हालातों घटनाओं को अपने आसपास , मित्रों ,और उनके आसपास भी घटते हुए देखा सुना , उससे यही निष्कर्ष निकला कि , 

इस देश में बीमार पड़ने का हक़ मध्यमवर्ग/गरीब वर्ग को नहीं है , क्योंकि अस्पताल देश की राजधानी समेत सारे छोटे नगरों कस्बों तक में सिर्फ और सिर्फ इसलिए खुले हैं कि तीमारदारों की अस्थि तक चूस कर बीमार को लाश में तब्दील करके आपको वापस कर दें | 

सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने का अड्डा बन चुके ऐसे तमाम अस्पताल , उनमें चिकित्सा के नाम संगठित लूट इंसान से हैवान बन चुके चिकिस्तक ,उनके सहयोगी सब के सब संगठित अपराध के दोषी हैं जिन्हें तत्काल सूली पर चढाया जाना चाहिए | 

सबसे आखिरी बात , अपने परिवार को सबसे बड़ा अनमोल धरोहर जो आप दे सकते हैं और जो देना चाहिए  वो है खुद को बीमार होने से बचाना | 

हो सकता है कि ,ऐसा सबके साथ न हुआ हो , तो आप खुशकिस्मत हैं और अपवाद हैं , अस्पताल से लौटा हूँ , क्षुब्ध भी हूँ और बेहद व्यथित भी , आप आज की ये पोस्टें पढ़िए

पहले पढ़िए ये पोस्ट , बाकी सब है इसके बाद
धूमिल के संग बैठ लीजिये आप लोहे का स्वाद 


अरे रुकिए महाराज , आप आखिर चले किधर
मुकेश सिन्हा कह रहे मेरा नदी सा है ये सफर 


कोई देखता होगा ,कोई बोलता होगा
डा शरद कह रहीं , कोई सोचता होगा


रुक जा प्यारे , अभी तो यहीं रह ,
रश्मि जी के साथ ,बीती बात की तरह


कोई फूला गुमान में , कोई घमंड में ऐंठा
अनुराधा कह रही हैं ,जमाना बैरी बन बैठा 


चलिए अब इससे थोड़ा इतर पढ़ के आएं
जानिये आखिर क्या राफेल के मार्ग में बाधाऐं 


घूम फिर के जीवन अपना तुम भी सवारो
कह रहे नीरज जाट ,मैं मुसाफिर हूँ यारों

शुभ रात्रि | अपना ख्याल रखिये तभी आप अपनों का ख्याल रख पाएंगे 


5 टिप्पणियाँ:

anuradha chauhan ने कहा…

सुंदर बुलेटिन प्रस्तुति बहुत बहुत आभार मेरी रचना को बुलेटिन का हिस्सा बनाकर मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए

Kavita Rawat ने कहा…

कमोवेश हर जगह यही हाल हैं, गरीबी अभिशाप तो है ही ऊपर से लूटमारी उनके ही हिस्से लिखी होती है
गंभीर चिंतन का विषय और बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!

Meena Bhardwaj ने कहा…

बहुत सुन्दर बुलेटिन ।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

दुख: हुआ सुन कर। आप स्वस्थ होवें यही कामना है। स्वास्थ विषय पर बिल्कूल सौ आना सही बात है सोचिये जरा पहाड़ों पर जहाँ हस्पपताल होना ही एक सपना होता है क्या हाल होता होगा मरीजों का? यहाँ तक हम पहाड़ी शहर के शहरी लोग जो अपना इलाज करवा सकते हैं उनके लिये भी चिकित्सक उपलब्ध नहीं होते हैं क्योंकि पहाड़ पर मरीज पैसा नहीं उगल सकते हैं इसलिये चिकित्सक पहाड़ पर चढ़ना ही नहीं चाहते हैं।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

चार साल पहले ऐसे ही अनुभवों से गुज़र चुका हूँ, बाक़ी जब आप भर्ती हुये थे तब भी देखा था, सरकारें कितनी भी आयें जाएँ आम जनता वैसे ही पिसती रहती है|

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