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रविवार, 23 मार्च 2014

ब्लॉग-बुलेटिन का बसंती चोला - 800 वीं पोस्ट

वो देश जहाँ कभी “मेरा रंग दे बसंती चोला” गूँजा करता था, आज मीका सिंह का “तू मेरे अगल बगल है” गूँजता है... जहाँ “हम भी आराम उठा सकते थे घर पे रहकर” सुना करते थे लोग, वहाँ यो यो हन्नी सिंह का “चार बोतल वोदका” सुनाई देता है. वे नौजवान थे जिन्होंने देश को अंग्रेज़ों से आज़ादी दिलाने के लिये अपनी जवानी क़ुर्बान कर दी – क्या लोग थे वो दीवाने या लोग थे वो अभिमानी.

आज भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की शहादत को याद करने का दिन है. और आज उनकी प्रासंगिकता और भी शिद्दत से महसूस होने लगी है.

आज जब हीरो का मतलब क्रिश या स्पाइडरमैन है, किसे याद रहता है कि हाड़, माँस के बने ये हीरो असली हीरो थे, जिनकी क़ुर्बानी के कारण हम आज ख़ुद को एक आज़ाद मुल्क का शहरी कह पा रहे हैं.

आइये, आज के दिन उन महान आत्माओं को सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए उनसे ये वादा करें:



हम बसाएँगे, सजाएँगे, सँवारेंगे तुझे,
हर मिटे नक्श को चमका के उभारेंगे तुझे
अपनी शह रग़ का लहू दे के निखारेंगे तुझे
दार पे चढ़ के फिर इक बार पुकारेंगे तुझे.

राह अग़ियार की देखें ये भले तौर नहीं,
हम भगत सिंह के साथी हैं कोई और नहीं!

हम वो दीपक हैं जो आँधी में जला करते हैं
हम वो ग़ुंचे हैं जो बिजली पे हँसा करते हैं
दर्द बनके दिल-ए-गीती में उठा करते हैं
उठ की आईन-ए-फ़ुगाँ तोड़ दिया करते हैं

ज़ुलमत-ए-ग़म में चमक उठते हैं तारों की तरह
दौड़ जाते हैं फ़िज़ाओं में शरारों की तरह!

भूख ने, प्यास ने, इफ़लास ने पाला है हमें
कभी बहके हैं तो फ़ाकों ने सम्भाला है हमें
ज़ब्र ने आहनी तंज़ीम में ढाला है हमें
झोंपड़े फूँक के मैदाँ में निकाला है हमें

आज हर मोड़ पे लिक्खेंगे कहानी अपनी
अपनी धरती में समो देंगे जवानी अपनी!
                  
                            ~ कैफ़ी आज़मी


और अब कुछ पोस्ट्स आपके लिए 
























तो अब मुझे इजाज़त दीजिये ... ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से सभी पाठकों को ८०० वीं पोस्ट की हार्दिक बधाइयाँ ... ऐसे ही स्नेह बनाए रखें |

सादर आपका 
सलिल वर्मा

लेखागार