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गुरुवार, 4 मई 2017

देश के दुश्मन - बाहर भी, भीतर भी : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
देश की सीमा पर पाकिस्तानी सेना का उत्पात उसकी आदत के अनुसार चल रहा है. देश की सीमा के भीतर जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजों की हरकतें जारी हैं तो नक्सलियों की हिंसात्मक गतिविधियाँ भी चल रही हैं. इन सबके बीच आमजन की तरफ से सबको मटियामेट कर देने के लिए आवाजें उठ रही हैं. पाकिस्तान को उसकी बर्बरता का यथोचित जवाब न देने के केंद्र सरकार को सोशल मीडिया पर अपशब्दों सहित आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है. पता नहीं इस आक्रोश का कितना हिस्सा सरकार तक पहुँच रहा है किन्तु सत्यता यह है कि आम जनमानस में आक्रोश बहुत ज्यादा है. सरकार को तमाम मंचों से सलाह दी जा रही है कि वह अमेरिका, फ़्रांस, जर्मनी, इजराइल जैसी नीति अपनाकर अपने दुश्मनों का सफाया करे. 


सही बात है, दुश्मनों के सफाए के लिए कठोर नीति का बनाया जाना आवश्यक है किन्तु क्या एक पल को सोचा गया है कि क्या इन देशों में कभी ऐसा होता देखा गया है कि
यहाँ के किसी नेता ने दूसरे देश के टीवी पर सार्वजनिक रूप से अपने राष्ट्राध्यक्ष को हटाने सम्बन्धी मदद मांगी हो?
इन देशों के भीतर इसी देश से आज़ादी पाने के नारे लगे हों?
इनके साहित्यकारों ने अकारण सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए पुरस्कार वापसी जैसा कोई कदम उठाया?
यहाँ जब भी विरोधी देशों पर, आतंकवाद पर कार्यवाही की गई तो विपक्षी दलों ने सरकार से उसके सबूत मांगे हों?
यहाँ किसी नेता ने, किसी बुद्धिजीवी ने किसी आतंकी को अपना भाई कहा हो? भटका नौजवान कहा हो?
यहाँ के किसी भी राज्य के नागरिक अपनी ही सेना पर पत्थर बरसाते हों?
देश के भीतर उसी देश का राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाता हो?
अपनी ही बेटी को आतंकियों द्वारा अपहृत करवाकर उनके लिए अपने ही घर से खाना भिजवाया जाता हो?

शायद हम में से किसी ने भी इन देशों में ऐसा माहौल नहीं देखा होगा. हमारा देश ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ देश के भीतर उपद्रव करने वालों को भटका नौजवान कहकर गले लगाया जाता है. वीर सैनिकों को धोखे से मारने वालों को मासूम वनवासी कहकर एक और हमले के लिए प्रोत्साहित कर दिया जाता है. सेना की कार्यवाही का सबूत माँगा जाने लगता है. एक व्यक्ति की मौत पर देश भर में असहिष्णुता बढ़ने लगती है. लोगों की पत्नियों को डर लगने लगता है. देश छोड़ने की बातें होने लगती हैं. बुद्धिजीवी अपने-पाने घरौंदों से बाहर आकर पुरस्कार वापसी में लग जाते हैं.

सोचिये ऐसे माहौल में सरकार, सेना, सैनिक किससे लड़ें? देश के बाहर के दुश्मनों से या फिर देश के भीतर छिपे दुश्मनों से? ऐसे माहौल में जब देश के टुकड़े करने वाले नारों पर, आज़ादी तक संघर्ष करने के नारों तक, आतंकवादी के पक्ष में लगते नारों के समर्थन में संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति आ जाये, देश की पुरानी पार्टी का दम भरने वालों के पदाधिकारी आ जाएँ तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है. ऐसे भयावह माहौल में अब जबकि सैनिक आये दिन शहीद हो रहे हैं, घुसपैठ बराबर हो रही है, घाटी में हिंसा जारी है, सेना पर पत्थरबाजी लगातार चल रही है किसी को असहिष्णुता नहीं दिख रही है, किसी की बीवी को डर नहीं लग रहा है, कोई देश छोड़ने की बात नहीं कर रहा है. फिर सोचिये एक पल को कि अचानक ये सब रुक गया और क्या शुरू हो गया? नक्सली हमला, पाकिस्तानी सेना का कायरानापन, घाटी की पत्थरबाज़ी, सेना के साथ दुर्व्यवहार. आखिर इन सबका एकसाथ चलने के पीछे का कारण क्या है? इन सबके मूल में क्या है? कहीं वे तो नहीं जिनके लिए आतंकी के लिए देर रात अदालत चलाई जा सकती है? कहीं वे तो नहीं जिनके लिए आतंकी भटके हुए भाई हैं? कहीं वे तो नहीं जिनके लिए देश के टुकड़े होने वाले नारों का समर्थन किया जाता है?

सोचिये, सोचिये और आइये आज की बुलेटिन की तरफ.

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गुरुवार, 9 मार्च 2017

आओगे तो मारे जाओगे - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो, 
मन कुछ अनमना सा है. लाख कोशिशों के बाद भी स्थितियाँ बदलती लग नहीं रही. लोग शिक्षित होते जा रहे हैं, उतने ही आक्रामक होते जा रहे हैं. पता नहीं किस उद्देश्य से आतंकवाद पनपता जा रहा है. हत्याओं का दौर बढ़ता जा रहा है. देश से दूर अपनी नापाक हरकतें दिखाता ISIS के कदम देश में पड़ चुके हैं, ऐसा ऐलान उनकी तरफ से ही हो चुका है. कई घंटों की मेहनत के बाद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में छिपा उनका आतंकी मारा गया. यदि ISIS देश में इस रूप में आ चुका है तो उनको स्पष्ट सन्देश कि वे सब इसी तरह समाप्त किये जायेंगे. इसको और स्पष्ट करते हुए दैनिक जागरण ने अपने आज दिनांक 09-03-2017 के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर एक कार्टून प्रकाशित किया है. उसी कार्टून को आज की बुलेटिन का आधार बनाते हुए आज की बुलेटिन आपके सामने पेश है.... 

 


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गुरुवार, 14 जुलाई 2016

जाने-अनजाने आतंकवाद का समर्थन - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आतंकवादियों के समर्थन में नारे लगना, उनके समर्थन में रैलियाँ करना, उनको शहीद घोषित करना, सेना के विरोध में खड़े होना, आतंकवादी के अंतिम संस्कार में अप्रत्याशित भीड़ का जुटना आदि वे बातें हैं जो सामान्य नहीं कही जा सकती हैं. हाल ही में एक आतंकी की मौत के बाद सेना का विरोध, राज्य में हिंसात्मक घटनाओं का होना, किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए. केंद्र सरकार का विरोध करने के लिए, मुस्लिमों के समर्थन में खड़े होने के लिए जिस तरह से आतंकवादियों का समर्थन किया जा रहा है वो निंदनीय है. जो लोग इन घटनाओं के सन्दर्भ में जम्मू-कश्मीर को आज़ाद किये जाने के पक्ष में, वहाँ जनमत-संग्रह कराये जाने के समर्थन में, जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का अंग मान लेने के पक्ष में वकालत करते दिख रहे हैं वे वास्तविक रूप में जम्मू-कश्मीर के समर्थन वाली नहीं वरन केंद्र सरकार के विरोध वाली मानसिकता से काम कर रहे हैं. सोचना होगा कि जम्मू-कश्मीर को आज़ाद कर देने से क्या देश भर में आतंकी घटनाओं की समाप्ति हो जाएगी? न सही देश भर में, क्या जम्मू-कश्मीर में ही शांति हो जाएगी? जनमत-संग्रह समर्थकों को समझना होगा कि विगत कई दशकों से जिस तरह से वहाँ के मूल निवासियों को हिंसात्मक गतिविधियों के द्वारा प्रताड़ित करके भगाया गया, उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा किया गया उसके बाद से वहाँ मूल निवासियों की संख्या नाममात्र को रह गई है. पाकिस्तान समर्थित आतंकी सोच वाले, स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर की माँग करने वाले अलगाववादी मानसिकता वाले लोगों ने वहाँ कब्ज़ा कर रखा है. ऐसे में जनमत-संग्रह का कोई अर्थ नहीं रह जाता है. उस राज्य की आज़ादी से देश में अन्य दूसरे राज्य अपनी स्वतंत्रता के लिए हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेना शुरू कर देंगे.


यहाँ केंद्र सरकार को कठोर कदम उठाये जाने की जरूरत है. उसके कठोर कदमों के साथ-साथ नागरिकों को भी संयम बरतने की आवश्यकता है. उन्हें महज राजनैतिक कठपुतली न बनते हुए देश-हित में अपनी आवाज़ उठानी चाहिए. उन्हें समझना होगा कि सेना अपने लिए नहीं वरन देश के लिए, देशवासियों के लिए अपनी जान जोखिम में डाल कर आतंकियों का मुकाबला करती है. ऐसे में महज विरोध के लिए नागरिकों का आतंकियों के समर्थन में खड़े हो जाना, आतंकी को शहीद बताने लगना दुर्भाग्यपूर्ण है. आज़ाद देश में आज़ादी की माँग करने वाले आतंकियों की मानसिकता स्पष्ट है, उसी मानसिकता का परिचय देते आम नागरिक भी किसी रूप में आतंकवादी से कम नहीं. आतंकी जहाँ बम-बन्दूक का इस्तेमाल करते हुए मौत बाँट रहे हैं वहीं तथाकथित बुद्धिजीवी केंद्र सरकार के विरोध के लिए आतंकियों का समर्थन कर मौत बाँटने में सहयोगी बन रहे हैं. वे किसी न किसी रूप में अपने को जम्मू-कश्मीर का, आतंकवादी का, मानवाधिकार का सच्चा समर्थक नहीं वरन आतंकवादी ही सिद्ध कर रहे हैं.

देश में सबकुछ सामान्य हो जाये, सामान्य रहे इसी कामना के साथ आज की बुलेटिन आपके सामने प्रस्तुत है.

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(चित्र गूगल छवियों से साभार)

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

पठानकोट और मालदा जैसा अब स्वीकार नहीं - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
वर्ष २०१६ की अपनी पहली बुलेटिन के साथ आपका मित्र उपस्थित है. ‘आप सबको नववर्ष मंगलमय हो’ कहने की हिम्मत इस समय हममें नहीं है. मात्र एक सप्ताह के भीतर ही देश में भूचाल सा आ गया. पठानकोट की आतंकी घटना ने जहाँ एक तरफ हमारी सुरक्षा व्यवस्था को आईना दिखाया है वहीं पाकिस्तान के साथ शांति-वार्ता जैसी पहल की आशंका को भी चकनाचूर सा किया है. ऐसा इसलिए क्योंकि चंद रोज पहले ही देश के प्रधानमंत्री ने एकाएक पाकिस्तान की यात्रा करके सबको भौचक कर दिया था. उनकी उस औचक यात्रा में नरेन्द्र मोदी जितनी देर पाकिस्तान में ठहरे, कहीं से भी किसी आतंकी घटना की खबर नहीं आई, कहीं भी कोई बम नहीं फूटा. इस घटनाक्रम ने सम्पूर्ण विश्व में एक सन्देश भी प्रसारित किया था कि यदि पाकिस्तान की सेना, वहाँ के सत्ताधारी यदि चाह लें तो कोई भी आतंकी संगठन एक बम धमाका भी नहीं कर सकता है. ऐसे में यात्रा के तत्काल बाद ही पठानकोट पर आतंकी हमला सारी कहानी स्पष्ट करता है.

इस बाहरी हमले के साथ-साथ पश्चिम बंगाल में मालदा में हुए हिंसात्मक प्रदर्शन ने भी हमें डराया है. ये समझने वाली बात है कि कल को देश में यदि कोई बड़ा आतंकी हमला हो जाये और उसी समय देश में कई-कई जगहों पर मालदा जैसी स्थितियाँ पैदा हो जाएँ तो सुरक्षा, शांति व्यवस्था को संभालना किसी भी सरकार के लिए परेशानी का सबब बन जाएगी. इससे भी भयावह स्थिति ये रही कि उत्तर प्रदेश के दादरी में अख़लाक़ के साथ हुई घटना को मीडिया ने जिस तरह से वैश्विक स्तर पर उभार दिया था; देश के कथित धर्मनिरपेक्ष लोगों ने पुरस्कार/सम्मान वापसी का घृणास्पद कार्य करना शुरू कर दिया था; गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों ने जिस तरह से वैमनष्यतापूर्ण बयानबाज़ी की थी वे सब मालदा की हिंसा पर शांति धारण किये रहे. तुष्टिकरण की नीति राजनीति से निकल कर अब समाज में, मीडिया में जिस तरह से फ़ैल रही है वो भविष्य के लिए घातक संकेत है.

फ़िलहाल तो पठानकोट का आतंकी हमला कई सवाल छोड़ गया; मालदा की साम्प्रदायिक हिंसा ने भी कई सवाल छोड़े हैं किन्तु अब इनको अनदेखा किया जाना राष्ट्रहित में नहीं होगा. सरकार के लिए जितना आवश्यक बाहरी आतंकी ताकतों से लड़ना है उससे कहीं अधिक आवश्यक आंतरिक ताकतों से निपटना भी है. ये आंतरिक आतंकी ताकतें अलग-अलग, नामालूम से स्वरूप में हमारे तंत्र के साथ मिली-जुली हैं और यही कारण है कि इनके द्वारा कभी पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाये जाते हैं कभी पाकिस्तान के, कभी आईएसआईएस के झंडे फहराए जाते हैं, कभी भारत मुर्दाबाद का शोर उठाया जाता है, कभी तिरंगा जलाया जाता है. ऐसे में स्पष्ट रूप से संकेत स्वतः मिलता है कि अब शांति और ज्यादा देर तक नहीं, अब धैर्य बहुत समय तक नहीं.

पठानकोट में शहीद सैनिकों को, मालदा के हिंसात्मक प्रदर्शन में मारे गए मासूम नागरिकों को विनम्र श्रद्धांजलि सहित आज की बुलेटिन.

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नववर्ष के आरम्भ ने देशव्यापी इस संकट को देने के साथ ही हमारी एक मित्र को उसके परिवार के चार सदस्यों सहित छीन लेने का व्यक्तिगत दुःख भी दिया, उन सबको भी श्रद्धासुमन.

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

आतंकवाद और हमारी एकजुटता - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
गुरुवार की बुलेटिन एक बार फिर आपके सामने है. फिर वही विषय हैं, फिर वही चर्चाएँ हैं, फिर वही विमर्श हैं, फिर वैसे ही कुतर्क हैं, फिर वैसी ही समस्याएँ हैं. क्या कभी कुछ बदलेगा? क्या कभी कुछ सुधरेगा? क्या कभी देशवासी किसी संवेदनशील मुद्दे पर एकमत होंगे? क्या कभी देशहित को राजनीति के चश्मे से देखना बंद किया जायेगा? बहुत-बहुत सवाल हैं जो लगातार दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं. इन सवालों के बीच बजाय सुधार के दूसरे देशों के, विशेष रूप से पश्चिमी देशों के उदाहरण दिए जाने लगते हैं. पश्चिम के किसी देश में हुई आतंकी घटना के बाद उस देश के द्वारा की गई जवाबी कार्यवाही की हम सब प्रशंसा करने लगते हैं. हम सब उस देश की, उस देश के नागरिकों की, उस देश के राजनीतिज्ञों की तारीफ करने में जुट जाते हैं. क्या कभी हमने आतंकी घटना का शिकार बने ऐसे किसी देश की वास्तविकता को, वहाँ के नागरिकों की मानसिकता को, उधर की मीडिया की नजर को जानने-समझने का प्रयास किया है?
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यदि अभी हाल ही में फ़्रांस में हुए आतंकी हमले को देखें तो वहाँ हमला होने के बाद नागरिकों ने तो संयम का परिचय दिया है साथ ही वहाँ के राजनेताओं ने, राजनैतिक दलों ने भी पर्याप्त सूझबूझ का परिचय दिया. किसी की भी तरफ से न तो विवादस्पद बयान आये और न ही अपने राष्ट्राध्यक्ष का इस्तीफ़ा माँगा गया. ऐसी घटना के बाद देश में लागू की गई इमरजेंसी का भी किसी तरह से विरोध नहीं किया गया. इसके साथ-साथ विशेष बात जो सामने आई वो ये कि वहाँ की मीडिया ने किसी भी तरह से क्षत-विक्षत शवों की प्रदर्शनी सी नहीं लगाई, किसी भी तरह की अफवाह को फैलने में सहायक नहीं बनी, किसी एक राजनैतिक दल अथवा राजनेता के विरुद्ध अपना नजरिया नहीं रखा. यदि एक पल को हम अपने सन्दर्भ में ऐसी घटनाओं का आकलन करें तो राजनैतिक दलों के, राजनेताओं के विवादस्पद बयान किस तरह सम्पूर्ण माहौल को प्रभावित कर देते, कहने की जरूरत ही नहीं; नागरिक भी अपने आपको तुरन्त अलग-अलग गुटों में बाँटकर बयानबाज़ी में सहायक सिद्ध होने लगते हैं; मीडिया घटना की विभीषिका को और बढ़ा-चढ़ा कर आन्तरिक स्थिति को बिगाड़ने में सहायक बनने लगती है.
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अभी हाल ही में मणिशंकर अय्यर द्वारा पाकिस्तान मीडिया में दिए गए बयान के बाद भी देश के नागरिकों, राजनेताओं, राजनैतिक दलों की ख़ामोशी, विभेद ही ये स्पष्ट करने को पर्याप्त है कि हम आतंकवाद के मुद्दे पर एकमत क्यों नहीं हो सकते. इसी के साथ ये भी स्पष्ट है कि जब तक हम नागरिक देशहित के मुद्दे पर, सुरक्षा के मुद्दे पर, आतंकवाद के मुद्दे पर एकमत नहीं होंगे तब तक जरा-जरा से आतंकी संगठन हमारे देश की सुरक्षा, शांति में सेंध लगाते रहेंगे, हम नागरिकों को मारते रहेंगे.
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बहरहाल, इसका इलाज तो खोजना ही होगा पर कैसे, कब. मन में ऐसी ही उथल-पुथल के बीच आज की बुलेटिन पर भी दृष्टि डालियेगा. शायद कोई हल समझ आये.

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गुरुवार, 6 अगस्त 2015

विरोध के पीछे का सत्य

            आतंकवादी को फाँसी की सजा सुनाई गई तो ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की तर्ज़ पर समाज के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों ने अपनी-अपनी आवाजें तेज़ करनी शुरू की और समाज में एक आतंकवादी के पक्ष में लोग खड़े दिखाई दिए. इस भीड़ में ऐसे चेहरे सामने आये जिनको समाज में सक्रियता लाने का सूचक साबित किया जाता रहा है, जिनको समाज में जागरूकता फ़ैलाने वाला माना जाता रहा है. ऐसा साबित करने का प्रयास किया गया मानो समूचे विश्व में एकमात्र भारत देश में फाँसी की सजा दिए जाने का प्रावधान है; कुछ इस तरह से समूचे घटनाक्रम को सामने रखा गया मानो भारतीय कानून व्यवस्था ने किसी भोले-भाले, मासूम, निरपराध को फाँसी की सजा सुना दी हो. कानून ने अपना काम पूरी पारदर्शिता से करते हुए आधी रात के बाद भी न्यायालय के द्वार खोलते हुए एक अपराधी की, एक आतंकी की फरियाद को सुना और ब्रह्ममुहूर्त में फाँसी देने का निर्णय बनाये रखा. अंततः एक आतंकवादी को फाँसी की सजा दे दी गई. 

            इस मामले में आतंकवादी के पक्ष में सहानुभूति दर्शाने वालों का उद्देश्य किसी न किसी रूप में ये साबित करना था कि वर्तमान केन्द्र सरकार ने सम्बंधित आतंकवादी को मुसलमान होने के कारण से फाँसी की सजा सुनाई. उन सबका मकसद सिर्फ ये दर्शाना था कि वे ही समूचे देश में मुसलमानों के एकमात्र और सच्चे हितैषी हैं और केन्द्र सरकार अथवा नरेन्द्र मोदी मुसलमानों के घोर विरोधी हैं. एक आतंकी की फाँसी की सजा का विरोध करने वालों के मूल में फाँसी की सजा का विरोध करना नहीं था, एक इन्सान को बचाना नहीं था, देश से फाँसी की सजा के प्रावधान को समाप्त करवाना नहीं था वरन उन सबका एकमात्र लक्ष्य केन्द्र सरकार का, भाजपा का, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करना था. यदि ऐसा नहीं था तो फिर इन लोगों के द्वारा दो-एक वर्ष पूर्व अफज़ल गुरू और कसाब की फाँसी का विरोध क्यों नहीं किया था? वे दोनों भी इन्सान थे, उन दोनों को भी फाँसी की सजा दी गई थी, उन दोनों को फाँसी की सजा भारतीय कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत सुनाई गई थी.

            देखा जाये तो मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति ने समाज से सही एवं गलत की पहचान को लगभग समाप्त कर दिया है. यहाँ आतंकवाद का भले ही कोई धर्म नहीं होता हो किन्तु एक आतंकवादी का धर्म निर्धारित होने लगता है. यहाँ आकर सोचने की आवश्यकता है कि की समाज में अब आतंकियों को भी हिन्दू-मुस्लिम की दृष्टि से अलग-अलग बाँटकर सजा का प्रावधान किया जाया करेगा? यहाँ ये तय करना होगा कि बुद्धिजीवी कहे जाने वालों का धर्म मजहबी दृष्टिकोण से आतंकियों को बचाने का ही रहेगा? अब जबकि आतंकवादी को फाँसी दे दी गई है, फाँसी के विरोधी बुद्धिजीवी भी शांति से अपने-अपने घरौंदों में बैठ चुके हैं तब सरकार द्वारा ‘पोर्न साइट्स’ के प्रतिबन्ध पर उठने वाला विरोध समाज में तेजी से फैलती सरकार-विरोधी मानसिकता का परिचायक है. भले ही सरकार ने पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध पर यू-टर्न ले लिया हो किन्तु समाज के एक वर्ग विशेष की मानसिकता सामने आ चुकी है. कुल मिलाकर इतना ही कहा जा सकता है कि ऐसे वर्ग की, ऐसे लोगों की मानसिकता किसी सार्थकता के लिए नहीं वरन केन्द्र सरकार के, भाजपा के, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध के लिए ही है. समाज में तेजी से फैलता ये दृष्टिकोण किसी सरकार के लिए नहीं वरन समाज के लिए ही घातक सिद्ध होगा.  

आइये समाज की चिंता करते हुए, सामाजिक परिवेश की चिंता करते हुए आज की बुलेटिन से रू-ब-रू होते हैं साथ ही एक प्रयास करते हैं सुन्दर, सभ्य, सुसंस्कृत समाज निर्माण का.

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दुर्लभतम मामलों में फांसी की सजा अऩुचित कैसे?

 

इस्लामिक विद्रोह के राह पर भारत!

 

राजनीति की बजाय जनता से जुड़े कांग्रेस


 

कलाम से प्रेम याकूब से घृणा - भारत के दो अद्भुत रूप



 

कौन था गायत्री मंत्र का रचियता?



मंगलवार, 26 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं (18)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -


अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का १८ वाँ भाग ...



पन्ने,प्रकृति,आकाश,  …… कलम के बगैर भी प्रतिभायें अपनी दिशा बना लेती हैं  . शब्द तो निश्चेष्ट आँखों से,सीले होठों से,घुटी घुटी आवाज़ों से,खो गई आवाज़ से भी निकलते हैं - एक स्पर्श महसूस कर लो,तो कई ग्रन्थ लिख जाते हैं - 
बस उन्हें ढूंढते जाओ,बहुत बड़ा है ये दुनिया का मेला  ....... कोई है,जो खींच लेता है अपनी तरफ !


किशोर कुमार खोरेन्द्र  
http://facebook.com/kishor.khorendra
"मन की किताब"

पुल से तुम्हारे घर तक
पहुंची ..सड़क पर मैं 
कभी नही चला हूँ 
पुल तक आकर ...
लौटते हुए मै ...
तुम्हें देखे बिना ....ही ...
यह मान लिया करता हूँ 
कि -
मैंने तुम्हें देख लिया है

मुझे लेकिन हर बार -
यही लगता है की -
बंद खिडकियों के पीछे ...
खड़ी हुई तुम -
हर प्रात:
हर शाम
उगते और डूबते हुए .....सूरज की तरह ..मुझे
जरूर देखती रही हो

सड़क के किनारे खड़े वृक्ष भी
अब
मुझे पहचानने लगे है
पत्तियाँ मेरे मन की किताब मे लिखी जा रही
कविताओ कों पढ़ ही लेती है

पुल पर बिछी सड़क कों
मेरी सादगी और भोलेपन से प्यार हो गया है
मेरे घर की मेज पर -जलता हुआ लैम्प
मुझसे पूछता है ..
क्या तुम्हारी कविता कभी समाप्त नही होगी ...?

मेरा चश्मा ...मेरी आँखों मे भर आये आंसूओ कों
छूना चाहता है
पर उसके पास भी हाथ नही है
काश तुम्हारी आँखों की रोशनी के हाथ लम्बे होते
और तुम मुझे छू पाती ......



अमरेन्द्र शुक्ला  

आज ,
बहुत दिनों के बाद ,
तुमसे बात करने को जी चाहा
तो सोचा पूछ लू तुमसे, की ,
तुम कैसे हो, 
कुछ याद भी है तुम्हे 
या सब भूल गए -----
वैसे, 
तुम्हारी बातें मुझे
भूलती नहीं, 
नहीं भूलते मुझे तुम्हारे वो अहसास 
जो कभी सिर्फ मेरे लिये थे 
नहीं भूलते तुम्हारे "वो शब्द" 
जो कभी तुमने मेरे लिए गढ़े थे ----

तुम्हे जानकार आश्चर्य होगा 
पर ये भी उतना ही सत्य है 
जितना की तुम्हारा प्रेम, 
की , 
"अब शब्द भी बूढ़े होने लगे है" 
उनमे भी अब अहम आ गया है 
तभी तो, 
इस सांझ की बेला में,
जब मुझे तुम्हारी रौशनी चाहिए 
वो भी निस्तेज से हो गए है 
मैं कितनी भी कोशिश करू
तुम्हारे साथ की वो चांदनी रातें, वो जुम्बिश, वो मुलाकातें 
जिनमे सिर्फ और सिर्फ हम तुम थे 
उन पलो को महसूस करने की 
पर इनमे अब वो बात नहो होती,

कही ये इन शब्दों की कोई चाल तो नहीं, 
या 
ये इन्हें ये अहसास हो चला है 
की इनके न होने से,हमारे बीच
एक मौन धारण हो जायेगा 
और हम रह जायेंगे एक भित्त मात्र,
क्यूंकि अक्सर खामोशियाँ मजबूत से मजबूत रिश्तों में भी, 
दरारे दाल देती है .....

तो मैं तुम्हे और तुम इन्हें (शब्दों को) बता दो 
मैं कभी भी तुम्हारी या तुम्हारे शब्दों की मोहताज न रही 
हमेशा से ही मेरी खामोशियाँ गुनगुनाती रही 
चाहे वो तुम्हारे साथ हो या तुम्हारे बगैर 
जानते हो क्यूँ , क्यूंकि , 
"शब्दहीन संवाद, शब्दीय संवाद से हमेशा ही मुखर रहा है"


विभा श्रीवास्तव  http://facebook.com/vrani.shrivastava

काश !
मैं एक विशाल वृक्ष और 
छोटे-छोटे पौधे ही होती ....

एक विशाल वृक्ष ही होती जो मैं ....
मेरी शाखाओं-टहनियों पर 
पक्षियों का बैठना - फुदकना 
मेरे पत्तों में छिपकर
उनका आपस में चोंच लड़ाना ,
उनकी चह-चहाहट - कलरव को सुनना , 
उनका ,शाखाओं-टहनियों पर ,पत्तों में घर बनाना ,
गिलहरी का पूछ उठाकर दौड़ना-उछलना मटकना , 
मेरी छाया में थके मनुष्य ,
बड़े जीव जंतुओं का आकर बैठना 
उनको सुकून मिलना , 
सबको सुकून में और खुश देख कर 
मेरी खुशी को भी पंख लग जाते ....
मेरे शरीर से निकली आक्सीजन की 
स्वच्छ वायु जीवन को सुकून देते , 

छोटे-छोटे पौधे ही होती जो मैं ....
मेरे फूलो से निकले खुसबु , 
वातावरण को सुगन्धमय बनाती ....
मेरे पत्तों-बीजों से 
औषधि बनते
सबको नवजीवन मिलते 
कितनी खुश होती मैं ...........
मुझे बयाँ करना मुश्किल है ......

लेकिन एक नारी औरत स्त्री हूँ मैं
जुझारू और जीवट
जोश और संकल्पों से लैस मैं
सामाजिक-राजनीतिक चादर की गठरी में कैद मैं

सामाजिक ढाँचे में छटपटातीं-कसमसातीं मैं 
नए रिश्तों की जकड़न-उलझन में पड़ कर 
पर पुराने रिश्तों को भी निभाकर 
हरदम जीती-चलती-मरती हूँ मैं
रिश्तों में जीना और मरना काम है मेरा ....
ऐसे ही रहती आई हूँ मैं 
ऐसे ही रहना है मुझे ?

उलझी रहती हूँ उनसुलझे सवालों में मैं
जकड़ी रहती हूँ मर्यादा की बेड़ियों में मैं
जीतने हो सकते हैं बदनामी का ठिकरा 
हमेशा लगातार फोड़ा जाता है मुझ पर
उलझी रहती हूँ मैं
लेकिन 
हँसते-हँसते सब बुझते -सहते 
हो जाती हूँ कुर्बान मैं 

कब-कब , क्यूँ-क्यूँ , कहाँ-कहाँ , कैसे-कैसे
छली , कुचली , मसली और तली गई हूँ मैं 
मन की अथाह गहराइयों में 
दर्द के समुद्री शैवाल छुपाए मैं 
शोषित, पीड़ित और व्यथित मैं 
मन, कर्म और वचन से प्रताड़ित मैं

मानसिक-भावनात्मक और 
सामाजिक-असामाजिक 
कुरीतियों-विकृतियों की शिकार मैं
लड़ती हूँ पुराने रीति-रिवाजों से मैं 
करती हूँ अपने बच्चों को सुरक्षित मैं
अंधविश्वासों की आँधी से 
खुद रहती हूँ हरदम अभावों में मैं
पर देती हूँ सबको अभयदान मैं 

अभाव ? शब्दों अमीरी,दुआओं की अमीरी - अभाव कैसा !!!

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  ५ साल पहले आज ही के दिन मुंबई घायल हुई थी ... वो घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरे है ... 



केवल सैनिक ही नहीं ... हर एक इंसान जिस ने उस दिन ... 'शैतान' का सामना किया था ... नमन उन सब को !
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जाते जाते एक वीडियो आप सब की नज़र है ...

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जय हिन्द !! 

लेखागार