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शनिवार, 2 सितंबर 2017

हिन्दी ग़ज़ल सम्राट दुष्यंत कुमार से निखरी ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय मित्रों,


हिन्दी ग़ज़ल में जो लोकप्रियता दुष्यंत को मिली,
वो किसी विरले कवि को है मिलती.
हिन्दी के ऐसे कवि-ग़ज़लकार हैं वे अब तक,
जिनका लेखन गूँजता है सड़क से संसद तक.  
यूँ तो अनेक विधाओं में उनकी कलम चली,
किन्तु ग़ज़लों को ही अपार लोकप्रियता मिली.
जन्मस्थान बिजनौर का ग्राम राजपुर नवादा,
दिन था वो 1 सितम्बर 1933 का.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करके,
आकाशवाणी भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर बने.
नाम दुष्यंत कुमार त्यागी स्वभाव से सहज-मनमौजी,
आरम्भ में रचनाएँ की बनकर दुष्यंत कुमार परदेशी.
साहित्य की दुनिया में पदार्पण किया था जब,
प्रगतिशील शायरों, कवियों का राज था तब.  
ग़ज़लों में ताज भोपाली औ क़ैफ़ भोपाली छाये थे,
अज्ञेय और मुक्तिबोध हिन्दी की कठिन बनाये थे.
तब सहज ग़ज़ल लिख उसे कठिनता से निकाला,
प्रसिद्धि पाई और हिन्दी में ग़ज़ल को निखारा.
साये में धूप एकमात्र ग़ज़ल संग्रह उनका,
आज भी साहित्य-प्रेमियों के बीच जाता है सराहा.
30 दिसम्बर 1975 को हिन्दी गज़लकार सो गया,
42 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया.
उनका नाम अमर रहेगा हिन्दी ग़ज़ल में,
आवाज़ बन उभरेगा जन-जन के दिल में.


हिन्दी ग़ज़ल के निर्विवाद नायक को काव्यात्मक श्रद्धांजलि के साथ काव्यात्मक-बुलेटिन

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गुरुवार, 1 सितंबर 2016

हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आज सुप्रसिद्ध गज़लकार दुष्यंत कुमार का जन्मदिन है. उनका जन्म बिजनौर के ग्राम राजपुर नवादा में 1 सितम्बर 1933 को हुआ था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत कुछ दिन आकाशवाणी भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर रहे. दुष्यंत का पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था. प्रारम्भ में दुष्यंत कुमार परदेशी के नाम से लेखन करते थे. इन्होंने एक कंठ विषपायी, सूर्य का स्वागत, आवाज़ों के घेरे, जलते हुए वन का बसंत, छोटे-छोटे सवाल सृजन किया. साये में धूप उनका प्रसिद्द ग़ज़ल-संग्रह है. जिस समय दुष्यंत कुमार साहित्य की दुनिया में आये उस समय ताज भोपाली, क़ैफ़ भोपाली, अज्ञेय, गजानन माधव मुक्तिबोध, नागार्जुन तथा धूमिल जैसे ख्यातिलब्ध लोग जमे हुए थे. दुष्यंत कुमार ने अपनी प्रतिभा से ग़ज़ल को उर्दू की क्लिष्टता से बाहर निकाल हिन्दी की सहजता के साथ स्थापित किया. उन्होंने सिर्फ़ 42 वर्ष के जीवन में अपार ख्याति अर्जित की. उनका देहांत 30 दिसम्बर 1975 को हुआ.


 समकालीन हिन्दी कविता विशेषकर हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यंत कुमार को मिली वो दशकों बाद विरले किसी कवि को नसीब होती है. वे एक कालजयी कवि हैं और ऐसे कवि समय काल में परिवर्तन हो जाने के बाद भी प्रासंगिक रहते हैं. उनका स्वर सड़क से संसद तक गूँजता है. इस कवि ने कविता, गीत, ग़ज़ल, काव्य, नाटक, कथा आदि सभी विधाओं में लेखन किया लेकिन गज़लों की अपार लोकप्रियता ने अन्य विधाओं को नेपथ्य में डाल दिया.

उनके जन्मदिवस पर उनकी एक ग़ज़ल के साथ ब्लॉग बुलेटिन परिवार की तरफ से श्रद्धा सुमन अर्पित हैं... 

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।


आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।


हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।



मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

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लेखागार