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रविवार, 9 जून 2019

ब्लॉग बुलेटिन - ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019



ब्लॉग बुलेटिन, इसकी नींव डाली थी जाने-माने ब्लॉगर अजय कुमार झा जी शिवम मिश्रा जी और देव कुमार झा जी ने, और मील के पत्थर बने इनके साथ 

सलिल वर्मा जी
वाणी गीत जी
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी
हर्षवर्धन श्रीवास्तव जी
और 
रश्मि प्रभा यानी मैं। 

इस टीम की हमेशा कोशिश रही है, कुछ नया करने की, जिससे अधिक से अधिक ब्लॉग,ब्लॉगर को जोड़ा जा सके, उन्हें एक साहित्यिक सम्मान दिया जा सके, जैसे -

प्रतिभाओं की कमी नहीं - एक वार्षिक अवलोकन। 

शुरू में इन प्रतिभाओं की पुस्तक भी निकली थी, लेकिन जीवन की आपाधापी में बहुत लोग इससे रूबरू नहीं हो पाए, और हमें ऑनलाइन ही खुद को समेटना पड़ा। 

हम ब्लॉग के दिनों को न भूले हैं, न भूलेंगे, न भूलने देंगे।  यह हम सबका पहला साहित्यिक प्लेटफॉर्म है।  हम सब हनुमान बन संजीवनी बूटी लाते रहें, तो तय है कि यह प्लेटफॉर्म कभी सूना नहीं होगा। 
अर्धवार्षिक समय में हमने तय किया है कि हम कहानी,कविता की एक स्वस्थ प्रतियोगिता आयोजित करेंगे।  

कहानी वर्ग में कहानी और लघुकथा
काव्य विधा में कविता और ग़ज़ल
उभरते ब्लॉगर में महिला व पुरूष
और 
एक ब्लॉगर ऑफ दा ईयर

आप अपनी जो भी रचना शामिल करना चाहें, उसका ब्लॉग लिंक हमें भेजें, नीचे दिये ईमेल पर ...

लाइक्स, कमेंट्स का बंधन नहीं, बुलेटिन टीम चयन करेगी।   
हम उसे 24 जून से 24 जुलाई तक शामिल करेंगे। अर्थात प्रतियोगिता 24 जून से 24 जुलाई तक चलेगी। 
सिर्फ एक रचना अपनी या अपने परिचित की भेजें यानी ब्लॉग लिंक। पुरस्कार ब्लॉग बुलेटिन की तरफ से दिसम्बर माह में आयोजित होने वाले वार्षिक अवलोकन के समय दिए जायेंगे। 

अंतिम निर्णय निर्णायक मंडल का होगा। 
तो, अविलम्ब इस प्रतियोगिता में शरीक हों  

~~~~~~~~~~~~~~~~~

अपना फैसला खुद करो !!

गठबंधन की गाँठ !

१० वीं बरसी पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

साहिर और अमृता

शिक्षा एक अंजूरी दे दो

हार या जीत

फिर इक बार तुम्हे लिखती हूँ मैं..!!!

धरती की सीने की दरारें फिर भरने वाली हैं

नहीं चाहिए कोई न्याय

क्या किसी को हालात बदलने हैं -------mangopeople

*गुड़िया का दर्द*

रविवार, 12 मई 2019

माँ की वसीयत बच्चों के नाम


बहुत सोचा 
एक वसीयत लिख दूँ अपने बच्चों के नाम ...
घर के हर कोने देखे
छोटी छोटी सारी पोटलियाँ खोल डालीं 
आलमीरे में शोभायमान लॉकर भी खोला
....... अपनी अमीरी पर मुस्कुराई !
छोटे छोटे कागज़ के कई टुकड़े मिले
गले लगकर कहते हुए - सॉरी माँ,लास्ट गलती है
अब नहीं दुहराएंगे ... हँस दो माँ '
अपनी खिलखिलाहट सुनाई दी ...
ओह ! यानी बहुत सारी हंसी भी है मेरी संपत्ति में !
आलमीरे में अपना काव्य-संग्रह
जीवन का सजिल्द रूप ...
आँख मटकाती बार्बी डौल
छोटी कार - जिसे देखकर ये बच्चे
चाभी भरे खिलौने हो जाते थे
चलनेवाला रोबोट
संभाल कर रखी डायरी
जिसमें कुछ भी लिखकर
ये बच्चे आराम की नींद सो जाते थे ...
मैंने ही बताया था
डायरी से बढकर कोई मित्र नहीं
..... हाँ वह किसी के हाथ न आये
और इसके लिए मैं हूँ न तिजोरी '
पहली क्लास से नौवीं क्लास तक के रिपोर्ट कार्ड
(दसवीं,बारहवीं के तो उनकी फ़ाइल में बंध गए)
पहला कपड़ा,पहला स्वेटर
बैट,बॉल ... डांट - फटकार
एक ही बात -
"जो कहती हूँ ... तुमलोगों के भले के लिए
मेरा क्या है !
अरे मेरी ख़ुशी तो ....'"
मुझे घेरकर
सर नीचे करके वे ऐसा चेहरा बनाते
कि मुझे हँसी आने लगती
उनके चेहरे पर भी मुस्कान की एक लम्बी रेखा बनती ...
मैं हंसती हुई कहती -
सुनो,मेरी हंसी पर मत जाओ
मैं नाराज़ हूँ ... बहुत नाराज़ '
ठठाकर वे हँसते और सारी बात खत्म !
ये सारे एहसास भी मैंने संजो रखे हैं
....
बेवजह कितना कुछ बोली हूँ
आजिज होकर कान पकड़े हैं
फिर बेचैनी में रात भर सर सहलाया है ..
मारने को कभी हाथ उठाया
तो मुझे ही चोट लगी
उंगलियाँ सूज गयीं
.... उसे भी मन के बक्से में रखा है ....
....
वक़्त गुजरता गया -
वे कड़ी धूप में निकल गए समय से
आँचल में मैंने कुछ छाँह रख लिए हैं बाँध के
ताकि मौका पाते उभर आये स्वेद कणों को पोछ सकूँ ...
...
आज भी गए रात जागती हुई
मैं उनसे कुछ कुछ कहती रहती हूँ
उनके जवाब की प्रतीक्षा नहीं
क्योंकि मुझे सब पता है !
घंटों बातचीत करके भी
कुछ अनकहा रह ही जाता है
.....मैंने उन अनकही बातों को भी सहेज दिया है
............
आप सब आश्चर्य में होंगे
- आर्थिक वसीयत तो है ही नहीं !!!
ह्म्म्मम्म - वो मेरे पास नहीं है ...
बस एहसास हैं मासूम मासूम से
जो पैसे से बढ़कर हैं -
थकने पर इनकी ज़रूरत पड़ती है
बच्चों को मैं जानती हूँ न
शाम होते मैं उन्हें याद आती हूँ
तकिये पर सर रखते सर सहलाती मेरी उंगलियाँ
.... उनके हर प्रश्नों का जवाब हूँ मैं
तो सारे जवाब मैंने वसीयत में लिख दिए हैं
- बराबर बराबर ........

रश्मि प्रभा 



हर दिन - माँ का दिन | Isha Sadhguru

 

 

*** वो बर्बाद करती है ***
-----------------
वो व्यस्त यूँ होती नहीं,
अपने कर्तव्यों में दिन भर
पर कुछ यों घुली हुई रहती है।
इस कथित व्यस्तता में
हर रोज़ नई सब्ज़ी का
बेजोड़ स्वाद जोड़ना स्वीकार करती है।
कि जिसे सबसे ज़्यादा बेगार मानकर
सैद्धांतिक रूप से
किसी विशेष काम के लिए तय नहीं किया जाता,
परात को पसारकर
हर निरुद्देश्य साँझ में
साग चुनने जैसा बेकार
कोई सबसे पसंदीदा काम चुन लिया है उसने।
बहनों की अथक ट्यूशन में
जिस सामाजिक सुरक्षा के लिए
ढेरों दुश्चिंता से लगातार लाचार रहती है
कई- कई घंटे ख़बरी चैनलों से चिपकी हुई भी
वो अपनी घिसी- पिटी दिनचर्या का मूक निर्वाह करती है,
वो अपने नैसर्गिक भोलेपन में
तब भूल जाती है,
कि बिके हुए सारे चैनेल्स पर
संरक्षा से कहीं बढ़कर
भय परोसना सिखाया जाता रहा है।
नहीं समझ पाती वो
इन नादानियों से कैसे पार पाया जाए,
सो परोसने के लिए फिर
दाल में पड़नेवाली नयी छौंक में ध्यान लगाती है।
सब सहेजकर सलीका जताने में
घंटों तक 'हीटर' जलाते हुए
फिर वो
कहीं कोई गुरेज़ भी नहीं करती।
यूँ हर रात
आदम युगीन बल्ब की पीली रोशनी में
जिस तरह वो ओसारे पे निश्चेष्ट बैठकर
हर रोज़ बच्चों के सकुशल लौट आने को
टिमटिमाती हुई बाट जोहती है
सभी परिपक्व हो चले सदस्यों के मस्तिष्क में
कोई अलग बिजली कौंधती है,
और घर में
हर तरह से अनाप- शनाप खर्चे पे
कोई वाकयुद्ध छिड़ता है।
हज़ारों की बिजली बिल से
अक्सर पापा जहाँ बावले- उतावले हो जाते हैं,
वो बेलौस मुस्कराती है,
इस तरह माँ,
घर में सबसे ज़्यादा बिजली बर्बाद करती है।***
माँ के लिए, जिसने जन्म दिया और जीवन की राह पर मुस्कुराकर, दुलार देकर, अटूट विश्वास भरे मौन संकेतों से गृहस्थ जीवन में आगे बढ़ने का आशीर्वाद दिया ...

और, नमन उस माँ को, जिसने मुझे मेरे गुण-दोषों के साथ हृदय से लगाया, जीवन का मर्म समझाया, आगे बढ़ाया, अटूट विश्वास के साथ ...

आज भी दोनों के यशस्काय में आलिङ्गनबद्ध उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुये ...

मातृदिवस पर हृदयस्तल से भावाञ्जलि! 🙏🏻



सोमवार, 19 मार्च 2018

किस मिट्टी से खुद को गढ़ लिया है ?



वह स्त्री जो बोलती है 
वह मैं नहीं 
 मैं,
चुप रहना चाहती हूँ !
...पर, सहजता का लिबास पहने
वह मौन स्त्री 
जो बोलती ही जाती है ...
बोलने के बाद 
खुद को देखती है हिकारत से 
... "मान गए तुम्हें !
हद हो 
हर दर्द को जूस की तरह पी जाती हो
यूँ तरोताजा दिखने का स्वांग रचती हो 
कि शुद्ध हवा भी अवाक रह जाए !
परेशानी का थोड़ा अभिनय ही कर लो
... किस मिट्टी से खुद को गढ़ लिया है
और ठोस बनाती जा रही हो ! 
कभी देखा है औरों की नज़रों से खुद को 
-कितनी हास्यास्पद लगती हो !
हर कोई सोचता है 
कि यदि तकलीफ होती तो नींद हराम हो जाती 
भूख मर जाती 
...... 
परेशानी है
तो परेशान दिखना चाहिए न 
खाने से पहले सौ बार सोचना चाहिए 
कोई राह दिखे ना दिखे 
उससे पहले,
सभी रास्तों को बंद कर देना चाहिए 
... लेकिन तुम !
नहीं सुधरोगी  ... "


मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

ब्लॉग की भागीरथी : विशेष ब्लॉग-बुलेटिन

ज़माना चाहे केतनो एडभांस हो जाए, अन्धबिस्वास खतम नहीं होता है अऊर लोग अजीब अजीब तरह का अन्धबिस्वास पालने लगता है. अब ई अन्धबिस्वास का न गोड़ होता है न हाथ, मगर चलता त है. अब बताइये कि दही खाकर जाने से काम सफल होता है, त इसमें दही का कमाल है कि ऊ आदमी का, जो मेहनत किया! करिया बिलाई के रास्ता काटने से खतरा. सोचिये कि कहीं गलती से बिलाई का एक्सीडेंट हो गया त ऊ बिलाई का सोचेगी. लेकिन हम त बिलाई रास्ता काट जाए त जानकर पार कर लेते हैं कि रास्ता में आने-जाने वाला मुसाफिर लोग को दिक्कत न हो.

अन्धबिस्वास का सम्बन्ध खाली आदमी, जानवर या छींकने-खांसने भर से नहीं है, बल्कि आँकड़ा यानि नंबर से भी है. हस्पताल में तेरह नंबर का बेड नहीं होता है अऊर अभी जब हम फ़्लैट खरीदने गए त देखे कि उसमें भी १३वां फ्लोर नहीं होता है. बहुत सा लोग ई सब चक्कर में पडता है.

अब हमसे कोई कहे त हमको १३ नम्बर से कोई सिकायत नहीं है. अऊर होना भी नहीं चाहिए. बचपन में मास्टर लोग सजा देने के लिये तेरह का पहाड़ा पूछते थे. मगर हमको मुँहजबानी याद था, त काहे घबराएं हम. अब आज तेरह तारीख है, त सब लोग छुट्टी लेकर घरे बइठ त नहीं जाएगा.

ई सब छोड़ दीजिए, अऊर सोचिये कि हम आपको अगर बताएँ कि आज फरवरी महीना का तेरह तारीख है त आप का सोचेंगे?? अब ई मत कहियेगा कि आज हम एक दिन के हो गए थे. चलिए हम बता देते हैं – 


आज के दिन हमारे ब्लॉग-बुलेटिन की बरिष्ठ सदस्य, हम सब की दीदी अऊर आप लोगों को ब्लॉग के जादुई दुनिया का सैर करवाने वाली रश्मि प्रभा जी का जनमदिन है.

दीदी के बेक्तित्व के बारे में कहने के लिये एक पोस्ट पूरा नहीं पडेगा, एतना बिस्तृत है इनका बेक्तित्व. दादी-नानी का दायित्व निभाते हुए भी साहित्त के प्रति अपना दायित्व निभाना नहीं भूलती हैं. एगो लगातार बहते रहने वाला नदी के धारा के तरह बिना रुके अपना सिरजन संसार में मगन रहती हैं. कभी पौराणिक पात्र के अस्थान पर अपने आप को रखकर इतिहास से सवाल पूछती हैं, कभी अपने जवाब से पूरा इतिहास को चुनौती देती हैं. अपना जीवन का बिसाल अनुभव छोटा छोटा बक्तव्य में सारा दुनिया के साथ बांटती हैं.

रश्मि दीदी का जीवन एतना उतार चढ़ाव से भरा रहा है कि अगर कोनो उपन्यासकार को मौक़ा मिलता त ऊ अइसा उपन्यास लिख देता कि जिसको न जाने केतना सम्मान, पुरस्कार अऊर का कहते हैं बेस्ट-सेलर का दर्जा मिल जाता. का मालूम कोई लिखकर पुरस्कार भी पा चुका होगा. मगर दुनिया का एही रीत है कि सफलता के सीढी पर चढता हुआ अदमी नीचे वाला सीढी को पैर से दबाता है अऊर ऊपरवाला को चूमता जाता है. उपन्यास सफल हो जाए त नाम लेखक का, किसको याद रहता है कि उसमें कऊन चरित्र था, का कहानी था, घटना का था.

खैर रश्मि दी का सादगी उनका सबसे सरल परिचय है. अपना बहुत सा कबिता ऊ हमको भेजती हैं, उसपर हमरा बिचार पूछती हैं, हमसे बिमर्स करती हैं अऊर हमारा सुझाया हुआ सुधार चाहे परिबर्तन करते हुये तनिक्को संकोच नहीं करती हैं. नहीं त इहाँ लोग के अहंकार का बैलून एतना भरा हुआ होता है कि आपके आलोचना का सुई उसमें बिस्फोट करने के लिये काफी होता है, अऊर त अऊर, जिन्नगी भर के लिये बोलचाल बन्द हो जाता है सो अलग.

खैर जाने दीजिये, आज के दिन जस्न का दिन है. इसलिये ब्लॉग-बुलेटिन के टीम के साथ-साथ सब पाठक लोग मिलकर सुभकामना का सोर मचाएँ उस भागीरथी के लिये जिसका एक-एक लहर कबिता के छन्द से बना है!



हैप्पी बर्थ-डे, रश्मि दी !!!

                                      सलिल वर्मा


मेरी भावनायें...: इससे ऊपर कोई परिचय क्या ?



सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

जियो ... खूब जियो ... सलिल भाई



ब्लॉग से फेसबुक, फेसबुक से मोबाइल, मोबाइल से वाट्सएप्प ... मिले मुझे सलिल भाई . विनम्रता, स्पष्टता, शालीनता से सामना होता रहा और दिल से दुआएँ निकलती रहीं . अब जब आज जन्मदिन है तब तो सर पर हाथ रखना ही है और कहना है ... खुदा दिलजलों की नज़र से बचाए, फिर भी दिलजले आ ही जाएँ राह में तो मुझसे बचाए .
हाल में सलिल भाई ने एक लिंक भेजा, और मैं हेमंत कुमार की आवाज़ में खो गई , आप इतना सोचिये मत, सुन ही लीजिये




सलिल भाई के लेखन के कायल तो हम रहे ही, अभिनय और गायन में भी वे मंजे हुए हैं  ... जिन्होंने नहीं देखा हो, उनको देखना चाहिए




गीतों, रचनाओं, और बेजोड़ कलाकारी की जन्मदिन पार्टी है , आज सबलोग इस बिहारी के रंग में रंग जाइये , बिल्कुल होली के रंगों की तरह , आइये बढ़ते जाइये





अब इनकी कलम 

चलते चलते कुछ बातें अपने लिए स्वयं सलिल भाई की कलम से -

मेरी फ़ोटो
हमरा नामः सलिल वर्मा,वल्दः शम्भु नाथ वर्मा,साकिनः कदम कुँआ, पटना,हाल साकिनः भावनगर, गुजरात हम तीन माँ के बेटा हैं,बृज कुमारी हमको जनम देने वाली,पुष्पा अर्याणी हमरे अंदर के कलाकार को जन्म देने वाली,अऊर गंगा माँ जिसके गोदी में बचपन बीता अऊर कॉलेज (साइंस कॉलेज/पटना विश्वविद्यालय) की पढाई किए.बस ई तीन को निकाल लिया तो हम ही नहीं रहेंगे...

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

वो जब याद आए, बहुत याद आए - 2




बेहतरीन कलम, बेहतरीन एहसास,  ... भूलना इतना आसान नहीं !
फेसबुक के भूलभुलैये में सभी ब्लॉग कौंधते हैं, पुकारते हैं, गाते हैं -
चलो एक बार फिर से  .... ब्लॉगर्स बन जाएँ हम सब 

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

वो जब याद आए, बहुत याद आए




यह उन दिनों की बात है, जब ब्लॉग का सूर्योदय काल था, दिग्गज ब्लॉगर और उनके बेहतरीन पोस्ट दिनचर्या का अहम हिस्सा थे !
हर दिन एक ख़ास रचना पढ़ने को मिलती, मुझे तो जो भी पसंद आता, उसे मैं औरों को भी सुनाती थी  ... सुनाना मेरी हॉबी मान लीजिये। 
आज उन दिनों की ख़ास दहलीज़ों तक ले चलती हूँ  
और दहलीज़ों को आप तक लेकर आती हूँ  ... 


मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

जब तक हम अनुभवों से नहीं गुजरते, तब तक सिर्फ रोते हैं !




"जब तक मैं उस आदमी से नहीं मिली थी जिसके पाँव नहीं थे, मैं मेरे पास जूते न होने पे बहुत रोती थी।"हेलेन केलर

जब तक हम अनुभवों से नहीं गुजरते, तब तक सिर्फ रोते हैं, 
अपना दुःख सबसे बड़ा लगता है !
जब तक अपना दुःख सबसे बड़ा लगे, समझो - दर्द को तुमने जिया ही नहीं, उससे रिश्ता बनाया ही नहीं  ... 


शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

सबकुछ कितना सुंदर है !


लहरें कभी नहीं सोचती
किनारों को छूने के लिए
मैं ही क्यूँ बेकरार रहूँ !
मुमकिन है सोचती हो 
लेकिन मोह किनारे का
उसे खींचता है ज़ोर से
और लोग ... तालियाँ बजाते हैं !
12 घण्टे समंदर के किनारे 
लहरों से खेलते हुए
तस्वीरें लेते हुए
वे यही सोचते हैं 
... सबकुछ कितना सुंदर है !


यह है समंदर की बात, उससे भी अधिक है ख़ास आज का दिन , ,,, भाई दूज , भाई-बहन के अटूट रिश्ते का दिन 
आत्मा से अपने भाइयों का नाम लेकर बहनें कहती हैं,
"... भईया चललें अहेरिया 
... बहिनी देली असीस हो न 
जिय जिय हो रे मेरो भईया 
जिय भईया लाख बरीस हो न "

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