मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के अबोटाबाद में हुआ था। उनका असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी है। देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले में बस गया था। मनोज ने अपने करियर में शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम और 'क्रांति' जैसी देशभक्ति पर आधारित अनेक बेजोड़ फ़िल्मों में काम किया। इसी वजह से उन्हें भारत कुमार भी कहा जाता है।
सोमवार, 24 जुलाई 2017
जन्मदिवस : मनोज कुमार और ब्लॉग बुलेटिन
मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के अबोटाबाद में हुआ था। उनका असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी है। देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले में बस गया था। मनोज ने अपने करियर में शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम और 'क्रांति' जैसी देशभक्ति पर आधारित अनेक बेजोड़ फ़िल्मों में काम किया। इसी वजह से उन्हें भारत कुमार भी कहा जाता है।
बुधवार, 24 जुलाई 2013
जन्म दिवस : मनोज कुमार …. ब्लॉग बुलेटिन
रविवार, 17 जून 2012
लो जी आ गयी 200 वी पोस्ट ... ब्लॉग बुलेटिन
- दिनकर जी का जीवन दर्पण और उनकी कुछ चुनी कविताएं प्रस्तुत की जाती हैं यहां। अगर रुचि हो तो ही पधारें। अनामिका जी का अच्छा प्रयास है।
- मृदुला जी की कविताओं में एक अलग छटा होती है। बिम्बों का सधा प्रयोग और शैली की जीवन्तता। सूर्यास्त कहते हैं हुआ में उन्होंने ढलती शाम को एक अलग रंग देने का प्रयास किया है।
धूप थाली मेंसजा ली,छितिज का आँचलपकड़करएक चक्का लाल सा,
फेसबुकिया युग की चार क्षणिकायें
३१. वंदना जी का कहना है इबादत के पन्नेलफ़्ज़ों के मोहताज नहीं होते।
३२. धीरेन्द्र जी कह रहे हैं पर याद छोड़ जाएंगे।
आपकी यादों में बस जायेगें बनकर राज,
हमारी कमी फिर भी महसूस होगी आज!
३४. आँखें बताती हैं त्वचा रोग का हाल राधारमण जी के स्वास्थ्य पर इसकी चर्चा है।
३५. रश्मि प्रभा की बात मानिए और आप ज़िन्दगी में जो भी कहना सच ही कहना।
मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को समय के ठहराव के बिम्ब पर प्रवाहित यह कविता मन को बहुत झकझोड़ती है।
बुलेटिन का यह 200 वां अंक है, और इसे पेश करते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। आप अच्छी ब्लॉगिंग करते रहें, बुलेटिन यहां की टीम लाती रहेगी।
हैप्पी ब्लॉगिंग!!
शुक्रवार, 1 जून 2012
ब्लॉग लिंक्स + मनोज कुमार = आज की ब्लॉग बुलेटिन
मैं मनोज कुमार आज की बुलेटिन लेकर हाज़िर हूं।

उपेन्द्र नाथ की पचास के करीब कहानियां, कवितायें व लघु- कथायें विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। घडी की टिक -टिक के साथ चलती इस व्यस्त जिंदगी से कभी कभी कुछ पल चुरा पते हैं तो उनमे कहानियों और कविताओं का सृजन कर लेते हैं और उन्हें अपने ब्लॉग सृजन शिखर पर भी प्रकाशित करते हैं। आज उनकी कुछ क्षणिकाओं से आप रू-ब-रू होइए --- एक यहां पर है
मुस्कराहट एक गुनाह
ये मुस्कराहट
चली जाये तो
सन्नाटा
आ जाये तो
गुनाह
उन्हें गुनाह पसंद नहीं
और हमें सन्नाटा
इस तरह बढती रही
हमारे गुनाहों की संख्या

वैसे तो कोई विशेष हलचल नहीं रही विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर। फिर भी कुछ निष्ठावान ब्लॉगर ने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। राधारमण जी ने
गुटका और सिगरेट हैं ओरल कैंसर की जड़ शीर्षक से यह बताने की कोशिश की है कि क्या आप तंबाकू, सिगरेट, पान मसाला, पान, गुटखा आदि के बगैर रह नहीं सकते? क्या इस कारण आपके मुंह में तकलीफ रहने लगी है? सावधान हो जाइए, विशेषज्ञ कहते हैं कि यह ओरल यानी मुंह का कैंसर हो सकता है। ओरल कैंसर यानी मुख का कैंसर, कैंसर के कारणों में आठवां प्रमुख कारण है। इसमें मुंह तो प्रभावित होता ही है, होंठ और जुबान पर भी इसका असर पड़ता है। वैसे यह गाल, मुंह के तालु, मसूड़ों और मुंह के ऊपरी हिस्से में होता है। इसके लक्षण आमतौर पर पकड़ में नहीं आते।

अमृता तन्मय ने एक ऐसी लक्षमण रेखा खींच दी है ब्लॉग काव्य-जगत में जिसे लांघ पाना कव्य-रचनाकारों के लिए एक बड़ी चुनौति है, इसलिए यहां आइए और चैलेंज स्वीकार कीजिए।
अक्सर
मेरी कविता
लाँघ जाती है
अनगिनत खींची हुई
लक्ष्मण रेखाओं को...
रावणों को
चकमा देकर
हथिया लेती है
पुष्पक विमान..

बापू से आज तक परिवर्तन की चाह कई महापुरुषों में रही जो सत्य के साधक रहे। अनीता जी कुछ ऐसी ही भाव हमारे समक्ष रख रही हैं।
पहले भी हुए थे ऐसे महान
वह भी इस कड़ी में अंतिम नहीं होगा
यह भी पता है उसे
यह श्रंखला जारी रहेगी
जाने कब तक
सत्य का आधार
चेतना को ही माना था उसने
और यह कोई दोष तो नहीं...

आशा और उत्साह का सृजन होता है जब कोई कवि कहे बढ़ कदम रुकने न पाये। संजय जी की कविताओं में कुछ अलग ही बात होती है। बिम्ब सर्वथा नवीन होते हैं और लय और प्रवाह हमें उन्हें गाने को विवश कर देते हैं।
राह काँटों से भरी हो,
या उमड़ती सी सरी हो,
जीत की चाहत खरी हो,
काल सिर नत हो झुकाये।
बढ़ कदम रुकने न पाये।

क्या आपको मालूम है शगस डिजीज (Chagas Disease)आखिर है क्या ? नहीं? कोई बात नहीं वीरूभाई आपको एक विशेषज्ञ की तरह समझा देंगे। थोड़ा बहुत तो यहीं बता देता हूं कि यह बीमारी एक खून चूसने वाले कीट से फैलती है .अखबार हफिंग्टन पोस्ट में छपी के रिपोर्ट के मुताबिक़ इस बीमारी से योरोप और अमरीका के गरीब गुरबों (सभी गरीब समुदायों को )को खासा ख़तरा पैदा हो गया है .

माहेश्वरी कनेरी बता रही हैं कि जीवन की ढ़लती शाम में ना जाने कितने बुजुर्ग कमजोर और थकते शरीर कोलेकर अकेले पन के भंवर जाल में जकड़े हुए हैं केवल इस आस में कि विदेश में बसा बेटा एक दिन जरुर लौट कर आएगा । इन बुजुर्ग माता पिता की आँखेपल पल इंतजार में पथरा जाती हैं पर लौट कर कोई नही आता.. बस इंतजार …सिर्फ इंतजार………
तरसता भटकता ढूँढ़ता
किसे ये मन बार-बार
जो चला गया अब न
आयेगा इस पार
पंख मिला उड़ चले
मुड़ के देखा न एक बार

शेखर जेमिनी काफ़ी गंभीर विषयों पर आलेख प्रस्तुत करते रहे हैं। विज्ञान और स्वास्थ्य संबंधी उनके लेख सदा हमें नई जानकारी देते हैं। इस बार वे चिकित्सा में विकल्प की आधारभूत आवश्यकता पर जानकारी दे रहे हैं। कहते हैं प्रश्न यह नहीं है कि कौन सी चिकित्सा पद्धति सही है ? प्रश्न यह है कि कौन सी चिकित्सा पद्धति आम आदमी तक सहज-सुलभ हो सकती है ? प्रश्न के जवाब के लिए उनके ब्लोऑग पर पढ़ें।

जीवन में शब्दों की लुकाछिपी चलती रहती है। रश्मि प्रभा ने इस भाव को बड़ी संजीदगी से अपनी कविता में ढाला है।
भावनाओं की आँधी उठे
या शनै: शनै: शीतल बयार बहे
या हो बारिश सी फुहार
सारे शब्द कहाँ पकड़ में आते हैं !
कुछ अटक जाते हैं अधर में
कुछ छुप जाते हैं चाँदनी में
कुछ बहते हैं आँखों से
और कभी उँगलियों के पोरों से छिटक जाते हैं
तो कभी आँचल में टंक जाते हैं

अनुपमा पाठक बता रही हैं जब हौसला हो और आपका विश्वास तो बुरी से बुरी स्थिति में ही राह दिखाने वाला अगले ही मोड़ पर मिल जाएगा, आप कदम तो बढ़ाइए।
समस्या आती है तो सहारे सकल
छीन लेती है,
मन की शान्ति समस्त
लील लेती है;
ऐसे में
एक बार झांकना हृदय में,
हाथ थामने को
विधाता स्वयं खड़ा है!
अब आज्ञा दीजिये ... फिर मिलेंगे ... जल्द ही ...
बुधवार, 15 फ़रवरी 2012
अपना सुझाव प्लीज़ ज़रूर दीजिएगा.... -आपका देव
आज एक मेल आया। इनसे इतना ही परिचय है मेरा, और उनका भी कि उन्हें यह लिखना पड़ा …
“मनोज जी, आपका ई-मेल आईडी नहीं था सो पिछला मेल नहीं भेज सका... अभी अभी शिवम भाई से लिया....”
औरं संदेश इतना आदेशात्मक था, जिसमें एक प्रेम भी …
सोमवार : रश्मि दीदी
मंगलवार : शिवम भईया
बुधवार : मेहमान रिपोर्टर / मनोज जी
गुरुवार: अजय भईया
शुक्रवार : शाहनवाज़ भाई
शनिवार : देव
रविवार : सलिल दादा
अपना सुझाव प्लीज़ ज़रूर दीजिएगा....
-आपका देव
कि हम अपने को और रोक नहीं सके … और तुरत लिंक ढूंढ़ने निकल पड़े ..
हालाकि मैंने चर्चा से अपने को अलग रखने की सोच रखा था, पर इन झा जी को इंकार नहीं कर सका। पहले तो सोचा मेल से ही मना कर दूं, पर कर न सका …
झा जी आपका आग्रह ठुकरा न पाया, कितने दिनों तक कन्टीन्यू कर पाता हूं कह नहीं सकता।
चलिए शुरू करते हैं .. धीरेन्द्र जी बता रहे हैं क़ामयाबी के नुस्खे![[AIbEiAIAAABDCMqz1J-osvynCSILdmNhcmRfcGhvdG8qKDAwNjdiZjQxNzcwNDZhOTQ2MDRhZDJmZWRjYjE5YjJlMjlkNDliN2MwAbCmkiWHMapDHgICParJ_aR-3iGL.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEifANoZtxjbf4HBeccabSbol8MMfbBaJ0JhDfhwoiOlmzRxHBy5mG8lhP-dAh0koMfrhYLE6WuOyG-LmbrBd9Cgc9CEAQMjjSiGK-a1Z7XDKJxCg7McTrTuG7-GM1suVGAuFtGNjM4kSDk/s220/AIbEiAIAAABDCMqz1J-osvynCSILdmNhcmRfcGhvdG8qKDAwNjdiZjQxNzcwNDZhOTQ2MDRhZDJmZWRjYjE5YjJlMjlkNDliN2MwAbCmkiWHMapDHgICParJ_aR-3iGL.jpg)
हाथ बाँधकर बैठने से पहले सोच धीरेन्द्र
अपने आप कोई जिन्दगी संवरती नही,
गाँव की शान, सेहत की जान, आम लोगों को आसानी से आहार में मिलने वाले जिसकी गणना हरी पतेदार सब्जी में की जाती है, जो लौह तत्व और कल्स्शियम से भरपूर है हमारा पसंदीदा शाक ( साग ) जिसका नाम है बथुआ के क़ामयाब गुणों के बारे में यदि जानना चाहते हैं तो इसे अवश्य पढ़ें। प्रस्तुत कर रहे हैं डॉक्टर अनवर जमाल।
अनुपमा त्रिपाठी जी आई हैं घूँघट में मुखड़ा छिपाए .... लेकर।
हरी-हरी पतियाँ पीस-पीस,
असुंअन जल सींच सींच ,
महीन महीन मेहंदी कर लाये ..
हथेली सजाये ..
चलते चलते केवल राम जी हमें ले चल रहे हैं सार्थक ब्लॉगिंग की ओर और कहते हैं …
इंटरनेट ने दुनिया को एक क्लिक तक सीमित कर दिया और अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हमें एक नायाब तोहफा दिया " ब्लॉगिंग " . आज दुनिया के तमाम लोग तरह - तरह के माध्यमों से एक - दुसरे से जुड़ रहे है . मानवीय भावनाओं को अभिव्यक्ति के नए साधन मिले हैं , इन साधनों ने मनुष्य में रचनाशीलता का जो संचार किया है वह कभी - कभी सोचने पर मजबूर करता है .
अपना पंचू, अरे अरे वही लोकेन्द्र सिंह राजपूत लगा रहे हैं सौ सुनार की एक लोहार की
तुम्हारा ही नाम लेकर रजनीश कर रहे हैं … इंतज़ार।
शिशुओं में आम है पीलिया यह जानकारी लेकर राधा रमण जी आए हैं स्वास्थ्य सबके लिए पर।
त्वचा और आँखों का पीला पड़ना गंभीर समस्या के लक्षण हैं। पीलिया में त्वचा का रंग बदलकर पीला हो जाता है। यह बदलाव सबसे ज़्यादा आँखों में दिखाई देता है, आँखों का सफेद हिस्सा पीला पड़ जाता है। लिवर में बिलिरुबिन नामक पिगमेंट के शरीर में एकठ्ठा होने से यह पीलापन दिखाई देने लगता है। सामान्य स्थिति में यह लिवर में बनने वाले बाइल के साथ आँत में पहुँचता है और मल के ज़रिए शरीर से बाहर निकल जाता है। रक्त में बिलिरुबिन पिगमेंट का स्तर बढ़ने पर या इसका निकास बाधित होने पर यह पीले रंग का पिगमेंट शरीर में इकठ्ठा होने लगता है, जिससे पीलिया हो जाता है। वयस्क या अधेड़ावस्था में पीलिया लिवर के क्षतिग्रस्त होने जैसी किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है।
अपनी आपबीती सुनाते हुए निखिल आनंद गिरी कहते हैं एक सूरज टूट कर बिखरा पड़ा है...
मखमली यादों की गठरी
पास उसके...
और कुछ सपने पड़े हैं आंख मूंदे....
ज़िंदगी की रोशनाई खर्च करके,
बेसबब नज़्मों की तह में,
चंद मानी भर गया है.....
एक शायर मर गया है....
ये सिर्फ़ दिल की बातें ही नहीं है यह है पापा! मुझे क्या बनना है .....(.लघुकथा) सुनील कुमार की
परिवार के सब लोग एक - दुसरे की और देख रहे थे कौन है वास्तविक अपराधी ? मै ,पिता जी, बुआ जी या मेरे संस्कार या एक संयुक्त परिवार की इच्छा .......मेरा तीन वर्ष का बेटा मेरी तरफ देख रहा था जिसकी आँखों में एक प्रश्न था पापा मुझे क्या बनना है .....
एस.एन. शुक्ल खोज रहे हैं मेरी कविताओं में (138) इन्सान कहाँ है ?
हिन्दू , ईसाई , सिख है , मुसलमान यहाँ है,
मैं खोजता रहा हूँ कि इन्सान कहाँ है ?
मज़हब हैं , जातियाँ हैं, जातियों में जातियाँ,
इन जातियों में आपकी पहचान कहाँ है ?
और अंत में शिप्रा की लहरें पर पढ़िए एक नचारी।
आज बस इतना ही। फिर मिलेंगे।
सादर,
मनोज कुमार
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