Subscribe:

Ads 468x60px

कुल पेज दृश्य

मनोज कुमार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मनोज कुमार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 24 जुलाई 2017

जन्मदिवस : मनोज कुमार और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के अबोटाबाद में हुआ था। उनका असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी है। देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले में बस गया था। मनोज ने अपने करियर में शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम और 'क्रांति' जैसी देशभक्ति पर आधारित अनेक बेजोड़ फ़िल्मों में काम किया। इसी वजह से उन्हें भारत कुमार भी कहा जाता है।




आज भारतीय सिनेमा के मशहूर अभिनेता - निर्देशक मनोज कुमार जी 80 वर्ष के हो गए हैं। आज इस सुअवसर पर समस्त हिन्दी ब्लॉग जगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देती है। हम सभी की ईश्वर से यही कामना है वे सदैव स्वस्थ रहे और दीर्घायु प्राप्त करें। सादर।। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।।    

बुधवार, 24 जुलाई 2013

जन्म दिवस : मनोज कुमार …. ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को नमस्कार।।

आज भारतीय सिनेमा के मशहूर अभिनेता - निर्देशक मनोज कुमार जी का 76वां जन्मदिन है। हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक देशभक्ति भरी फ़िल्में देने के लिए मनोज जी को याद किया जाता है, अपनी इसी देशभक्ति प्रेम के कारण उन्हें भारत कुमार का उपनाम भी हासिल हुआ है। पिछले दिनों तबियत ख़राब होने की वजह से सिनेमा का ये सितारा कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती है। आज उनके जन्मदिन के अवसर पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और पूरा हिंदी ब्लॉगजगत उन्हें जन्मदिन की ढेर सारी बधाईयाँ देता है और साथ ही साथ ये भी दुआ करता है कि मनोज कुमार जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाए।  











अब चलते हैं आज की बुलेटिन  की ओर …. 















कल फिर मिलेंगे। शुभ रात्रि।।

रविवार, 17 जून 2012

लो जी आ गयी 200 वी पोस्ट ... ब्लॉग बुलेटिन


  1. दिनकर जी का जीवन दर्पण और उनकी कुछ चुनी कविताएं प्रस्तुत की जाती हैं यहां। अगर रुचि हो तो ही पधारें। अनामिका जी का अच्छा प्रयास है।
  2. मृदुला जी की कविताओं में एक अलग छटा होती है। बिम्बों का सधा प्रयोग और शैली की जीवन्तता। सूर्यास्त कहते हैं हुआ में उन्होंने ढलती शाम को एक अलग रंग देने का प्रयास किया है।
धूप थाली में
सजा ली,
छितिज का आँचल
पकड़कर
एक चक्का लाल सा,
3. रविकर फैजावादी जब सक्रिय होते हैं, तो हर जगह वे ही दिखते हैं। कविता की तो मानों वे टकसाल हैं। जहां गए दो-चार काव्यात्मक पंक्तियों का वृक्षारोपण कर आए। 
हर नए-पुराने विषय पर लिखने की उनको बीमारी है, 
कल तक शीतलता पर लिखा, आज गरमी की बारी है।

4. वैसे, अगर आप शांता को नहीं जानते...तो गलती आपकी नहीं,... भारत की हर दूसरी बहन यूं ही तमाम कुर्बानी देने के बावजूद गुमनाम बनी रहती है। शांता की किस्मत में भी ऐसी ही कुर्बानी थी। बावजूद इसके कि वो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की बहन थी और रामजन्म को संभव बनाने के लिए उसने बड़ा बलिदान दिया था। इस गुमनाम पात्र जो लेकर रविकर जी ने एक ब्लॉग ही बना दिया है। नाम है “श्रीराम की सहोहदरी : भगवती शांता”। अब इस विषय पर उन्हें जो “कुछ कहना है” आप यहां पढ़ें। इस काव्य रचना के बारे में रविकर जी का कहना है, “यह रचना अक्तूबर में पूरी हो चुकी है- परन्तु कई जगह कुछ लोच है- दुबारा यथा-संभव  संशोधन कर पोस्ट कर रहा हूँ ।”

5. ज़िन्दगी ज़िन्दादिली का नाम है, कहने वाले तो कह गए। दीपक बाबा तो उनसे मिल आए हैं और सबको मिला रहे हैं। पढ़िए यहां इन ६० साल के जवान या बूढ़े के बारे में और देखिए एक बानगी यहां
देखो मितर, तेरा प्रेम बिलकुल पवितर उन्दे विच कोई दो राय नई. पर जो ग्यारह सौ रूपए मेरी चादर वास्ते संभाल रखे हन, उन्दे विच पंच सौ रुपये मेनू हुने दे दे. कल किसने देखा है यार – मैंने मरुँ या न मरुँ. J

6. कुछ सीरियस कविताएं पढ़ने की ज़रूरत महसूस हो तो आपको रमाकांत सिंह से मिलना चाहिए। इनकी कविताओं में ज़माने का दर्द, समाज का चिंतन और मन की चिंता प्रकट रूप से दिखती हैं। आप भी देखिए।

नींद आती नहीं
सपने दिखते नहीं

सपने दिखते हैं वो 
अपने होते ही नहीं 

तुम ही बतलाओ भला 
नींद कैसे आती है ?


7. कुछ गिरह ऐसी होती हैं जो सात जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ती और कुछ गांठें देकर छूट जाती हैं। साधना  वैद जी इसी तरह की गिरह की चर्चा कर रही हैं।
सात जन्मों के लिये
जो गिरह बाँधी थी
वह चंद महीने भी
नहीं चल पाई !



8. स्वप्न मेरे हो या आपके, वह आते तो हैं नींद में आने के बाद। पर नींद में जाने के पहले कोई ख़त लग जाए हाथ, तो क्या होता है बता रहे हैं दिगम्बर नासवा।

तेरी यादों से पीछा छुड़ाने के बाद
और नींद की आगोश में जाने से पहले
न जाने रात के कौन से पहर
तेरे हाथों लिखे खत  
खुदबखुद दराज से निकलने लगते हैं  

9. मुकेश चन्द्र पांडेय के लक्ष्य पर इस बार है भारत के राष्ट्रपति :प्रमुख तथ्य जब सारे देश में अगले राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर बहस ज़ारी हो तो इस तरह के तथ्य बड़े काम के हैं।


10. बादल है-प्रकृति का नेह। उसकी कल्पना मात्र हर्षाती है। जिस पर बरस जाए,वह तो नाच ही उठेगा। कैसे,कोई मोर देख कर जाने। सुमन जी बता रही हैं -- छा गए बादल

११. एक चिन्तन है - जान देना यह विकल्प कितना सही है? आप भी अपने विचार शेयर करें। रीना मौर्या का प्रश्न और एक कविता।

१२. पल्लवी सक्सेना हमेशा कोई न कोई सामाजिक मुद्दा उठाती हैं और उस पर विमर्श करती हैं। इस बार उन्होंने प्रश्न उठाया है कि विवाहित होते हुए भी अविवाहित दिखने की होड़

१३. कुंवर जी को मैं ब्लॉगजगत का ग़ज़ल सम्राट  मानता हूं। इनकी ग़ज़लें जहां एक ओर चिंतन का नया आयाम सौंपती हैं वहीं इनमें सामाजिक सरोकार को भी स्वर दिया जाता है। चेहरा-ए-इन्सान के पीछे भी चेहरा भी ऐसी ही ग़ज़ल है जो दिल के साथ दिमाग में भी जगह बनाती है।

लोग शक करने लगे हैं बाग़बाँ पर.
वक़्त ऐसा आ पड़ा है गुलसिताँ पर.
चेहरा-ए-इन्सान के पीछे भी चेहरा,
हम करें किस पर यकीं आख़िर यहाँ पर.

१४. उन्नयन पर उदयवीर सिंह ने कोई कविता पेश की और आपका दिलो-दिमाग सोचने पर मज़बूर न हुआ हो ऐसा न हुआ कभी।
ढूंढा,
चार्वाकों , सांख्य,बौद्ध, जैन ,
द्वैत ,अद्वैत दार्शनिकों ने ,
अंधकार के गह्वर में 
तिरोहित ,
पैरों में छाले,
फटे वसन,अश्रु-भरे नेत्र 

१५. जब देवेन्द्र जी के बताए कंक्रीट के जंगल से गुज़रेंगे तो ... आपको भी महसूस होगा कि
आकाश से
झर रही आग
घरों में
उबल रहे लोग।

१६. वीरू भाई जितनी मेहनत कर सामग्री लगाते हैं अपने ब्लॉग पर उतनी मेहनत शायद ही कोई करता होगा। किसी एक पोस्ट को रिकोमेंड करने से बेहतर है कि उनके ब्लॉग को ही मैं रिकोमेंड करूं। राम राम भाई कहते-कहते आप वहां पहुंचिए वीरू भाई स्वागत करते मिल जाएंगे।

१७. अगर आपने डॉ. जे.पी. तिवारी को अब तक नहीं पढ़ा, तो बस अभी से ही शुरू कर दीजिए। बहुत कम लोग हैं जो इतने ज्ञान की बातें करते होंगे। दिल से संत पर मन से किसी वैज्ञानिक दृष्टि रखने वाले तिवारी जी के ब्लॉग्स हैं -- ज्ञान-विज्ञान, प्रज्ञान-विज्ञान, प्रज्ञान विज्ञान परिचर्चा
पूछता हू समीक्षकों- परीक्षकों से, आज के प्रखर चिंतकों से एक छोटा प्रश्न.
यह बसंत क्यों हुआ असंत? और कैसा है सितारों के उस पार का संसार

१८. चंद्रभूषण मिश्र जी गाफ़िल की ग़ज़लों में कुछ खास होता है जो हमेशा दिल और दिमाग के बीच रस्साकस्सी को निमंत्रण देता है। इस बार वो अमानत में लेकर आए हैं छुपा ख़ंजर नहीं देखा, तो देखिए न ..
जो हर सर को झुका दे ख़ुद पे ऐसा दर नहीं देखा।
जो झुकने से रहा हो यूँ भी तो इक सर नहीं देखा।।
पहुँच जाता कोई वाँ पे जहां ईसा का रुत्बा है,
कोई बिस्तर नहीं छोड़ा के वो बिस्तर नहीं देखा।

१९. जेन्नी शबनम की नज़्में पढने से ऐसा लगता है कि वह यह मानती हैं कि शायरी का मतलब कुछ कह देना नहीं होता है, यानी शायरी में वाचालता उन्हें मंज़ूर नहीं है। वह ख़ामोशी के कायल हैं। उनकी शायरी में खामोशी जो है वह कई अर्थ और रंग लिए हुए है। देखिए मैं कहीं नहीं

मन में बहुत रंजिश है

तुम्हारे लिए भी और वक्त के लिए भी 

फिर भी चल रही हूँ वक्त के साथ 
रोज रोज प्रतीक्षा की मियाद बढाते रहे तुम

मेरे संवाद और सन्देश फ़िज़ूल होते गए  

२०. सरकारी काम सिर्फ़ नियमों से चले या इसमें कुछ संवेदना के भी तत्व होने चाहिए। देखिए एक पक्ष यह भी -- फ़ुरसत में ... ज़िन्दगी के दोराहे पर!
कभी-कभी हम ज़िन्दगी के ऐसे दोराहे पर खड़े होते हैंजहां एक ओर हमें सामाजिक मर्यादाओं का ध्यान रखना पड़ता है, तो दूसरी ओर अपने कर्तव्यों का भी निर्वाह करना पड़ता है। दिल और दिमाग़ की रस्साकसी में भले ही ख़ुद हमारा दम घुट रहा हो, लेकिन ऐसे में भी हमें अपने विवेक का सहारा लेकर किसी उचित निष्कर्ष तक पहुंचना पड़ता है, जो अपने आप में  एक तनी रस्सी पर चलने से कम नहीं होता जहाँ एक तरफ़ गहरी खाई होती है, तो दूसरी तरफ गहरा कुंआ।

२१. कौशलेन्द्र जी की 

फेसबुकिया युग की चार क्षणिकायें

वे हिन्दी प्रेमी हैं
इसीलिये
रोमन में हिन्दी लिखते हैं
और अंग्रेजी
देवनागरी में।

२२. अनुपमा जी की कविताओं में संगीत सा लय होता है। प्रकृति का सजीव चित्रण समेटे पढ़िए इस कविता को -- कारे मतवारे घुघरवा बदरवा
धरा पर छाते हैं ...मन को लुभाते हैं ..
घूम घूम घिरते हैं ...मतवारे   बदरवा ...
कैसे उड़ते है ......कारे बदरवा ....
कारे मतवारे घुँघरारे बदरवा .. ...... .....!!

२३. 
२३ जब तक हम ही अपनी भाषा की कद्र नहीं करेंगे, जब तक खुद उसे उचित सम्मान नहीं देंगे, तब तक हमें बाहर वालों की आलोचना करने का भी हक नहीं बनता। कह रहे हैं गगन शर्मा कुछ अलग सा पर।

२४. प्रेम की परिभाषा कई रूपों में देखने को मिलती है लेकिन जब ब्लॉग हो उल्लूक टाईम्स तो परिभाषा भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए। सुशील भाई ने बिल्कुल अलग हट के इसे परिभाषित किया है --

प्रेम की वही खिड़की
विन्डो दो हज़ार से अपडेट होकर
विन्डो आठ जैसी जवान होकर
आ गई है तैयार

२५. अपना पंचू  पर लोकेन्द्र सिंह राजपुत पेश करते हैं -- उपनिषदगंगा : भारत में भारतीयता का प्रवाह -- इस आलेख में बता रहे हैं कि  अगर किसी देश का परिचय पाना है तो उसका टेलीविजन देखना चाहिए। वह राष्ट्र का व्यक्तित्व होता है। स्पष्ट है कि दूरदर्शन पर भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कार्यक्रम ही प्रसारित होना चाहिए।

२६. गिरिजेश राव हमेशा कुछ असाधारण ही रचते हैं। इस बार भी उनके आलसी चिट्ठे पर ऐसा ही कुछ है जिसे उन्होंने शीर्षक दिया है - तोरू और अविनाश के साथ - वनसरू की छाँव में। एक कविता का अविनाश द्वारा अनुवाद है। जिसके बारे में हिमांशु कहते हैं - “तोरू दत्त सी अनन्य प्रतिभा...उसकी कलम से निकली अद्भुत और अनोखी कविता--पहले ही विस्मित करने को पर्याप्त थीं! अब अविनाश भईया का अनुवाद-छन्द! ठगे-से रह गए! अप्रतिम! ” एक नमूना देखिए --
मुझको जो प्रिय प्राणों से थे, हा प्यारे!

जा सोयें हैं उस निद्रा जिससे कोई नहीं उठा रे!

उनके हेतु जिनको तुमसे नेह रहा था,

आज तुम्हारे आगे मान से मेरा शीश झुका रे!


२७. सिर्फ बीमारियाँ ही नहीं  लातें हैं जीवाणु ,बचाते भी हैं बीमारियों  से आतताई जीवाणुओं के खिलाफ एक दीवार बनकर  कहना है वीरू भाई का। अपनी पोस्ट अनोखा पारितंत्र है जीवाणुओं का के ज़रिए बता रहे हैं कि ऐसे हज़ारों जीवाणू हमारे शरीर में रहते हैं।


२८. अतुल श्रीवस्तव  बहस नहीं करना चाहते, अपना ज्ञान बढाना चाहते हैं, इसलिए उनकी पोस्ट पर बहस न कर अपने हिसाब से शीर्षक सुझाने का कष्‍ट करें एक रोचक आलेख है। पढिए।

२९. शास्त्री जी आगाह से कर रहे हैं -- मौत से सब बेखबर हैं, यह एक कड़वी सच्चाई है कि
जिन्दगी में स्वप्न सुन्दर हैं सजाये,
गगनचुम्बी भवन सुन्दर हैं बनाये,
साथ तन नही जायेगातन्हा सफर हैं।

किन्तु कितना मौत से सब बेख़बर हैं।।

३०. रचनाओं में जिसका शिल्प ही शाश्वत हो वह उम्र भर एक से एक बेहतरीन रचनाएं देता रहेगा। अजी मैं बात महेन्द्र वर्मा जी की कर रहा हूं -- जिनका कहना है कि 
जख़्म सीने में पलेगा उम्र भर,

गीत बन-बन कर झरेगा उम्र भर।



३२. धीरेन्द्र जी कह रहे हैं पर याद छोड़ जाएंगे
आपकी यादों में बस जायेगें बनकर राज,
हमारी कमी फिर भी महसूस होगी आज!

३४. आँखें बताती हैं त्वचा रोग का हाल राधारमण जी के स्वास्थ्य पर इसकी चर्चा है।

३५. रश्मि प्रभा की बात मानिए और आप ज़िन्दगी में जो भी कहना सच ही कहना।
मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को समय के ठहराव के बिम्ब पर प्रवाहित यह कविता मन को बहुत झकझोड़ती है। 

बुलेटिन का यह 200 वां अंक है, और इसे पेश करते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। आप अच्छी ब्लॉगिंग करते रहें, बुलेटिन यहां की टीम लाती रहेगी।
हैप्पी ब्लॉगिंग!!

शुक्रवार, 1 जून 2012

ब्लॉग लिंक्स + मनोज कुमार = आज की ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रों!
मैं मनोज कुमार आज की बुलेटिन लेकर हाज़िर हूं।
मेरे बारे में
उपेन्द्र नाथ की पचास के करीब कहानियां, कवितायें व लघु- कथायें विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। घडी की टिक -टिक के साथ चलती इस व्यस्त जिंदगी से कभी कभी कुछ पल चुरा पते हैं तो उनमे कहानियों और कविताओं का सृजन कर लेते हैं और उन्हें अपने ब्लॉग सृजन शिखर पर भी प्रकाशित करते हैं। आज उनकी कुछ क्षणिकाओं से आप रू-ब-रू होइए --- एक यहां पर है
मुस्कराहट एक गुनाह
ये मुस्कराहट
चली जाये तो
सन्नाटा
आ जाये तो
गुनाह
उन्हें गुनाह पसंद नहीं
और हमें सन्नाटा
इस तरह बढती रही
हमारे गुनाहों की संख्या

वैसे तो कोई विशेष हलचल नहीं रही विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर। फिर भी कुछ निष्ठावान ब्लॉगर ने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। राधारमण जी ने
गुटका और सिगरेट हैं ओरल कैंसर की जड़ शीर्षक से यह बताने की कोशिश की है कि क्या आप तंबाकू, सिगरेट, पान मसाला, पान, गुटखा आदि के बगैर रह नहीं सकते? क्या इस कारण आपके मुंह में तकलीफ रहने लगी है? सावधान हो जाइए, विशेषज्ञ कहते हैं कि यह ओरल यानी मुंह का कैंसर हो सकता है। ओरल कैंसर यानी मुख का कैंसर, कैंसर के कारणों में आठवां प्रमुख कारण है। इसमें मुंह तो प्रभावित होता ही है, होंठ और जुबान पर भी इसका असर पड़ता है। वैसे यह गाल, मुंह के तालु, मसूड़ों और मुंह के ऊपरी हिस्से में होता है। इसके लक्षण आमतौर पर पकड़ में नहीं आते।
My Photo
अमृता तन्मय ने एक ऐसी लक्षमण रेखा खींच दी है ब्लॉग काव्य-जगत में जिसे लांघ पाना कव्य-रचनाकारों के लिए एक बड़ी चुनौति है, इसलिए यहां आइए और चैलेंज स्वीकार कीजिए।
अक्सर
मेरी कविता
लाँघ जाती है
अनगिनत खींची हुई
लक्ष्मण रेखाओं को...
रावणों को
चकमा देकर
हथिया लेती है
पुष्पक विमान..
मेरा फोटो
बापू से आज तक परिवर्तन की चाह कई महापुरुषों में रही जो सत्य के साधक रहे। अनीता जी कुछ ऐसी ही भाव हमारे समक्ष रख रही हैं।
पहले भी हुए थे ऐसे महान
वह भी इस कड़ी में अंतिम नहीं होगा
यह भी पता है उसे
यह श्रंखला जारी रहेगी
जाने कब तक
सत्य का आधार
चेतना को ही माना था उसने
और यह कोई दोष तो नहीं...
मेरा फोटो
आशा और उत्साह का सृजन होता है जब कोई कवि कहे बढ़ कदम रुकने न पाये। संजय जी की कविताओं में कुछ अलग ही बात होती है। बिम्ब सर्वथा नवीन होते हैं और लय और प्रवाह हमें उन्हें गाने को विवश कर देते हैं।
राह काँटों से भरी हो,
या उमड़ती सी सरी हो, 
जीत की चाहत खरी हो,
काल सिर नत हो झुकाये।
बढ़ कदम रुकने न पाये।
मेरा फोटो
क्या आपको मालूम है शगस डिजीज (Chagas Disease)आखिर है क्या ? नहीं? कोई बात नहीं वीरूभाई आपको एक विशेषज्ञ की तरह समझा देंगे। थोड़ा बहुत तो यहीं बता देता हूं कि यह बीमारी एक खून चूसने वाले कीट से फैलती है .अखबार हफिंग्टन पोस्ट में छपी के रिपोर्ट के मुताबिक़ इस बीमारी से योरोप और अमरीका के गरीब गुरबों (सभी गरीब समुदायों को )को खासा ख़तरा पैदा हो गया है .
My Photo
माहेश्वरी कनेरी बता रही हैं कि जीवन की ढ़लती शाम में ना जाने कितने बुजुर्ग कमजोर और थकते शरीर कोलेकर अकेले पन के भंवर जाल में जकड़े हुए हैं केवल इस आस में कि विदेश में बसा बेटा एक दिन जरुर लौट कर आएगा । इन बुजुर्ग माता पिता की आँखेपल पल इंतजार में पथरा जाती हैं पर लौट कर कोई नही आता.. बस इंतजार …सिर्फ इंतजार………
तरसता भटकता ढूँढ़ता
किसे ये मन बार-बार
जो चला गया अब न
आयेगा इस पार
पंख मिला उड़ चले
मुड़ के देखा न एक बार
My Photo
शेखर जेमिनी काफ़ी गंभीर विषयों पर आलेख प्रस्तुत करते रहे हैं। विज्ञान और स्वास्थ्य संबंधी उनके लेख सदा हमें नई जानकारी देते हैं। इस बार वे चिकित्सा में विकल्प की आधारभूत आवश्यकता पर जानकारी दे रहे हैं। कहते हैं प्रश्न यह नहीं है कि कौन सी चिकित्सा पद्धति सही है ? प्रश्न यह है कि कौन सी चिकित्सा पद्धति आम आदमी तक सहज-सुलभ हो सकती है ? प्रश्न के जवाब के लिए उनके ब्लोऑग पर पढ़ें।
मेरा फोटो
जीवन में शब्दों की लुकाछिपी चलती रहती है। रश्मि प्रभा ने इस भाव को बड़ी संजीदगी से अपनी कविता में ढाला है।
भावनाओं की आँधी उठे
या शनै: शनै: शीतल बयार बहे
या हो बारिश सी फुहार
सारे शब्द कहाँ पकड़ में आते हैं !
कुछ अटक जाते हैं अधर में
कुछ छुप जाते हैं चाँदनी में
कुछ बहते हैं आँखों से
और कभी उँगलियों के पोरों से छिटक जाते हैं
तो कभी आँचल में टंक जाते हैं
मेरा फोटो
अनुपमा पाठक बता रही हैं जब हौसला हो और आपका विश्वास तो बुरी से बुरी स्थिति में ही राह दिखाने वाला अगले ही मोड़ पर मिल जाएगा, आप कदम तो बढ़ाइए।
समस्या आती है तो सहारे सकल
छीन लेती है,
मन की शान्ति समस्त
लील लेती है;
ऐसे में
एक बार झांकना हृदय में,
हाथ थामने को
विधाता स्वयं खड़ा है!

अब आज्ञा दीजिये ... फिर मिलेंगे ... जल्द ही ...

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

अपना सुझाव प्लीज़ ज़रूर दीजिएगा.... -आपका देव

आज एक मेल आया। इनसे इतना ही परिचय है मेरा, और उनका भी कि उन्हें यह लिखना पड़ा …

“मनोज जी, आपका ई-मेल आईडी नहीं था सो पिछला मेल नहीं भेज सका... अभी अभी शिवम भाई से लिया....”

औरं संदेश इतना आदेशात्मक था, जिसमें एक प्रेम भी …

सोमवार : रश्मि दीदी
मंगलवार : शिवम भईया
बुधवार : मेहमान रिपोर्टर / मनोज जी
गुरुवार: अजय भईया
शुक्रवार : शाहनवाज़ भाई
शनिवार : देव
रविवार : सलिल दादा
अपना सुझाव प्लीज़ ज़रूर दीजिएगा....  
-आपका देव

 

कि हम अपने को और रोक नहीं सके … और तुरत लिंक ढूंढ़ने निकल पड़े ..

 

हालाकि मैंने चर्चा से अपने को अलग रखने की सोच रखा था, पर इन झा जी को इंकार नहीं कर सका। पहले तो सोचा मेल से ही मना कर दूं, पर कर न सका …

झा जी आपका आग्रह ठुकरा न पाया, कितने दिनों तक कन्टीन्यू कर पाता हूं कह नहीं सकता।

 

चलिए शुरू करते हैं .. धीरेन्द्र जी बता रहे हैं क़ामयाबी के नुस्खे[AIbEiAIAAABDCMqz1J-osvynCSILdmNhcmRfcGhvdG8qKDAwNjdiZjQxNzcwNDZhOTQ2MDRhZDJmZWRjYjE5YjJlMjlkNDliN2MwAbCmkiWHMapDHgICParJ_aR-3iGL.jpg]

हाथ बाँधकर बैठने से पहले सोच धीरेन्द्र
अपने आप कोई जिन्दगी संवरती नही,

 

 

गाँव की शान, सेहत की जान,  आम लोगों को आसानी से आहार में मिलने वाले जिसकी गणना हरी पतेदार सब्जी में की जाती है, जो लौह तत्व और कल्स्शियम से भरपूर है हमारा पसंदीदा शाक ( साग ) जिसका नाम है बथुआ के क़ामयाब गुणों के बारे में यदि जानना चाहते हैं तो इसे अवश्य पढ़ें। प्रस्तुत कर रहे हैं डॉक्टर अनवर जमाल।

 

My Photoअनुपमा त्रिपाठी जी आई हैं घूँघट में मुखड़ा छिपाए .... लेकर।

हरी-हरी पतियाँ पीस-पीस,

असुंअन  जल सींच सींच ,

महीन महीन  मेहंदी कर लाये ..

हथेली सजाये ..

 

मेरा फोटोचलते चलते केवल राम जी हमें ले चल रहे हैं सार्थक ब्लॉगिंग की ओर और कहते हैं …

इंटरनेट ने दुनिया को एक क्लिक तक सीमित कर दिया और अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हमें एक नायाब तोहफा दिया " ब्लॉगिंग " . आज दुनिया के तमाम लोग तरह - तरह के माध्यमों से एक - दुसरे से जुड़ रहे है . मानवीय भावनाओं को अभिव्यक्ति के नए साधन मिले हैं , इन साधनों ने मनुष्य में रचनाशीलता का जो संचार किया है वह कभी - कभी सोचने पर मजबूर करता है .

 

 

अपना पंचू, अरे अरे वही लोकेन्द्र सिंह राजपूत लगा रहे हैं सौ सुनार की एक लोहार की

 

तुम्हारा ही नाम लेकर रजनीश कर रहे हैं … इंतज़ार।

 

शिशुओं में आम है पीलिया यह जानकारी लेकर राधा रमण जी आए हैं स्वास्थ्य सबके लिए पर।

त्वचा और आँखों का पीला पड़ना गंभीर समस्या के लक्षण हैं। पीलिया में त्वचा का रंग बदलकर पीला हो जाता है। यह बदलाव सबसे ज़्यादा आँखों में दिखाई देता है, आँखों का सफेद हिस्सा पीला पड़ जाता है। लिवर में बिलिरुबिन नामक पिगमेंट के शरीर में एकठ्ठा होने से यह पीलापन दिखाई देने लगता है। सामान्य स्थिति में यह लिवर में बनने वाले बाइल के साथ आँत में पहुँचता है और मल के ज़रिए शरीर से बाहर निकल जाता है। रक्त में बिलिरुबिन पिगमेंट का स्तर बढ़ने पर या इसका निकास बाधित होने पर यह पीले रंग का पिगमेंट शरीर में इकठ्ठा होने लगता है, जिससे पीलिया हो जाता है। वयस्क या अधेड़ावस्था में पीलिया लिवर के क्षतिग्रस्त होने जैसी किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है।

 

अपनी आपबीती सुनाते हुए निखिल आनंद गिरी कहते हैं एक सूरज टूट कर बिखरा पड़ा है...

मखमली यादों की गठरी
पास उसके...
और कुछ सपने पड़े हैं आंख मूंदे....
ज़िंदगी की रोशनाई खर्च करके,
बेसबब नज़्मों की तह में,
चंद मानी भर गया है.....
एक शायर मर गया है....

 

ये सिर्फ़ दिल की बातें ही नहीं है यह है पापा! मुझे क्या बनना है .....(.लघुकथा) सुनील कुमार की

परिवार के सब लोग एक - दुसरे की और  देख रहे थे कौन है वास्तविक अपराधी ? मै ,पिता जी, बुआ जी या मेरे संस्कार या एक  संयुक्त परिवार की इच्छा .......मेरा  तीन  वर्ष का बेटा मेरी तरफ देख रहा था जिसकी आँखों में एक प्रश्न था पापा मुझे क्या बनना है .....

 

एस.एन. शुक्ल खोज रहे हैं मेरी कविताओं में (138) इन्सान कहाँ है ?

हिन्दू , ईसाई , सिख है , मुसलमान  यहाँ  है,
मैं  खोजता   रहा  हूँ  कि   इन्सान  कहाँ  है ?
मज़हब हैं , जातियाँ हैं, जातियों में जातियाँ,
इन जातियों में  आपकी  पहचान  कहाँ है ?

 

और अंत में शिप्रा की लहरें पर पढ़िए एक नचारी।

 

आज बस इतना ही। फिर मिलेंगे।

सादर,

मनोज कुमार

लेखागार