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शनिवार, 11 मई 2019

हिंदी ब्लॉगिंग अंतर्जाल युग की एक उल्लेखनीय उपलब्धि....


हिंदी ब्लॉगिंग अंतर्जाल युग की एक उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जा सकती है जिसने सामान्य पाठकों और नवलेखन तथा लेखक/लेखिकाओं के मध्य एक सेतु का निर्माण किया .  जिन विशिष्ट लेखक/लेखिकाओं के लेख अखबार/पत्रिकाओं में पढ़ते रहे, उनसे एक क्लिक पर ही साक्षात्कार सामान्य पाठकों के लिए आसान हुआ और वहीं दूसरी ओर  पाठकों की त्वरित टिप्पणी द्वारा लेखक/लेखिकाओं का भी उत्साहवर्धन होता है. हिंदी  ब्लॉगिंग ने डायरियों में लिख कर भूल जाने वाले सामान्य जन को भी लेखन/पाठन के लिए एक खुला आसमान दिया.  तकनीक के लाभ हानि एक सिक्के के दो पहलू जैसे ही होते हैं इसलिए एक बार उच्चतम स्थान तक आकर हिंदी ब्लॉगिंग का पहिया कुछ लड़खड़ाया. शौकिया लिखने वाले भी एक आधार पाकर प्रिंट मीडिया की तरफ मुड़ने लगे . नियंत्रित विधा न होने के कारण बंदर के हाथ में उस्तरा आने  उच्छृंखलता आई तो पाठकों और लेखकों का इस प्लेटफॉर्म से मोहभंग भी हुआ. फेसबूक/ट्विटर/वाट्सएप आदि ने भी ब्लॉगिंग के प्रति उपेक्षा बढ़ाई . मगर फिर भी कुछ प्रतिबद्ध ब्लॉगर्स ने डटे और जुटे रहकर इस माध्यम की सार्थकता बनाये रखी है. विभिन्न अभियानों द्वारा लेखकों और पाठकों को आकर्षित करने का कार्य भी हुआ. समस्या यह भी रही कि ब्लॉग पाठकों तक कैसे पहुँचे क्योंकि हिंदी ब्लॉगिंग को गति देने वाले संकलक ब्लॉग वाणी और चिट्ठाजगत सुप्तावस्था में चले गये. ऐसे में ब्लॉग बुलेटिन,  चिट्ठा चर्चा आदि के संचालक जो अपने संकलकों के माध्यम से लेखकों तथा पाठकों के बीच एक मजबूत कड़ी बने हुए हैं, साधुवाद के पात्र हैं. 
पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों के फलस्वरूप हिंदी ब्लॉगिंग में मेरी भी अनियमितता रही है.  मगर जब शिवम मिश्रा ने इस संकलक से जुड़ने का आग्रह किया तो इस दौर में भी हिंदी ब्लॉगिंग को नियमित रखने वाले लेखक/लेखिकाओं को पाठकों तक पहुँचाने के इस सेतुबंध में गिलहरी सा प्रयास कर रही हूँ. ...

व्यंग्य लेखन में महारत है जिन्हें उनके ब्लॉग पर आया हुआ है जबरदस्त चुनावी तूफान

सेवानिवृत्ति के उपरांत गाँव में रहकर शहरी अभिजात्य और गँवई मानसिकता के बीच की कड़ी बने हुए इस ब्लॉग पर गाँव के सहज दृश्यों के सरल शब्दचित्र मोहक हैं.

गठबंधन पर सभाजीत ने टिप्पणी की – साझे में होल्ला ही नीक रहथ (सामूहिक रूप में होलिका दहन ही उपयुक्त है। आग लगाओ, तमाशा देखो और अपने अपने घर जाओ), साझे में सरकार नहीं चलती।


तकनीक के ब्लॉग पर विंडोज के अपडेट से होने वाली खड़खड़ाहट मिलेगी यहाँ
विंडोज 10 अपडेट...

भीषण गर्मी में भी अपने लाल पुष्पों से लदा फँदा गुलमोहर प्रेम की अविरल फुहार बरसाये हुए है यहाँ.
कहो गुलमोहर

नारी सशक्तिकरण पर विचारोत्तेजक लेख लिखने वाली आराधना इस आलेख में सरल सहज हैं . अपने आसपास की गतिविधियों में मगन... 
आराधना का ब्लॉग

अपनी कविताओं से दोहरी चाल चलने वालों को कड़ी फटकार देते हैं. नसीहतें भी!
यज्ञ सदियों तक चले

शांतनु सान्याल की कविता  मुक्त द्वार पढ़ सकते हैं यहाँ
.

पुरानी पोस्ट है अज़दक पर मगर एक ही ब्लॉग पर दुनिया के कोने कोने पहुँचा रहे ' दुनिया जिसे कहते हैं ' में.
दुनिया जिसे कहते हैं...

अपने पिता की स्मृति में किशौर चौधरी ने जो लिखा.

क्षमाप्रार्थी हूँ कि बहुत से ब्लॉग छूटे होंगे पढ़ने से क्योंकि इन दिनों अधिक पढ़ना नहीं हुआ है.  यदि आप किसी विशेष ब्लॉग के बारे में बताना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. 
ब्लॉग बुलेटिन की टीम का भी बहुत आभार कि उन्होंने विश्वासपूर्वक यह कार्य मुझे सौंपा. 

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

लकीर बड़ी करनी होगी ......






पिछले दिनों या कहा जाए कि जब से ये नई सरकार सत्ता में आई है तब से शायद विरोधी विचारधारा वालों की बौखलाहट इतनी  ज्यादा  बढ़  गयी है   कि उन्हें  सकारात्मक  बातें  भी विरोध करने लायक लगती हैं | यदि आज देश का प्रधानमंत्री आम जन से सीधे संवाद करता है , उनसे सुझाव माँगता है सलाह सुनता है और ये कहता है कि आप खुद , पर्यावरण को , समाज को और देश को स्वच्छ रखें इसलिए भी क्योंकि आप स्वच्छ रहेंगे तो स्वस्थ रहेंगे | पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति ही इस बात में भी कोइ उल्टी बात सोच सकता है |

मुझे अक्सर अपने शिक्षक द्वारा सुनाई गयी एक बात याद आती है | वे कहा करते थे कि किसी खींची हुई लकीर को छोटा करने के दो तरीके होते हैं , पहला कि उसे मिटा कर छोटा किया जाए और दूसरी ये कि ठीक उसके बगल में उससे बड़ी लकीर खींच दी जाए तो वो लकीर स्वयमेव ही छोटी हो जायेगी |बात बहुत गहरी है इसलिए मुझे अक्सर ही याद हो आती है |

आज देश , समाज बदल रहा है और पूरा विश्व इस बात का साक्षी हो रहा है न सिर्फ इतना ही बल्कि आज जो अचानक ही एक विशवास भरा माहौल बन गया है उसने पूरे विश्व के सामने भारत को एक अलग मुकाम पर पहुंचा दिया है | ऐसा इसलिए भी संभव हो पाया है क्योंकि आज देश की सरकार पूर्ण बहुमत वाली सरकार है जिसे कहीं भी ये भय नहीं कि ऐसा किया तो समर्थन वापस की बरसों से चली आ रही धमकी वाली रवायत से उसे रूबरू होना पडेगा | नई सरकार निर्णय ले रही है , योजनायें बना रही है और तेज़ी से उन पर अमल कर रही है | जब भी सब कुछ ठीक ठीक होने लगता है तो नकारात्मक ताकतें अक्सर उस सकारात्मक दिशा को भ्रमित या मोड़ने की कोशिस करती हैं | और ये कोशिस हो भी रही है किन्तु ऐसे समूह को ये अब समझ जाना चाहिए कि दशकों बाद जाकर देश में एक जैसा जनमानस तैयार हुआ है तो इसके पीछे बहुत सारी वजहें होंगी | इसलिए प्रयास ये किया जाना चाहिए कि लकीर को मिटाने से बेहतर है कि बड़ी लकीर खींचने में अपनी भागीदारी निभाई जाए |

चलिए आज देखते हैं कहाँ क्या क्या लिखा गया है , मैं सिर्फ एक पंक्ति में आपको पोस्ट सूत्र दूंगा .....पोस्ट पर पहुँच कर आप स्वयं पढ़ कर पोस्ट का आनंद लें .....

बाऊ और नेबुआ की झाँखी : फौरने पहुँच कर ई पोस्ट बांची

औरत तेरी कहानी :
एक ब्लौगर की ज़ुबानी

गाय से तो पूछ लो : क्या , पोस्ट पढनी है नहीं ??

प्रतीक्षा :
न करें , फौरन ही पोस्ट पढ़ें

गुमनामी बाबा की गुमनामी सहयोगी : लीला राय ध्यान रहे , इन्हें कोइ भूलने न पाय

संघ भाजपा समन्वय बैठक : सिर्फ समन्यवय नाराजी या दबाव :
हाय क्यों कुरेदते हो जालिम , हरा कर देते हो घाव

रायटर्स डायरी : गुमे हुए शब्दों का नौस्टेलजिया
पढ़ पढ़ के मन मयूरा भया , झूमे रे जिया

देश ठीके चल रहल हौ बापू :
सब बजा रहल हौ, अपन अपन भोंपू

उम्र :
न पूछी जाय न बताई जाय

जयन्ती पर शास्त्री जी और बापू को नमन :
देशः और समाज में रहे चैन और अमन

तलाश आम आदमी की :   इस पोस्ट पर आकर ख़त्म हो जाती है



और अंत में इस खाकसार की एक पोस्ट

अजब  गजब किस्से कचहरी के : कुछ भोर के कुछ दुपहरी के


आज के लिए इतना ही ...अब सप्ताह में एक दिन आपसे मुलाक़ात होती रहेगी

शनिवार, 25 जुलाई 2015

लम्हे इंतज़ार के

प्रिये ब्लॉगर मित्रगण नमस्कार,
आज की बुलेटिन में प्रस्तुत है मेरी लिखी नई कहानी....

















लम्हे इंतज़ार के
---------------------
ऐ मेरे चंदा - शुभ-रात्री, आज रात मेरे लिए कोई प्रेम भरा गीत गाओ। काली सियाह रात का पर्दा गिर चुका है और तुम्हारी शीतल सफ़ेद चांदनी कोमल रुई की तरह चारों तरफ बरसने लगी है। क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ ? दिल की खिड़की खुली है और बाहर दरवाज़े बंद हो गए हैं। दुनिया मेरे इर्द-गिर्द मंडरा रही है और मैं हूँ जो रत्ती भर भी हिल नहीं रहा है। मैं अपनी सोच और विचारों के साथ स्थिर हूँ। मैं उस शिखर पर हूँ जहाँ से देखने पर सब कुछ बदल जाता है। मेरी हर सांस के साथ मेरे अरमानो पर पिघलती बर्फ़ के बहते हुए हिमस्खलन जैसा डर लगने लगता है। तुम कितनी दूर हो मुझसे। मैं तुम्हे वास्तविकता में महसूस तो नहीं कर सकता, पर सितारों की रौशनी को देख सकता हूँ। नींद मेरे से कोसों दूर उन बंद अलमारियों के पीछे जाकर छिप गई है। मैं तुम्हे इस चाँद की सूरत में देख रहा हूँ, इसकी बरसती शफ्फाक़ चांदनी में तुम्हे अपनी बाहों के आग़ोश में महसूस कर सकता हूँ, हीरों से चमकते सितारों की जगमगाहट में तुम्हारी मुस्कान की झलक पा रहा हूँ। मैं तो तुम्हारे इश्क़ की मूर्ती हूँ और मेरा दिल इसकी मिटटी को धीरे-धीरे तोड़कर मेरी हथेलियों में भर रहा है। मैं निडर हूँ, फिर भी एक अनजाना डर मुझे तराशता जा रहा है।

मैं अधर में हूँ और जागते हुए भी सोया महसूस कर रहा हूँ, मेरे पैर ठंडे फ़र्श को छू रहे हैं और मैं इस अनिद्रा वाली नींद में चलते हुए अपने घर का खाखा ख़ोज रहा हूँ। मैं ग्रेनाइट से बनी मेज़ छू रहा हूँ और चमड़े से बने सोफ़े पर अपनी उँगलियों में पसीजते पसीने के निशाँ बनाकर छोड़ता रहा रहा हूँ। मैं दरवाज़े तक पहुंच उसे सरका कर बाहर लॉन में ओस से गीली नर्म घास पर खड़ा अपनी आत्मा को तुमसे जोड़ने का प्रयास कर रहा हूँ। तुम यहाँ भी नहीं हो पर तुम यहाँ के कण-कण में व्याप्त हो। समस्त प्रांगण तुम्हारे प्रेम से दमक रहा है। मैं दिक्सूचक बन गया हूँ पर अपनी उत्तर दिशा नहीं ढूँढ पा रहा हूँ। मेरा तीर लगातार घूम रहा है और मुझे नींद के झोंके आने लगे हैं। मैं आसमां की तरफ देखता हूँ तो मेरी आँखें धुंधली हुई जाती हैं, मैं लालायित हूँ, मैं तरस रहा हूँ, मैं अपनी पसलियों को अपनी हथेलियों से थामे खड़ा हूँ और अपने दिल की धडकनों को सीने से बहार निकल पड़ने के लिए संघर्ष करते, दबाव बनाते महसूस कर रहा हूँ। मैं निडर हूँ, फिर भी मेरी हर सांस के साथ एक अनकहा डर सांस ले रहा है।

दुनिया मौन है। मैं पुराने बरगद पर, जिससे तुम्हे बेहद लगाव है, पर पड़े झूले पर औंधा लेट गया हूँ। तुम्हारे होने के एहसास को अपना तकिया बना तुम्हारे सीने पर सर रखकर मैं आराम से लेटा हूँ। पर यह एहसास मेरी मौजूदगी को नकार रहा है। मेरे सपने मेरी हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ कर रहे है। पर मैंने हार नहीं मानी है मैं कोशिश कर रहा हूँ। मैं तुम्हारे अक्स को इन बाहों में भरता हूँ पर मुझे तुम्हारी अनुपस्थिति के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता। मेरा ह्रदय में आज भी तुम्हारे साथ की स्मृतियाँ ताज़ा हैं। मैं तुम्हारी परछाई को इन बेजुबां चीज़ों में छूने की कोशशि कर रहा हूँ और अपने हाथों के स्पर्श से उन अलसाई स्मृतियों को मिटाता जा रहा हूँ। मैं आगे बढ़ एक दफ़ा फिर तुम्हे खोजने की कोशिश कर रहा हूँ। तुम मुझे चिढ़ाती हो और मेरी आँखें नम हो जाती हैं। तुम ख़ुशी से खिलखिलाकर, प्रफुल्लित हो उठती हो और मैं तुम्हारे प्रेम के गुरुत्वाकर्षण में बंधा चला जाता हूँ। मैं अपने हाथ ऊपर उठा खड़ा हूँ और ऐसा महसूस कर रहा हूँ जैसे इश्क़ की हवा में तैर रहा हूँ और अरमानो के आसमां में तुम्हारी मदहोशी के बादलों में गोते लगता आगे बढ़ रहा हूँ और जल्द ही तुम्हारे करीब, बहुत करीब पहुँच जाऊंगा। मैं इन बादलों से ऊपर, इन वादियों से परे, चाँद सितारों के बीच कहीं किसी ख़ूबसूरत गुलिस्तां में तुम्हारे साथ बैठ बातें करूँगा। यही सोच मैं ख़ुशी से झूम जाता हूँ। मैं अपने वादे से बेहद प्रफुल्लित हूँ। तुम गर्म सांसें छोड़ रही हो, गहरी सांसें भर निःश्वास हो रही हो और तुम्हारा आकर्षण फिर से मुझे तुमसे जोड़ रहा है। आशा, उम्मीद, विश्वास मेरी नसों में खून बनकर दौड़ रहा है और मेरी देह की मिटटी को सींच रहा है। मैं एक दफ़ा फिर से इंतज़ार में बैठा हूँ तकियों को अपने आस-पास जमा किये हुए। अकेला बिलकुल अकेला, ख़ामोशी को पढ़ता और तुम्हारे प्रतिबिम्ब से बातें करता।  में अकेला हूँ सचमुच अकेला।

ऐ मेरे चंद्रमा - शुभरात्रि।
आज रात मेरे लिए कोई अनोखा गीत गाओ।
सुबह के उजाले तक मुझे अकेला इंतज़ार के लम्हों में तड़पता मत छोड़ देना।

--- तुषार राज रस्तोगी ---

आज की कड़ियाँ

बदलाव तुझसे इश्क़ के बाद  - राखी शर्मा

करार - श्याम कोठारी 'उदय'

भोर हो गई - अनुपमा त्रिपाठी

आंवले का वृक्ष - अनीता सचदेवा

न कौशल न विकास :क्या करें इस डिग्री-डिप्लोमा का ? -  शशांक द्विवेदी

लहलहाते खेत बंजर हो गए - रश्मि शर्मा

फ़ेसबुक के धकाधक उपयोग करने के फायदे - रविशंकर श्रीवास्तव

कैसा न्याय - आशा सक्सेना

चाँद मेरे हिस्से का - वंदना गुप्ता

रहना सदा चलते कभी रुकना नहीं - रेखा जोशी

यह सच है -  पुरुषोत्तम पाण्डेय

आज के लिए इतना ही अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी तब तक के लिए - सायोनारा

नमन और आभार
धन्यवाद्
तुषार राज रस्तोगी
जय बजरंगबली महाराज | हर हर महादेव शंभू  | जय श्री राम

शनिवार, 4 जुलाई 2015

दिल की बात शब्दों के साथ

प्रिये ब्लॉगर मित्रगण नमस्कार,

शहर से बाहर होने के कारण पिछले हफ्ते बुलेटिन लगा पाने में असमर्थ रहा उसका दिल से खेद है परन्तु आज फिर से आपके सामने हाज़िर हूँ एक छोटा सा लेख लेकर जो जीवन की सच्चाई से जुड़ा है। आशा है आपको मेरा लेख प्रभावित करेगा और थोड़ा बहुत सोचने पर विवश भी करेगा। तो पेश है दिल की बात शब्दों के साथ :-

इंसान को कभी भी किसी की मजबूरियों पर हँसना नहीं चाहियें क्योंकि कोई भी प्राणी इन्हें स्वयं खरीद कर नहीं लाता। मजबूरी इंसान से क्या करवाये कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिए वक़्त की मार से हमेशा डर कर रहना चाहियें क्योंकि बुरा वक़्त किसी को कभी बताकर नहीं आता और ना ही अच्छा वक़्त कभी किसी से पूछ कर आता है। आपकी अक्ल कितनी भी तेज़ क्यों ना हो, आप कितने ही अक्लमंद क्यों ना हों परन्तु जब तक आपका नसीब आपकी अकल का साथ नहीं देगा ज़िन्दगी में जीत हासिल कर पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन ही होगा। बीरबल भले ही बेहद अक्लमंद था परन्तु इतना होशियार होने के बावजूद कभी भी बादशाह नहीं बन सका। इसलिए तो कहते हैं नसीब से कोई नहीं लड़ सकता। मिलता उतना ही है जितना नसीब में लिखा होता है फिर चाहे कितने ही घोड़े क्यों ना खोल लो। व्यक्ति सिर्फ मेहनत कर सकता है, कोशिश कर सकता है, अपना कर्म कर सकता है परन्तु उसका फल मिलना या ना मिलना यह किस्मत पर निर्भर करता है। किस्मत से कोई भी व्यक्ति पार नहीं पा सकता। बातें बनाना बहुत ही आसान काम है परन्तु उन्ही बातों को साकार करना बहुत ही कड़ा काम है। बिना परिश्रम और लगन के कोई भी बनाई गई बात साबित नहीं होती है इसलिए हमेशा बोलने से पहले तोलना सीखिए और कभी भी व्यर्थ ना बोलिए क्योंकि ना तो तुम अपने आप को गले लगा सकते हो और ना तुम खुद अपने कंधे पर सर रखकर रो सकते हो और ना ही इस दुनिया से रुखसत हो सकते हो। जीवन में किसी ना किसी अपने की ज़रुरत हमेशा होती है, आपको समझने के लिए और विपरीत हालातों में आपके साथ उनका मुकाबला करने के लिए, आपका हाथ थाम कर आपके साथ खड़े रहने के लिए या फिर आपको हौंसला देने के लिए। एक दुसरे के लिए जीने का नाम ही ज़िन्दगी है इसलिए वक़्त उन्हें दो जो तुम्हे दिल से चाहते हैं। कोई भी रिश्ता पैसों का मोहताज नहीं होता क्योंकि कुछ रिश्ते मुनाफा नहीं देते पर जीवन को अमीर ज़रूर बना देते हैं। इसलिए अपना वक़्त अपने अपनों को दीजिये और अपने रिश्तों को मज़बूत बनाइये। सभी को आदर, सम्मान और प्यार देने से ही प्यार, दुलार, अपनापन, यश, कीर्ति, सम्मान मिलता है और जब यह सब मिलता है तब ही दुनिया आबाद रहती है। ये बातें हैं तो बहुत छोटी-छोटी पर ज़िन्दगी में मायने बहुत रखती हैं।


आप सोचते होंगे कि आज यह सब बातें क्यों कर रहा हूँ मैं? तो बताना चाहूँगा कि आज आदरणीय, हम सबके प्यारे और भारत के बेटे स्वामी विवेकानन्द जी की ११३ वीं पुण्यतिथि है जो अपने जीवन काल में युवा शक्ति के भी प्रतीक रहे हैं। साथ ही अमर क्रांतिकारी विचारक और संगठनकर्ता भाई भगवती चरण वोहरा की १११वीं जयंती भी आज के दिन ही है। मैं अपने इस लेख के द्वारा भारत के इन वीर सपूतों को श्रद्धांजलि देना चाहता हूँ जिन्होंने अपने जीवनकाल में, अपनी बातों में, अपने इरादों में, अपनी भावनाओं में, अपने विचारों में सदैव देशवासियों को देशभक्ति, मानवता, प्रेम, आध्यात्म, दर्शन, संयम, नैतिकता, भाईचारा, सदभाव, निस्वार्थ सेवा, और शांति का ही सन्देश दिया है। भारत माता के ऐसे कर्मठ बेटों को मेरा शत शत नमन और उम्मीद करता हूँ अपने देश का हर प्राणी ऐसा ही गुणवान बने, सत्य और प्रेम के मार्ग पर चले और सभी के लिए एक मिसाल कायम करे। यदि आज का युवावर्ग ऐसी महान पुण्यआत्माओं की शिक्षा का दस प्रतिशत भी ग्रहण कर जीवन में उतार ले तो भारत की समस्त समस्याओं का समाधान चुटकियों में हो जाए। इसलिए मेरे देशवासिओं से और मेरे बुलेटिन के पाठकों से मेरी गुज़ारिश है कि जितना हो सके, थोडा बहुत जितना भी समय मिले, भूले भटके जीवन में एक बार ज़रूर और ज़रूर ऐसे किसी भी महान इंसान की शिक्षाओं को पढ़ने का प्रयास ज़रूर कीजिये और उनका अनुसरण जीवन में ज़रूर करने की कोशिश कीजिये। 


आज की कड़ियाँ 
 
अमर शहीद भगवती चरण वोहरा जी की १११ वीं जयंती - शिवम् मिश्रा

उन खतों का मुकम्मल पता रकीब की मज़ार है - पूजा उपाध्याय

स्पर्श - रंजना भाटिया

तुम्हारी मनमर्जियां मेरी अमानत हैं - प्रतिभा कटियार

कहीं बच्चे भी कभी बड़े होते हैं ? - वंदना गुप्ता

एक ग़ज़ल : तेरे बग़ैर भी - आनंद पाठक

भगीरथ से - ओंकार

सरोगेट कंट्री - सीमा आज़ाद

कोई छीलता जाता है - रश्मि शर्मा

चाँद - चेतन रामकृष्ण

एक साँप के प्रति - निहार रंजन

बहाने कुछ न लिखने के - निवेदिता श्रीवास्तव

आज के लिए इतना ही अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी तब तक के लिए - नमस्कार

नमन और आभार
धन्यवाद्
तुषार राज रस्तोगी
जय बजरंगबली महाराज | हर हर महादेव शंभू  | जय श्री राम

गुरुवार, 22 मई 2014

पतझड़

आदरणीय ब्लॉगर मित्रों

प्रस्तुत है आज का बुलेटिन उम्मीद है आपका स्नेह प्राप्त होगा |














एक फूल जब चमन में खिल गया
सारे गुलशन से ही वो अलग हुआ
ज़िन्दगी सिमट गई उसकी
वक़्त आखिरी जिंदगी का, उसका आ गया
वो तो मासूम बेखबर था ज़माने से
वो तो अपनी ही हर सोच में उलझ गया
उस माली का किरदार भी, अजब ही था कुछ
पूरे चमन की आँखों में वो खटक गया
सीखी माली से चमन ने भी बेवफाई
जिंदा रहने का भी स्वप्न छोड़ दिया
अब क्या तोड़ोगे तुम हर गुल को
बाग़ का पत्ता-पत्ता भी ये कह कर रो दिया
मांगी माफ़ी माली ने, जब जानी अपनी गलती
भोले-भाले उपवन में फिर वसंत हो गया....

आज की कड़ियाँ 













अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

रविवार, 27 अप्रैल 2014

ब्लॉग बुलेटिन और शबरी के बेर



कॉलेज में ख़ाली समय में हम सारे दोस्त ग्राउण्ड में गोल बनाकर बैठ जाते थे और गाने, चुटकुले, फ़िल्मी डायलॉग जैसे खेल एंजॉय करते थे. मेरे ज़िम्मे आता था उन सारे खेलों की ऐंकरिंग करना. ऐसे में जब भी कोई गाना गाने वाला आता तो मैं कुछ इस अंदाज़ में उद्घोषणा किया करता था – “हाँ तो बहनों और भाइयों, अब आपके सामने हम पेश करने जा रहे हैं मुहम्मद रफ़ी का गाना, जो किशोर कुमार की आवाज़ में मन्ना दे साहब ने गाया है और उसे प्रस्तुत कर रहे हैं हिमांशु कुमार!!

बड़ा घिसा हुआ चुटकुला लगा न आप लोगों को. है ही, लेकिन आज अचानक याद आ गया तो इसका कोई न कोई कारण तो होगा ही. तो चलिये एक और म्यूज़िकल सा मुहावरा दोहरा दूँ, शायद आपको कुछ याद आ जाये. “अपनी डफली – अपना राग!” बात भी सही है भाई, जब डफली अपनी है तो राग भी तो अपना ही होगा ना, मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ में किशोर कुमार का गाना तो नहीं हो सकता न. वही तो.
ये मुहावरे भी अजीब होते हैं, कहना कुछ चाहते हैं और कहते कुछ और हैं. अब देखिये न, मेरी बकवास झेलने के बाद तो आप भी सोचते होंगे कि “ऊँची दुकान – फीके पकवान”. पकवान भले फीके हों लेकिन दुकान ऊँची बताने का शुक्रिया. इन दिनों मार्केट में एक नया मुहावरा आया हुआ है: अपनी थाली – अपना पकवान! मतलब तो इसका पता नहीं, लेकिन विद्वज्जनों के श्रीमुख से निकला हरेक शब्द अपने लिये तो किसी शास्त्र से कम नहीं.

हमने तो यही माना है कि हमारा घर है और आप हमारे मेहमान हैं. अब आपको हम ये थोड़े न कहेंगे कि आप अपनी थाली घर से लेकर आएँ. भई, हमने बुलाया है तो जो थाली-पत्तल होगा हमारे यहाँ उसी में जिमाएँगे आपको, मगर जो भी जिमाएँगे प्रेम से. रही बात पकवान की तो जो रूखी-सूखी है उसे शबरी का बेर समझ कर आपकी थाली में परोसते हैं या सुदामा के चावल मानकर आपका स्वागत करते हैं.

किस्सा मुख़तसर ये कि ये ब्लॉग-बुलेटिन हमारा घर है, बुलेटिन पर किसी भी दिन अपनी बात कहने वाला जो कह गया वो थाली है और ये जो लिंक्स हमने ब्लॉग के वन-उपवन से चुने हैं, उसे आप शबरी के बेर समझिये. इस देश में अतिथि को देवता का दर्ज़ा दिया जाता है. आप हमारे लिये देवता समान हैं. खाने में नमक कम हो, चीनी ज़्यादा हो, मिर्च तेज़ हो गई हो, खाना बासी हो, रोटी जल गई हो, चावल कच्चा रह गया हो, दाल में पानी कम पड़ा हो, सब्ज़ी बेमौसम हो और बेस्वाद लगी हो तो बेशक हमें बताएँ. हम सिर झुकाकर माफ़ी माँग लेंगे. आप दुबारा हमारे घर पधारें और हमारे यहाँ जूठन गिराने का सौभाग्य हमें प्रदान करें इसके लिये हम उन कमियों को दूर करने का प्रयास करेंगे.

आख़िर में एक बड़ी छोटी सी घटना. मेरे छोटे भाई का एक दोस्त है. वो जब भी कहीं बाहर रेस्त्राँ में सभी दोस्तों के साथ खाना खाने जाता था, तो बिल चाहे कोई भी चुकाए वो रिसेप्शन पर ये ज़रूर कहता था – भाई साहब! थोड़ी क्वालिटी सुधारिये! एक बार सभी दोस्तों ने मिलकर उससे पूछ ही लिया कि यार क्वालिटी में क्या सुधार चाहिये तुम्हें? तो उसका जवाब बड़ा सिम्पल सा था – कुछ नहीं, बस ऐसा कहते रहना चाहिये, इससे अपनी इम्पॉर्टेंस बनी रहती है!”

ख़ैर, आप सब हमारे लिये इम्पॉर्टेण्ट हैं, नहीं तो आज के टाइम में बहुत से ख़र्च हो गये, पर हमारी टीम आज भी आप के आतिथ्य को सदा तत्पर है. आफ्टर ऑल - थाली भले हमारी हो, पकवान भले हमारा हो, लेकिन स्वाद तो आप से ही आता है!


शबरी के बेर










और

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

मसालेदार बुलेटिन

आदरणीय ब्लॉगर मित्रगण सादर नमस्कार,

आज दिल बहुत प्रसन्न है तो कुछ संजीदा लिखने का दिल नहीं है | तो आज प्रस्तुत है उमंग, तरंग और ठहाको से भरपूर रंगारंग, मसालेदार बुलेटिन |



अध्यापक (कक्षा मे) , बच्‍चो बताओ कि दूध को खराब होने से बचाने के लिए क्या करना चाहिए?
सोनू, जी उसे पी लेना चाहिए ।
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टीचर : व्हॉट इज यूअर नेम...?
बच्चा : सर, सूर्य प्रकाश...
टीचर : इंग्लिश में जवाब दो...
बच्चा : सर, सनलाइट...
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एक भिखारी ने होटल में फोन करके एक नान, एक बटर चिकन और एक प्लेट पनीर टिक्का भिजवाने का ऑर्डर दिया...
दूसरी ओर से सवाल किया गया, "सर, बिल किसके नाम का बनेगा...?"
भिखारी ने तपाक से जवाब दिया, "भगवान के नाम का दे दो, बाबा..."
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तीन औरतें आपस में अपने पतियों की मूंछों के बारे में बातें कर रही थीं...
पहली ने कहा, मेरे पति की मूंछें इतनी छोटी हैं कि बहुत अजीब दिखाई देते हैं...
दूसरी बोली, मेरे पति की तो मूंछ ही नहीं है, और उन्हें देखकर मुझे हंसी आती है...
तीसरी ने तपाक से कहा, मेरे पति की मूंछें तो इतनी बड़ी-बड़ी हैं कि मुझे गुदगुदी होती है...
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प्रेमसुख जब मरकर स्वर्ग पहुंचा तो उसके सामने स्वर्ग या नरक किसी एक को चुनने का विकल्प रखा गया। यमदूत के साथ जब उसने स्वर्ग की देहरी से अंदर झांका तो पाया कि एक बड़ी उजाड़-सी जगह में कुछ लोग टहल रहे हैं, कई बीमार हैं, कई कराह रहे हैं।
फिर प्रेमसुख ने नरक के द्वार से झांका तो वहां का नजारा उलटा था- कई अप्सराएं वहां नाच रही थीं। एक ओर कॉकटेल पार्टी चल रही थी। यह सब देख उसने नरक में जाने का तय किया। अंदर जाने पर देखा कि एक गरम तेल भरी कड़ाही में लोगों को डाला जा रहा है। किसी-किसी की खाल भी खींची जा रही है, किसी पर कोड़े बरसाए जा रहे हैं। अब प्रेमसुख चकरा गया और यमदूत से पूछा- यह सब क्या है? जो बाहर से दिख रहा था, वह यहां है नहीं। ऐसा क्यों?
यमदूत ने कहा - यह तो नरक के मार्केटिंग विभाग का कमाल है।
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टीचर ने क्लास में बच्चों से सवाल किया, "तुम सबसे ज्यादा किससे नफरत करते हो...?
एक बच्चे ने जवाब दिया, "राजा राममोहन राय...
टीचर ने हैरानी से फिर पूछा, "लेकिन क्यों...?
बच्चे ने तपाक से कहा, "उन्होंने बाल विवाह बंद करवा दिया था...
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टीचर (क्लास मे पढाते हुए), "बच्चो आयकर, बिक्रीकर, भूमिकर से मिलता झुलता कोइ और शब्द बताओ।"
निशु, "सर, एक नही तीन शब्द सुने, सुनील गावासकर, सचिन तैंदुलकर और दिलीप वेंगसरकर।"
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मेली अपने पति प्रेमसुख से- जब आप चश्मा उतारते हो, तो बहुत हैंडसम दिखते हो।
प्रेमसुख चमेली को बाहों में लेकर बोला- सही है, जब मैं चश्मा उतारता हूं, तभी तुम खूबसूरत दिखती हो।
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मनु,"डेडी, ज्यादा काबिल कौन है मैं या आप?"
डैडी, " मै, क्योकि मैं एक तो तुम्हारा बाप हुँ, दुसरे उम्र मे भी तुम से बडा हुँ और मेरा तजुर्बा भी तुम से ज्यादा है।"
मनु, "फ़िर तो आप जानते होगें कि अमेरिका की खोज किस ने की थी? "
डैडी, "कोलम्बस ने की थी"
मनु, "कोलम्बस के बाप ने क्यों नही की, उसका तजुर्बा तो कोलम्बस से कही ज्यादा होगी?"
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एक छोटा बच्‍चा दुसरे बच्‍चे से, अगर दिन को सूर्य न निकला तो क्या होगा?
दुसरे बच्‍चे ने जवाब दिया, "बिजली का बिल बढ जाएगा।"
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टीचर (मिन्नी से), "आज स्कूल मे देर से आने का तुमने क्या बहाना ढूंढा है?"
मिन्नी, "सर आज मै इतनी तेज दौड कर आई कि बहाना सोचने का मौका ही नही मिला।"
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मरते समय पति ने अपने पत्नी को सब कुछ सच बताना चाहा । उस ने कहा " मै तुम्हे जीवन भर धोखा देता रहा। सच तो यह है कि दर्जनो औरतों से मेरे नाजायज संबंध थे।"
पत्नी बोली, "मै भी सच बताना चाहूँगी । तुम बीमारी से नही मर रहे मैने तुम्हे धीरे-धीरे असर करने वाला जहर दिया है।"
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पत्नी: मैने आज सपनो मे देखा है कि तुम मेरे लिए हीरों का हार लाए हो, इस सपने का क्या मतलब है?
पति: आज शाम को बताऊगा। शाम को पति ने एक पैकेट पत्नी को लाकर दिया। पत्नी ने खुशी-खुशी पैकेट खोला तो उस मे एक किताब निकली । किताब का नाम था, 'सपनो का मतलब' ।
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नया सिपाही (इंस्पैक्टर से), "सर ये बिलकुल गलत है कि मैं उस चोर से डर गया था।"
इंस्पैक्टर, "तो तुम उस गाडी के पिछे क्यों छिपे थे?"
नया सिपाही, "जी वह तो मैं कुत्ता देख कर छिपा था ।"
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मैनेजर ने आने वाले से पूछा, " क्या तुम्हें पता नही कि आज्ञा के बिना अन्दर आना मना है।"
आने वाला, "जनाब मैं आज्ञा लेने के लिए ही अन्दर आया हूं।"
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अध्यापक," बाबर भारत मे कब आया?"
बंटी, "पता नही सर।"
अध्यापक, " बोर्ड पर नही देख सकते, नाम के साथ ही लिखा है।"
बंटी, मैने सोचा, शायद वह उसका फ़ोन नम्बर है।"
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मेली - मां, मैं प्रेमसुख से शादी नहीं करूंगी।
शीला - क्यों बेटी, क्या तेरी नजर में कोई और है?
चमेली - नहीं मां!
शीला - क्या कोई परेशानी है?
चमेली - हां! प्रेमसुख को तो स्वर्ग-नरक में विश्वास ही नहीं है।
शीला - तू घबरा मत बेटी, पहले उससे शादी तो कर ले। उसके बाद उसे स्वर्ग-नरक में विश्वास अपने आप ही हो जाएगा।
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एक बहानेबाज कर्मचारी का दादा उस के दफ़तर में जा कर उस के बाँस से बोला, " इस दफ़तर मे सुनिल नाम का व्यक्ति कार्य करता है, मुझे उस से मिलना है, वह मेरा पोता है।"
बाँस ने मुस्करा कर कहा, " मुझे अफ़सोस है, आप देर से आए है, वह आप के आर्थी को कंधा देने के लिए छुट्टी लेकर जा चुका है।"
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सेठानी (नौकरानी से), "क्यों महारानी जी आज आने मे इतनी देर क्यों लगा दी?"
नौकरानी, "सेठानी जी मै सीढियों से गिर गई थी।"
सेठानी, "तो क्या उठने मे इतनी देर लगती है।"
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एक घर में चोरी की नियत से घुसे चोर को वहां की मोटी औरत ने पकड़ा और उसके ऊपर चढ़ कर बैठ गई।
फिर अपने नौकर से बोली,  जा जल्दी से, पुलिस को बुला ला।
नौकर घबरा कर बोला - बीवी जी, मेरी चप्पल नहीं मिल रही।
तभी चोर जोर से चीखा - ओह... यार, मेरी पहन ले, पर जल्दी जा...।
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अध्यापक कक्षा में छात्रों को चींटी के संबंध में शिक्षाप्रद बातें बता रहे थे |
अध्यापक - अब बताओ कि चींटी से हमें क्या सिख मिलती है |
छात्र - मास्टरजी चींटीयां यह बता देती है कि मां ने मिठाई कहां रखी है |
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प्रस्तुत हैं आज की कड़ियाँ 

मेरी कुछ हायकू रचनाएँ - संध्या

राजनैतिक तुकबन्दियाँ - राजीव तनेजा

चाँद - प्रियंका जैन

हाल - रेवा

तुरंत बदलिये अपना पासवर्ड और बचिये हार्टब्‍लीड से - माय बिग गाइड

फिल्‍म समीक्षा : भूतनाथ रिटर्न्‍स - चवन्नी चैप

प्यार वो एहसास है - अपर्णा खरे

हुआ ये क्यूँ कर? - पूनम

सागर - सुरेश राजपूत

रविकर ले हित-साध, आप मत डर खतरे से - रविकर

बहारें फिर भी आएँगी - सरोज

स्वागत है, तुम्हारा नवागत हे नए वर्ष - मोना परसाई

अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

जीवन में संगीत का महत्त्व

आदरणीय ब्लॉगर मित्रों सादर प्रणाम,

प्रस्तुत है आज का बुलेटिन : 

मनुष्य में संगीत प्रेम एक सहज बोध है | संगीत विद्या, सुस्वर, कंठ संगीत, गाना, ताल, तालैक्य, राग, लय, संगीत, सुर, म्यूजिक, तान, अवरोहण, राग, और भी ना जाने कौन कौन से नामों से यह जाना जाता है | हालांकि यह इसके परंपरागत पुकारे जाने वाले नाम हैं परन्तु आजकल की नई पीढ़ी को सिर्फ और सिर्फ 'म्यूजिक' शब्द ही समझ आता है | इस संसार में, कायनात में कितनी ही ऐसी चीजें हैं जो इंसान के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बहुत उपयोगी हैं और उनके जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करने में कारगार साबित हुई हैं | उनमें से एक ऐसी ही बेहतरीन अभिव्यक्ति संगीत की है | जिस प्रकार प्रकृति मनुष्य को सजीव और व्यवस्थित रखने हेतु ज्ञान-अज्ञान, पाप-पुण्य, घर्म-संस्कार का अनुगमन कराती है उसी प्रकार इंसानी मस्तिष्क और जीवन को शांत, अव्याकुल, स्थिर, तनाव मुक्त रखने के लिए यही संगीत भी सुनाती है | 

संगीत से सुन्दर इस दुनिया में कुछ भी और नहीं है और ना हो सकता है और ना ही कभी होगा क्योंकि संगीत हर तरह से बंधन मुक्त है | संगीत किसी एक धर्म का नहीं इसका कोई मज़हब नहीं यह किसी का भी ग़ुलाम नहीं | इसका कोई रंग नहीं रूप नहीं आकार नहीं प्रकार नहीं और ना ही कोई इसको बंधन में बाँध सकता है | संगीत ना हिन्दू का है ना मुसलमान का, ना सिख का, ना ईसाई का | यह सबका प्यारा है सबका दुलारा है | इस विश्व में संगीत का कोई सानी नहीं | जिस तरह इन्द्रधनुष के सात रंग होते हैं, इंसान के जीवन में सात वचन होते हैं, उसी तरह इसके साथ सुर होते हैं और इंसानी जीवन में उनका महत्त्व और नाता उतना ही गहरा और पुराना है | 

ज़िन्दगी में संगीत का एक अलग ही महत्त्व है | एक तरह से देखा जाये तो एक आम इंसान के जीवन में संगीत का एक अलग ही मुक़ाम है | संगीत दिल-ओ-दिमाग को ही नहीं बल्कि आत्मा को भी सुकून देता है | मिसाल के तौर पर यदि मैं अपने बारे में कहूँ तो मैं एक बहुत ही साधारण सा प्राकृतिक जीव हूँ | देश, काल, पात्र, माहौल, व्यवस्था, परिवेश, परिस्थिति, वातावरण, अवस्था के अनुरूप मेरी चित्त वृत्ति में परिवर्तन अनिवार्य होता है | कभी मनोदशा जड़ तो कभी मिजाज़ चेतन | कभी प्रसन्न कभी अप्रसन्न | कभी ख़ुशी कभी उदास | कभी खिन्न और ना जाने कितने ही भिन्न प्रकार के वेग मन का अभिन्न अंग आवर्तशः होते रहते हैं | इन सभी मुद्राओं को अपने वश में करने और उनके उग्र, हर्षित, उत्तेजित, कुपित, कष्टप्रद, आतंकित, अवनत मनोभावी आवेग को नियंत्रित और वशीभूत करने के लिए संगीत का सुनना बेहद ज़रूरी है | 

मेरे जैसा एक औसत मध्यम वर्गीय प्राणी हो, ऊँचे वर्ग का व्यक्ति हो या कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति हो, नर-नारी, बड़ा-बूढ़ा, लड़का-लड़की, बच्चा-बच्ची यहाँ तक किन्नर और जानवर आदि तक हर कोई संगीत को अपने जीवन में सर्वोच्तम स्थान देते हैं | ताल पर झूमना और थिरकना तो बिलकुल सभी को लुभाता है | रोज़मर्रा के जीवन की आपाधापी में आज सभी अपने तनाव को कम करने के लिए संगीत सुनते नज़र आते हैं | 

आज ज़िन्दगी में संगीत का सिलसिला सुबह की चाय की प्याली से शुरू होकर रात को सनम से बातचीत करते-करते सो जाने तक चलता रहता है | सुबह पौ फटी नहीं के घर में रेडियो पर घार्मिक कार्यक्रम, भजन, मन्त्र, आरती आदि सुनना आरम्भ हो जाता है | कुछ लोग अपने कंप्यूटर, डीवीडी प्लेयर, टीवी, डिश, टाटास्काई आदि उपकरणों पर भी सुनना पसंद करते हैं | वहीं पर कहीं पर उठते ही रॉक एंड रोल सुना जाता है तो कहीं नए-पुराने फ़िल्मी गीत बजाये जाते हैं | आशिकों के मकबरों में सुबह से आपको रोमांटिक संगीत की छनक सुनने को मिल जाएगी | वहीं बाल बच्चेदार परिवारों में छोटे बच्चों के लिए बालवाड़ी और उनके बालविहार से जुड़े कार्यक्रम सुनने को मिल जायेंगे | 

जिनके पास यह सब सुविधाएँ नहीं होती तो आज की टेक्नोलॉजी जिंदाबाद है जिसने मोबाइल फ़ोन में संगीत सुनने और चुनने दोनों का अधिकार दिया है | मोबाइल आज हर छोटे बड़े की ज़िन्दगी का एक अहम् हिस्सा है और उसी के साथ संगीत भी सहज रूप से जीवन में जज़्ब होता जा रहा है | घर से काम पर निकलते पैदल, गाड़ी में, मेट्रो में, बस में, रिक्शा में, स्कूटर पर, बाईक पर या कैसे भी हो हर जगह आपको लोगों के कानों में उनके हैडफ़ोन और ईअरप्लग लगे नज़र आ जायेंगे | 

संगीत की ताक़त ऐसी है की यदि एक दफ़ा बज जाये तो क्या अच्छा और क्या बुरा सभी नाचने और थिरकने को उतारू हो जाते हैं | संगीत एक है रूप अनेक हैं कभी माँ की लोरी में तो कभी पिता की थपकी में, कभी प्रभु के भजन में, कभी अल्लाह की अज़ान में, कभी सबद-गुरबानी में, कभी चर्च के कैरोल्स में | संगीत रोते हुओं को हंसाता है तो हँसते हुओं को रुलाता भी है | संगीत व्यक्ति की खुशियों में शामिल होता है तो ग़म में भी साथ निभाता है | संगीत की पैठ हर जगह में है | इसकी दीवानगी अपनों में भी होती है और परायों में भी | यह दोस्तों की भी चाहत है और दुश्मनों की भी | कभी लैला का इनकार है तो कभी मंजनू का इज़हार | कहीं सोहनी का रश्क़ है तो कहीं महिवाल का इश्क और कभी हीर रांझा का संगीत है | 

हमारे रोज़ की दिनचर्या में, ऑफिस में, केबिन में, कैंटीन में, कंप्यूटर पर, घर में, रसोई में, टॉयलेट में, बाथरूम में, बेडरूम में, टीवी रूम में, नौकरी लगने पर, शादी तय होने पर, गर्ल फ्रेंड-बॉयफ्रेंड मिलने पर, इन्क्रीमेंट होने पर, बालक होने पर, बीवी-प्रेमी-प्रेमिका से अनबन होने पर, यारी दोस्ती में, वैलेंटाइन डे पर, ख़ुशी में, त्योहारों पर, जन्मदिन पर, क्लास में पास होने पर, बॉस के लताड़ने पर, नौकरी छूटने पर, रिश्तों के टूटने पर, अपनों के रूठने-मानाने पर, डांट खाने पर, ख़ुशी जताने पर, ग़म छुपाने पर, टेंशन रिलीज़ करने पर, ग़म गलत करने पर, बार में नशा चढ़ने पर, दिलरुबा के भड़कने पर, हनीमून में तड़पने पर, बेडरूम में फड़कने पर और भी ना जाने कहाँ, कैसे, किधर गाना सुनना तो बनता है गुरु | जब भी कान लगाकर सुनोगे तब हमेशा हर कहीं संगीत बजता नज़र आएगा | जब बजेगा गाना जभी तो तरोताज़ा होगा दीवाना और तयार हो जायेगा ज़िन्दगी का एक नया फ़साना और लड़ेगा एक नई जंग के लिए, एक नए उत्साह के साथ नए दिन को जीने के लिए | 

कुछ कम्पनियों में तो बाकायदा म्यूजिक रूम भी बनाये जाते हैं जिससे उनके कर्मचारियों का मनोबल संगीत सुनाकर बढ़ाया जा सके और कार्यक्षमता में और ज्यादा बढ़ोतरी हो सके | अब तो हर कोई अपनी पसंद के गाने, विडिओज़ आदि सब यू-ट्यूब पर भी देख सकते हैं और सुन सकते हैं | इन्टरनेट सेवा ने सभी को आपस में इतना ज्यादा जोड़ दिया है की अब संगीत का आदान-प्रदान व्हाट्सऐप, वाईबर, लाईन, वीचैट, फेसबुक आदि जैसे स्रोतों के मध्यम से भी हो सकता है | आप अपनी मनोदशा को किसी से भी कभीं भी कहीं भी अपने चुनिन्दा संगीत के रूप में इन माध्यमों से व्यक्त कर सकते हैं | 

संगीत की महिमा ऐसी है कि निर्जीव में प्राण फूँक दे | अब आप निर्णय कीजिये संगीत इस दुनिया में सबसे बेहतर है या नहीं ........ क्या और कुछ है इससे बेहतर ! 

आज की कड़ियाँ 












अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

गुरुवार, 27 मार्च 2014

ईश्वर भी वेकेशन चाहता होगा ?

प्रिये ब्लॉगर मित्रों सादर नमस्कार,

प्रस्तुत है आज का बुलेटिन एक अलग विषय पर | उम्मीद है आपका रेस्पोंसे अच्छा मिलेगा कमेंट्स और क्रिटिक के साथ | 






क्या, ईश्वर आधीन है ? अपने भक्तों का, नहीं ईश्वर आधीन हो गया हमारे विचारों में | ईश्वर को माना है एक एजेंट की तरह या उसको रिश्वत देते हैं किसी नेता की भांति | अमुक काम होने पर, प्रसाद चढ़ाऊंगा / चढ़ाऊंगी | मात्रा क्या है, कितनी है यह काम के पूर्ण होने पर बताऊंगा / बताऊंगी | शायद भगवान् भी छटपटाता होगा, मानव के इस अविचारनीय व्यवहार पर | हर मानव विधाता को दोष देता है | अपने दुखों में, रोते-धोते, बिगड़ते काम के लिए, नौकरी ना मिलने पर, बढ़िया छोकरी ना मिलने पर, बीवी की बेवफ़ाई पर, सुसराल-मायका बुरा मिलने पर, बॉस बुरा मिलने पर, सास बुरी मिलने पर, साली अच्छी ना मिलने पर, बौस के जैसी सेक्रेटरी ना मिलने पर, बुरे कामों के लिए, किस्मत में खोट के लिए जैसे और भी कितने ही बहनों और हर उन्नत्ति में, विजय में, खुशियों में और सुचारू चलते जीवन में कहता है प्रभु की ऐसी ही इच्छा है, यह जो भी सब हो रहा है सब ऊपर वाले का किया धरा है | स्वस्थ शरीर रहने पर मानव अपने शरीर का ख़याल स्वयं रखता है पर अपने अच्छे-बुरे कर्मों के और उनके फल में बिना विचारे क्यों हर पल, हर वाक्य में भगवान् को घसीटता हैं ? हर चौराहे पर, हर गलियारे, वाहन में, घर में, रसोई में, दुकानों में, यहाँ तक सड़क पर आलों को बनाकर, चादरें बिछाकर, पेड़ों में, पत्तों में, गमले में, नदी-नालों में और जहाँ ना देखो वहां भी सभी जगह ईश्वर को स्थापित करता है या किसी दैत्य की तरह समझकर उसके कोप से डरकर यह सब करता है ? क्यों ? जबकि मानव जन्म में ही प्रभु ने गीता में सब कुछ कह डाला है फिर भी उसे ना जानते हुए ईश्वर को क्यों अपमानित करते हैं द्रौपदी की भांति ? क्यों उसके दामन को दूषित करते रहते हैं हम ? 

यह मेरी एक सोच भर है और मेरा ऐसा मानना है की शायद इंसान की ऐसी ही हरकतों के कारण आज कलयुग में कभी ईश्वर भी तंग आकर अपने ईश्वरपन के एहसास को भुलाना तो ज़रूर चाहता होगा | कहीं न कहीं वो भी एक सामान्य, साधारण, छोटा सा मिडिल क्लास ईश्वर बनकर अपना जीवन जीना चाहता होगा | कुछ समय के लिए ही सही पर कहीं जाकर चिल्ल करना चाहता होगा | हाथ में जूस का गिलास लेकर कहीं समुंद्र के किनारे कुर्सी पर लेटे आराम फ़रमाना चाहता होगा | रोज़ रोज़ के आने वाले किल किल कांटे वाले मुकद्दमें, विनय, गुजारिश, फ़रियाद, अनुरोध, अर्जियों, आवेदन, इच्छाओं, गुहार, निवेदन, प्रार्थना, माँग, विनती इत्यादि से थक कर, पक कर सबके फैंसलों, परिणामों, चिंताओं, परेशानी से दूर रहकर अपने मन मस्तिष्क को शान्ति देना चाहता होगा | कहीं अकेले में बैठकर कॉफ़ी पीते हुए हाथ में किसी दुसरे भगवान् की लिखी किताब लेकर पढ़कर क्वालिटी टाइम बिताना चाहता होगा | कभी वो भी तो अकेले थिएटर में बैठ कर पॉपकॉर्न चरते अपनी पसंदीदा सिनेमा का मज़ा उठाना चाहता होगा | जो प्रभु आज के युग में कपल हैं मतलब की गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड हैं या मियां-बीवी हैं और दोनों ही प्रोफेशनल वर्किंग मोड में हैं और रोज़ाना जीवन में ईश्वरपन के सुख-साधन अफ्फोर्ड कर सकते हैं वो भी कहीं न कहीं समय निकालकर आपस में साथ समय ज़रूर व्यतीत करना चाहते होंगे हैं | मूड बना कर वो भी तो आपस में डुएट गाना चाहते होंगे | मुझे ऐसा लगता है भगवान् को भी तो हॉलिडे, इन्क्रीमेंट, पर्क्स, ब्रेक आदि मिलना चाहियें | जब इंसान अपनी परिस्थितियों से उब कर, किलस कर, चिढ़ कर भगवान् को दोष दे सकता है तो प्रभु भी तो कभी ना कभी ऐसा सोच सकता है | बात बात पर प्रभु को कोसने से और पकड़ कर इन्वोल्वे करने से अच्छा है अपने कर्म पर ध्यान दें और मस्त रहें | हँसे मुस्कुराएँ खुशियाँ मनाएं परिस्थितियां चाहे कितनी ही विषम क्यों न हों, विपरीत क्यों ना हों हमेशा सकारात्मक सोच रखें और पॉजिटिव रहे | क्यों है या नहीं ? 

यह व्यंग लिखने का मतलब सिर्फ इतना है के उन आँख वाले अन्धो और कान के बहरों और पुरुषार्थ ना करने वाले आलसी जीवों को अक्ल आ जाये और वो बात बात पर भगवान् की टांग खींचना बंद करके हिम्मत जुटा कर अपने जीवन का सामना अपने आप करने की कोशिश करें | क्योंकि जिस दिन भगवान् में ब्रेक ले लिया ना उस दिन बेटा अच्छे अच्छों की लंका लग जाएगी | कुछ सोचो - :) ......

आज की कड़ियाँ 
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एक आम चेहरा भर ही तो हूँ - वंदना गुप्ता

भूतों के राजा का वरदान तो कल्पना है - नित्यानंद गायेन

जय बोलें किसकी - उदय वीर सिंह

कभी बतला भी न पाया कि कितना प्यार करता हूँ तुमसे मैं - वीरेन डंगवाल

ज़र्रों में क्यूँ खोज रहा है काफ़िर शुकून के पल यहाँ - केशव किशोर जैन

शोर था इस मकाँ में क्या-क्या कुछ - नासिर काज़मी

आणविक परीक्षण - अनीता

अपने (कुण्डलियाँ) - सरिता भाटिया

ख़्वाब - सरस

रंगमंच के बहाने - राजेश उत्साही

कम्‍प्‍यूटर के टिप्‍स और ट्रिक्‍स का बेहतरीन संग्रह - कंप्यूटर टिप्स एंड ट्रिक्स

नज़रे उठा के देखो करता है 'वो' इशारे - शिखा कौशिक

अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

गुरुवार, 13 मार्च 2014

दोगला समाज

आदरणीय ब्लॉगर दोस्तों सादर प्रणाम 

प्रस्तुत है आज की बुलेटिन.....

शादी हुई ... दोनों बहुत खुश थे!

स्टेज पर फोटो सेशन शुरू हुआ!

दूल्हे ने अपने दोस्तों का परिचय साथ खड़ी अपनी साली से करवाया " ये है मेरी साली , आधी घरवाली "

दोस्त ठहाका मारकर हंस दिए !

दुल्हन मुस्कुराई और अपने देवर का परिचय अपनी सहेलियो से करवाया " ये हैं मेरे देवर ..आधे पति परमेश्वर "

ये क्या हुआ ....? अविश्वसनीय ...अकल्पनीय!

भाई समान देवर के कान सुन्न हो गए! 

पति बेहोश होते होते बचा!

दूल्हे , दूल्हे के दोस्तों , रिश्तेदारों सहित सबके चेहरे से मुस्कान गायब हो गयी!

लक्ष्मन रेखा नाम का एक गमला अचानक स्टेज से नीचे टपक कर फूट गया!

स्त्री की मर्यादा नाम की हेलोजन लाईट भक्क से फ्यूज़ हो गयी!

थोड़ी देर बाद एक एम्बुलेंस तेज़ी से सड़कों पर भागती जा रही थी!

जिसमे दो स्ट्रेचर थे! एक स्ट्रेचर पर भारतीय संस्कृति कोमा में पड़ी थी ...

शायद उसे अटैक पड़ गया था! 

दुसरे स्ट्रेचर पर पुरुषवाद घायल अवस्था में पड़ा था ...

उसे किसी ने सर पर गहरी चोट मारी थी!

आसमान में अचानक एक तेज़ आवाज़ गूंजी .... भारत की सारी स्त्रियाँ एक साथ ठहाका मारकर हंस पड़ी थीं !

यह चुटकुला या व्यंग आज मुझे एक मित्र ने भेजा | पढ़कर दिमाग में फितूर उठ गया और अब जाकर यहाँ इस लेख के रूप में शांत हुआ है | यह व्यंग ख़ास पुरुष वर्ग के लिए है जो खुद तो अश्लील व्यंग करना पसंद करते हैँ पर जहाँ महिलाओं कि बात आती है वहां संस्कृति कि दुहाई देते फिरते हैं | अपनी नज़रों में तो गिद्ध के समान लार लिए घुमते हैं और ऊँगली दूसरों पर उठाते हैं | सवाल यह उठता है की यह बात कहाँ तक सार्थक है | क्या नारी को अपनी बात कहने का हक़ इस दोगले समाज में है भी या नहीं है ? 

इस पुरुष प्रधान समाज में नारी को जिस हकारत की नज़र से देखा जाता है और एक भोग की वस्तु, प्रयोग की वस्तु, अपने मौज मज़े की वस्तु, एक बंधवा मज़दूर के रूप में देखा जाता है क्या वह सही है ? मेरी सोच से तो इससे ज्यादा निंदनीय बात कोई और हो ही नहीं सकती | 

आज की नारी स्वाबलंबी है | अपने पैरों पर स्वयं खड़ी है | सबका ख़याल रखने में सक्षम है | वो अपनी व्यावसायिक ज़िन्दगी और निजी ज़िन्दगी में भली भांति समन्वय बनाकर चलने वालो में से हैं फिर क्यों पुरुष इस बात को नहीं समझ और स्वीकार कर पाता की नारी सर्वोच्च है सर्वोत्तम है | 

नारी को लेकर हर जगह मर्द हर प्रकार के अश्लील मज़ाक करता है यदि वही स्त्री करे तो उसे आपत्ति है | क्यों भला? उसे भी पूर्ण अधिकार है हर तरह का मजाक करने का | यदि पुरुष यह समझते हैं कि इस प्रकार के मज़ाक से उनकी गरिमा में चार चाँद लग जाते हैं तो उसी प्रकार नारी की गरिमा भी क्यों नहीं बढती ? ऐसे मज़ाक करने पर उनकी गरिमा पर ऊँगली क्यों उठाई जाती है | 

मर्दों को यह समझना होगा कि यदि नारी एक जन्म देने वाली माँ है, दुखों को बांटने वाली दोस्त है, जीवन भर साथ देने वाली पत्नी है, हंसी-मज़ाक, छेड़छाड़ करके दिल लगाने वाली बहन है, एक पिता का गुरूर बेटी है वही स्त्री समय आने पर ज़रुरत के अनुसार स्त्री शक्ति का प्रतीक देवी दुर्गा और काली भी है | 

मुझे तो बड़े दुःख और खेद के साथ ऐसे दोगले समाज की भत्सना करने का दिल करता है जिसका एक हिस्सा मैं स्वयं भी हूँ | आज जो नारी का सम्मान नहीं कर सकते और उन्हें बराबरी का दर्जा देने में असमर्थ हैं वो आगे भविष्य में क्या करेंगे ? ऐसी लिजलिजी सोच, संकीर्ण मानसिकता, अनैतिक रवैया और बदबूदार विचार वाले लोगों के घटिया मस्तिष्क पर थू करके अपने थूक को भी व्यर्थ करने का दिल भी नहीं करता जो किसी लायक ही नहीं हैं | 

हर रोज़, सुबह शाम, आये दिन कहीं ना कहीं नारी का उत्पीड़न हो रहा है, अश्लील व्यवहार हो रहा है, फिल्म जगत में नारी को एक कठपुतली बनाकर पेश किया जा रहा है, सड़क चलते छेड़खानी हो रही है, मोहल्ले के नुक्कड़ पर फितरे कसे जा रहे हैं, बलात्कार की घटनाएँ हो रही हैं, दहेज़ के कारण हत्याएं हो रही हैं, छोटी छोटी बालिकाओं का शोषण हो रहा है | घरों में, दफ्तरों में, अस्पतालों में, विद्यालाओं में, संगठनो में, राजनीति में, फिल्म जगत में, विज्ञापन जगत में और जहाँ ना देखो वहां भी हर पल नारी के प्रति दुर्भावना रखने वाले पाखंडी देखने को मिल ही जाते हैं | इस दोगलेपन की भी हद है | यहाँ तक अगर गौर फरमाएं तो देसी प्रचलित गलियां भी माँ और बहन पर ही आधारित हैं | अरे यार गरियाने का इतना शौक़ है तो बाप भाई पर बना कर दो नारी पर ही क्यों ? 

आख़िर कब तक ? ऐसा कब तक चलता रहेगा ? कब हमारा समाज और पुरुष सोच इस पाखंड का त्याग करेगी ? कब सच का सामना करने की हिम्मत समाज में आएगी ? कब पुरुष की आँखें खुलेंगी ? कब तक ऐसे ही नकारात्मकता का नंगा नाच समाज में होता रहेगा ? अपनी अशिष्टता और असभ्यता की चूड़ियाँ यह पुरुष प्रधान समाज कब तोड़ेगा और अपनी कायरता के सिन्दूर को कब अपनी मांग से मिटाएगा ? कब अपनी कुरीतियों के साथ पुरुष सती होगा ? कब अपनी यौन इच्छाओं, भद्दी भाषावली, कुसंगति और अश्लीलता और फूहड़ मजाकिया लहजे की चिता जलाकर उनकी विधवा कहलायेगा ? कब तक आखिर कब तक ? इन सवालों का जवाब आज नहीं ढून्ढ पाए तो कल तक शायद बहुत देर हो जाएगी | सोच बदलो समाज बदलो चरित्र बदलो व्यक्तित्त्व बदलो | इस सच पर ज़रा गौर फरमाएं और सोचें ....... !

आज की कड़ियाँ 













अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

गुरुवार, 6 मार्च 2014

ईश्वरीय ध्यान और मानव

आदरणीय ब्लॉगर मित्रगण सादर नमन

आज की बुलेटिन एक अलग रंग में रंगी आधात्मिक विचारों से लबरेज़ और मानव के एक अनोखे रूप को प्रस्तुत करती हुई आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ | एक विचार जो यकायक ही मस्तिष्क में कौंधा और तुरंत ही कागज़ पर उतर आया और बन गया आज की प्रस्तुति का सबब | तो पेश कर रहा हूँ अपने अलबेले दिमाग से उपजे कुछ ख़यालात |


मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वरीय ध्यान मानव के लिए सबसे बड़ा सूरज है | जिस प्रकार सूरज के निकलने से समस्त संसार जगमगा उठता है ठीक उसी प्रकार प्रभु की ज्योति पाने से इंसान भी स्वर्ण के भाँती दमकने लगता है | उसका अंत करण एक अद्भुत अलौकिक रौशनी में डूब जाता है और फिर वह व्यक्ति जब संसार में जिस किसी वास्तु को देखता है तब उसे सब जगह वो ही प्रकाश नज़र आता है, जो अंत करण में विद्यमान है | तब सभी उसे अपने समान लगते हैं | समस्त मानव जाति उसकी बंधू बन जाती है, यानि सभी इंसान उसके भाई, नातेदार, रिश्तेदार, यार दोस्त, मित्र, अग्रज, अनुज सब एक समान लगते हैं | छल-कपट, उंच-नीच, जात-पात, मोह-माया, अच्छा-बुरा, बैरभाव, लोभ आदि के प्रश्नों से ऊपर उठकर उसकी सोच एक अलग संसार और आकाश में विचरण करती है | ज्ञान, अपनेपन, विश्वास, सहनशीलता, स्वीकरण, त्याग,  की एक अलग अवस्था उसके मन-मस्तिष्क में समाहित होती है | वो अवस्था सम्पूर्ण मानवता की अवस्था होती हैं जिस पर इश्वर भी कहते हैं कभी कभी नतमस्तक हो जाता है |

आज की कड़ियाँ 

छोटी छोटी खुशियाँ - कुशवंश

ये 'कामवालियां - शालिनी कौशिक

पकाऊ फ्रेन्ड्स - सरिक खान

टाइटैनिक की कहानी - अनीता

पिता की महानता - आमिर अली

पीर विरह की - मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

टुकड़े - मीनाक्षी मिश्रा तिवारी

स्त्री है वह - डिंपल सिरोही

कहीं किसी ख़याल का निशान भी नहीं बचा - सौरभ शेखर

भावों की चमक - चेतन रामकिशन

कम खुदा न थी परोसने वाली - मीता

अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

महादेव के अंश चंद्रशेखर आज़ाद

आदरणीय मित्रगण.... प्रणाम

कुछ समय से मैं बुलेटिन लगा पाने में असमर्थ था | इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ | अब एक नए जूनून और सोच के साथ आपके सामने हाज़िर हूँ और ये मेरा छोटा सा प्रयास आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ | आशा करता हूँ आपको मेरे विचार प्रभावित करेंगे और अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अपनी बात, राय, सहमति, असहमति वयक्त करेंगे तो बहुत आनंद प्राप्त होगा |


आज भोले बाबा महादेव महाकालेश्वर शमशान अधिपति शिव शम्भू का जन्म दिवस है मतलब आज महाशिवरात्रि का पर्व है और दूसरी तरफ आज ही हमारे अपने शहीद-ए-आज़म महान क्रान्तिकारी अमर पूजनीय वन्दनीय पंडित चन्द्रशेखर 'आजाद' जी जिनका नाम भर सुनते ही अंग्रेज़ अफसरों की पैंट गीली हो जाती थी की ८३वीं पुण्यतिथि भी है |

वैसे अपने दिल से सोचता हूँ तो आवाज़ आती है के आज के दिन को क्यों ना 'चन्द्रशेखर दिवस' का नाम देकर एक नए रूप में याद किया जाये | आप पूछेंगे क्यों तो मैं कहूँगा कि शंकर भगवान् को भी तो इसी नाम से जाना जाता है, उनके अनेक नामों में से एक नाम ‘चन्द्रशेखर’ भी है और दूसरी तरफ पंडित जी भी तो भारत के क्रांतिकारी समूह के शिव ही थे | उनके तांडव ने अंग्रेजों और गद्दारों के दिलों में दहशत और हलचल मचा कर रख दी थी और आजादी के चाँद को वो भी अपने शीश पर लिए ही चलते थे |

लोग कहते हैं उन्हें २७ फ़रवरी, १९३१, को एक ग़द्दार की मुखबरी के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था | मैं कहता हूँ कि उन्होंने जो फैसला लिया वो सही था क्योंकि मैं 'सत्यम शिवम् सुन्दरम' और ‘सत्यमेव जयते’ में विश्वास करता हूँ और पंडितजी का शिव समान रूप सुन्दर ही नहीं उनके व्यक्तित्त्व में भी सत्य कूट कूट कर भरा था | वह भारत माता के सच्चे सपूत थे और अपने अंतिम समय तक अपने जीवन सत्य और वचन को साथ लेकर ही चलते रहे और जीवित किसी के हाथ ना आने का प्रण पूर्ण किया |  वे अमर हो गए जैसे हमारे भोले बाबा अमर हैं, अजर हैं और बा-असर हैं |

ऐसे महान क्रांतिकारी, शिव सरीखे, भोले बाबा के समान दृढ़ संकल्पी, बुलंद इरादों के पक्के, क्रांति के तांडव से अंग्रेज़ों और गद्दारों के दांत खट्टे करने वाले, सत्य के मार्ग पर चलने वाले, जूनून और वादे दे पक्के, देश प्रेमी, निष्ठावान, कर्मप्रिये, सदैव अमर स्वतंत्रता सेनानी को मेरा शत शत नमन, हार्दिक श्रद्धांजलि और नत मस्तक हो प्रणाम |

आज का ये दिवस हर सूरत में 'चंद्रशेखर दिवस' कहलाने योग्य है इसलिए भारत माता के सपूत, देशभक्त, शिवांश अमर पंडित चन्द्रशेखर 'आज़ाद' और श्रृष्टि के पालन हार और महाप्रभु महादेव शिव शम्भू को मेरा कोटि कोटि नमन | जिस प्रकार शिव सदैव अजर अमर रहेंगे उसी प्रकार 'आज़ाद' का नाम भी अजर अमर रहेगा |

जय शिव शम्भू | जय महाकाल महाकालेश्वर | जयकारा वीर बजरंगी का हर हर महादेव |

आज की कड़ियाँ 
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मैं सजदा करता हूँ उस जगह जहाँ कोई 'शहीद' हुआ हो - शिवम् मिश्रा

पॉपुलर संस्कृति में महादेव - अवनीश मिश्रा

चंद्रशेखर आजाद की दुर्लभ तस्वीर - मंजीत ठाकुर

शिवरात्रि का अवकाश - अनीता

चंद्रशेखर आजाद - अरविन्द गौरव

महाशिवरात्रि - गृहस्थ महिमा - गिरिजेश राव

चंद्रशेखर आजाद - अनीता शर्मा

विविधा - आना

चंद्रशेखर आज़ाद की बहन - अवनीश सिंह

प्रेम - इमरान अंसारी

अच्छे लगे - त्रिलोकी मोहन पुरोहित

अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

बुधवार, 26 जून 2013

दुर्घटनाएं जिंदगियां बर्बाद करती हैं और आपदाएं नस्ल ..........



उत्तराखंड आपदा , अभी पूरे देश के ज़ेहन में सिर्फ़ यही कौंध रहा है , उस भयावह आपदा जो कयामत बनके आई थी , बीते गुजरे एक सप्ताह से भी अधिक का समय बीत चला है , आज भी खबर यही है कि हज़ारों लोग अब भी मौत के मुंह में हैं । जिंदगियों के जाने का आंकडा , वो आंकडा जो सरकार बता रही है बढता जा रहा है और और इससे कई गुना ज्यादा वो संख्या होगी जो दिन बीतने के साथ ही उत्तराखंड की जमींदोज़ हो चुकी धरती और पहाड के बीच अब गुमनाम होने जैसी होती जा रही है । वो जो पिछले नौ दिनों से अपनों की तलाश में भटक रहे हैं , उनके बारे में जानने के लिए बेताब हैं , परेशान हैं , मायूस हैं जाने उनकी ये बेताबी , ये परेशानी और ये मायूसी कितनी लंबी होने वाली है कईयों की तो शायद उम्र भर के लिए ।

इस आपदा ने इंसानियत के रक्षक हमारे वीर जांबाज़ सैनिकों को अपना फ़र्ज़ निभाने का मौका दिया तो वहीं कुछ आदमखोर इंसानों के झुंड ने लाशों तक से व्याभिचार करके ये साबित कर दिया कि , इंसान अब जीवन स्तर की मानसिकता में पशुओं से कहीं अधिक घृणित और नीच हो गया है । ऐसे में एक कही हुई बात मुझे याद आ रही थी कि ,दुर्घटनाएं तो जिंदगियां बर्बाद करती हैं मगर आपदाएं नस्लों को तबाह कर देती हैं , युगों के लिए ।


हिंदी अंतर्जाल के विभिन्न प्लेटाफ़ार्मों पर , सभी अपनी अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं , लेकिन इसी बीच मैं फ़ेसबुक पर अचानक नज़र पडती है , सुनीता भास्कर , पेशे से पत्रकार ,
जिनका ब्लॉग ही है , पत्रकार की डायरी और जितना मैं पढता जाता हूं दिल दिमाग सन्न होते जाते हैं ,

अपनी ताज़ा रिपोर्ट में वे लिखती हैं ,
" कईयों के परिजन खुद जान हथेली में रखकर ग्रुप में गुप्तकाशी या गौरीकुंड तक हो आए हैं, लेकिन उन्हें अपने कहीं नजर नहीं आए। कई परिजन चार चार हिस्सों में बंटे हैं। संगठनों द्वारा रात गुजारने के लिए दिए आशियाने से मुंह अंधेरे ही यह लोग उठ जाते हैं और चारों दिशाओं में फैल जाते हैं। एक सहस्त्रधारा हैलीपैड पर तो दूजा जौलीग्रांट एयरपोर्ट के गेट के बाहर अड्डा डालता है। तीसरा ऋषिकेश तो चौथा हरिद्वार में अपनों के इंतजार में खड़ा हो जाता है। उन्हें नहीं मालूम कि बचाव व राहत कार्य के बाद कौन किस रास्ते कब व कहां लाया जाएगा। कुछ लोग सभी अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं तो कोई दिन भर कैफे में सरकारी वेबसाइट खंगालते रहते हैं। आलम यह है कि मुंह अंधेरे की सुबह से शाम की कालिमा छंटने तक कोई भी मंत्री, अधिकारी उनके कांधे पर हाथ रख दिलासा देने वाला नहीं है। इसके उलट यह अधिकारी फोन स्वीच आफ कर वातानुकुलित कमरो में रहकर  उनके जले पर नमक ही छिडक़ने का काम कर रहे हैं।"


इस त्रासदी के आठ दिनों बाद कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी के आपदाग्रस्त क्षेत्र के दौरे पर कटाक्ष करते हुए गोदियाल जी अपने ब्लॉग अंधड पर लिखते हैं ,

"निकले तो थे गुपचुप दर्द बांटने 
बाढ़ पीड़ितों का,  
दर्मियाँ सफर तो भेद उनका 
किसी पे उजागर न हुआ, 
 मगर खुला भी तो कब, 
जब मंजिल पे वो पूछ बैठे;  
"आखिर इस जगह हुआ क्या था ?"


और इसके बाद शिवम मिश्रा जी ने एक पोस्ट लिंक प्रेषित की , जिसमें नित्यानंद जी ने बडे ही मार्मिक रूप से , पहाड की मां ’ को चित्रित किया है देखिए ,


पहाड़ की माँ ---------------


सीता 
पांच बच्चों की माँ है 
पार चुकी है पैंतालीस वर्ष 
जीवन के 
दार्जिलिंग स्टेशन पर 
करती है कुली का काम 
अपने बच्चों के भविष्य के लिए |


सिर पर उठाती है
भद्र लोगों का भारी -भारी सामान
इस भारी कमरतोड़ महंगाई में
वह मांगती है
अपनी मेहनत की कमाई
बाबुलोग करते उससे मोलभाव
कईबार हड़तालों में
मार लेती है पेट की भूख |


ब्लॉगर प्लेटफ़ार्म के अतिरिक्त , जागरण जंक्शन और नवभारत टाइम्स ब्लॉग्स जैसे अन्य प्लेटफ़ार्मों पर भी यही विषय सबसे ज्यादा मथा जा रहा है , देखिए वहां यतीन्द्रनाथ , टिहरी बांद और हिमालय को मुद्दा बनाते हुए कहते हैं

"
1972 में योजना आयोग द्वारा टिहरी बाँध परियोजना को मंजूरी के साथ ही टिहरी और आस-पास के इलाके में बाँध का व्यापक विरोध शुरू हो गया था। जब विरोध के स्वर तत्कालीन केंद्र सरकार तक पहुंचा तब संसद की ओर से इन विरोधों की जांच करने के लिए 1977 में पिटीशन कमेटी निर्धारित की गई।1980 में इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी ने बाँध से जुड़े पर्यावरण के मुद्दों की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाई। इस समिति ने बाँध के विकल्प के रूप में बहती हुई नदी पर छोटे-छोटे बाँध बनाने की सिफ़ारिश की। पर्यावरण मंत्रालय ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर गंभीरता पूर्वक विचार करने के बाद अक्टूबर,1986 में बाँध परियोजना को एकदम छोड़ देने का फैसला किया। नवंबर, 1986 में तत्कालीन सोवियत संघ सरकार ने टिहरी बाँध निर्माण में आर्थिक मदद करने की घोषणा की। इसके बाद फिर से बाँध निर्माण कार्य की सरगर्मी बढ़ने लगी। फिर बाँध से जुड़े मुद्दों पर मंत्रालय की ओर से समिति का गठन हुआ। फरवरी, 1990 में इस समिति ने बाँध स्थल का दौरा करने के बाद रिपोर्ट दी कि “टिहरी बाँध परियोजना पर्यावरण के संरक्षण की दृष्टि से बिलकुल अनुचित हैं।”

 वहीं ब्लॉगर श्री जे एल सिंह , अपने ब्लॉग में बरसात से बर्बादी , को शब्दों में कुछ यूं पिरोते हैं ,
"

सूरज ताप जलधि पर परहीं, जल बन भाप गगन पर चढही.
भाप गगन में बादल बन के, भार बढ़ावहि बूंदन बन के.
पवन उड़ावहीं मेघन भारी, गिरि से मिले जु नर से नारी.
बादल गरजा दामिनि दमके, बंद नयन भे झपकी पलके!
रिमझिम बूँदें वर्षा लाई, जल धारा गिरि मध्य सुहाई
अति बृष्टि बलवती जल धारा, प्रबल देवनदि आफत सारा "

नवभारत टाइम्स ब्लॉगस पर राजेश कालरा कहते हैं कि अब कभी सामने नहीं आ पाएगी सच्चाई

"बर्बादी के जितने भी अंदाजे लगाए जा रहे हैं, उनमें एक बात विशिष्ट है। मरने वालों की तादाद। शुरुआत 200 लोगों की मौत से हुई थी। फिर उत्तराखंड के सीएम ने कहा कि एक हजार लोग मरे हैं। फिर राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री ने कहा कि मरने वालों की तादाद 5000 तक पहुंच सकती है। अब अंदाजे लगाने का तो ऐसा है कि जिसका जो जी करे उतनी संख्या बता दे। समस्या यह है कि सभी अंधेरे में तीर चला रहे हैं क्योंकि सचाई यह है कि हमें कभी पता नहीं चलेगा कि असल में कितने लोग मारे गए।"

तो डाक्टर सामबे , आपदा प्रबंधन पर सवाल उठाते हुए कहते हैं , " 

kedarnath1.jpgईश्वर-अल्लाह पर हम आगे विचार करेंगे। पहले एक साधारण-सी बात कहते हैं और वह यह कि जो खतरों से खुद को बचाता है, खुदा उसी को बचाता है। अंग्रेजी कहावत है- 'God helps those who help themselves'। हम नदी, झील, पहाड़ और समुद्र के समीप जाएं, तो राम भरोसे न जाएं। अपनी समझदारी साथ लेकर जाएं। वहां की भौगोलिक स्थिति और संभावित खतरों के बारे में सजग होकर जाएं। यह पता करके जाएं कि अगर वहां आफत आई, तो वहां बचाव की क्या व्यवस्था है? वहां का आपदा प्रबंधन का रेकार्ड क्या है? हादसों के रेकार्ड आनेवाले खतरों से निपटने में मददगार होते हैं। कुदरत के कहर से बचने के लिए हम क्या कर सकते हैं?"

वहीं ब्लॉगर तृप्ति अपने ब्लॉग कच्ची लोई में कहती हैं कि बारी हमारी भी बहुत जल्दी आनी है , अपनी पोस्ट को समाप्त करते हुए वो कुछ पंक्तियां लिखती हैं , 

"

तरक्की कर रहे हैं हम तरक्की करते जाएंगे
बहुत कुछ खो चुके हैं हम बहुत कुछ खोते जाएंगे
हैं जिंदा हम बड़ी बेशर्म सांसों के सहारे पर
मरेगा सामने वाला मगर हम जीते जाएंगे
कहानी सामने वाले की अपनी भी कभी होगी
वही तब आसमां होगा वही तब ये जमीं होगी
जो समझो बात इतनी सी तो फिर हर बात छोटी है
नहीं तो चाह में जीने की हम बस मरते जाएंगे..."

इधर पिछले दिनों ब्लॉगिंग में भी भूस्खलन का दौर जारी है , यानि कि उठापटक जी , अविनाश वाचस्पति जी ने अपने ब्लॉग को ही अलविदा करने का मन बना लिया , या शायद कह ही दिया और घोषणा कर डाली कि अब वे सिर्फ़ फ़ेसबुक पर ही नुमाया होंगे , इसी उहापोह में डाक्टर अरविंद मिश्रा जी की पोस्ट आई और क्या लबाबल बहस से लबरेज हो गई पोस्ट देखिए , डा मिश्रा ने लिखा ,
"वे पिछडे हैं जो ब्लॉगिंग तक ही सिमटे हैं " , जिसमें उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि ,
" आज भी मैं यह बल देकर कहता हूँ कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद  माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख  सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं .यह पोस्ट भी वहां दिखेगी ही ...." 

जब पोस्ट इतनी धारदार, वारदार हो तो फ़िर प्रतिक्रिया तो आनी ही थी और क्या खूब आईं देखिए , 




  1. ब्लॉग अभिव्यक्ति का सहज माध्यम है। इसकी प्रासंगिगता कभी खत्म नहीं होगी।

    फ़ेसबुक और ट्विटर तुरंता जुमलेबाजी के माध्यम हैं। फ़ेसबुक मेरे लिये नोटिसबोर्ड की तरह है जहां अपने ब्लॉग की नोटिस लगाते हैं, जुमलेबाजी करते हैं, फ़ूट लेते हैं। ब्लॉग हमारे लिये घर की तरह है जहां हमेशा लौटने का, रहने का मन करता है।

    लिखने वाले की सबसे बड़ी इच्छा होती है कि लोग उसे पढ़ें और सराहें। प्रिंट मीडिया में छपना वाह-वाही समझी जाती हैं क्योंकि ब्लॉग के मुकाबले ज्यादा लोग पढ़ते हैं उसे। प्रिंट भले ही खबरों के लिये आउटडेटेड हो गया हो लेकिन बाकी लिखे पढ़े के लिये उसमें छपने का मजा ही कुछ और है। इसे स्वीकारने में कोई संकोच नहीं करना चाहिये।

    लेकिन प्रिंट मीडिया की अपनी सीमायें हैं। अगर आप बहुत बड़े सेलिब्रिटी नहीं हैं तो आपका लिखा सब कुछ वहां नहीं छप जायेगा। आपके अपने मन के भाव, उद्गार, संस्मरण , चिरकुटैयों, अपीलों , धिक्कार के लिये वहां कोई जगह नहीं होगी। उसके लिये आपको लौट के अपने यहां ही आना होगा और उसके लिये ब्लॉग से उपयुक्त कोई माध्यम नहीं है।

    ब्लॉगिंग ने आम लोगों को अभिव्यक्ति का जो सहज माध्यम प्रदान किया है उसकी तुलना और किसी माध्यम से नहीं हो सकती। लोग अपने भाव, कवितायें, सोच, संस्मरण अपने ब्लॉग पर लिखते हैं। ट्विटर पर शब्द सीमा है, फ़ेसबुक पर सर्चिंग लिमिटेशन। ब्लॉग पर आप अपनी सालों पहले की किसी भी पोस्ट पर डेढ़ -दो मिनट में पहुंच सकते हैं, फ़ेसबुक अपना दस दिन पुराना स्टेटस खोजने में भी घंटा लग सकता है। ब्लॉग जैसी आजादी और सुविधा और कहां?

    इस बीच एक घालमेल और हुआ है कि, ब्लॉग जो कि अभिव्यक्ति का माध्यम है और जिसकी कोई सीमा नहीं है को, साहित्यप्रेमियों और पत्रकार बिरादरी ने हाईजैक जैसा करके इसको साहित्यमंच या फ़िर पत्रकारपुरम जैसा बनाने की कोशिश करके इसको सीमित करना शुरु कर दिया है। जबकि ऐसा है नहीं- ब्लॉग आज के समय में दुनिया का सबसे तेज दुतरफ़ा माध्यम है। लेखक/पाठक के बीच अभिव्यक्ति और प्रतिक्रिया का इससे तेज और कोई खुला माध्यम नहीं है।

    ब्लॉग और फ़ेसबुक से पैसे कमाने की बात जो करते हैं वे लहरें गिनकर भी पैसा कमा सकतें हैं। उसके लिये व्यक्ति को लेखन सक्षम नहीं कमाई सक्षम होना चाहिये। पैसे कमाने और नाम कमाने और इनाम जुगाड़ने के लिये भी लोग तरह-तरह की तिकड़में लगानी होती हैं। वे सब आम आदमी के बस की नहीं होती।

    मैं ब्लॉग लेखन से क्यों जुड़ा हूं उसका यही कारण है कि अपनी तमाम अभिव्यक्तियों के लिये ब्लॉग ही सबसे मुफ़ीद माध्यम है। और कोई माध्यम इतना सहज और सुगम नहीं है जितना कि ब्लॉग। इसीलिये अपन इससे जुड़े हैं और इंशाअल्लाह जुड़े रहेंगे। आप भी यह पोस्ट सिर्फ़ ब्लॉग पर ही लिख सकते थे। लिख तो फ़ेसबुक पर भी सकते थे लेकिन अगर वहां लिखते तो हम इत्ता लंबा कमेंट वहां नहीं लिखते। रात को पढ़कर लाइक करके फ़ूट लिये होते। आपकी तमाम बहस-विवाद वाली तमाम पोस्टें जो ब्लॉग पर हैं वे हम फ़ौरन खोजकर पढ़ सकते हैं। फ़ेसबुक और दूसरे तुरंता माध्यमों पर -इट इज हेल ऑफ़ द टॉस्क! :)

    समय के साथ लोगों की धारणायें भी बदलती हैं। डेढ़ साल पहले हमने एक पोस्ट लिखी थी - ब्लॉगिंग, फ़ेसबुक और ट्विटर . उस पर आपका कहना था- ब्लॉग जगत में निश्चय ही एक मरघटी का माहौल बन रहा है ..हमें कोई खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए ….

    इसी पोस्ट पर आपके घोषित शिष्य संतोष त्रिवेदी की टिप्पणी थी- फेसबुक की लत छूट चुकी है,ट्विटर पर यदा-कदा भ्रमण कर लेते हैं पर ब्लॉगिंग पर नशा तारी है ! जब तक खुमारी नहीं मिटती,लिखना और घोखना जारी रहेगा !

    आज की स्थिति में ब्लॉग के प्रति आपका लगाव बरकरार है। और आपने लिखा भी -अपने आब्सेसन के चलते ब्लागिंग का दामन थामे हुए हैं मरघट में किसी का इंतजार करेंगे कयामत तक। संतोष त्रिवेदी उदीयमान ब्लॉगर से ब्लॉगिंग में अस्त से हो चुके हैं। फ़ेसबुक की लत दुबारा लगा गयी है। प्रिंट मीडिया में घुसड़-पैठ शुरु है और काफ़ी जम भी गयी है। आगे और जमेगी, जमे शुभकामनायें।

    जो सूरमा ब्लॉग को पिछड़ा बताकर फ़ेसबुक और ट्विटर पर जाने की बात कह रहे हैं उनको यह याद रखना चाहिये कि उनकी पहचान अगर है, कुछ लोग उनको जानते हैं तो वह सब एक ब्लॉगर होने के चलते है। वर्ना फ़ेसबुक और ट्विटर में अनगिन लोगों के हजारों, लाखों फ़ालोवर होंगे। कौन जानता है उनको?

    और किसी का पता नहीं लेकिन अपन ब्लॉगिंग अपन के लिये घर जैसा लगता है। जितनी सहजता यहां हैं मुझे उतना और कहीं नहीं। इसीलिये अपन ब्लॉगिंग से जुड़े हैं और लगता है कि आगे भी जुड़े सहेंगे।
    प्रत्‍युत्तर दें
    उत्तर
    1. अनूप जी ,
      प्रिंट मीडिया की व्याप्ति /पहुंच अब बहुत सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक रह गई है ! सोशल मीडिया वैश्विक है!
      भारत की किसी भी पत्रिका /समाचार पत्र की कितने दूर तक पहुँच है ?
    2. प्रिंटमीडिया की भौगोलिक व्याप्ति सिमटी है लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया के कंधे पर चढ़कर तो अभी भी यह दुनिया जहान तक पहुंचती है। :)
 और अभी तो प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है ,

चलिए अब चलते चलते आपको कुछ एक लाइना पोस्ट लिंक थमाए देते हैं ,

१.पढ लें धनुष के बारे में : सिलेमा इसके बाद देख लीजीएगा

२.जो तेरा है वो मेरा है : फ़िर क्यों चिंताओं ने घेरा है

३.उत्तराखंड के संकट में लोकतंत्र लापता :  न लोक का ही न ही तंत्र का है पता

४.जिंदगी यूं ही कटती रही : धूप छांव सी सिमटती रही

५.विंडो ८ में लगाएं विंडो ७ जैसा स्टार्ट बटन : और स्टार्ट करते ही पोस्ट लिखें :)

६.संजय जी कुमुद और सरस को अब तो मिलाइए : जी आप सीरीयल देखते जाइए

७.राहुल बाबा का जन्मदिन बडा या मदद : अकल बडी या भैंस :)

८.पीने में रम गया है मन : रम का नाम सुनके ही मन हुआ प्रसन्न :)

९.ये आपदा सीख भी देती है : मगर हम कतई नहीं लेते , आदत से मजबूर

१०.आज का प्रश्न : हल करिए जी

चलिए आज के लिए इतना ही फ़िर मिलते हैं , नई बुलेटिन में , नए ब्लॉग पोस्टों और नई प्रतिक्रियाओं को समेटे हुए , तब तक उत्तराखंड पीडितों के लिए दुआ करते रहें , पढते रहें , लिखते रहें ।

शुक्रिया .....................

लेखागार