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ब्लॉग बुलेटिन - ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019

रविवार, 30 जून 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (सातवां दिन) कविता




एहसासों की जब बारिश होती है, तब यादों का संदूक अतीत की पांडुलिपियों से भर जाता है।  कहानी, कविता की शक्ल लिए न जाने कितने रिश्ते बचपन के रुमाल, दुपट्टे में बंधे मिल जाते हैं - कुछ ऐसे ही रिश्ते के साथ आज इस मंच पर हैं मुदिता गर्ग।  


अलमारी - एहसास अंतर्मन के

 

देखा था
‘अम्मा‘ को
रहते हुए मसरूफ
ब्याह में साथ आई
शीशम की नक्काशीदार अलमारी को
सहेजते संजोते ....

सोचा करती थी मैं ,
क्या संभालती हैं
दिन भर इस पुरानी अलमारी में
दिखाती थी वो मुझे
अपने हाथ के बने
क्रोशिया के मेजपोश
कढ़ाई वाली बूटेदार चद्दर
और दादा के नाम वाले रुमाल ......

पापा के
पहली बार पहने हुए कपड़ों को
छूते  हुए छलक उठता था
वात्सल्य उनके रोम रोम से ,
और लाल हो उठते थे रुख़सार
मीना जड़े झुमकों को
कान पे लगा के
खुद को देखते हुए आईने में ,
हया से लबरेज़ आँखों को
मुझसे चुराते हुए बताया था उन्होंने
ये मुंह दिखाई में दिए थे “उन्होंने”....

मैं नादान
कहाँ समझ पाती थी उन दिनों
उस अलमारी से जुड़े
उनके गहरे जज्बातों को ,
सहेज ली है आज मैंने भी
एक ऐसी ही अलमारी
ज़ेहन में अपने .....

छूती रहती हूँ
जब तब खोल के
गुज़रे हुए सुकुंज़दा लम्हों को
कभी दिखाती हूँ किसी को
चुलबुलाहट बचपन की
जो रखी है
करीने से तहा कर
अलमारी के एक छोटे से खाने में...

एक और खाने में
जमाई है सतरंगी चूनर
शोख जवान यादों की
और कुछ तो
तस्वीरों की तरह सजा ली हैं
अलमारी के पल्लों पर ,
आते जाते नज़र पड़े
और मुस्कुरा उठूँ  मैं
अपने पूरे वजूद में ....

अलमारी के एक कोने में
लगती है ज़रा सी सीलन
लिए हुए नमी
उस भीगे हुए सीने की,
टूटा था बाँध
अश्कों  का
उस आगोश में समा कर ......

छू गया था दुपट्टा मेरा
जब आये थे वो
घर मेरे पहली दफ़ा
महक रहा है अब तक
एक कोना अलमारी का
उस छुअन की खुशबु से ......

बिखरी हैं यादें कितनी ही
बेतरतीब सी
बेतरतीबी उनकी
सबब है ताजगी का
सहेज लिया है चंद को
बहुत सलीके से
जैसे हो माँ का शाल कोई
छू  कर जिसे
पा जाती हूँ वही ममता भरी गर्माहट.....

डाल दी हैं
कुछ अनचाही यादें
अलमारी के सबसे निचले तल पर
गड्डमड्ड करके
जो दिखती नहीं
लेकिन बनी रहती हैं वही,
हर पुनर्विवेचन के बाद
हो जाता है विसर्जन
उनमें से कुछ का,
कुछ रह जाती हैं
अगली नज़रसानी के इंतज़ार में ...

सीपियाँ जड़ी वो डब्बी
गवाह  है
उन पलों की
जहाँ बस मैं और वो
जी लेते थे कुछ अनाम सा,

गुजरना इस अलमारी के
हर कोने से
बन जाती है प्रक्रिया ध्यान की
और खो  जाती हूँ मै
समय के विस्तार में
दिन महीने सालों से परे
भूत ,भविष्य और वर्तमान को
एक-मेक करते हुए.......

 (अम्मा-मैं अपनी दादी माँ को कहा करती थी )


शनिवार, 29 जून 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (छठा दिन)लघुकथा




"मैंगो पीपल यानी हम और आप वो आम आदमी जिसे अपनी हर परेशानी के लिए दूसरो को दोष देने की बुरी आदत है . वो देश में व्याप्त हर समस्या के लिए भ्रष्ट नेताओं लापरवाह प्रसाशन और असंवेदनशील नौकरशाही को जिम्मेदार मानता है जबकि वो खुद गले तक भ्रष्टाचार और बेईमानी की दलदल में डूबा हुआ है. मेरा ब्लाग ऐसे ही आम आदमी को समर्पित है और एक कोशिश है उसे उसकी गिरेबान दिखाने की." - जानी-मानी ब्लॉगर अंशुमाला जी खरी खरी बातें हर खरे लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।  तर्कसंगत बातें इतनी संयत होती हैं, लेखन में इतनी स्पष्टता होती है कि आप सहज रूप से उसे स्वीकार करते हैं। 
आज उनकी लघुकथा भी इतनी ही तर्कसंगत है - 


      सेठ जी हाथ में खीर पूड़ी और दो लड्डू लिए अब भी ऊपर पेड़ पर कौवो को खोज रहें थे , जिनकी आवाज तो आ रही थी लेकिन दिख नहीं रहे थे | सामने फुटपाथ पर पड़ा गोबर और थोड़ी घास बता रही थी कि रोज वहां अपनी गाय लाने वाली वाली अपनी गाय लेकर जा चुकी हैं |  अब मुंबई जैसे शहर में उन्हें कहाँ रास्ते में  घूमती गाय मिलेगी  | मन ही मन सोचने लगे क्या इस पितृपक्ष को मेरे पितर अतृप्त ही रह जायेंगे | यहाँ तो कोई जानवर पंछी  दिख ही नहीं रहा जो उनके पितरो तक उनका दिया भोजन पहुंचा सके | तभी किनारे खड़े दो बच्चो पर उनकी नजर गई शायद फुटपाथ पर रहने वालों के थे | एक पांच छह साल का दूसरा सात आठ साल का रहा होगा | उनके गंदे बदन पर फटी गंदी पैंट के सिवा कुछ ना था | उनकी नज़रे पेड़ के नीचे ढेर सारे पत्तलों में रखे तरह तरह के खानो पर थी जिन पर मखियाँ भिनभिना रही थी | सेठ जी ने एक नजर घड़ी पर डाली और अपना पत्तल भी वही उन पकवानो के ढेर के बगल में रख दिया और हाथ जोड़ आगे बढ़ने से पहले आँखों से उन बच्चो को घूर कर हिदायत दे दी की वो उस खाने को खाने के बारे में सोचे भी नहीं | जैसे ही वो आगे बढे एक तेज हवा का झोका ढलान पर रखे लड्डुओं को लुढ़का कर उन पकवानो से दूर कर दिया | सामने खड़े बच्चो ने एक नजर एक दूसरे को देखा और झट उन लड्डुओं को मुट्ठी में भींच पास की दिवार की ओट में छुप गयें  |  दिवार के पीछे दो तृप्त आत्माएं अपनी हथेलियों की मिठास के मजे ले रहीं थी |

शुक्रवार, 28 जून 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (पांचवां दिन) कविता




संगीता स्वरुप - 2008 से इनका ब्लॉग  गीत.......मेरी अनुभूतियाँ हमारे साथ है।  जीवन की आपाधापी में अनेकों बार हम रुक जाते हैं, पर विचारों का सैलाब नहीं थमता।  ऊपर से ठहरी हुई नदी कभी ठहरती नहीं, तभी तो आज वे हमारे बीच आई हैं - अपनी गूढ़ रचना के साथ -
  


उद्गम था कंस का
एक पापाचार
नारी पर किया नर ने
वीभत्स  अत्याचार ,
उग्रसेन की भार्या
पवनरेखा थीं पतिव्रता
रूप धर कर  पति का
द्रुमिल ने था उसको छला ,
भान जब उसको हुआ तो
विक्षिप्त सी वो हो गयी
दुर्मिल के इस अंश को
वो यूं शापित  कर गयी ।
बोया है जो तूने
मुझमें अपना अंश
खत्म करेगा उसे
यादव का ही वंश
समाज ने भी निर्दोष को
तिरस्कृत  कर दिया
पति ने भी उसे स्वयं से
उपेक्षित कर दिया ।
ज्यों ज्यों बढ़ा बालक
अचंभित होता रहा
माँ के एकांतवास पर
गहनता से सोचता रहा ,
सुन कर ऋषि नारद से
अपने जन्म की कथा
भर गया उसका हृदय
सुन माँ की अंतर व्यथा ।
सबल हुआ जब यही बालक
लिया बदला अत्याचार का
पिता को उसने दिखाया
मार्ग  कारागार  का ।
समाज से उसको कुछ ऐसी
वितृष्णा सी जाग गयी
प्रजा पर अत्याचार कर
धधकती ज्वाला शांत की ।
बच नहीं पाया वो  लेकिन
माँ के दिये श्राप से
मुक्ति मिली कृष्ण हाथों
उसके किए सब पाप से ।
अंतिम समय में  बस उसने
कृष्ण से ये निवेदन किया
गर स्वीकारता  समाज माँ को
तो ये न होता , जो मैंने किया ।
नियति से शापित था वो
इसलिए ये सब होना ही था
अंत पाने के लिए   उसे
ये  सब करना ही था ।

छोड़ दें इतिहास को तो
आज भी नारी शापित है
छल से या बल  से
उसकी अस्मिता लुट जाती है ।
निर्दोष होते हुये भी समाज
ऐसी नारी को नहीं स्वीकारता
हृदय पर लगे ज़ख़्मों की
गहराई को नहीं  नापता । 

गुरुवार, 27 जून 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (चौथा दिन) कविता





आज हम आपको मिलवाते हैं उषा किरण जी से, जिन्होंने हाल में ही अपना ब्लॉग बनाया, और पाठकों के साथ एक अद्भुत ताना बाना जोड़ा।  इनकी कलम में एक ऐसी ज़िन्दगी की ताकत है, जिससे हर कोई किसी न किसी तरह खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है।  
ये स्वयं कहती हैं -
"मन की उधेड़बुन से उभरे विचारों को जब शब्द मिले
तो कुछ सिलवटें खुल गईं और कविता में ढल गईं
और जब शब्दों से भी मन भटका
तो रेखाएं उभरीं और
रेखांकन में ढल गईं...
इन्हीं दोनों की जुगलबन्दी से बना है ये
ताना- बाना
यहां मैं और मेरा समय
साथ-साथ बहते हैं""



जब वे
किसी अस्मिता को रौंद
जिस्म से खेल
विजय-मद के दर्प से चूर
लौटते हैं घरों को ही
तब चीख़ने लगते हैं अख़बार
दरिंदगी दिखाता काँपने लगता है
टी वी स्क्रीन
दहल जाते हैं अहसास
सहम कर नन्हीं चिरैयों को
ऑंचल में छुपा लेती हैं माँएं...
और रक्तरंजित उन हाथों पर
तुम बाँधती हो राखी
पकवानों से सजाती हो थाली
रखती हो व्रत उनकी दीर्घायु के लिए
भरती हो माँग
तर्क करती हो
पर्दे डालती हो
कैसे कर पाती हो ये सब ?
कैसे सुनाई नहीं देतीं
उस दुर्दान्त चेहरे के पीछे झाँकती
किसी अबला की
फटी आँखें,चीखें और गुहार ?
किसी माँ का आर्तनाद
बेबस बाप की बदहवासी ?
बोलो,क्यों नहीं दी पहली सजा तब
जब दहलीज के भीतर
बहन या भाभी की बेइज़्ज़ती की
या जब छीन कर झपटा मनचाहा ?
तुम्हारे इसी मुग्ध अन्धत्व ने
सौ पुत्रों को खोया है
उठो गाँधारी !
अपनी आँखों से
अब तो पट्टी खोलो...!!

बुधवार, 26 जून 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (तीसरा दिन) ग़ज़ल




ग़ज़ल की शाम हो या घनी धूप, दिल कहीं खो जाता है गुमनाम प्रतिध्वनियों में।  आँखें बंद हो जाती हैं, और पूरी प्रकृति गुनगुनाने लगती है। आजमाया होगा, एक बार फिर आजमा लीजिये दिगंबर नासवा जी के साथ  ... 


जितनी बार भी देश आता हूँ, पुराने घर की गलियों से गुज़रता हूँ, अजीब सा एहसास होता है जो व्यक्त नहीं हो पाता, हाँ कई बार कागज़ पे जरूर उतर आता है ... अब ऐसा भी नहीं है की यहाँ होता हूँ तो वहां की याद नहीं आती ... अभी भारत में हूँ तो ... अब झेलिये इसको भी ...
 
कुल्लेदार पठानी पगड़ी, एक पजामा रक्खा है
छड़ी टीक की, गांधी चश्मा, कोट पुराना रक्खा है

कुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
परछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है

टूटे घुटने, चलना मुश्किल, पर वादा है लौटूंगा
मेरी आँखों में देखो तुम स्वप्न सुहाना रक्खा है

जाने किस पल छूट गई थी या मैंने ही छोड़ी थी
बुग्नी जिसमें पाई, पाई, आना, आना रक्खा है

मुद्दत से मैं गया नहीं हूँ उस आँगन की चौखट पर
लस्सी का जग, तवे पे अब तक, एक पराँठा रक्खा है

नींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
माँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है

अक्स मेरा भी दिख जाएगा उस दीवार की फोटो में
गहरी सी आँखों में जिसके एक फ़साना रक्खा है

मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है
 

मंगलवार, 25 जून 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (दूसरा दिन) कहानी




प्रतियोगिता तो अपनी जगह है, हमें इस बात का हर्ष है कि पूरे एक महीने हम चुनिंदा रचनाओं से गुजरेंगे, ज़िन्दगी के नौ रस में भीगेंगे।  
दूसरे दिन का जयघोष वंदना अवस्थी दूबे की कहानी से हम कर रहे, ब्लॉग जगत का एक जाना-माना नाम, जिनको पढ़ने का लोभ संवरण कोई भी साहित्यिक रुझान रखनेवाला नहीं कर सकेगा।  
हमारा यह प्रथम प्रयास आपको कैसा लग रहा, इससे हमें अवश्य अवगत कराइयेगा बंधू :) 




"नमस्ते अम्मां जी"
" कौन? अरे कमला! आओ-आओ"
खुद को समेटती हुई कमला, सुधा जी की बग़ल से होती हुई सामने आई और पूरे श्रद्धाभाव से उनकी चरण-वंदना की.
" आज इस तरफ़ कैसे?"
" मामी के हियां आई थी, उनकी बिटिया का गौना रहा. हम तो पहलेई सोच लिये थे कि लौटते बखत आपसे मिलनई है. "
कमला ने विनीत मुस्कान बिखेरी, और वहीं सुधा जी के सामने ज़मीन पर बैठ गई.
" अरे यहां बैठो न !"
बग़ल में पड़े दीवान पर हाथ ठोंक कर इशारा किया सुधा जी ने. लेकिन कमला सुधा जी के इस आग्रह की असलियत जानती थी, सो उसने फिर खुद को निम्नतर स्तर पर लाते हुए हाथ जोड़ कर उनका आग्रह ठुकरा दिया और
" अरे नीचे कहां? ये कालीन तो बिछा है न, इधरई नीक लगे है बैठना." जैसा अभ्यस्त डायलॉग भी फ़ेंक दिया.
सुधा जी ने भी निश्चिंत निश्वास छोड़ा.
ऊपर बैठने का न्यौता देने के बाद वे हमेशा शंकित हो उठती थीं कि कहीं कोई कमला, श्यामकली, या सुक्खी उनकी बग़ल में बैठ ही न जाये.
" फुल्ली के पापा काल बिहान भये गिर गये रहे अम्मां जी. एतना मना करते हैं उनै लेकिन सुन्तई नईं हैं. "
कमला ने अपने दुख-दर्द सुनाने शुरु कर दिये थे और सुधा भी पूरी चिन्ता के साथ सुन रही थीं.
" अरे रे रे... फिर चोट-वोट तो नहीं लगी? कैसे गिर गये? "
" अब का बताई अम्मां जी.........."
कमला धाराप्रवाह शुरु हो गई थी कमला की कथा रफ़्तार पकड़े, उसके पहले ही सुधा जी ने अपने पैर-दर्द का प्रसंग छेड़ दिया था, बल्कि यूं कहें कि पैर दर्द की बात कमला के कान में डाल दी, और इत्मीनान से चप्पल उतार के सामने पांव फैला लिये . कमला ने भी आदतानुसार सुधा जी का पांव हल्के-हल्के दबाना शुरु कर दिया.
निधि को मालूम था कि अब ऐसा ही होगा. मुफ़्त में कमला-कथा का श्रवण सुधा जी कर ही नहीं सकतीं थीं.
सुधा जी जब चार लोगों में बैठी होती थीं, तो समानता, जाति-भेद जैसे विषयों पर बड़े अच्छे विचार प्रस्तुत करतीं थीं, लेकिन उन्हें व्यवहार में लागू नहीं कर पाती थीं. बस इसीलिये निधि को बड़ी कोफ़्त होती है, सुधा जी के उदारमना भाषणों से. जो कर नहीं सकतीं , उसके लिये झूठी बातें क्या बनाना? सुधा जी की कथनी और करनी में बहुत अन्तर था.
नाश्ता करने बैठतीं तो इस चिंता में कि कहीं निधि ज़्यादा नाश्ता न दे दे, एक खाली प्लेट मंगवातीं, अपनी प्लेट में से थोड़ा सा पोहा निकाल आगे को सरका देतीं और रमा को कहतीं -
" ले रमा , पहले नाश्ता कर ले"
कुछ ऐसे भाव से जैसे मोहन थाल परोस दिया हो.
उतने से नाश्ते को देख के निधि शर्म से पानी-पानी हो जाती.
बची हुई मिठाई हफ़्तों सहेजे रहतीं सुधा जी. जब फ़फ़ूंद दिखाई देने लगती तो बड़े एहसान के साथ कहतीं-
" रमा, ये मिठाई लेती जाना, और हाँ, खाने लायक़ न हो, तो किसी जानवर को डाल देना."
फिर पानी-पानी हो जाती निधि.
कल से रमा चार दिन की छुट्टी पर जा रही थी. रमा के छुट्टी लेने के विचार मात्र से निधि के हाथ-पांव फूलने लगते हैं. निधि को सुबह आठ बजे ऑफ़िस के लिये निकलना होता है, सो सुबह का खाना बनाना उसके लिये मुश्किल था. लिहाजा उसने खाना बनाने के लिये विमला का नाम प्रस्तावित किया तो सुधा जी ने तुरन्त खारिज़ कर दिया. तुरन्त बोलीं-
" अरे! उसका बनाया खाना हम कैसे खा सकते हैं?"
बहुत कोफ़्त हुई थी निधि को. उसी के साफ़ किये बर्तनों में खाना पकाते हैं, उसी का भरा पानी पीते हैं, आटा गूँध सकती है वो, लेकिन खाना नहीं बना सकती!!
समझ में नहीं आतीं निधि को ऐसी बातें.
कई बार निधि ने सुधा जी को समझाने की कोशिश की लेकिन हर बार उसे खुद की समझाइश से ज़्यादा मजबूत सुधा जी के इरादे दिखाई दिये.
छटपटा रही थी निधि सुधा जी को इस घेरे से बाहर लाने के लिये.
सुबह कुमुद दीदी का फोन आया, कि वे कोलकता जा रही हैं, लौटते हुए दो दिन निधि के पास भी रुकेंगीं. निधि की तो जैसे मुँह मांगी मुराद पूरी हो गई. उसे लगा कि अब कुमुद दीदी के साथ मिल के कुछ तो करेगी ही वह.
चार दिन इंतज़ार में बीते . आज कुमुद दीदी यानि सुधा जी की इकलौती बेटी आ गई थीं. कुमुद दीदी की ख़ासियत ये थी कि वे सुधा जी की, मां होने के नाते किसी भी ग़लत बात में हां में हां नहीं मिलाती थीं. बल्कि उन्हें समझाने की भरपूर कोशिश करती थीं.
सुबह शोर-शराबे में बीती. देर से खाना हुआ, तो रात का खाना बाहर खाने का प्लान बना.
खाने-पीने की शौकीन सुधा जी को बाहर खाने से कभी परहेज नहीं रहा है. आज भी सब तैयार होने लगे तो निधि ने चिन्ता जताई -
" दीदी, मम्मी के लिये तो खाना बनवाना होगा न?"
" अरे हां रे. मम्मी, तुम्हारे लिये क्या बनना है? रमा को बता दो. तुम तो होटल में कुछ खाओगी नहीं........."
तिरछी मुस्कान के साथ कुमुद दी ने ऊंची आवाज़ में पूछा.
"क्यों? हम क्यों नहीं खायेंगे? हमारा आज व्रत थोड़े ही है."
सुधा जी ने थोड़े अचरज से पूछा.
" अरे, लेकिन वहां होटल में पता नहीं किसने खाना बनाया हो... ? अब वहां कोई पूछेगा तो नहीं कि कुक किस जाति का है? कोई भी बना सकता है."
कुमुद दी गम्भीर हो के बोलीं.
कोशिश करके हंसी दबानी पड़ रही थी निधि को.
" वैसे मम्मी, तुम तो पता नहीं कहां कहां के होटलों में खाना खा चुकी हो, कुक के बारे में पहले ही पता लगा लेती हो क्या?"
सुधा जी अवाक!
" अरे नहीं भाई. कहीं कोई ऐसा भी करता है?"
" मगर तुम्हें तो ऐसा करना चाहिए. घर में इतनी छुआछूत और बाहर कुछ नहीं? तुम्हारा तो धर्म नष्ट-भ्रष्ट हो गया न?"
" फिर अगर बहर खा सकती हो तो घर में इतना परहेज क्यों?"
कोई जवाब नहीं था सुधा जी के पास.
रात भर पता नहीं क्या सोचती रहीं सुधा जी; लेकिन सुबह निधि ने सुना, विमला से कह रही थीं-
" विमला, रमा जब छुट्टी पर जाये, तब तू खाना बना दिया कर. निधि को दिक्कत हो जाती है इत्ते सबेरे से......"
निधि जानती है, किसी भी इंसान को एक पल में नहीं बदला जा सकता. लेकिन बदलने की लगातार कोशिशें की जायें तो सकारात्मक परिणाम तो मिलने ही हैं.

सोमवार, 24 जून 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (पहला दिन) कविता





प्रतीक्षा की घड़ियाँ खत्म हुईं, ब्लॉग के ऊपर छाए घने बादल बरस गए हैं, सोंधी खुशबू और सतरंगे इंद्रधनुष के साथ ये ब्लॉग बुलेटिन आपके सामने है । एहसासों की नदी एहसासों के समंदर से मिलने को आतुर है - लेखक और पाठक की अविस्मरणीय यात्रा शुरू हो गई है अपने साहित्यिक पड़ाव के लिए ।
शंखनाद के साथ आप सबका स्वागत है ।...

मन पाए विश्राम जहाँ 

अनीता निहलानी का एक जाना माना ब्लॉग है।  उनकी एक सशक्त कविता के साथ हम आज से चलनेवाली प्रतियोगिता का आरम्भ करते हैं। 


कितना नीर बहा अम्बर से
कितने कुसुम उगे उपवन में,
बिना खिले ही दफन हो गयीं
कितनी मुस्कानें अंतर में !

कितनी धूप छुए बिन गुजरी
कितना गगन न आया हिस्से,
मुंदे नयन रहे कर्ण अनसुने
बुन सकते थे कितने किस्से !

कितने दिवस डाकिया लाया
कहाँ खो गये बिन बाँचे ही,
कितनी रातें सूनी बीतीं
कल के स्वप्न बिना देखे ही !

नहीं किसी की राह देखता
समय अश्व दौड़े जाता है,
कोई कान धरे न उस पर
सुमधुर गीत रचे जाता है !



रविवार, 23 जून 2019

अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी की ११८ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी (अंग्रेजी:Rajendra Nath Lahiri, बाँग्ला:রাজেন্দ্র নাথ লাহিড়ী, जन्म:२३ जून १९०१ - मृत्यु:१७ दिसम्बर १९२७) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण स्वतंत्रता सेनानी थे। युवा क्रान्तिकारी लाहिड़ी की प्रसिद्धि काकोरी काण्ड के एक प्रमुख अभियुक्त के रूप में हैं।
संक्षिप्त जीवनी
बंगाल (आज का बांग्लादेश) में पबना जिले के अन्तर्गत मड़याँ (मोहनपुर) गाँव में २३ जून १९०१ के दिन क्षिति मोहन लाहिड़ी के घर राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का जन्म हुआ। उनकी माता का नाम बसन्त कुमारी था। उनके जन्म के समय पिता क्रान्तिकारी क्षिति मोहन लाहिड़ी व बड़े भाई बंगाल में चल रही अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में योगदान देने के आरोप में कारावास की सलाखों के पीछे कैद थे। दिल में राष्ट्र-प्रेम की चिन्गारी लेकर मात्र नौ वर्ष की आयु में ही वे बंगाल से अपने मामा के घर वाराणसी पहुँचे। वाराणसी में ही उनकी शिक्षा दीक्षा सम्पन्न हुई। काकोरी काण्ड के दौरान लाहिड़ी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में एम० ए० (प्रथम वर्ष) के छात्र थे। १७ दिसम्बर १९२७ को गोण्डा के जिला कारागार में अपने साथियों से दो दिन पहले उन्हें फाँसी दे दी गयी। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को देश-प्रेम और निर्भीकता की भावना विरासत में मिली थी। राजेन्द्रनाथ काशी की धार्मिक नगरी में पढाई करने गये थे किन्तु संयोगवश वहाँ पहले से ही निवास कर रहे सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आ गये। राजेन्द्र की फौलादी दृढ़ता, देश-प्रेम और आजादी के प्रति दीवानगी के गुणों को पहचान कर शचीन दा ने उन्हें अपने साथ रखकर बनारस से निकलने वाली पत्रिका बंग वाणी के सम्पादन का दायित्व तो दिया ही, अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का प्रभार भी सौंप दिया। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए उन्हें हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन की गुप्त बैठकों में आमन्त्रित भी किया जाने लगा।
काकोरी काण्ड
फाँसी की फन्दा और लाहिड़ी का अन्तिम सन्देश
क्रान्तिकारियों द्वारा चलाये जा रहे स्वतन्त्रता-आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था को देखते हुए शाहजहाँपुर में दल के सामरिक विभाग के प्रमुख पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' के निवास पर हुई बैठक में राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी भी सम्मिलित हुए जिसमें सभी क्रान्तिकारियों ने एकमत से अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना को अन्तिम रूप दिया था। इस योजना में लाहिड़ी का अहम किरदार था क्योंकि उन्होंने ही अशफाक उल्ला खाँ के ट्रेन न लूटने के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप अशफाक ने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया था।
इस योजना को अंजाम देने के लिये लाहिड़ी ने काकोरी से ट्रेन छूटते ही जंज़ीर खींच कर उसे रोक लिया और ९ अगस्त १९२५ की शाम सहारनपुर से चलकर लखनऊ पहुँचने वाली आठ डाउन ट्रेन पर क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अशफाक उल्ला खाँ और चन्द्रशेखर आजाद व ६ अन्य सहयोगियों की मदद से धावा बोल दिया। कुल १० नवयुवकों ने मिलकर ट्रेन में जा रहा सरकारी खजाना लूट लिया। मजे की बात यह कि उसी ट्रेन में सफर कर रहे अंग्रेज सैनिकों तक की हिम्मत न हुई कि वे मुकाबला करने को आगे आते।
काकोरी काण्ड के बाद बिस्मिल ने लाहिड़ी को बम बनाने का प्रशिक्षण लेने बंगाल भेज दिया। राजेन्द्र बाबू कलकत्ता गये और वहाँ से कुछ दूर स्थित दक्षिणेश्वर में उन्होंने बम बनाने का सामान इकट्ठा किया। अभी वे पूरी तरह से प्रशिक्षित भी न हो पाये थे कि किसी साथी की असावधानी से एक बम फट गया और बम का धमाका सुनकर पुलिस आ गयी। कुल ९ साथियों के साथ राजेन्द्र भी गिरफ्तार हो गये। उन पर मुकदमा दायर किया और१० वर्ष की सजा हुई जो अपील करने पर ५ वर्ष कर दी गयी। बाद में ब्रिटिश राज ने दल के सभी प्रमुख क्रान्तिकारियों पर काकोरी काण्ड के नाम से मुकदमा दायर करते हुए सभी पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने तथा खजाना लूटने का न केवल आरोप लगाया बल्कि झूठी गवाहियाँ व मनगढ़न्त प्रमाण पेश कर उसे सही साबित भी कर दिखाया। राजेन्द्र लाहिड़ी को काकोरी काण्ड में शामिल करने के लिये बंगाल से लखनऊ लाया गया।
तमाम अपीलों व दलीलों के बावजूद सरकार टस से मस न हुई और अन्तत: राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह- एक साथ चार व्यक्तियों को फाँसी की सजा सुना दी गयी। लाहिड़ी को अन्य क्रान्तिकारियों से दो दिन पूर्व १७ दिसम्बर को ही फाँसी दे दी गयी।
आजादी के इस दीवाने ने हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा चूमने से पहले वंदे मातरम् की हुंकार भरते हुए कहा था- "मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ।"
 
ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी उनकी ११८ वीं जयंती पर शत शत नमन |
 
सादर आपका 
 
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"स्नेह का रुतबा"

मेरा पिया त्रिगुणातीत!

मैं एक विरोधाभास का पीछा कर रही हूँ, तुम भी एक कल्पना को गले लगाए हो !

कभी अलविदा ना कहना तुम

नीला आलोक

फ़िल्टर कॉफ़ी

584. चमकी मौत

प्रकृति सुर और संगीत

प्रगल्भता की ओर

दिल मेरा

मियाँ मुनक्का की जासूसी

३६४. इच्छाएँ

रिक्शे वाला

उजाला जीवन में तभी आएगा जब इंसानियत का उजाला दिल में जल जाएगा!

परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान

समर्पित है राष्ट्रभक्तों को २३ जून

जीवन में आ जाती बहार

क्रिकेट स्पोर्ट नहीं इंडस्ट्री है : गिरीश बिल्लोरे ''मुकुल"

लघुकथा- मेरा सपना

इस अकाल बेला में मुक्तिबोध

अमृता एक औषधि

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अब आज्ञा दीजिए ...

जय हिन्द !!!

शनिवार, 22 जून 2019

रहा गर्दिशों में हरदम: २४५० वीं ब्लॉग बुलेटिन

जब आदमी साइंस पढ़ता है त अपने आप को एतना बुद्धिमान समझने लगता है कि उसको बुझाता है जइसे दुनिया का सब सवाल का जवाब उसके पास है. लेकिन ऊ भुला जाता है कि पेड़ के ऊपर चढ़ा हुआ आदमी को दूर से आता हुआ रेलगाड़ी देखाई देता है, मगर पेड़ के नीचे खड़ा आदमी नहीं देख पाता है. इसलिये दुनो आदमी का कहना कि गाड़ी आ रहा है अऊर नहीं आ रहा है, सही है. साइंस का जेतना भी ज्ञात सिद्धांत है उसके हिसाब से कोई बैज्ञानिक सही हो सकता है, मगर सब सिद्धांत उसको ज्ञात है ई बात का सर्त ऊ नहीं लगा सकता.

एतना भूमिका ई बात के लिये  कि जबतक हम ज्योतिस के बारे में नहीं पढ़ाई किये थे तब तक सब बेकार लगता था, मगर जब पढ़े, कुछ प्रैक्टिस किये तब बुझाया कि कमाल का चीज है. साइंस पढ़ने के बावजूद भी भरोसा हो गया. तब जाकर हम सबसे जादा याद किये सेक्सपियर साहब को. काहे कि ज्योतिस के मामला में ऊ हमारे गुरु हैं. उनका नाटक मैकबेथ ज्योतिस के सिद्धांत को ब्याबहारिक रूप से साबित करता है. खैर ऊ कहानी फिर कभी. चलिये ज्योतिस का एगो खास बात हम अपने बारे में बताते हैं अऊर इसमें कोई मिलावट नहीं है, काहे कि इस बात को हमारे अऊर आप लोग में से बहुत से लोग के दोस्त भी सुईकार किये जो ज्योतिस के बहुत बड़े जानकार हैं – पण्डित सिद्धार्थ जोशी जी.

आपके कुण्डली में खराब स्थान होता है अऊर खराब ग्रह होता है, साथ में अच्छा स्थान अऊर अच्छा ग्रह भी होता है. हमारा कुण्डली में भी है, लेकिन आपको ताज्जुब होगा कि जेतना अच्छा ग्रह है, सब खराब स्थान में है अऊर खराब ग्रह अच्छा घर में बइठा हुआ है. नतीजा सारा जिन्नगी में हम फेलियर रहे, हमारा तय किया हुआ कोई काम कभी नहीं हुआ. जो अच्छा हुआ उसके लिये एतना नाक रगड़ना पड़ा कि खुसी का मजा खतम हो गया.

दिल्ली में आकर महसूस हुआ कि चलो अब थोड़ा सा टाइम बचा है, एहीं से सीनियर सिटिजन गति को प्राप्त हो जाएँगे. लिखना पढ़ना साल भर से बंद था, सोचे थे धीरे-धीरे सुरु करेंगे. सुरुआत भी किये अपने ब्लॉग पर अऊर जिस दिन सुरू किये उसी दिन हमारा ग्रह-नछत्तर के पेट में दरद सुरू हो गया. अऊर इससे पहले कि हम नॉर्मल होते, हमरा बदली गुजरात हो गया. पुराना जगह, मगर नया काम. इस बार मानसिक सांति, मगर समय का भीसन कमी. रात को नौ बजे के बाद कभी दस बजे लौटना अऊर थक कर टीवी देखते हुये खाना खाकर सो जाना. कुल मिलाकर नतीजा एही कि हमारा लिखना बंद.

आपलोग कहियेगा कि एक घटना से कोई नियम नहीं बनता कि हमारा कुण्डली खराब है अऊर हमारा ग्रह गोचर गड़बड़ है. लेकिन जाने दीजिये कोई कहा है कि आँसुओं का बिज्ञापन नहीं करना चाहिये, दुनिया में पहिले से बहुत जादा है. एक एक कहानी सुनाने बइठेंगे त लिखने वाला एक एक उपन्यास लिख जाएगा. 

इसलिये आज त बस उत्सव का बात करना है. हमारा ब्लॉग-बुलेटिन का टीम का लोग आप लोग को ब्लॉग-बुलेटिन ब्लॉग-रत्न सम्मान प्रतिजोगिता के बारे में पहिले से बता चुके हैं. इसलिये हम आपसे बिनती करेंगे कि इसमें बढ़चढ़कर भाग लीजिये. ई प्रतिजोगिता का मतलब हार-जीत ईनाम सम्मान नहीं है, बस ब्लॉग का दुनिया में जो भी सकारात्मक और रचनात्मक काम चल रहा है उसको जगाए रखना है. आज आपका आभासी दुनिया से गायब हो जाने पर लोग आपको खोजता है, आपके परिबार के खुसी में जस्न मनाता है, आपके अच्छा स्वास्थ का कामना या आपके दु:ख में साथ मिलकर आँसू बहाता है, ऊ आपके परिबार से बाहर एही ब्लॉग के दुनिया का दोस्त लोग है. 

हमारा टीम का अथक प्रयास अऊर लगन का नतीजा है कि हमलोग आज 2450 वाँ पोस्ट तक पहुँच गये. बिना आप लोग के सहजोग के ई कहाँ सम्भब था. हम भले केतनो ब्यस्त हों, बुलेटिन पर अपना पोस्ट लिखना कभी नहीं भूलते हैं, चाहे केतना भी परेसानी हो.

अब ई बात हमरा सितारा अऊर ग्रह लोग को मत बता दीजियेगा, नहीं त बस समझ लीजिये कि हमरा एहाँ लिखना भी बंद हो जाएगा.


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गाँव का जीवन

हवाई सर्वेक्षण.......

वडोदरा से अहमदाबाद डीएमयू से और जलाराम के पराठे

ज़िंदगी और मौत ....इन्द्रा

हमारी प्राचीन विरासत

माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया

आप अच्छे हो - लघुकथा

लोहे का घर-53

पहली गर्भावस्था के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

बरखा

कैसी प्रगति कैसा विकास

गीत : उम्र गुजरती है सपनों की तुरपाई में

चूड़ियाँ भी अपनी हद जानती हैं

प्रधानाध्यापक की गवाही

प्रभा-लेखन

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शुक्रवार, 21 जून 2019

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2019 - ब्लॉग बुलेटिन


प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (अंग्रेज़ी: International Yoga Day) को प्रतिवर्ष '21 जून' को मनाने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र द्वारा लिया गया है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील पर संयुक्त राष्ट्र ने '21 जून' को 'विश्व योग दिवस' घोषित किया है। योग हज़ारों साल से भारतीयों की जीवन शैली का हिस्सा रहा है। ये भारत की धरोहर है। विश्व के कई हिस्सों में इसका प्रचार-प्रसार हो चुका है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के इस निर्णय के बाद उम्मीद की जा रही है कि अब इसका विस्तार और भी तेज़ी से होगा।

'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' को मनाये जाने की पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर, 2014 को 'संयुक्त राष्ट्र महासभा' में अपने भाषण में रखकर की थी, जिसके बाद '21 जून' को 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' घोषित किया गया। 11 दिसम्बर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है।

वैसे, आप योग करो न करो ... किसी को रत्ती भर भी फ़र्क़ नहीं पड़ता ... पर इतना तो मानोगे कि इस #योगदिवस के बहाने ही सही विश्व आज भारतीय आदर्शों का अनुसरण कर रहा है। 
सादर आपका
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गुरुवार, 20 जून 2019

जमीनी काम से ही समस्या का समाधान : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
ये साहब हैं आनन्द दत्ता. एक बेहतरीन पत्रकार, फोटोग्राफर, रांची में रहते हैं. बिहार के कुख्यात चमकी बुखार के खिलाफ जागरुकता अभियान में जमकर लगे हुए हैं. रांची से चले, सुबह मुजफ्फरपुर पहुंचे. अस्पताल में कैम्प किया. पब्लिक फंडिंग से प्राप्त पैसों से पहले मरीज के परिजनों के लिये खाने का इन्तजाम कराया फिर पीने के पानी की व्यवस्था में जुट गये. दो वाटर प्यूरिफायर लगवा चुके हैं, तीसरा लगवा रहे हैं. इस बीच इनकी नजर गयी कि अस्पताल परिसर में 13-14 प्यूरिफायर पहले से लगे हैं जो छोटी-छोटी गड़बड़ी की वजह से बन्द हैं, सो उनको ठीक कराने में जुट गये. इसी दौरान इनकी नजर गयी कि परिजनों के बैठने की जगह लगे कई पंखे खराब हैं. इसके लिये इलेक्ट्रिशियन बुला लिए. मुश्किल से 70-80 हजार रुपये खर्च हुए होंगे लेकिन इन्होंने मरीजों के परिजनों के खाने-पीने और इस भीषण गर्मी में चैन से बैठने की व्यवस्था कर दी है. 

आनंद दत्ता ने अपनी वाल पर लिखा है कि शुरुआती काम हो चुका, भले ही अब पैसा मत भेजिए परन्तु गाँव-गाँव जाकर चमकी बुखार के खिलाफ जमीन पर काम करके जागरूकता अभियान के लिए वालंटियरों की अधिक आवश्यकता है. इसे कहते हैं पत्रकारिता और अभी उमर भी ज्यादा नहीं है बंदे की.


वाकई ऐसे लोगों से सीखने की आवश्यकता है. मीडिया या पत्रकारिता का काम सिर्फ समाचार बनाना भर नहीं होना चाहिए. लोगों का काम सिर्फ आश्वासन देना भर नहीं होना चाहिए. जमीनी काम ही असलियत में समस्या का समाधान होता है. आनंद दत्ता को साधुवाद.


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बुधवार, 19 जून 2019

तजुर्बा - ए - ज़िन्दगी - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |


 "हर एक लकीर, एक तजुर्बा है जनाब,
झुर्रियां चेहरों पर, यूँ ही आया नही करती।"
- अज्ञात

सादर आपका
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कोशिश का मूल्यांकन

मैं भाग रही हूँ तुमसे दूर

संतुष्ट है भारत

कच्चे केले का चोखा

भजन-कीर्तन भी दिनचर्या की औपचारिकता भर रह गए हैं

चिकित्सक भी डर गया है ... सहम गया है

सिने-संगीत इंद्र का घोड़ा है : 'विविध भारती' के प्रधान नियोजक और कवि नरेंद्र शर्मा से इन प्रश्नों के उत्तर सुनिए

भारत के संविधान में बहुसंख्यकों की उपेक्षा, पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ व बरुण...

एक सफर : कॉर्पोरेट से किसानी तक

गांव, मसान और गुड़गांव

बाहों में आपकी पापा !!

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अब आज्ञा दीजिए ...

 जय हिन्द !!!

मंगलवार, 18 जून 2019

वीरांगना रानी झाँसी को नमन : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आज, 18 जून को रानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि है. उनका जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था. उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु पुकारा जाता था. झाँसी के राजा गंगाधर राव से उनका विवाह हुआ. सन 1851 में उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई लेकिन चार माह पश्चात उसका निधन हो गया. राजा गंगाधर राव को इस घटना से गहरा धक्का पहुंचा. वे लगातार अस्वस्थ रहने लगे और 21 नवंबर 1853 को उनका स्वर्गवास हो गया. इससे पहले उन्होंने अपने चचेरे भाई के पुत्र को गोद लेने सम्बन्धी प्रस्ताव अंग्रेजों के पास भेजा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था. 


राजा के निधन पश्चात् 27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत करके झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी. एक वार्ता के क्रम में रानी के घोष मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी के साथ ही विद्रोह का बिगुल बज उठा. अंग्रेजों की राज्य लिप्सा की नीति से उत्तरी भारत के नवाब और राजे-महाराजे असंतुष्ट हो गए और सभी में विद्रोह की आग भभक उठी. नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तांत्या तोपे आदि रानी के इस कार्य में सहयोग देने आगे आये.

23 मार्च 1858 को झांसी का ऐतिहासिक युद्ध आरंभ हुआ. रानी ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंग्रेजों का बहादुरी से मुकाबला किया. वे अपनी पीठ पर दामोदर राव को बाँध घोड़े पर सवार हो अंग्रेजों से युद्ध करती रहीं. युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मी बाई झाँसी से कालपी होते हुए ग्वालियर जा पहुँचीं. ग्वालियर पर आक्रमण कर वहां के किले पर अधिकार कर लिया गया. अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करता हुआ ग्वालियर पहुँच गया. यहाँ हुए युद्ध में रानी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं. 18 जून 1858 को ग्वालियर का युद्ध उनके लिए अंतिम अंतिम युद्ध सिद्ध हुआ. वे घायल हो गईं और अंततः वीरगति प्राप्त की.


रानी लक्ष्मी बाई के जीवन से दो बातें सीखने योग्य हैं. एक तो उन्होंने उस कालखंड में जबकि पर्दा-प्रथा प्रभावी था किन्तु स्त्री-शिक्षा प्रभावी रूप में नहीं थी, रानी ने महिलाओं की सेना बनाई, उनको प्रशिक्षित किया. दूसरे, बिना किसी स्त्री-विमर्श, नारी-सशक्तिकरण सम्बन्धी आन्दोलनों के उन्होंने बुन्देलखण्ड और आसपास के अनेक पुरुष राजाओं को अपने झंडे तले लाकर स्त्री-शक्ति का परिचय दिया था.

वीरांगना को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.

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सोमवार, 17 जून 2019

नाम में क्या रखा है - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

जब ऑफिस की पुरानी मैडम ने चपरासी को "ओए" कह के बुलाया,
तो नई मैडम को उसपर तरस आया और बोली, "लोग जाने कहाँ से पढ कर आ जाते हैं, भला 'ओए' कहकर किसी को कभी बुलाते हैं?" "सुनो, मैं शिष्टाचार निभाऊंगी, तुम्हें तुम्हारे नाम से ही बुलाऊंगी।"

चपरासी गदगद हो गया, बोला, "आप सरीखे लोगों का ही हम गरीबों को साथ है, मैडम जी मेरा नाम 'प्राणनाथ' है।"

मैडम जी सकुचाई, पलभर कुछ ना बोल पाई, फिर कहा, "इस नाम से अच्छा न होगा तुम्हें बुलाना, अगर कोई पुकारने का नाम हो तो बताना!"

चपरासी बोला ,"मेरे घर में सब मुझे दुलारते हैं, बीवी से लेकर अब्बा तक सब 'बालम' कह कर पुकारते हैं।"

मैडम की समझ में कुछ न आया, एक नया आईडिया लगाया, बोली, "रहने दो, अब पहेलियां न बुझाओ, मोहल्ले वाले तुम्हें क्या कहते हैं ये बताओ!"

चपरासी बोला, "मैडम जी, सबका हम दिल बहलाते हैं, और मोहल्ले में 'साजन' कहलाते हैं।"

मैडम अब तक ऊब चुकी थी, ऊहापोह में डूब चुकी थी, कहा "मुए, ये सब नाम कहाँ से लिए जाएंगे, तू 'सरनेम' बता उसी से काम चलाएंगे।"

चपरासी बोला, "मैडम जी क्या करूं, दुनिया का सब 'गेम' है, आप 'सरनेम' से बुलाइए, 'स्वामी' मेरा 'सरनेम' है!"

अब मैडम झल्लाई, जोरों से चिल्लाई, " 'ओए' मेरा सिर मत खा, एक कप गरम चाय ले के आ!" 

सादर आपका

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पगडण्डियों के छलावे

सभी जानते हैं ..उजालों की फितरत

सफेद कोट वाले भगवान से...

मृत्यु दूत

आसमानी पंछियों को भूल जा ...

मेरी कविताएं अनाथ नहीं

जीवन आधारे - वृक्ष हमारे

"चक्रव्यूह"

अंसार क़म्बरी की ग़ज़लें

मुक्तक

आखिरी स्तम्भ

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 अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

रविवार, 16 जून 2019

पितृ दिवस की शुभकामनाएं




माँ को आँगन बनाते हुए,
हर कमरे का फर्श बनाते हुए,
ईश्वर ने पिता की मजबूत दीवारें खड़ी कीं,,
दहलीज बनाया,
माँ को नम,
पिता को सुरक्षा स्तम्भ बनाया ।
ऐसा करते हुए,
उसने न पुरुष को ज्यादा बनाया
ना स्त्री को कम ।
धरती बनी माँ की क्षमता अद्भुत,
तो आकाशीय विस्तार देनेवाले पिता का गौरव अविस्मरणीय ।
कहीं धरती अकेली हो जाये,
कहीं आकाश...
इससे सत्य नहीं बदलता,
न ईश्वर का चयन गलत होता है !
और समय का यह चयन भी
अपना अस्तित्व रखता है,
धरती-आकाश को
एकसाथ बनने का 
स्वर्णिम अवसर देता है 
माँ और पिता को पर्णकुटी बना देता है । 

पितृ दिवस की शुभकामनाएं 

पिता को समर्पित --------क्षणिकाएॉं
याद आता है
गिने थे अनगिन तारे
गोदी में बैठे तुम्हारे
हर रात ढूँढा ध्रुव तारा
तुम्हारी तर्जनी के सहारे
तुमसे ही जाने थे
दिशाओं के नाम
फूलों के रंग, पर्वत,पहाड़
नदियाँ,सागर देश गुमनाम
पास थी तुम्हारे
जादू की छड़ी
जो हल कर देती थी
प्रश्न सारे।
याद आता है
पिता का चश्मा
जिसे लगाने की
कितनी ज़िद्द थी मेरी
और तुम
केवल मुस्कुरा के कहते
अभी उम्र नहीं है तेरी---
अब रोज़ लगाती हूँ
और ---
लगता है
आप पास हो आप
यहीं कहीं
बस चश्मा थोड़ा
धुंधला है |
याद आता है
हर शाम पिता से अधिक
उनके झोले की प्रतीक्षा करना
उसी में से पूरे होते थे
सारे सपने, मनोकामना
तुमने कभी नहीं दुखाया
बालमन
उसमें थी निधि स्नेह की
त्याग का अपरिमित धन।
कथनी से करनी बड़ी
तुम्हारी सीख,
है धरोहर
पीढ़ी दर पीढ़ी
दीप स्तम्भ सी
पथ प्रदर्शक।
मैंने ना छुआ आकाश कभी
और ना मापी सागर की गहराई
ना कभी समेटी बरगद की छाया
ना देखी हिमालय की ऊँचाई
मैंने तो बस अपने पिता में
इन सब को समाहित होते देखा है।


महज़ दो दिन हुए हैं पिता से मिलकर लौटी हूँ ।
उन्होंने गिलहरियों से बचा कर रखा था, लीची के पेड़ में लगे मीठे रसीले लीचियों को मेरी ख़ातिर .....
बंगालियों के घर जब भी बेटी आती है तो रसोई में पकाई जाती है मछली ....पिता ने मां को ख़ास हिदायत देकर बनवा रखी थी ... मेरी मनपसंद फिश करी ....
मेरे खाने के एक एक निवाले पर उनकी मुस्कान बस देखते ही बनती थी ....
पिता ! कहते हैं अब बहुत ही कम ....
समझने की कोशिश करते हैं चीज़ों को पहले से ज़्यादा ....
बच्चों का कलरव उन्हें अब भाने लगा है ख़ूब !
धीमी रौशनी वाले बेतरतीब फ़ैले अपने कमरे में बनाते हैं सुध बुध खो कर असंख्य चित्र ....
रंगों का समावेश अब तलक उनके मिज़ाज का परिचायक बना हुआ है ।
पिता ! अनाम ही लिखते रहते हैं अनंत कविताएं ....
जैसे कि , सृजन उनके लिए प्राणवायु हो ....
अपनी आत्मा में बुनते हैं कोई निराला संगीत ! स्वरलहरियों को छेड़ते हैं अपनी मध्यम आवाज़ में ....फ़िर करने लगते हैं अनर्गल अपने बचपन की बातें ....
भोजन स्वादिष्ट चाहिए आज भी उन्हें किंतु किंचित मात्र से भर लेते हैं अपना पेट ...
पिता ! मीठे के शौक़ीन हैं , मना करने पर भी मानते नहीं ....बीमारियों से डर नहीं लगता उन्हें , जीवन के संत्रासों को झेलकर बन चुके हैं - लौहपुरुष !
पिता ! बोलते बतियाते समय पढ़ते हैं ग़ौर से मेरे चेहरे के हर एक भाव को ...फ़िर तपाक से पूछ बैठते हैं कि - ये निशान कैसे पड़ गए ....पहले तो नहीं देखा कभी ...जैसे बच्चे टटोलते हैं न अपने ही खिलौने , दूसरे किसी को देकर ...ठीक वैसी ही जिज्ञासु भरी भंगिमाओं से भरकर वो पूछते हैं- मेरे चेहरे , हाथ या पांव के किसी भी चोट के विषय में .....और अक़्सर वज़ह पता चलते ही , दुलार से भरते देखा है उनको .....
हरियाली का संवर्धन पिता की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है । वो जहां कहीं भी रहें , पौधे लगाना और पौधों की देखरेख करना कभी नहीं भूलते ... जैसे उन्होंने कसम खा रखी हो हरियाली में ही अपनी ख़ुशहाली ढूढ़ने की ...
सांस्कृतिक गतिविधियों में , घर और बाहर के मांगलिक कार्यों में या की सामाजिक अनुष्ठानों में, सम्पूर्ण प्रभुता के साथ आज भी सक्रिय रहते देखा है मैंने पिता को.......
बहरहाल , इस तरह मेरे पिता ने बचा रखा है जीवन जीने का ख़ुद का फ़लसफ़ा ....जो देता है - बल , ऊर्जा और उल्लास मुझे .....अच्छे सेहत की दुआ के साथ विश्व भर के समस्त पिताओं को ख़ूब सारा प्यार - दुलार और ढेर सारी शुभकामनाएं ......
पिता हैं - तो हर मुश्क़िल आसान है !

लेखागार