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शनिवार, 1 जून 2019

शब्दों का अर्घ्य


 

हर सुबह 
खुद को तलाशती हूँ,
अपने नाम की सार्थकता के लिए
एहसासों के ब्रह्ममुहूर्त में,
शब्दों का अर्घ्य देती हूँ ।
जो भी ईश्वर मुझे देगा,
मेरे बच्चे उसको अर्थवान बनाएंगे ---

रश्मि प्रभा


9 टिप्पणियाँ:

सदा ने कहा…

एहसासों के ब्रह्ममुहूर्त में,
शब्दों का अर्घ्य देती हूँ ।
जो भी ईश्वर मुझे देगा,
मेरे बच्चे उसको अर्थवान बनाएंगे --- माँ की भावनाएं निर्मल मन लिए यूँ ही निरन्तर जप करती रहती हैं
बेहतरीन लिंक्स एवम प्रस्तुति
सादर आभार

Anita ने कहा…

अनुभव तो सभी को होते हैं, अच्छे-बुरे सभी तरह के, पर कोई कोई ही उन अनुभवों को शब्दों में व्यक्त भी कर सकता है..ताकि कोई और भी यदि सचेत होना चाहे तो हो जाये. पठनीय रचनाओं से सजा सुंदर बुलेटिन, आभार !

Anita ने कहा…

रोज़ा और नमाज की घालमेल पढ़कर मन भीग गया..धर्म के नाम पर व्यर्थ की लड़ाई करने वाले कभी भी धर्म का मर्म नहीं जान सकते

yashoda Agrawal ने कहा…

वेहतरीन बुलेटिन
जो भी ईश्वर मुझे देगा,
मेरे बच्चे उसको अर्थवान बनाएंगे
सादर...

Meena sharma ने कहा…

एक रोज़ा ऐसा भी..... कितनी मासूमियत, कितना निर्मल मन !!!
जाने कहाँ गए अब ऐसे लोग !

वाणी गीत ने कहा…

शब्दों का अनमोल अर्ध्य आज के समय में अधिक अर्थवान हो उठा है. एक रोजा भी अनूठा है.
स्वयं का भी लिखकर भूला हुआ स्मरण हुआ.
सभी लिंक्स शानदार
आभार!

विश्वमोहन ने कहा…

एहसासों के ब्रह्ममुहूर्त में,
शब्दों का अर्घ्य देती हूँ ।
...... वाह! बहुत सुंदर और सारगर्भित।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

जय हो रश्मि दीदी ... जय हो |

Admin ने कहा…

Aapki Post Acchi Hoti Hai Ek Baar aap https://www.guideinhindi.com/ jarur dekh kar apne vichar vyakt kare dhanyavad

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