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बुधवार, 26 जून 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (तीसरा दिन) ग़ज़ल




ग़ज़ल की शाम हो या घनी धूप, दिल कहीं खो जाता है गुमनाम प्रतिध्वनियों में।  आँखें बंद हो जाती हैं, और पूरी प्रकृति गुनगुनाने लगती है। आजमाया होगा, एक बार फिर आजमा लीजिये दिगंबर नासवा जी के साथ  ... 


जितनी बार भी देश आता हूँ, पुराने घर की गलियों से गुज़रता हूँ, अजीब सा एहसास होता है जो व्यक्त नहीं हो पाता, हाँ कई बार कागज़ पे जरूर उतर आता है ... अब ऐसा भी नहीं है की यहाँ होता हूँ तो वहां की याद नहीं आती ... अभी भारत में हूँ तो ... अब झेलिये इसको भी ...
 
कुल्लेदार पठानी पगड़ी, एक पजामा रक्खा है
छड़ी टीक की, गांधी चश्मा, कोट पुराना रक्खा है

कुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
परछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है

टूटे घुटने, चलना मुश्किल, पर वादा है लौटूंगा
मेरी आँखों में देखो तुम स्वप्न सुहाना रक्खा है

जाने किस पल छूट गई थी या मैंने ही छोड़ी थी
बुग्नी जिसमें पाई, पाई, आना, आना रक्खा है

मुद्दत से मैं गया नहीं हूँ उस आँगन की चौखट पर
लस्सी का जग, तवे पे अब तक, एक पराँठा रक्खा है

नींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
माँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है

अक्स मेरा भी दिख जाएगा उस दीवार की फोटो में
गहरी सी आँखों में जिसके एक फ़साना रक्खा है

मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है
 

53 टिप्पणियाँ:

रंजू भाटिया ने कहा…

बेहतरीन रचना

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

शानदार ग़ज़ल
एक-एक शेर भावुक करता हुआ

yashoda Agrawal ने कहा…

व्वाहहहहह
बेहतरीन ग़ज़ल
सादर

mark rai ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल।
किसी जमाने बाद ब्लॉग पर आकर काफी अच्छा लगा।

Pammi singh'tripti' ने कहा…

बहुत बढ़िया..

Anita ने कहा…

वाह ! दिगम्बर जी के ब्लॉग पर भी गजलों का एक पूरा खजाना रखा है, बचपन की यादों को याद करके किसका मन खिल नहीं जाता, फिर ये यादें जो एक पूरी पीढ़ी को उस काल में ले जाती हैं जब खेल के साधन कंचे और लट्टू हुआ करते थे वीडियो गेम्स नहीं..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

नासवा जी के ब्लॉग पर एक से एक बेहतरीन ग़ज़लों का खजाना और इस ग़ज़ल में तो पूरा ज़माना ही रख दिया । बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ।

Archana Chaoji ने कहा…

निरंतर और बढ़िया लेखन

Sadhana Vaid ने कहा…

मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है
वाह ! क्या बात है ! हर घर में एक ज़माना रखा होता है कोई ढूँढने वाला भी तो हो ! सब अपनी ही कहानियों में मसरूफ हैं ! हर शेर बेशकीमती ! बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल !

Meena sharma ने कहा…

दिगंबर सर के 'फैनों' की लिस्ट बड़ी लंबी है....
मैं भी हूँ जी इस लिस्ट में....
किसी कोने में होगा नाम अदना सा हमारा भी !!!

vandan gupta ने कहा…

मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है
शानदार ग़ज़ल ......दिगंबर नासवा जी को तो हमेशा पढ़ा करती थी .......वाकई वो ज़माना याद आ गया और लगा जैसे ये शेर उसी के लिए तो लिखा गया है जैसे ब्लॉग हमारा पुश्तैनी मकान ही तो है :) :)

सदा ने कहा…

कुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
परछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है

जहाँ बचपन के साथ ... ये खज़ाना भी हो तो क्या कहने
अद्भुद सृजन एवम उम्दा प्रस्तुति के लिए
बधाई सहित शुभकामनाएं

shikha varshney ने कहा…

नासवा जी की बेहतरीन गज़लों में से है यह ग़ज़ल ...एक एक शेर शानदार.

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

यादों और दिल को सहलाती रचना ...शानदार ग़ज़ल ..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

नासवा जी को पढते हुये आज दस साल हो गये. इनकी ग़ज़लें बहुत ही सरल और अर्थवान होती हैं. जब ये रूमानी ग़ज़ल लिखते हैं तो हर शखस को अपना महबूब याद आ जाता है और जब बचपन की यादें शेयर करते हैं तो अपना बचपन पुकारने लगता है. इन्होंने नज़्में भी लिखी हैं, लेकिन ग़ज़लों में इनका चमत्कार बस मुग्ध करता है.

nayee dunia ने कहा…

टूटे घुटने, चलना मुश्किल, पर वादा है लौटूंगा
मेरी आँखों में देखो तुम स्वप्न सुहाना रक्खा है...वाह.. ! बहुत बढ़िया


Anuradha chauhan ने कहा…

बेहतरीन अंक दिगंबर जी की बेहतरीन ग़ज़ल के साथ

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आभार आपका ... अच्छा लगा आपको देख कर ब्लॉग पर

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत आभार

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शुक्रिया यशोदा जी

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जी सही कह रहे हैं आप ... ब्लॉग यादों का पिटारा है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शुक्रिया जी

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आप बचपन की यादों को स्पर्श कर सके तो ये प्रयास सफल ही है ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपकी प्रशंसा शब्दों से बहुत आगे है ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत आभार आपका

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जी सच है आपकी बात आज के दौर के हिसाब से ... और चलना भी है ज़माने के साथ ही ... आभार आपका

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपकी रचनाओं का तो मैं भी फ़ैन हूँ ... आभार आपका ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जी सही बात है आपकी ... इस घर को भी सभी ने सम्भालना है और ये ज़रूर सम्भलेगा ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत आभार सदा जी ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत आभार शिखा जी ..।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आभार निशा जी ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये आपका स्नेह है सलिल जी ... सफ़र इसी प्रेम में बीत जाए तो जीवन सवाल हो जाता है ... आपका आभार है बहुत बहुत ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत आभार आपका ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आभार अनुराधा जी ...

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति !

संध्या शर्मा ने कहा…

आपकी रचना हमेशा की तरह बेमिसाल... बहुत अच्छा लग रहा है फिर से ब्लॉग पर इतनी रौनक देखकर... शुभकामनाएं

संध्या शर्मा ने कहा…

आपकी रचना हमेशा की तरह बेमिसाल... बहुत अच्छा लग रहा है फिर से ब्लॉग पर इतनी रौनक देखकर... शुभकामनाएं

उषा किरण ने कहा…

आपकी रचना दिल को छू गई !

Dr Varsha Singh ने कहा…

लाजवाब

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आभार संध्या जी ... सच में रौनक़ है ब्लॉग पर आज

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आभार आपका

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत शुक्रिया

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जी शुक्रिया आपका

आनंद प्रवीण ने कहा…

ग़ज़ल का एक- एक शेर ऐसे लगता है जैसे हमारे बीते दिनों की याद दिला रहा है। क़रीब ला रहा है। शानदार।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

🙏🙏🙏

Disha ने कहा…

अर्थपूर्ण और बेहतरीन।

Preeti 'Agyaat' ने कहा…

मुद्दत से मैं गया नहीं हूँ उस आँगन की चौखट पर
लस्सी का जग, तवे पे अब तक, एक पराँठा रक्खा है...वाह्ह

रेणु ने कहा…

वाह !!!आदरणीय दिगम्बर जी को पढना एक नितांत रूहानी अनुभव है | उनकी रचनाएँ हिन्दी बसाहित्य जगत में ग़जल विधा को नित नयी प्राण वायु देती हैं | ये रचना तो कमाल है , बेमिसाल है | हार्दिक शुभकामनायें दिगम्बर जी |

Jyoti Dehliwal ने कहा…

में दिगम्बर जी की लगभग हर रचना पढ़ती हूं। उनकी हर रचना अपने आप मे अनूठी होती हैं।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Aadhar Disha ji

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शुक्रिया प्रीति जी

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत आभार आपका रेणु जी ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आभार ज्योति जी ...

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