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शनिवार, 29 जून 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (छठा दिन)लघुकथा




"मैंगो पीपल यानी हम और आप वो आम आदमी जिसे अपनी हर परेशानी के लिए दूसरो को दोष देने की बुरी आदत है . वो देश में व्याप्त हर समस्या के लिए भ्रष्ट नेताओं लापरवाह प्रसाशन और असंवेदनशील नौकरशाही को जिम्मेदार मानता है जबकि वो खुद गले तक भ्रष्टाचार और बेईमानी की दलदल में डूबा हुआ है. मेरा ब्लाग ऐसे ही आम आदमी को समर्पित है और एक कोशिश है उसे उसकी गिरेबान दिखाने की." - जानी-मानी ब्लॉगर अंशुमाला जी खरी खरी बातें हर खरे लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।  तर्कसंगत बातें इतनी संयत होती हैं, लेखन में इतनी स्पष्टता होती है कि आप सहज रूप से उसे स्वीकार करते हैं। 
आज उनकी लघुकथा भी इतनी ही तर्कसंगत है - 


      सेठ जी हाथ में खीर पूड़ी और दो लड्डू लिए अब भी ऊपर पेड़ पर कौवो को खोज रहें थे , जिनकी आवाज तो आ रही थी लेकिन दिख नहीं रहे थे | सामने फुटपाथ पर पड़ा गोबर और थोड़ी घास बता रही थी कि रोज वहां अपनी गाय लाने वाली वाली अपनी गाय लेकर जा चुकी हैं |  अब मुंबई जैसे शहर में उन्हें कहाँ रास्ते में  घूमती गाय मिलेगी  | मन ही मन सोचने लगे क्या इस पितृपक्ष को मेरे पितर अतृप्त ही रह जायेंगे | यहाँ तो कोई जानवर पंछी  दिख ही नहीं रहा जो उनके पितरो तक उनका दिया भोजन पहुंचा सके | तभी किनारे खड़े दो बच्चो पर उनकी नजर गई शायद फुटपाथ पर रहने वालों के थे | एक पांच छह साल का दूसरा सात आठ साल का रहा होगा | उनके गंदे बदन पर फटी गंदी पैंट के सिवा कुछ ना था | उनकी नज़रे पेड़ के नीचे ढेर सारे पत्तलों में रखे तरह तरह के खानो पर थी जिन पर मखियाँ भिनभिना रही थी | सेठ जी ने एक नजर घड़ी पर डाली और अपना पत्तल भी वही उन पकवानो के ढेर के बगल में रख दिया और हाथ जोड़ आगे बढ़ने से पहले आँखों से उन बच्चो को घूर कर हिदायत दे दी की वो उस खाने को खाने के बारे में सोचे भी नहीं | जैसे ही वो आगे बढे एक तेज हवा का झोका ढलान पर रखे लड्डुओं को लुढ़का कर उन पकवानो से दूर कर दिया | सामने खड़े बच्चो ने एक नजर एक दूसरे को देखा और झट उन लड्डुओं को मुट्ठी में भींच पास की दिवार की ओट में छुप गयें  |  दिवार के पीछे दो तृप्त आत्माएं अपनी हथेलियों की मिठास के मजे ले रहीं थी |

29 टिप्पणियाँ:

yashoda Agrawal ने कहा…

व्वाहहहहह
पितर तृप्त हुए
बेहतरीन
सादर नमन

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह ...
चुटीली ... लघु लेकिन गहरी ... बहुत बहुत शुभकामनाएँ ...

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

गागर में सागर
आईना समाज के सामने ...
उम्दा लेखन

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुंदर!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

तीक्ष्ण कटाक्ष .

अर्चना तिवारी ने कहा…

बढ़िया लघुकथा है।

shikha varshney ने कहा…

सटीक तर्कसंगत लेखन.

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

सटीक और तर्कसंगत कथ्य।

anshumala ने कहा…

रश्मि प्रभा जी बहुत बहुत धन्यवाद | उम्मीद हैं सभी को लघुकथा पसंद आयेगी 🙏

Archana Chaoji ने कहा…

वाह, इनका ब्लॉग मेरी पसंद है... बहुत सटीक लेखन है इनका हमेशा से ,बधाई

रंजू भाटिया ने कहा…

बहुत बढ़िया लघुकथा

~Sudha Singh vyaghr~ ने कहा…

वाह बहुत बढ़िया लघुकथा , एकदम सटीक

Sadhana Vaid ने कहा…

मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर जगाती एक अत्यंत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी कथा !बहुत खूब !

Preeti 'Agyaat' ने कहा…

संवेदनशील रचना

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

अंशुमाला एक बहुत सुलझी हुई इन्सान हैं, जिसका प्रभाव उनके लेखन की हर विधा पर दिखता है... हर विधा बोले तो हर विधा... इनकी कहानियाँ, घरेलू संस्मरण, इनकी टिप्पणियाँ, राजनैतिक व्यंग्य... सबकुछ! इनकी यह कहानी जल्दी में छाँटी हुई कहानी लग रही है! बहुत अच्छा विषय है... इस विषय पर एक फ़िल्म भी देखी है मैंने जो एक बांग्ला कथा पर आधारित थी!
ख़ैर, एक बेहतर चुनाव रश्मि दी!

वाणी गीत ने कहा…

भूखे का धर्म भोजन है.
कथा अच्छी है.
बस पितृ पक्ष के लिए कहूँ तो उसमें सबका भाग होता है. गाय, कौवे, कुत्ते और अतिथि (यहाँ अतिथि मतलब मेहमान नहीं बल्कि गरीब, अनाथ होता है)

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

सत्य को दर्शाती रचना ....हालांकि अब काफी परिवर्तन आ चुका है फिर भी बहुत सारों को समझना अभी बाकी है ..

anshumala ने कहा…

सभी पाठकों का धन्यवाद 🙏 |

shobhana ने कहा…

सार्थक लघु कथा ।

Meena sharma ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Meena sharma ने कहा…

अंशुमाला जी का ब्लॉग मेरे मन के बहुत करीब है क्योंकि मैं मैंगोपीपल में से एक हूँ। उनके लेखन में बेबाकी और सहजता दोनों मन मोह लेती हैं। यह लघुकथा भी सार्थक संदेश देती है।

रेणु ने कहा…

बहुत ही मार्मिक कथा | अंशुमाला जी को पहली बार पढ़ा | धन्यवाद ब्लॉग बुलेटिन सुदक्ष कथाकार से रिची करवाने के लिए |

Vaanbhatt ने कहा…

अति सम्वेदनशील लघु कहानी...

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत सुंदर लघुकथा।

Anita ने कहा…

परंपराओं का सम्मान करने के नाम पर हृदयहीनता का कैसा प्रदर्शन...सोचने पर मजबूर करती हुई सशक्त रचना

संध्या शर्मा ने कहा…

सटीक लेखन... शुभकामनाएं

संध्या शर्मा ने कहा…

सटीक लेखन... शुभकामनाएं

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत बढ़िया लघुकथा...सटीक लेखन

Anita Lalit (अनिता ललित ) ने कहा…

सही अर्थों में यही असली धर्म है!
सुंदर लघुकथा!
हार्दिक बधाई !

~सादर
अनिता ललित

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