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बुधवार, 25 सितंबर 2019

बिना किसी जीत हार के




कमी न तुममें थी
न मुझमें थी,
और शायद कमी तुझमें भी थी,
मुझमें भी थी ...
कटु शब्द तुमने भी कहे,
हमने भी कहे,
मेरी नज़रों से तुम गलत थे,
तुम्हारी नज़रों से हम !
बना रहा एक फासला,
न तुम झुके,
न हम - 
शिकायतें दूर भी हों तो कैसे ?
आओ, चुपचाप ही सही,
कुछ दूर साथ चलें,
मुमकिन है थकान भरे पल में,
तुम मुझे पानी दो
मैं तुम्हें ...
बिना किसी जीत-हार के,
बातों का एक सिलसिला शुरू हो जाए ।

रश्मि प्रभा 


एक ब्लॉग लिंक उठाती हूँ और उसके कुछ कमरों से गुजरती हूँ आपको साथ लेकर, शायद इसी बहाने रुके कदम,फिर चल पड़े -

    प्रदीपिका सारस्वत

इनफ़िडल




तन तंबूरा तार मन...




इसके बाद आप इन्हें पढ़िए और कहिये और लिखें 

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

कुछ भी शाश्वत नहीं




कुछ भी शाश्वत नहीं, तो जब तक जीवन है, अपनी एक पहचान बनाइये । परिवर्तन जीवन चक्र का सत्य है, लेकिन इस सत्य में अपनी जिद, अपनी नफरत का मसालेदार तड़का लगाना उचित नहीं । क्योंकि, "ज़िन्दगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मुकाम, वो फिर नहीं आते"
इस गाने की पूरी पंक्तियों पर गौर कीजिए, सोचिए और जो भी निर्णय लीजिये, उस पर अमल कीजिये । वक़्त हाथ से फिसल जाए, तब रोने का कोई औचित्य नहीं ।

 
#अमेज़न
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एक दिन हम भी जल जाएंगे
जैसे जला एक पूरा जंगल
या सोचो जल गया पृथ्वी का फेफड़ा
ये आग
आपदा कम
एक हत्या का रूप ज्यादा थी
ईश्वर बचा सकते थे
सब
पर, उस दौरान वो लिबास बदल रहे थे
जून में अक्सर पहाड़ी लोग
अधूरी सुलगी बीड़ी जंगलों
में फेंकते हैं
और पैर से मसलना भूल जाते हैं
फैलती है ऐसे ही आग और
डांड बीड़ी से भी तेज सुलगते हैं
मुझे लगता है ईश्वर भी बीड़ी पीता है
उसने ही छोड़ी होगी अधूरी सुलगी
बीड़ी अमेज़न के जंगल मे,
अपने नए लिबास को निहारते हुए
आजकी कविता मेरे प्रिय गुरु विवेक श्रीवास्तव को समर्पित

होस्टल की एक खिड़की और दोस्तयोवस्की।
जब शिक्षक, शिक्षक ही नहीं अभिभावक की भी भूमिका निभाते थे।
खिड़की पर बैठे देख वार्डन डांटती थी -" किसी ने बताया नहीं क्या? लड़कियाँ खिड़की पर नहीं बैठतीं, कमर में ठंड लग जाती है"
कम गर्म पहने होस्टल से निकलो तो डेस्क पर बैठी बाबूश्का चिल्लाकर वापस कमरे में भेज देती-"ठीक से कपड़े पहनकर बाहर जाओ"
कॉलेज की कैंटीन की लाइन में कोई टीचर आगे पीछे होती तो एक प्लेट में कुछ छोटा सा देखकर कहती -" स्टूडेंट्स को ठीक से खाना चाहिए वरना पढ़ाई कैसे करोगे? और परोसने वाली को कहती इसे एक चिकन का पीस दो, पैसे मैं दूंगी"
वह दौर और वह जगह पढ़ाने की ही नहीं सिखाने की भी थी- जीवन भी, जीवन मूल्य भी और दुनियादारी भी।
उन कच्चे-पक्के दिनों में जिसने भी जो कुछ भी सिखाया, पढ़ाया, मुझे "मैं" बनाया, सबका शुक्रिया 🙏
#येउनदिनोंकीबातहै

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