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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

आइये बनें हम भी सैनिक परिवार का हिस्सा : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
पुलवामा में आतंकी हमले के बाद से पूरे देश में सेना के प्रति, सैनिकों के प्रति संवेदनात्मक माहौल बना हुआ है. किसी हादसे के बाद इन वीर शहीदों के परिजनों के प्रति चंद दिनों तक तो लोगों की संवेदना बनी रहती है परन्तु कुछ दिनों, महीनों बाद उस शहीद के परिजन अकेले से पड़ जाते हैं. चंद दिनों के बाद वे जीवन की वास्तविक कठिनाइयों से जूझने लगते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि बहुतायत सैनिकों के परिवार मध्यम अथवा निम्न मध्यम आय वर्ग से आते हैं. किसी-किसी परिवार में वही सैनिक एकमात्र कमाऊ पूत होता है. कहीं-कहीं वही एक सैनिक समूचे परिवार का आधार होता है. किसी-किसी घर में वही एक सैनिक अपने छोटे भाई-बहिन के भविष्य का ख्याल रखने वाला होता है. किसी-किसी परिवार में कोई शहीद सैनिक नव-विवाहित होते हैं, कहीं-कहीं वे नवजात शिशु के पिता बने होते हैं. ऐसे में स्पष्ट है कि शहीद हुए उस जवान के घर पर चंद दिनों के बाद वास्तविक कठिनाइयाँ सिर उठाना शुरू कर देती हैं. वर्ष भर के पर्व-त्यौहार, आस-पड़ोस के आयोजन आदि के समय भी उन परिवारों को अपने खोये हुए सदस्य की याद बहुत गहराई से आती होगी. 


यही वह बिंदु होता है जहाँ जवानों के परिजनों को वास्तविक रूप से हमारे साथ की आवश्यकता होती है. हम नागरिक जो किसी जवान की शहादत के समय संवेदित होकर एकजुट होना शुरू कर देते हैं उनको सतत एकजुट और संवेदित बने रहने की आवश्यकता है. इसके लिए हम अपने-अपने जिले में, अपने-अपने क्षेत्र के सैनिकों की जानकारी कर सकते हैं और उनके परिजनों से समय-समय पर मिल सकते हैं. उनके साथ पर्व-त्यौहार को मना सकते हैं. उनकी किसी भी तरह की समस्या का समाधान बन सकते हैं. शहीद सैनिकों के बच्चों की शिक्षा से सम्बंधित, उनके माता-पिता के स्वास्थ्य, चिकित्सा से सम्बंधित समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं. उनके अन्य परिजनों की परेशानियों का समाधान भी कर सकते हैं. हमारे एक कदम इस तरह से उठाने पर उन परिजनों को भी गर्व की अनुभूति होगी और वे अपने आपको कभी भी अकेला महसूस नहीं करेंगे. ये आवश्यक नहीं कि हर मदद आर्थिक रूप से हो, यह भी जरूरी नहीं कि हर शहादत के बाद ही संवेदित हुआ जाये, हम सभी ऐसा कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं और अपने वीर सैनिकों के परिजनों का हिस्सा बन सकते हैं.

ऐसा हम सभी उन सैनिक परिवारों के साथ भी कर सकते हैं, जो अपने घर-परिवार से दूर अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं. हमारी आज़ादी, हमारी सुरक्षा के लिए कहीं किसी मोर्चे पर तैनात डटे हुए होते हैं. आइये मिलकर एक प्रयास करें अपने सैनिकों के लिए, उनके परिजनों के लिए.  

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सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

एयरमेल हुआ १०८ साल का - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय  ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

वर्तमान में ई-मेल का जमाना है क्लिक करते ही संदेश एक स्थान से दूसरे तक पहुंच जाता है किंतु पिछले दशक तक लाल नीले स्ट्रिप बार्डर वाले पत्र की खास अहमियत थी और एयरमेल सेवा ही सबसे तेज थी। हार्ड कापी को जल्द से जल्द भेजने का माध्यम आज भी एयरमेल सेवा ही बनी हुई है जिसे शुरू हुए अब एक सौ आठ साल हो रहे हैं।
फ्रेंच पायलट हैनरी पिक्वइट ने पहला एयरमेल लेटरों के पैकेट को इलहाबाद से एयर लिफ्ट करके नैनी पहुंचाया था। इस पहली एयरमेल फ्लाइट के आयोजकों को भलीभांति आभास हो गया था कि वह एक इतिहास बनाने जा रहे हैं, इसी लिये इस लोक उपयोगी सेवा की शुरूआत को एक अन्य चेरिटी के काम से जोड़ते हुए शुरू किया। 18 फरवरी 1911 को हुई इस पहली फ्लाइट से भेजे गये पत्रो से हुई आय को बैंगलूर के ट्रिनिटी चर्च के एक हॉस्टल निर्माण के लिये दान कर दिया गया।
राइट्स बंधुओं के द्वारा पहली पावर फ्लाइट की कामयाबी के बाद महज सात साल बाद हुई इस ऐतिहासिक उडान में 6500 पत्र ले जाये गये थे जिनमें पं. मोतीलाल नेहरू द्वारा अपने पुत्र जवाहर लाल नेहरू को लिखे चर्चित खत के अलावा किंग जार्ज पंचम और नीदरलैंड की महारानी के नाम लिखे गये खत भी शामिल थे। 

हैनरी पर भी जारी हुआ था डाक टिकट 

 
सन 2011 मे विश्व की पहली एयरमेल सेवा के लिए इस्तेमाल होने वाले वायुयान को चलाने वाले फ्रेंच पाइलट हैनरी पिक्वट पर भी उनकी यादगार शुरूआत में साहसिक योगदान के लिए फ्रांस में एक स्पेशल पोस्टल स्टाप भी जारी किया गया था| 
 
सादर आपका

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देश-समाज के प्रति समर्पित लोगों को मिडिया में तवज्जो मिले

बस चुप हो देखिये

बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता ....

बेगूसराय में रंग-ए-माहौल

लघुकथा : ध्वज

बडा सवाल !

शहादत को नमन

जैसे को तैसा

दर्द

बदला लो

जलसेना विद्रोह (मुम्बई) - १८-२३ फ़रवरी सन् १९४६ की ७३ वीं वर्षगांठ

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अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!! 

लेखागार