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रविवार, 16 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 15



शिवम मिश्रा, तेज तर्रार, गंभीर, आत्मविश्वास से भरे, अपने परिवार के लिए अति संवेदनशील व्यक्तित्व  ... अपनी ज़िन्दगी की भागदौड़ से वक़्त निकालते हैं इतिहास के लिए।  जी हाँ, उनका ब्लॉग 

बुरा भला

   एक ऐतिहासिक पन्ना ही है। तारीखें और ख़ासियत उनके पन्नों पर साँसें लेती हैं, और ख़ुद को दोहराती हैं। 



  
बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर, 1910 को बंगाली कायस्थ परिवार में ग्राम-औरी, जिला-नानी बेदवान (बंगाल) में हुआ था। इनका बचपन अपने जन्म स्थान के अतिरिक्त बंगाल प्रांत के वर्धमान जिला अंतर्गत खण्डा और मौसु में बीता। इनकी स्नातक स्तरीय शिक्षा पी.पी.एन. कॉलेज कानपुर में सम्पन्न हुई। 1924 में कानपुर में इनकी भगत सिंह से भेंट हुई। इसके बाद इन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए कानपुर में कार्य करना प्रारंभ किया। इसी क्रम में बम बनाना भी सीखा। 

8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली स्थित केंद्रीय विधानसभा (वर्तमान का संसद भवन) में भगत सिंह के साथ बम विस्फोट कर ब्रिटिश राज्य की तानाशाही का विरोध किया। बम विस्फोट बिना किसी को नुकसान पहुंचाए सिर्फ पचांर्े के माध्यम से अपनी बात को प्रचारित करने के लिए किया गया था। उस दिन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार की ओर से पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल लाया गया था, जो इन लोगों के विरोध के कारण एक वोट से पारित नहीं हो पाया। 

इस घटना के बाद बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। 12 जून, 1929 को इन दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सजा सुनाने के बाद इन लोगों को लाहौर फोर्ट जेल में डाल दिया गया। यहां पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर लाहौर षड़यंत्र केस चलाया गया। उल्लेखनीय है कि साइमन कमीशन के विरोध-प्रदर्शन करते हुए लाहौर में लाला लाजपत राय को अंग्रेजों के इशारे पर अंग्रेजी राज के सिपाहियों द्वारा इतना पीटा गया कि उनकी मृत्यु हो गई। इस मृत्यु का बदला अंग्रेजी राज के जिम्मेदार पुलिस अधिकारी को मारकर चुकाने का निर्णय क्रांतिकारियों द्वारा लिया गया था। इस कार्रवाई के परिणामस्वरूप लाहौर षड़यंत्र केस चला, जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा दी गई थी। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी जेल भेज दिया गया। जेल में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए। 

आजादी के बाद नवम्बर, 1947 में अंजली दत्त से शादी करने के बाद वे पटना में रहने लगे। बटुकेश्वर दत्त को अपना सदस्य बनाने का गौरव बिहार विधान परिषद ने 1963 में प्राप्त किया। श्री दत्त की मृत्यु 20 जुलाई, 1965 को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हुई। मृत्यु के बाद इनका दाह संस्कार इनके अन्य क्रांतिकारी साथियों-भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की समाधि स्थल पंजाब के हुसैनी वाला में किया गया। इनकी एक पुत्री भारती बागची पटना में रहती हैं। बटुकेश्वर दत्त के विधान परिषद में सहयोगी रहे इन्द्र कुमार कहते हैं कि 'स्व. दत्त राजनैतिक महत्वाकांक्षा से दूर शांतचित एवं देश की खुशहाली के लिए हमेशा चिन्तित रहने वाले क्रांतिकारी थे।' मातृभूमि के लिए इस तरह का जज्बा रखने वाले नौजवानों का इतिहास भारतवर्ष के अलावा किसी अन्य देश के इतिहास में उपलब्ध नहीं है।
आज इन की १०८ वीं जयंती पर हम सब भारत माता के इस वीर लाल , अमर क्रांतिकारी स्व॰ श्री बटुकेश्वर दत्त जी शत शत नमन करते है |

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

2018 ब्लॉग बुलेटिन अवलोकन - 14

साधना वैद जी के सधे शब्दों को वर्षों से पढ़ती आ रही हूँ  

Sudhinama

    पर, फेसबुक पर,  ... इसके अतिरिक्त शब्दों और उनकी आवाज़ के माध्यम से उनके साथ संवेदना जैसा रिश्ता है। कुछ रिश्तों को हम नाम नहीं दे सकते, देना भी नहीं चाहिए, वर्ना उसके अर्थ सम्भवतः बदल जाते हैं या कम हो जाते हैं !
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उनके शब्दों में, "मैं एक भावुक, संवेदनशील एवं न्यायप्रिय महिला हूँ और यथासंभव खुशियाँ बाँटना मुझे अच्छा लगता है !"

Sudhinama: प्रश्न और रिश्ते

 

यह प्रश्नों का संसार भी 
कितना निराला है !
विश्व के हर कोने में
कोने में बसे हर घर में
घर में रहने वाले 
हर इंसान के मन में
उमड़ते घुमड़ते रहते हैं 
ना जाने कितने प्रश्न,
बस प्रश्न ही प्रश्न !

अचरज होता है
ये छोटे-छोटे प्रश्न भी 
कितनी पाबंदी से
रिश्तों को परिभाषित कर जाते हैं
और मन के हर भाव को
कितनी दक्षता से बतला जाते हैं
कहीं रिश्तों को प्रगाढ़ बनाते हैं
तो कहीं पुर्जा-पुर्ज़ा बिखेर कर
उनकी बलि चढ़ा देते हैं !

प्रश्नों की भाषा
स्वरों के आरोह अवरोह
उछाले गए प्रश्नों की शैली और अंदाज़
वाणी की मृदुता या तीव्रता
रिश्तों के स्वास्थ्य को बनाने
या बिगाड़ने में बड़ी अहम्
भूमिका निभाते हैं !

किसने पूछा, किससे पूछा,
क्यों पूछा, कब पूछा,
किस तरह पूछा, क्या पूछा
सब कुछ बहुत मायने रखता है  
ज़रा सा भी प्रश्नों का मिजाज़ बदला
कि रिश्तों के समीकरण बदलने में
देर नहीं लगती !

छोटा सा प्रश्न कितने भावों को
सरलता से उछाल देता है
जिज्ञासा, कौतुहल, लगन, ललक,
प्यार, हितचिंता, अकुलाहट, घबराहट
चेतावनी, अनुशासन, सीख, फटकार,
व्यंग, विद्रूप, उपहास, कटाक्ष,  
चिढ़, खीझ, झुंझलाहट, आक्रोश,
संदेह, शक, शंका, अविश्वास,
धमकी, चुनौती, आघात, प्रत्याघात
सारे मनोभाव कितनी आसानी से
छोटे से प्रश्न में
समाहित हो जाते हैं और
इनसे नि:सृत होते अमृत या गरल
शहद या कड़वे आसव
कभी रिश्तों की नींव को
सींच जाते हैं तो कभी
जला जाते हैं,
कही रिश्तों के सुदृढ़ महल बना जाते हैं
तो कहीं मजबूत किले ढहा कर
खंडहर में तब्दील कर जाते हैं !

तो मान्यवर अगर जीवन में
रिश्तों की कोई अहमियत है तो
प्रश्नों के इस तिलिस्म को समझना
बहुत ज़रूरी है !
 

लेखागार