साल का सुरुआत अभी होबे किया है त आज हमको भी बहुत सा पुराना-नया बात याद आ रहा है. ऊ ब्लॉग का स्वर्न काल थाजब नया नया दाखिल हुये थे. बहुत सा लोग तबतक स्थापित हो चुका था अऊर जिनका लेखन हमको बहुत परभावित करता था. सच पूछिये त जेतना सिर्सस्थ लोग आज भी देखाई देता है उनमें हम सबसे जुनियर हैं. मगर धीरे-धीरे हमरा भी पहचान बनता चला गया अऊर कुछ लोग बिहारी होने के बावजूद भी इज्जत देने लगा. इसका सबसे बड़ा कारन जानते हैं का था? हमरा ईमानदारी.
दरसल ब्लॉग-जगत में बहुत बे-ईमानी चलता था. ऊ जमाना था जब बहुत सा “बड़ा लेखक” लोग भी बिना ब्लॉग पढे हुये कमेण्ट में बहुत अच्छा, कमाल का लिखा है आपने, बहुत प्रेरक रचना है... ई सब बात लिख देता था. बहुत सा लोग पिछला कमेण्ट पढकर हेर-फेर करके नया टिप्पणी चेप देता था. असल में ऊ लोग का भी मजबूरी था, काहे कि उनको एक रोज में सैकड़ों पोस्ट पर कमेण्ट जो करना पड़ता था, ताकि उनके पोस्ट पर भी ऊ लोग आकर हाजिरी लगाए. अब एतना पोस्ट पढकर कमेण्ट करने में त हालत खराब हो जाएगा, ओही से एक झटका में सबको निपटा देते थे.
हमरा खराबी एही था कि हम बहुत कम पोस्ट पढते थे, मगर पढला के बाद कमेण्ट करते थे. अ आप लोग को भरोसा दिलाते हैं कि आज भी हम बिना पढे कम से कम टिप्पणी त नहिंये करते हैं. एही हाल हमरा फेसबुक पर भी है. बहुत कम पोस्ट लिखते हैं, गिना चुना लोग को पढते हैं अऊर टिप्पणी का ओही स्टैंडर्ड बनाकर चलते हैं.
एही चक्कर में केतेना बार अइसा हुआ कि टिप्पणी में कोई कबिता हम लिख दिये, त उसको ओहीं पोस्ट करके हम भुला जाते थे. कभी कभी बाद में खोजने से भी नहीं मिलता था. दरसल हम जेतना अपना कबिता को नेग्लेक्ट किये हैं कि अगर हमरा कबिता हमसे बदला लेना चाहे त हमको सात जन्म तक कबिता से वंचित रख सकता है. मगर हमरा कबिता को भी मालूम है कि हम कबिता के बिना नहीं रह सकते हैं अऊर कबिता हमरे साँस साँस में बसता है.
बस गुअजरा हुआ साल में हम कबिता के साथ एगो परयोग किये. सुबह-सुबह व्हाट्स ऐप्प पर लोग एन्ने-ओन्ने का फॉरवर्ड किया हुआ मेसेज भेजता रहता है, हम कभी उसको फ़ॉरवर्ड नहीं करते हैं. हम अंगरेजी का बहुत सा सूक्ति का हिन्दी में भाव अनुवाद करके अऊर उसको एकेदम अपना बनाकर कबिता के रूप में ढाल दिये. फिर उसको अपने पसंद का संदेस से मिलता जुलता फोटो (अऊर कभी कभी अपना फ़ोटो) के साथ अपना करीबी लोग को भेजना सुरू कर दिये. हमरा भी सर्त एही था कि उसको कभी भी फेसबुक पर सेयर नहीं किये. कुछ चाहने वाले लोग शेयर कर दिये त हमको कोनो आपत्ति भी नहीं हुआ.
बस एही सिलसिला अभी तक चल रहा है. इसी बहाने हम अपने अंदर लुकाया हुआ कबि को बाहर निकालने का कोसिस भी किये अऊर कबिता के प्रति जो हमरा करजा था ऊ हो धीरे धीरे चुका दिये. आज लगभग 200 कबिता हम लिख चुके हैं अऊर आप लोग के आसीर्बाद से अभी भी चल रहा है. कबिता अच्छा है या बुरा है मालूम नहीं, लेकिन बहुत से परसिद्ध लोग से अच्छा कबिता है ई बात त हम अपना खुद का आलोचक होने के नाते भी कह सकते हैं.
कभी मौका मिला त अगिला बार हम अपना कबिता के साथ ब्लॉग-बुलेटिन पेस करेंगे. फिलहाल त देखते देखते 2300 वाँ बुलेटिन आपके सामने आ गया. बधाई आप सब लोगों को, काहे कि बहुत मोस्किल से हमलोग ई बुलेटिन को आगे बढा पा रहे हैं. सबके साथ बेक्तिगत समस्या है, मगर ऊ का कहते हैं कि आदत हो त छूटियो जाता है, लत कहाँ छूटता है- छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई!
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नये साल में क्या बदलेगा
हे कृष्ण
♥♥♥♥♥अपने औचित्य... ♥♥♥♥♥♥
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“भाग दौड़" भरी ज़िन्दगी १: ए दिल है मुश्किल जीना यहाँ, जरा हट के जरा बच के ये है बम्बे मॅरेथॉन!!
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