Subscribe:

Ads 468x60px

कुल पेज दृश्य

ब्लॉग बुलेटिन - ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019

रविवार, 31 मार्च 2019

47वीं पुण्यतिथि - मीना कुमारी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
मीना कुमारी (1 अगस्त, 1933 - 31 मार्च, 1972) भारत की एक मशहूर अभिनेत्री थीं। इन्हें खासकर दुखांत फ़िल्म में उनकी यादगार भूमिकाओं के लिये याद किया जाता है।1952 में प्रदर्शित हुई फिल्म बैजू बावरा से वे काफी वे काफी मशहूर हुईं।

मीना कुमारी का असली नाम माहजबीं बानो था और ये बंबई में पैदा हुई थीं। उनके पिता अली बक्श भी फिल्मों में और पारसी रंगमंच के एक मँजे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में संगीतकार का भी काम किया था। उनकी माँ प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो), भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी जिनका ताल्लुक टैगोर परिवार से था। माहजबीं ने पहली बार किसी फिल्म के लिये छह साल की उम्र में काम किया था। उनका नाम मीना कुमारीविजय भट्ट की खासी लोकप्रिय फिल्म बैजू बावरा पड़ा। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थे। मीना कुमारी के आने के साथभारतीय सिनेमा में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ था जिसमें नरगिस, निम्मी, सुचित्रा सेन और नूतन शामिल थीं।

1953 तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं।परिणीता से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ। परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूकि इस फिल्म में भारतीय नारियों के आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत भूमिकाएँ करने वाले की होकर सीमित हो गयी। लेकिन ऐसा होने के बावज़ूद उनके अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू भारतीय दर्शकों पर हमेशा छाया रहा।

मीना कुमारी की शादी मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही के साथ हुई जिन्होंने मीना कुमारी की कुछ मशहूर फिल्मों का निर्देशन किया था। लेकिन स्वछंद प्रवृति की मीना अमरोही से1964 में अलग हो गयीं। उनकी फ़िल्म पाक़ीज़ा को और उसमें उनके रोल को आज भी सराहा जाता है। शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की। उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में छपी।

आज स्वर्गीय मीना कुमारी जी के 47वीं पुण्यतिथि पर हम सब उनकी शख्सियत और अभिनय को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

शनिवार, 30 मार्च 2019

सांसद का चुनाव और जेड प्लस सुरक्षा - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक आदमी ने सांसद का चुनाव लड़ा! उसे सिर्फ तीन वोट मिले!

यह पता चलते ही वह सरकार से जेड प्लस की सुरक्षा मागने लगा!

जिले के डी एम साहब ने समझाते हुए कहा, `आप को सिर्फ तीन वोट मिले है फिर आप को जेड प्लस कैसे दी जा सकती है?`

 
वह आदमी बोला `जिस शहर मे सिर्फ तीन लोगों को छोड़कर बाकी सब मेरे खिलाफ हों तो मुझे नहीं तो और किसे सुरक्षा मिलनी चाहिए?`

सादर आपका 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

३५२.खुले मैदान में लड़की

समय धार पर चलता जीवन

सबको समय समझाएगा

आँसुओं की माप क्या है?

"उसूल"

देश मेरा रंगरेज़ है बाबू

जोधपुर जैसलमेर की घुम्मकड़ी #2: जोधपुर से जैसलमेर

ईश्वर चाहता था कि वह मुक्त हो ईश्वरत्व से!

दादी माँ कुछ बदलो तुम भी

स्त्रियाँ

राब्ता

 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

ईश्वर, मनुष्य, जन्म, मृत्यु और मोबाइल लगी हुई सेल्फ़ी स्टिक

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज का ज्ञान:

जन्म और मृत्यु ईश्वर के हाथ है!

मनुष्य के हाथ में सिर्फ़ मोबाइल लगी हुई सेल्फ़ी स्टिक है!

सादर आपका
~~~~~~~~~~~~~~~ 

मौत के पास आ गये ज़िंदगी की तलाश में ( देश की वास्तविकता ) डॉ लोक सेतिया

पत्नी नहीं प्रधानमंत्री हूं!

आँसू क्षणिकाएं

सबका हश्र बुरा होता हैं प्यार में

आसपास के लोग (कहानी संग्रह) समीक्षा

१६२ वर्ष पहले आज भड़की थी प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की ज्वाला

अक्षर

दर्द ने कुछ यूँ निभाई दोस्ती

निम्न मध्यम वर्ग

गुरु-शिष्य संवाद

चाहती हूं सीधी होना

~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 28 मार्च 2019

अब अंतरिक्ष तक सर्जिकल स्ट्राइक करने में सक्षम... ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार मित्रो,
कल, 27 मार्च को जब डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम आईलैंड लॉन्च कॉम्पलेक्स से रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक मिसाइल ने बतौर परीक्षण एक सैटेलाइट को मार गिराया तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जो अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता रखते हैं. भारत से पहले अभी तक यह क्षमता रूस, अमेरिका और चीन के पास थी. यह एक एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण था, जिसे मिशन शक्ति नाम दिया गया. इसके लिए DRDO के बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया गया. यह मौजूदा बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का हिस्सा है. 


इस मिशन में जिस सैटेलाइट को निशाना बनाया गया, वह निचली कक्षा में घूम रहा था. यह परीक्षण इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने इसके जरिये यह साबित किया है कि वह अपनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से बाहरी अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को निशाना बना सकता है. चूँकि हमारा पड़ोसी देश चीन बहुत पहले यह क्षमता विकसित कर चुका है ऐसे में भारत पर काफी दबाव था. यह सत्य किसी से छिपा नहीं है कि आज की दुनिया में पारंपरिक हथियारों से शत्रु का मुकाबला नहीं किया जा सकता है और वह भी तब जबकि पड़ोसी देशों से आपके संबंध अच्छे नहीं हों. ऐसे में देश की तरफ से किया गया यह परीक्षण भारतीय रक्षा शक्ति को कई गुना मजबूत करता है. 

इस सफल परीक्षण के लिए सभी वैज्ञानिकों और शुभेच्छुजनों को शुभकामनायें, बधाई.

++++++++++












बुधवार, 27 मार्च 2019

विश्व रंगमंच दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
विश्व रंगमंच दिवस
विश्व रंगमंच दिवस की स्थापना 1961 में इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट (International Theatre Institute) द्वारा की गई थी। रंगमंच से संबंधित अनेक संस्थाओं और समूहों द्वारा भी इस दिन को विशेष दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है। इस दिवस का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश है, जो विश्व के किसी जाने माने रंगकर्मी द्वारा रंगमंच तथा शांति की संस्कृति विषय पर उसके विचारों को व्यक्त करता है। 1962 में पहला अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश फ्रांस की जीन काक्टे ने दिया था। वर्ष 2002 में यह संदेश भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड द्वारा दिया गया था।

जीवन के रंगमंच पर रंगमंच की मूल विधाओं का सीधा नाता है ,वे आईने की रूप में समाज की अभिवायाकतियो को व्यक्त करती है, सभ्यता के विकास से रंगमंच की मूल विधाओ में परिवर्तन स्वभाविक है। किन्तु लोकरंग व लोकजीवन की वास्तविकता से दूर इन दिनों आधुनिक माध्यमों यथा टेलीविज़न, सिनेमा और वेबमंच ने सांस्कृतिक गिरावट व व्यसायिकता को मूल मंत्र बना लिया है जिससे मूल विधाएँ और उनके प्रस्तुतिकारों को वह प्रतिसाद नहीं मिल पाया है जिसके वो हक़दार हैं। मानवता की सेवा में रंगमंच की असीम क्षमता समाज का सच्चा प्रतिबिम्बन है। रंगमंच शान्ति और सामंजस्य की स्थापना में एक ताकतवर औज़ार है। लोगों की आत्म-छवि की पुर्नरचना अनुभव प्रस्तुत करता है, सामूहिक विचारों की प्रसरण में, समाज की शान्ति और सामंजस्य का माध्यम है, यह स्वतः स्फूर्त मानवीय, कम खर्चीला और अधिक सशक्त विकल्प है व समाज का वह आईना है जिसमें सच कहने का साहस है। वह मनोरंजन के साथ शिक्षा भी देता है। भारत में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटकों व मंडली से देश प्रेम तथा नवजागरण की चेतना ने तत्कालीन समाज में उद्भूत की, जो आज भी अविरल है। 'अन्धेर नगरी' जैसा नाटक कई बार मंचित होने के बाद भी उतना ही उत्साह देता है। कालिदास रचित अभिज्ञान शाकुंतलम्, मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन, मोलियर का माइजर, धर्मवीर भारती का 'अंधायुग', विजय तेंदुलकर का 'घासीराम कोतवाल' श्रेष्ठ नाटकों की श्रेणी में हैं। भारत में नाटकों की शुरूआत नील दर्पण, चाकर दर्पण, गायकवाड और गजानंद एण्ड द प्रिंस नाटकों के साथ इस विधा ने रंग पकड़ा।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 











आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।। 

मंगलवार, 26 मार्च 2019

विद्यार्थी जी को याद करते हुए ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार,
मार्च 1931 में कानपुर में भयंकर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए जिसमें हजारों लोग मारे गए. गणेश शंकर विद्यार्थी ने आतंकियों के बीच जाकर हजारों लोगों को बचाया. इसी प्रयास में वे खुद एक हिंसक भीड़ में फंस गए, जिसने उनकी बेरहमी से हत्या कर दी. इसे महज इत्तेफाक कहा जाये या फिर कोई साजिश कि उनकी हत्या सरदार भगत सिंह को फाँसी दिए जाने के ठीक दूसरे दिन हुई. जी हाँ, भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों से घबराकर अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें निर्धारित तिथि से एक दिन पहले, 23 मार्च को फांसी दे दी इसी के ठीक दूसरे दिन, 25 मार्च को विद्यार्थी जी की हत्या हो जाती है. विद्यार्थी जी भी अपने विचारों और निडर स्वभाव के कारण अंग्रेजों की आँख में खटक रहे थे. विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़े या फिर अंग्रेजी शासन की साजिश का शिकार हो गए, ये अंधकार में है. जो सत्य है वह यह कि उनका शव अस्पताल की लाशों के मध्य पड़ा मिला था. वह इतना फूल गया था कि उसे पहचानना तक मुश्किल था. उनकी पहचान होने के बाद 29 मार्च को उनका अंतिम संस्कार किया गया. 


विद्यार्थी जी ने सन 1917-18 में होम रूल आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाई और कानपुर में कपड़ा मिल मजदूरों की पहली हड़ताल का नेतृत्व किया था. सन 1920 में उन्होंने प्रताप का दैनिक संस्करण आरम्भ किया और उसी साल उन्हें रायबरेली के किसानों के हितों की लड़ाई करने के लिए दो साल कठोर कारावास की सजा हुई. सन 1922 में विद्यार्थी जी जेल से रिहा हुए पर सरकार ने उन्हें भड़काऊ भाषण देने के आरोप में फिर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इसके बाद उन्हें सन 1924 में रिहा किया गया.

26 अक्टूबर 1890 को अपने ननिहाल प्रयाग में जन्मे विद्यार्थी जी अपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण एण्ट्रेंस तक ही पढ़ सके किन्तु उनका स्वतंत्र अध्ययन अनवरत चलता ही रहा. आरम्भ में उन्होंने एक नौकरी भी की मगर अपने अंग्रेज़ अधिकारियों से न पटने के कारण उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी. इसके बाद कानपुर में भी उन्होंने नौकरी की. इसी तरह की स्थिति के बाद नौकरी छोड़कर वह अध्यापक हो गए. प्रसिद्द साहित्यकार महावीर प्रसाद द्विवेदी इनकी योग्यता देखकर प्रभावित हुए और उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास सरस्वती में बुला लिया. यहाँ से एक ही वर्ष के बाद अभ्युदय नामक पत्र में चले गये और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे. इन्होंने कुछ दिनों तक प्रभा का भी सम्पादन किया था. बाद में सन 1913 में उन्होंने प्रताप (साप्ताहिक) का सम्पादन किया.

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं पर विद्यार्थी जी के विचार बड़े ही निर्भीक होते थे. वे कानपुर के लोकप्रिय नेता, पत्रकार, शैलीकार एवं निबन्ध लेखक रहे. पत्रकारिता के साथ-साथ विद्यार्थी जी की साहित्यिक अभिरुचियाँ भी निखरती रही. उनकी रचनायें सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य, हितवार्ता आदि में छपती रहीं. हिन्दी में शेखचिल्ली की कहानियाँ आपकी ही देन हैं. विद्यार्थी जी ने अंततोगत्वा कानपुर लौटकर प्रताप अखबार की शुरूआत की जो आज़ादी की लड़ाई का मुख-पत्र साबित हुआ. उन्होंने सरदार भगत सिंह को प्रताप से जोड़ा था. रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा प्रताप में उन्होंने ही प्रकाशित की.  

गणेश शंकर विद्यार्थी जी को उनकी पुण्यतिथि पर बुलेटिन परिवार की ओर से सादर श्रद्धांजलि.

++++++++++











सोमवार, 25 मार्च 2019

फ़ारुख़ शेख़ और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
फ़ारुख़ शेख़
फ़ारुख़ शेख़ (अंग्रेज़ी: Farooq Sheikh, जन्म: 25 मार्च, 1948; मृत्यु: 27 दिसम्बर, 2013) एक भारतीय अभिनेता, समाज-सेवी और एक टेलीविजन प्रस्तोता थे। उन्हें 70 और 80 के दशक की फ़िल्मों में अभिनय के कारण प्रसिद्धि मिली। वो सामान्यतः एक कला सिनेमा में अपने कार्य के लिए प्रसिद्ध थे जिसे समानांतर सिनेमा भी कहा जाता है। उन्होंने सत्यजित राय और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे भारतीय सिनेमा के महान् फ़िल्म निर्देशकों के निर्देशन में भी काम किया।

फ़ारुख़ एक बेहतरीन कलाकार तो थे ही लेकिन उससे कहीं आगे वह एक बेहतरीन इंसान थे। फ़ारुख़ शेख़ संपन्न परिवार से ज़रूर थे मगर पिता के निधन के बाद उन्होंने छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाया। उन्होंने रेडियो और टीवी पर कार्यक्रम किए, लेकिन सिर्फ पैसों की खातिर फ़िल्मों में काम करना उन्हें मंजूर न था। इसीलिए जिस जमाने में अभिनेता एक साथ दर्जनों फ़िल्में साइन करते थे, फ़ारुख़ शेख़ एक बार में दो से ज्यादा फ़िल्मों में काम नहीं करते थे। 1978 में ‘नूरी’ की कामयाबी के बाद कुछ ही महीनों में उनके पास क़रीब 40 फ़िल्मों के प्रस्ताव आए। लेकिन उन्होंने सारे के सारे ठुकरा दिए क्योंकि वे सब ‘नूरी’ की ही तरह थे। फ़ारुख़ शेख़ का नाम कभी किसी विवाद में नहीं आया। न ही किसी सह-अभिनेत्री या हिरोइन से उनका नाम जुड़ा। वे पूरी तरह से पारिवारिक इंसान थे। उनकी दो बेटियां हैं। उन्होंने ईश्वर में सदा विश्वास किया। वे कहते थे कि एक शक्ति है जो ऊपर से हमें संचालित कर रही है। धर्म और जाति के नाम पर बंटवारे या भेदभाव उन्हें कभी गवारा न थे। उन्होंने सदा कहा कि गुजर जाने के बाद दुनिया में याद किए जाने की ख्वाहिश उनमें नहीं है। वह कहते थे कि यह ज़िंदगी एक उत्सव है और अपने रियलिटी शो ‘जीना इसी का नाम है’ में मैं ज़िंदगी का ही जश्न मना रहा हूँ।

बॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता फ़ारुख़ शेख़ का शुक्रवार 27 दिसम्बर, 2013 की रात दुबई में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। मीडिया को यह जानकारी उनकी मित्र एवं अभिनेत्री दीप्ति नवल ने दी। दुबई में ज़रूरी औपचारिकता पूरी करने के बाद उनका शव अंतिम संस्कार के लिए मुंबई लाया गया। मुंबई में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। फ़ारुख़ शेख़ 65 वर्ष के थे और उनकी तबीयत इससे पहले अच्छी थी और उन्होंने दो महीने पहले शारजाह पुस्तक मेले में शिरकत की थी। फ़िल्म 'गरम हवा' से कैरियर की शुरुआत की थी और उसके बाद कला और मुख्यधारा की फ़िल्म में अपनी पहचान बनाई थी। उन्होंने चश्मेबद्दूर, उमराव जान, नूरी, किसी ने कहा, साथ-साथ, ये जवानी है दीवानी आदि समेत तमाम फ़िल्में कीं। फ़ारुख़ शेख़ ने सत्यजीत रे के साथ भी लंबे समय तक काम किया। उनकी आख़िरी फ़िल्म 'क्लब 60' थी। फ़ारुख़ शेख़ को कला फ़िल्मों, रंगमंच और टेलीविजन में उनके योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने टेलीविजन पर प्रसिद्ध शो 'जीना इसी का नाम है' की मेजबानी भी की थी।

आज फ़ारुख़ शेख़ जी की 71वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।   

रविवार, 24 मार्च 2019

नेगेटिव और पॉज़िटिव राजनीति - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

 चुनावी माहौल है ऐसे में आज का ज्ञान राजनीति पर ही आधारित है...

राजनीति की सब से पॉज़िटिव बात :- राजनीति मे आपका कोई भी दुश्मन नहीं होता !
राजनीति की सब से नेगेटिव बात :- राजनीति मे आपका कोई भी दोस्त नहीं होता !

सादर आपका

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

हर कोई किसी गिरोह में है फिर कैसे कहें आजादी के बाद सोच भी आज आजाद हो गयी है

नहीं का नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मैं शराब हूँ

दो नयन अपनी भाषा में जो कह गए....

610. परम्परा

प्रेम के कल्पवृक्ष

जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है

मंजिलें उनको मिलीं जो दौड़ में शामिल न थे

धूप

मुझे तुम्हारी बाहों में रहना था

आसान नहीं मर जाना

 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिए ...

जय हिन्द !!!

शनिवार, 23 मार्च 2019

वास्तविक राष्ट्र नायकों का बलिदान दिवस - २३ मार्च

प्रिय  ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

ये हमारे देश का दुर्भाग्य है कि कुछ स्वार्थी, बेग़ैरत, सत्ता लोलुप तथाकथित "देशभक्तों और राष्ट्र नायकों" द्वारा, केवल अपने राजनीतिक विचारों और मतभेदों के कारण, "हिंसावादी और आतंकी" घोषित किए गए अमर क्रांतिकारियों को उनकी शहादत के ८८ वर्षों बाद भी न्याय नहीं मिला है।

जबकि इस के उलट उन्हीं तथाकथित "देशभक्तों और राष्ट्र नायकों" के अजन्में वंशज भी "सर्टिफाईड देशभक्त" कहलाते हैं।

एक के बाद एक सरकारें आती रही पर किसी ने भी इतिहास में हुई इस भूल को सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया। मौजूदा सरकार भी इस मामले में अब तक उदासीन ही दिखी।

पर अब समय आ गया है कि हम अपने वास्तविक राष्ट्र नायकों को पहचाने और उन्हें सम्मानित करें।

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से ८८ वें बलिदान दिवस पर अमर शहीद सरदार भगत सिंह जी , सुखदेव जी और राजगुरु जी को शत शत नमन !

वंदे मातरम।

इंक़लाब ज़िंदाबाद।

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

शहिदे आजम ! सरदार भगत सिंह जी

चुनाव

बचपन का डर

रेल्वे राजू 

मोदी ने वास्तव में बर्बाद कर दिया

उनकी आँखों से यात्रा का सुख

दुलरुआ फाग (गीत)

शहीदी दिवस 23 मार्च पर कविता।

उपनिषद का श्रवण

नीले पीले जमीन पर

८८ वें बलिदान दिवस पर शत शत नमन

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!! 

शुक्रवार, 22 मार्च 2019

विश्व जल दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
विश्व जल दिवस प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को मनाया जाता है। आज विश्व में जल का संकट कोने-कोने में व्याप्त है। लगभग हर क्षेत्र में विकास हो रहा है। दुनिया औद्योगीकरण की राह पर चल रही है, किंतु स्वच्छ और रोग रहित जल मिल पाना कठिन हो रहा है। विश्व भर में साफ़ जल की अनुपलब्धता के चलते ही जल जनित रोग महामारी का रूप ले रहे हैं। कहीं-कहीं तो यह भी सुनने में आता है कि अगला विश्व युद्ध जल को लेकर होगा। इंसान जल की महत्ता को लगातार भूलता गया और उसे बर्बाद करता रहा, जिसके फलस्वरूप आज जल संकट सबके सामने है। विश्व के हर नागरिक को पानी की महत्ता से अवगत कराने के लिए ही संयुक्त राष्ट्र ने "विश्व जल दिवस" मनाने की शुरुआत की थी।

विश्व जल दिवस का प्रारम्भ

'विश्व जल दिवस' मनाने की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1992 के अपने अधिवेशन में 22 मार्च को की थी। 'विश्व जल दिवस' की अंतरराष्ट्रीय पहल 'रियो डि जेनेरियो' में 1992 में आयोजित 'पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' (यूएनसीईडी) में की गई थी, जिस पर सर्वप्रथम 1993 को पहली बार 22 मार्च के दिन पूरे विश्व में 'जल दिवस' के मौके पर जल के संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता फैलाने का कार्य किया गया।

संकल्प का दिन

'22 मार्च' यानी कि 'विश्व जल दिवस', पानी बचाने के संकल्प का दिन है। यह दिन जल के महत्व को जानने का और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन है। आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। प्रकृति इंसान को जीवनदायी संपदा जल एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, इंसान भी इस चक्र का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना प्रत्येक व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है। इस चक्र के थमने का अर्थ है, जीवन का थम जाना। प्रकृति के ख़ज़ाने से जितना पानी हम लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते। अतः प्राकृतिक संसाधनों को दूषित नहीं होने देना चाहिए और पानी को व्यर्थ होने से भी बचाना चाहिए। 22 मार्च का दिन यह प्रण लेने का दिन है कि हर व्यक्ति को पानी बचाना है।



~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के शुभसंध्या। सादर ... अभिनन्दन।।

गुरुवार, 21 मार्च 2019

बुरा मानना हो तो खूब मानो, होली है तो है... ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आखिरकार होली हो ली. दिन भर धमाचौकड़ी चलती रही, कभी बच्चों की, कभी बड़ों की. इसी धमाचौकड़ी में मित्र-मंडली संग शहर की सुनसान पड़ी सड़कों पर टहलना हुआ. अलग-अलग रंग के, अलग-अलग जीव दिखाई दिए. कुछ रंग में मस्त, कुछ भंग में मस्त. कुछ तेज रफ़्तार बाइक में मगन, कुछ दारू के नशे में टुन्न. एक मित्र मिले, अनजाने से. अनजाने से इसलिए क्योंकि पूरी तरह अपने रंग में थे. न कदमों का होश था, न हमें पहचान पाने का. पता नहीं किस झोंक में चले आये सड़क के इस पार. आकर गले लगे और बोले बुरा न मानो होली है. हमने कहा इसमें बुरा क्या मानना मित्र, आखिर होली है ही ऐसा त्यौहार. उनके चेहरे पर एकदम चमक आ गई, बोले वाह दोस्त, क्या बात कही. फिर एकदम से उनके अन्दर के तरल पदार्थ ने शायद किक मारी. चेहरे को जरा सा सख्त करके बोले, बुरा मानना हो तो खूब मानो. होली है तो है.


हम समझ गए कि उनके और उनके तरल पदार्थ के बीच रस्साकशी चल रही है. अन्दर का तरल पदार्थ उन्हें नाली में पटकने को आतुर दिख रहा था और हमारे मित्र थे कि बिना गिरे-पड़े घर पहुँचने की आतुरता में थे. उनको एक पान की दुकान के किनारे पड़ी बेंच पर बिठाया और सलाह दी कि उतनी ही लिया करो अपने प्याले में, जो न पटके किसी नाले में.

वे हमारा मंतव्य समझ गए तो हो-हो-हो करके हँस दिए. इतनी देर में उनके दिमागी कंप्यूटर ने अपने सॉफ्टवेयर को अपडेट किया और वे हमें पहचान गए. भटकती जीभ के सहारे हमारे हाथ को थाम बड़े भावुक हो गए और बोले, कहाँ रोज-रोज प्याले में भरते हैं, कहाँ रोज-रोज नाले में गिरते हैं. हमने भी उसी भावुकता में वाह-वाह कह दिया.

उस वाह-वाह ने उनके अन्दर के कवित्व को जगा दिया और चंद पंक्तियाँ पटक दी सामने. उसके बाद लगा कि उसे अकेले छोड़ना सही नहीं, सो मित्र-मंडली ने उसे अपने में समेटा और बजाय मयखाने के घर ले जाकर छोड़ा.

उसकी पटकी-पटकाई वही पंक्तियाँ आपके सामने ज्यों की त्यों, बिना लड़खड़ाए. होली की शुभकामनाओं के साथ आनंद लीजिये, आज की बुलेटिन का. 



लोगों ने बड़ा ही गलत काम किया है,
नाहक ही पीने-पिलाने को बदनाम किया है.
कहाँ बह गए लोगों के दरो-दीवार जश्न में,
बैठकर मयखाने में जाम को ही पिया है.

पीने का मजा क्या जानें दूर रहने वाले,
पूछो उसे जो हैं नशे में चूर रहने वाले.
अपने में खोये रहते हैं दीवानों की तरह,
शहंशाह खुद को जहाँ का बना लिया है.

जाम पर जाम टूट कर बिखर गए कितने,
महकती शाम के दीवाने हो गए कितने.
मदहोशी के आलम में अब होश नहीं अपना,
जाना है घर पता मयखाने का दिया है.

++++++++++













बुधवार, 20 मार्च 2019

बुरा ना मानो होली है !

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |


मैं टल्ली हूं, आशा है आप भी टल्ली होंगे !!

मैने ये बुलेटिन आपको दीवाली की शुभकामनायें देने के लिये लिखा है...आज इस आज़ादी के अवसर पर हमे ये रक्षाबंधन का त्योहार अच्छे से मनाना चाहिये और घरों मे दीपक जला कर रंग गुलाल खेलना चाहिये क्योंकि आज ही के दिन गांधी जी ने रावण का वध करके महाभारत का युद्ध विजय किया था और अमेरीका को आज़ाद कराया था...इसलिये एक बार फिर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें....ईश्वर आपको भाँग मे भीगे इस संदेश को झेलने की शक्ति दे..."MERRY X'MAS" ...

बुरा ना मानो होली है !

ब्लॉग बुलेटिन टीम और मेरी ओर से आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं | 
सादर आपका
 शिवम् मिश्रा

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

538.होली का त्यौहार

फाग सुनाये होली

हमारी पहचान हैं त्योहार

गुलाल- ए- अमन

ठहरो , फिर मैं भी मना लूं होली

होली का हुड़दंग !

हैप्पी होली --

फागुन आया है

"होली"

सात सालों के बाद इस शुभ संयोग में मनेगी होली, होलिका दहन का यह है शुभ समय

होली खेलि रहे नन्दलाल

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!!

सोमवार, 18 मार्च 2019

श्रद्धांजलि - मनोहर पर्रिकर और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।

सच्चे और सादगी पसंद व्यक्तित्व, आईआईटीएन, ईमानदार आदर्श नेता, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री, देश के पूर्व रक्षामंत्री श्री मनोहर पर्रिकर जी को समस्त भारतवासी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

रविवार, 17 मार्च 2019

होली का टोटका - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

इस होली पर 2588 साल बाद ऐसा योग बनने जा रहा है। अचूक टोटका जो आप सभी का जीवन बदल देगा। आजमा कर देखे।

करोबार में मंदी हो, काम पर जाने का मन ना करता हो,कही बाहर जाने का मन ना करता हो,बच्चे पढ़ ना रहे हो, उनके कम नंबर आ रहे हो ,सिर दर्द होता हो,खाना खाने में मन ना लगता हो,रात को बार बार नींद खुलती हो, बदन दर्द होता हो, आँखें दर्द करती हो, आलस आता हो,

इन सब बीमारियों का रामबाण इलाज।

होली की शाम को जब होली दहन हो, अपने सिर पर से सात बार मोबाइल घूमा कर आग में फेंक दें और पीछे मुड़ कर न देखें...

एक दो दिन परेशानी होगी, जी मिचलएगा, गुससा आयेगा, फिर सब बीमारियों में आराम आ जायेगा |

सादर आपका

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

झटपट, चटपटी केक

किनारे को भी हमसे किनारा चाहिए - चिन्मय शर्मा

जो हम कभी हो नहीं सकते

झण्डे को तो एक सा रहने दो .....

गुरुजी की होली

वह दिन जरूर आएगा

याद किया करना तर्पन में

तानसेन

अभी सिर्फ 'बनारस' उजड़ा है

पर मानी न मैंने भी हार

१७ मार्च - भारत के दो नायाब नगीनों की जयंती का दिन

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!! 

लेखागार