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गुरुवार, 21 मार्च 2019

बुरा मानना हो तो खूब मानो, होली है तो है... ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आखिरकार होली हो ली. दिन भर धमाचौकड़ी चलती रही, कभी बच्चों की, कभी बड़ों की. इसी धमाचौकड़ी में मित्र-मंडली संग शहर की सुनसान पड़ी सड़कों पर टहलना हुआ. अलग-अलग रंग के, अलग-अलग जीव दिखाई दिए. कुछ रंग में मस्त, कुछ भंग में मस्त. कुछ तेज रफ़्तार बाइक में मगन, कुछ दारू के नशे में टुन्न. एक मित्र मिले, अनजाने से. अनजाने से इसलिए क्योंकि पूरी तरह अपने रंग में थे. न कदमों का होश था, न हमें पहचान पाने का. पता नहीं किस झोंक में चले आये सड़क के इस पार. आकर गले लगे और बोले बुरा न मानो होली है. हमने कहा इसमें बुरा क्या मानना मित्र, आखिर होली है ही ऐसा त्यौहार. उनके चेहरे पर एकदम चमक आ गई, बोले वाह दोस्त, क्या बात कही. फिर एकदम से उनके अन्दर के तरल पदार्थ ने शायद किक मारी. चेहरे को जरा सा सख्त करके बोले, बुरा मानना हो तो खूब मानो. होली है तो है.


हम समझ गए कि उनके और उनके तरल पदार्थ के बीच रस्साकशी चल रही है. अन्दर का तरल पदार्थ उन्हें नाली में पटकने को आतुर दिख रहा था और हमारे मित्र थे कि बिना गिरे-पड़े घर पहुँचने की आतुरता में थे. उनको एक पान की दुकान के किनारे पड़ी बेंच पर बिठाया और सलाह दी कि उतनी ही लिया करो अपने प्याले में, जो न पटके किसी नाले में.

वे हमारा मंतव्य समझ गए तो हो-हो-हो करके हँस दिए. इतनी देर में उनके दिमागी कंप्यूटर ने अपने सॉफ्टवेयर को अपडेट किया और वे हमें पहचान गए. भटकती जीभ के सहारे हमारे हाथ को थाम बड़े भावुक हो गए और बोले, कहाँ रोज-रोज प्याले में भरते हैं, कहाँ रोज-रोज नाले में गिरते हैं. हमने भी उसी भावुकता में वाह-वाह कह दिया.

उस वाह-वाह ने उनके अन्दर के कवित्व को जगा दिया और चंद पंक्तियाँ पटक दी सामने. उसके बाद लगा कि उसे अकेले छोड़ना सही नहीं, सो मित्र-मंडली ने उसे अपने में समेटा और बजाय मयखाने के घर ले जाकर छोड़ा.

उसकी पटकी-पटकाई वही पंक्तियाँ आपके सामने ज्यों की त्यों, बिना लड़खड़ाए. होली की शुभकामनाओं के साथ आनंद लीजिये, आज की बुलेटिन का. 



लोगों ने बड़ा ही गलत काम किया है,
नाहक ही पीने-पिलाने को बदनाम किया है.
कहाँ बह गए लोगों के दरो-दीवार जश्न में,
बैठकर मयखाने में जाम को ही पिया है.

पीने का मजा क्या जानें दूर रहने वाले,
पूछो उसे जो हैं नशे में चूर रहने वाले.
अपने में खोये रहते हैं दीवानों की तरह,
शहंशाह खुद को जहाँ का बना लिया है.

जाम पर जाम टूट कर बिखर गए कितने,
महकती शाम के दीवाने हो गए कितने.
मदहोशी के आलम में अब होश नहीं अपना,
जाना है घर पता मयखाने का दिया है.

++++++++++













5 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बुरा कहाँ और
कौन मानने जा रहा है
अब तो लग रहा है
आदमी पूरे साल ही
होली मना रहा है :)

बढ़िया बुलेटिन प्रस्तुति आभार राजा साहब 'उलूक' की होली पर नजरे इनायत के लिये। शुभकामनाएं होली की सभी चिट्ठाकारों पाठकों और होलियारों के लिये।

Digamber Naswa ने कहा…

पीने वालन को लोग बेवजह बदनाम करते हैं ... सही कहा है ...
अच्छी रचनाएं हैं ... आभार मेरी ग़ज़ल को जगह देने के लिए ...

शिवम् मिश्रा ने कहा…

राजा साहब आपको और बाक़ी सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं |

Anuradha chauhan ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति शानदार रचनाएं

Sanjay Grover ने कहा…

शामिल करने के लिए शुक्रिया. मस्ती मनाएं :)

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