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गुरुवार, 28 जून 2018

टोपी, कबीर, मगहर और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
गुजरात के टोपी विवाद के बाद उत्तर प्रदेश में भी टोपी को विवाद बनाया जा रहा है. कबीरदास की पाँच सौवीं पुण्यतिथि के अवसर पर प्रधानमंत्री के मगहर भ्रमण को लेकर होने वाली तैयारियों एवं अन्य स्थितियों का जायजा लेने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वहाँ पहुँचे. मगहर में बनी कबीरदास की मजार में पहुँचने पर योगी जी को टोपी पहनाने की कोशिश की गई. योगी जी ने टोपी पहनने से इंकार कर दिया. इसके बाद भी उस टोपी को उनको पकड़ाने का प्रयास किया जाता रहा. मीडिया को जैसे इसी मौके की तलाश थी. अब उसके लिए देश भर से, उत्तर प्रदेश से सारे मुद्दे समाप्त हो गए हैं. सभी जगह एकमात्र मुद्दा योगी जी का टोपी न पहनना बना हुआ है.


मगहर में जिन कबीरदास जी के अंतिम संस्कार को लेकर हिन्दू-मुस्लिम विवाद हुआ था और कहते हैं कि इस विवाद के बाद कबीरदास जी के पार्थिव शव के स्थान पर फूल ही मिले, जिन्हें हिन्दू-मुस्लिम ने आपस में बाँट कर अपने-अपने धार्मिक तरीके से उनका अंतिम संस्कार किया. मगहर में आज भी दोनों धर्मों के प्रतीक एक स्थल पर बने हुए हैं. 27 एकड़ में फैले इस समाधि स्थल में कबीरदास की आदमकद प्रतिमा ने बरबस ध्यान आकर्षित करती है. एक तरफ मजार कबीर साहब की इबारत लिखी इमारत थी, जो अपने आपमें स्पष्ट संकेत दे रही थी इस्लामिक मजहबी होने का. इस इमारत के भीतर दो मजारें, एक कबीरदास की तथा दूसरी उनके बेटे की बताई जाती है. इसी इमारत के दूसरी तरफ एक छोटी सी दीवार पार करने पर बनी इमारत के प्रवेशद्वार पर सदगुरु कबीर समाधि का लिखा होना और भीतर कबीर की मूर्ति का होना उसके स्वतः ही हिन्दू धर्मावलम्बियों के होने के संकेत देती है. इस विस्तृत समाधि प्रांगण के एक तरफ पुस्तकालय, दूसरी तरफ कबीर साहित्य विक्रय हेतु उपलब्ध है.


लेखक ने स्वयं मगहर में इस स्थान का भ्रमण किया है. एक प्रांगण में दो धर्मों, मजहबों की इमारतों को अलग-अलग रूपों में देखने के बाद जहाँ एक तरफ ख़ुशी का एहसास हुआ वहीं मन में एक खटका सा भी लगा कि क्या मुसलमानों ने कबीर को वर्तमान में अपने मजहब का नहीं माना है? क्या मुसलमानों में कबीर-साहित्य के प्रति अनुराग नहीं है? हिन्दू धर्म के साथ-साथ इस्लाम की आलोचना करने वाले कबीर को क्या वर्तमान मुसलमानों ने विस्मृत कर दिया है? दोनों इमारतों की स्थिति, वहाँ आने वाले लोगों की स्थिति, दोनों तरफ की व्यवस्थाओं को देखकर, दोनों इमारतों में सेवाभाव से कार्य करने वालों को देखकर लगा कि आज के समय में कबीर भी धार्मिक विभेद का शिकार हो गए हैं. वो और बात रही होगी जबकि उनके अंतिम संस्कार के लिए आपस में हिन्दू-मुस्लिम में विवाद पैदा हुआ होगा किन्तु मगहर में स्थिति कुछ और ही दिखाई पड़ी. इस्लामिक इमारत के नीचे मजार के रूप में कबीर नितांत अकेलेपन से जूझते दिखाई दिए. जहाँ बस एक इमारत, एक सेवादार, नाममात्र को रौशनी और चंद हरे-भरे पेड़-पौधे उनके आसपास हैं. किसी समय में तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों पर बेख़ौफ़ होकर बोलने वाले कबीर आज इस विभेद पर गहन ख़ामोशी ओढ़े लेटे दिखे. उस स्थल को और बेहतर बनाने, कबीरदास की स्वीकार्यता मुस्लिमों में भी बनाने, कबीरदास के साहित्य का प्रचार-प्रसार मुस्लिमों के बीच करने के बजाय वहाँ के सेवादार आने वाले को टोपी पहनाने को आतुर दिखे.

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मंगलवार, 6 मार्च 2018

जाकी रही भावना जैसी.... : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियों,
इन दिनों मलयालम पत्रिका गृहलक्ष्मी के कवर पर बच्चे को स्तनपान कराती मॉडल गीलू जोसेफ और पत्रिका चर्चा में है. इसके खिलाफ वहां के एक वकील विनाद मैथ्यू ने महिलाओं के अश्लील चित्रण (रोकथाम) अधिनियम 1986 का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए कोल्लम सीजेएम कोर्ट में सेक्शन 3 और 4 के तहत केस दर्ज कराया है. गृहलक्ष्मी के संपादक ने सफाई देते हुए कहा है कि पत्रिका माताओं की सार्वजनिक जगहों पर स्तनपान कराने की जरूरत के प्रति लोगों को जागरूक करना चाहती है. कवर पेज पर इस तस्वीर के साथ लिखा गया है कि माँयें केरल से कह रही हैं, घूरो मत, हम स्तनपान कराना चाहती हैं. वास्तविकता क्या है ये तो वह मॉडल जाने और उस पत्रिका का सम्पादक पर स्तनपान कराते हुए फोटो ने सोशल मीडिया में सनसनी फैला रखी है. अब सोशल मीडिया में बहस छिड़ी हुई है. कुछ लोग इस फोटो को सही बता रहे थे तो कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति जताते हुए विरोध दर्ज कराया है.


किसी भी स्थिति के एक सिक्के की तरह दो पहलू हो सकते हैं, दो से ज्यादा भी. ऐसे में समझने वाली आवश्यकता इसकी है कि किसी भी स्थिति से वास्तविक निष्कर्ष क्या निकल रहा है. इस सन्दर्भ में एक कहानी याद आती है. आज वही आपके सामने.
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एक बार एक कवि हलवाई की दुकान पहुंचे. अपने खाने भर का सामान लिया और वहीं खाने बैठ गये. इतने में कवि महोदय ने देखा कि एक कौआ बार-बार दही के बर्तन में चोंच मारने की कोशिश कर रहा है. कौए की इस हरकत पर हलवाई को बहुत गुस्सा आया. बार-बार कौए को भगाते रहने के बाद भी जब कौआ न माना तो हलवाई ने एक पत्थर उठा कर कौए को दे मारा. पत्थर सीधा कौए को लगा और वो मर गया.
इस घटना को देख कवि का हृदय संवेदित हो उठा. अपना भोजन निपटाने के बाद जब वो पानी पीने पहुंचे तो कोयले के टुकड़े से वहाँ बनी दीवार पर एक पंक्ति लिख दी -
काग दही पर जान गँवायो

कुछ देर में वहाँ से एक लेखपाल का निकलना हुआ. वह कागजों में हेराफेरी के आरोप में निलम्बित चल रहा था. दुकान पर रुककर पानी पीने के दौरान उस लेखपाल की निगाह कवि की लिखी पंक्ति पर पड़ी तो उसे वह पंक्ति अपने से जुड़ी नजर आई और उस पंक्ति को लेखपाल ने अपने हिसाब से कुछ ऐसे बना दिया -
कागद ही पर जान गँवायो

उसके जाने के बाद एक आशिक मिजाज लड़का निराश सा वहाँ पानी पीने रुका. उस पंक्ति को पढ़कर लड़के को उसमें अपनी स्थिति की अनुभूति हुई. इसी अनुभूति में उसने उस पंक्ति में संशोधन कर कुछ ऐसे बना दिया -
का गदही पर जान गँवायो

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सीधी सी बात है, एक पंक्ति, एक ही जैसे शब्द किन्तु सबने अपने-अपने हिसाब से, अपनी-अपनी प्रकृति के हिसाब से उस पंक्ति को पढ़ा और अर्थ निकाला. आजकल ऐसा ही कुछ हो रहा है. आज किसी भी बात को अपने हिसाब से, अपनी दृष्टि से देखकर उसको सही, गलत बनाया जा रहा है. खैर, जब तक समाज है, तब तक ये सब भी चलता रहेगा. आइये, हम सब अपनी-अपनी दृष्टि से आज की बुलेटिन का आनंद लें.

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शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

ट्वीट से उठा लाउडस्पीकर-अज़ान विवाद : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
लोग एक बार फिर मुद्दे से भटक कर उसे धर्म, मजहब की चौखट पर खींच लाये. यदि आपने गौर किया होगा तो आप एकदम सही जगह पहुँच रहे हैं. जी हाँ. गायक सोनू निगम के चार ट्वीट और फिर उसके बाद उठा विवाद. उस विवाद के बाद का विवाद तो और भी हास्यास्पद रहा जबकि फतवे के नाम पर दोनों तरफ से अपने-अपने कदम देखने को मिले. एक ने सिर घोंट देने के दस लाख लगाये और अगले ने अपना सिर मुडवा लिया. बहरहाल, मुद्दा ये नहीं कि किसका फतवा? किसके लिए फतवा? सोनू निगम ने ट्वीट के द्वारा अपनी परेशानी बताई या फिर अपनी लोकप्रियता की राह को और साफ़ किया ये वही जानें किन्तु उससे एक मुद्दा निकला कि धार्मिक कृत्यों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल हो या न हो. जो लोग भी अपने-अपने स्तर में इस चर्चा में सहभागी बने वे इससे भटक कर हिन्दू, मुस्लिम में विभक्त हो गए.

देखा जाये तो विगत कुछ वर्षों से समाज दो भागों में बंट गया है. एक हिन्दू और दूसरा गैर-हिन्दू. यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ. सोनू निगम के चार ट्वीट में यदि पहले ट्वीट में अजान शब्द आया है तो तीसरे शब्द में मंदिर, गुरुद्वारा शब्दों का भी प्रयोग किया गया है. इसके बाद भी बवाल पैदा करने में अज़ान-प्रेमी ही सामने आये हैं. इसमें मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों तरफ के लोग हैं. वैसे सोचने की बात बस इतनी है कि आखिर मुस्लिम समुदाय को इस पर आपत्ति क्या है कि उनकी मजहबी क्रिया में लाउडस्पीकर का उपयोग न होने का ट्वीट आ गया? कहीं उनको ये तो नहीं लग रहा कि ट्वीट के बहाने सरकार उनकी मजहबी क्रिया में उपयोग होने वाले लाउडस्पीकर को प्रतिबंधित तो करने जा रही है?

बहरहाल अंतिम निष्कर्ष क्या होगा ये तो बाद की बात है मगर एक सामान्य से ट्वीट पर आक्रोशित हो जाना, फतवा जारी करना, सोनू निगम पर मुकदमा दर्ज करने की अपील, धार्मिक भावनाओं को भड़काने का आरोप लगाने जैसे कदम मुस्लिम समुदाय की आक्रामकता को ही दर्शाता है. यही आक्रामकता उनको समुदाय में सबसे कहीं अलग-थलग खड़ा कर देती है. अपने आपको मुख्यधारा से अलग न होने देने की दिशा में वे खुद ही कुछ सोचें और विचार करें. उन्हें समझना होगा कि समाज-निर्माण में फैसले लेने का आधार न तो ट्वीट होता है और न ही लाउडस्पीकर. आपसी समझ, विश्वास, स्नेह ही सबको आगे बढ़ाता है, सबकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता है.

चलिए, जो हो रहा है उसका आनंद लीजिये, जो होगा उसका आनंद लीजियेगा. हल फ़िलहाल अभी तो सोनू निगम के चारों ट्वीट का अवलोकन करते हुए आज की बुलेटिन का आनंद लीजिये. 







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गुरुवार, 2 मार्च 2017

झूठ के लिए सच को दबाने का शोर - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आज की ये बुलेटिन हम ही लगा रहे हैं, विशुद्ध हम ही. इसमें हमारा कंप्यूटर, हमारा हाथ, उसकी उंगलियाँ, हमारी वैचारिकी, इंटरनेट, ब्लॉगर, अनेक साथियों की पोस्ट लिंक आदि-आदि वो सहायक सामग्री है जो इस बुलेटिन को पूरा करने में सहयोगी है. आप सबको लग रहा होगा कि आज की बुलेटिन कहाँ से आरम्भ हो गई? असल में वर्तमान हालात में महज एक बयान ने कि मेरे पापा को युद्ध ने मारा है, पाकिस्तान ने नहीं, समूची सोच को दो फिर से भागों में बाँट दिया है. हालाँकि ऐसा कई बार हुआ है मगर इस बार इसको बहुत बारीकी से देखने की आवश्यकता है. इस बार इस तरह का बयान किसी राजनेता की तरफ से नहीं आया, जिन्हें सत्तालोलुप मानकर समूची राजनीति को गंदगी साबित कर दिया जाता है. ऐसा बयान किसी फ़िल्मी हस्ती की तरफ से नहीं आया, जिन्हें धनलोलुप बताकर समूचे मनोरंजन पर काला धब्बा लगा दिया जाता है. ऐसा बयान किसी मीडियापर्सन की तरफ से भी नहीं आया, जिन्हें टीआरपीलोलुप बताते हुए समूची मीडिया को दलाल घोषित किया जा चुका है. इस बार ऐसा बयान एक शहीद फौजी की बेटी की तरफ से आया. उसके इस बयान के पीछे की मानसिकता क्या है, ये वो ही बता सकती है किन्तु जिस तरह के कार्यक्रम के आयोजन से एक विवाद उपजा और फिर उस विवादित कार्यक्रम के पार्श्व से वैचारिक द्वंद्व सामने आया, मानसिक विकार सामने आया वो चिन्तनीय है.


राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह जैसी अवधारणाओं में बँट चुके समाज में एकदम से सही-गलत की परिभाषाएँ बदल दी गई हैं. अब किसी आतंकी के पक्ष में खड़ा होना भी इसलिए सही हो जाता है क्योंकि उसका विरोध दक्षिणपंथी लोग कर रहे हैं. किसी आतंकी के समर्थन में लोगों का हुजूम इस कारण एकत्र हो जाता है क्योंकि वो एक समुदाय विशेष से सम्बंधित है. किसी आतंकी के आमंत्रण को लोग इसलिए भी जायज ठहराने लगते हैं क्योंकि वो अपने ही देश में आज़ादी की माँग करता है. यहाँ देश की बात करने वाले, आतंकियों का विरोध करने वाले, देश के टुकड़े न होने देने का ऐलान करने वाले महज इसलिए कट्टर कहलाने लगते हैं क्योंकि वे किसी न किसी रूप में केंद्रनीत भाजपा से सम्बंधित दिखाई देने लगते हैं. देश के भीतर देश के टुकड़े किये जाने के नारे लगते रहना क्या वास्तविक अभिव्यक्ति है? देश के भीतर किसी आतंकी के समर्थन में जुलूस निकालना क्या वास्तविक मानवाधिकार है? दलगत विरोध के नाम पर, व्यक्तिगत विरोध के नाम पर देश का विरोध करना क्या वास्तविक स्वतंत्रता है? दक्षिणपंथ, वामपंथ के नाम पर खिंची बारीक रेखा के बीच कब तक देश में आतंकियों को प्रश्रय दिया जाता रहेगा? राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह के नाम पर कब तक सेना को पत्थरों का सामना करना पड़ेगा? अनेकानेक सत्यों को छिपा कर कब तक देश में झूठ को प्रतिष्ठित किया जाता रहेगा?

आश्चर्य होता है जबकि दलगत, व्यक्तिगत विरोध के नाम पर देश के विकास के लिए बनाई गई नीतियों तक का विरोध किया जाने लगता है. राष्ट्रहित में उठाये गए कदमों का विरोध महज इसलिए किया जाने लगता है क्योंकि उन क़दमों को लागू करने वाली सरकार को तथाकथित रूप से साम्प्रदायिक बताया जाता रहा है. कुछ ऐसा ही उस समय हुआ जबकि केंद्र सरकार द्वारा भ्रष्टाचार, कालाधन, जाली मुद्रा आदि की रोकथाम के लिए नोटबंदी जैसा कदम उठाया. तब भी अनेकानेक लोगों के साथ-साथ देश के विख्यात अर्थशास्त्री ने इस कदम से जीडीपी के नकारात्मक रूप से प्रभावित होने की बात की थी. इधर अब जबकि जीडीपी से सम्बंधित आँकड़े सामने आये हैं तो नोटबंदी के समय की सारी आशंकाएं निर्मूल साबित हुई हैं. जीडीपी अपने स्तर को बनाये रखने में कामयाब रही. स्पष्ट समझ आ रहा है कि नोटबंदी के समय सिर्फ विरोध करने के लिए ही विकासदर कम रहने, जीडीपी गिरने, अर्थव्यवस्था को नुकसान होने जैसी आशंकाएँ व्यक्त की गई थीं.

बहरहाल, देश सदियों से अपने स्वरूप में हम सबके बीच है. हजारों-हजार साल तक इसे तोड़ने की कोशिश देश के भीतर से, देश के बाहर से होती रही मगर ऐसी ताकतें ही मिट गईं, देश सलामत रहा. विगत कुछ वर्षों से ऐसी ताकतें जो आस्तीन का साँप बनकर, दीमक बनकर छिपी हुई थीं, वे विरोध की राजनीति के चलते सामने आ चुकी हैं. उनकी पहचान साबित हो चुकी है. राष्ट्रवाद, राष्ट्रद्रोह के मुद्दे से इतर सहजता से दिखाई दे रहा है कि कौन सेना के साथ है, कौन आतंकियों के साथ है. कौन देश की आज़ादी का समर्थन कर रहा है और कौन देश के टुकड़े किये जाने की माँग कर रहा है. ये समय ऐसे लोगों को पहचान कर अपना कदम उठाये जाने का है न कि अनर्गल विवादों का हिस्सा बनकर अपनी ऊर्जा को नष्ट करने का. आशा है कि जागरूक कहलाने का दम भरने वाले नागरिक ऐसा कदम उठाएंगे और देशहित में सहयोगी बनेंगे. समझना होगा कि झूठ को कितनी बार भी दोहराया जाये वो सच नहीं हो जाता.

इसी आशा और विश्वास के साथ कि देश सदा विकास करेगा, देश की आज़ादी हमेशा अक्षुण्य रहेगी, आज की बुलेटिन आपके सामने प्रस्तुत है.

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गुरुवार, 21 जनवरी 2016

क्या लिखा जाये, क्या नहीं - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
क्या लिखा जाये, क्या नहीं; किस बात पर चिंतन किया जाये और किस बात पर चिंता; किस मुद्दे का सामाजीकरण किया जाये और किसका राजनीतिकरण समझ से परे है. इस असमंजस के बीच स्व-लिखित बुन्देली कविता के साथ आज की बुलेटिन. 

आनंद लेने का प्रयास कीजिये और समाज में नित नए तरीके से पैदा होते/किये जाते विवादों के समाधान खोजने का भी प्रयास करियेगा.

शेष अगली बुलेटिन में....
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अब है कछु करबे की बिरिया,
आँखन से दूर निकर गई निंदिया।

उनके लानै नईंयाँ आफत,
मौज मजे को जीबन काटत,
पीकै घी तीनऊ बिरिया।
अब है कछु करबे की बिरिया॥

अपनई मन की उनको करनै,
सच्ची बात पै कान न धरनै,
फुँफकारत जैसें नाग होए करिया।
अब है कछु करबे की बिरिया॥

हाथी घोड़ा पाले बैठे,
बिना काम कै ठाले बैठे,
इतै पालबो मुश्किल छिरिया।
अब है कछु करबे की बिरिया॥

कर लेयौ लाला अपयें मन कौ,
इक दिना तो मिलहै हमऊ कौ,
तारे गिनहौ तब भरी दुफरिया,
अब है कछु करबे की बिरिया॥

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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

जलियाँवाला बाग़ की यादें - ब्लॉग जगत के विवाद - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम !

आज १३ अप्रैल है ... यूं तो हम में से काफी लोगो की ज़िन्दगी में इस दिन का कोई न कोई ख़ास महत्व जरूर होगा ... किसी का जन्मदिन या फिर किसी की शादी की वर्षगाँठ ... कुछ भी हो सकता है ... खैर जो भी हो ... आप आज उस खास पल को याद जरूर कीजियेगा जिस पल ने आप की ज़िन्दगी को ऐसे हजारो खुशनुमा पल दिए !

बस एक छोटी सी गुज़ारिश है ... साथ साथ याद कीजियेगा उन हजारो बेगुनाह लोगो को जिन को आज के ही दिन गोलियों से भुन दिया गया सिर्फ इस लिए क्यों की वो अपने अधिकारों की बात कर रहे थे ... आज़ादी की बात कर रहे थे ... जी हाँ ... आप की रोज़मर्रा की इस आपाधापी भरी ज़िन्दगी  में से मैं कुछ पल मांग रहा हूँ ... जलियाँवाला बाग़ के अमर शहीदों के लिए ... जिन को आजतक हमारी सरकार ने शहीद का दर्जा भी नहीं दिया जब कि देश को आजाद हुए भी अब ६६ साल हो जायेंगे !!!

अन्दर जाने का रास्ता ... तंग होने के कारण जनरल डायर अन्दर टैंक नहीं ले जा पाया था ... नहीं तो और भी ना जाने कितने लोग मारे जाते !!

बाग़ की दीवालों पर गोलियों के निशान

यहाँ से ही सिपाहियों ने भीड़ पर गोलियां चलाई थी

हत्याकांड का एक (काल्पनिक) चित्र

शहीद स्मारक

सूचना
इस से पहले भी आप से मैं ऐसी गुजारिश कर चुका हूँ ... आगे भी करता रहूँगा ... ताकि हम भी सरकार की तरह उन अमर शहीदों को भूल न जाएँ !

ब्लॉग बुलेटिन की पूरी टीम और पूरे ब्लॉग जगत की ओर से जलियाँवाला बाग़ के सभी अमर शहीदों को हमारा शत शत नमन !!
सादर आपका 
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जलियाँवाला बाग़ के शहीदों को श्रद्धांजलि...



कोई कुछ बोल रहा था... कोई कुछ सुन रहा था... हवा सुन्न थी... न कुछ बोल रही थी... न सुन रही थी... क्यूंकीवही जानती थी शायद... कि क्या होने वाला है... कुछ बूट रौन्द्ते चले आए ज़मीं को... इंसान नहीं बस वर्दी में कुछ कठपुतलियाँ थीं... एक गोरे ने धागा खींचा... गोलियाँचिल्ला पड़ी... बच्चे बूढ़े औरत थोड़ा चीखे फिर... खामोश हो गये... उस बैसाखी ने कितने ही घरों को... बैसाखियाँ थमा दी... मैं वो कुआँ था जो हाथ फैला के वही पड़ा था... कितने दौड़ कर मेरी बाहों में आए... गोद में लुढ़क गये... उस दिन सोचा शायद मुझमें जान होती... इतनी जानें नहीं जाने देता... तब उन भूरे मुलाज़िमों से गोलियाँ खाई थी... आज गालि... more »

मलयालम थर्टीन!!!


आशीष ढ़पोरशंख/ ਆਸ਼ੀਸ਼ ਢ਼ਪੋਰਸ਼ੰਖ at MY EXPERIMENTS WITH LOVE AND LIFE


प्यारी सहेलियों और यारों, ट्वाईस अपोन ए टाईम इन द बचपन, एक पहेली का जवाब मुझे बेहद पसंद था। पहेली थी किसी ऐसी भारतीय भाषा का नाम जो उल्टा-सीधा कैसे भी बोलो, रहेगा एकदम सेम-टु-सेम! और उत्तर ओबवियस्ली था: मलयालम! और मुझे इस शब्द की आवाज़ अच्छी लगती थी और बोलने में आता था स्वाद! इनफैक्ट, आज के चीफ मिनिस्टर के पापा को भी मैंने पहले-पहल 'मलयालम सिंह' कहना शुरू किया था! जब इंग्रेजी आ गयी, तो उनका नाम मेरे लिए 'सॉफ्ट लायन' हो गया! तब मैं छोटा बच्चा था, लेकिन अब मैं बड़ा बच्चा हूँ, इसलिए मुलायम सिंह जी क्षमा करें! *ए पिक्चर इज़ वर्थ ए थाउजेंड वर्ड्स, * *फिर भी ज़्यादा जानकारी के इच्छुक फोटू में द... more »

चुहुल - ४८


noreply@blogger.com (पुरुषोत्तम पाण्डेय) at जाले

(१) हवाई जहाज के जमीन पर उतरते समय अन्दर हवा का दबाव बहुत बढ़ जाता है इसलिए बहुत से यात्रियों के कान में जबरदस्त दर्द होने लगता है. इससे बचने के लिए यात्रियों को कुछ टॉफियां/गोलियां दी जाती हैं, ताकि उनको चबाते हुए दबाव का असर कम महसूस हो. ऐसे ही जब एक एयर हॉस्टेस ने गोलियाँ बांटी और दर्द की खास शिकायत वाले यात्री से बाद में पूछा, “गोलियों से आराम हुआ?” यात्री बोला, “कोई खास नहीं, पर अब ये बताइये इन गोलियों को कान से बाहर निकालू कैसे?” (२) दो पड़ोसी किशोर लड़के आपस में बातें कर रहे थे. एक बोला, “यार, तेरा नवजात भाई इतना रोता क्यों है?” दूसरा बोला, “अगर तुम्हारे मुँह में एक भी दाँत ... more »

महिमा देवदर्शन की.


सुशील बाकलीवाल at नजरिया


सर्वधर्म समभाव. सबका मालिक एक.. मंदिर और उसमें स्थापित भगवान की मूर्ति हमारे लिए आस्था के केंद्र हैं। मंदिर हमारे धर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं और हमारे भीतर आस्था जगाते हैं । किसी भी मंदिर को देखते ही हम श्रद्धा के साथ सिर झुकाकर भगवान के प्रति नतमस्तक हो जाते हैं। आमतौर पर हम मंदिर भगवान के दर्शन और कामनाओं की पूर्ति के लिए जाते हैं लेकिन मंदिर जाने के और कई लाभ भी हैं मंदिर वह स्थान है ज... more »

O Re Piya - Aaja Nachle


'आ जा नाच ले, फिल्म के इस खूबसूरत गीत को सुनिये भी और देखिये भी ! राहत फ़तेह अली खान ने कमाल किया है इसे गाने में ! साधना वैद

कार्टून :- ... टके सेर भाजी टके सेर खाजा.



संगतराश : एक मुलाकात


ब्लॉ.ललित शर्मा at ललितडॉटकॉम


हथौड़े की चोट से छेनी से निकलता संगीत आकर्षित करता है मुझे, मंत्र मुग्ध सा उस शिल्पकार के समीप खड़ा हो जाता हूँ जो प्रस्तर प्रसव द्वारा एक सजीव प्रतिमा को जन्म दे रहा है। उसकी पीड़ा में सहभागी हो जाता हूँ, इतना अधिक अंतरंग कि वह मेरे वुजूद पर छा जाता है, उससे अलग नहीं हो पाता। लगता है उस प्रतिमा को मैं ही आकार दे रहा हूँ तन्मय होकर। शायद पिछले जन्म में संगतराश था, आज हर्फ़तराश हूँ, इस जीवन में भी तराशने का कार्य ही है। शिल्पकार की यही नियति है, उसे तराशना ही पड़ता है, आने वाली पीढी को विरासत में देने के लिए, चाहे जो भी हो। अद्भुत शिल्प-सिरपुर (फ़ोटो - सुशील जाचक)भरी दुपहरिया, ... more »

47. ऐसी किताबें अपने यहाँ कब छपेंगी?


जयदीप शेखर at कभी-कभार


परसों सन्दीप कुमार रावत नाम के एक नौजवान घर में आये थे। उनका व्यक्तित्व देखते हुए उन्हें "सेल्समैन" कहने में अच्छा नहीं लग रहा। खुद को बनारस का बताया उन्होंने- कहा एम.बी.ए. कर रहे हैं। हालाँकि मेरे अनुमान को भी उन्होंने सही बताया- कि मूलतः वे उत्तराखण्ड के हैं। 2,000 रुपये में 3+2 किताबें वे दे गये। मेरे बेटे अभिमन्यु ने बीते मार्च में 10वीं की परीक्षा दी। मैं सोच ही रहा था कि 'फ्लिपकार्ट' से कोई भारी-भरकम किताब उसे मँगा दूँ, ताकि वह मोबाइल, टीवी, कम्यूटर से कभी-कभार दूर भी रहे। पिछले साल सत्यजीत राय के अमर चरित्र "फेलू'दा" के सारे (शायद 26) लघु उपन्यास वह बिन... more »

ज्ञान दर्पण.कॉम को बेस्ट वेब पत्रकारिता सम्मान


Ratan singh shekhawat at ज्ञान दर्पण

जयपुर : 10 अप्रेल २०१३ को जयपुर के सूचना केंद्र में न्यूज पेपर्स एसोसियशन ऑफ़ इंडिया की राजस्थान इकाई व ह्युमन 4 ह्युमन संस्था द्वारा आयोजित युवा पत्रकार सम्मान समारोह में प्रदेश में अपने अपने कार्यक्षेत्रों में श्रेष्ठ पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को "कलम के सिपाही" सम्मान सम्मानित किया गया| इस अवसर पर वेब पत्रकारिता की श्रेणी में श्रेष्ठ कार्य करने के लिए ज्ञान दर्पण.कॉम को "बेस्ट वेब पत्रकारिता" सम्मान से सम्मानित किया गया| इस अवसर पर युवा पत्रकारों के साथ ही प्रदेश के वरिष्ट पत्रकार श्याम आचार्य, महेश शर्मा, मिलाप चंद डंडिया, लक्ष्मी शर्मा व चम्मा शर्मा को लाइफ टाइम अचीवमेंट स... more »

हैप्पी बर्थ डे दीनदयाल अंकल :)




बच्चों के मन को समझना और उनके लिए लिखना आसान नहीं होता । बच्चों के मासूम मन की और उनकी रूचि की सामग्री को शब्द देना लेखन की दुनिया में शायद सबसे कठिनतम काम है । मुझे बच्चों के मन को समझने और बाल साहित्य पढने में बहुत रूचि है । अबकी बार जब जयपुर जाना हुआ तो दीनदयालजी से बात हुयी और उनकी कुछ पुस्तकें मिली । काफी समय से सोच रही थी कि उनके बाल साहित्य को लेकर मैं अपने विचार आप सबके साथ साझा करूं। उनके ब्लॉग पर काफी समय से उनकी बाल रचनाएँ नियमित पढ़ती रूप से पढ़ती आई हूँ । ऐसे में उनकी पुस्तकें पढना और बाल मन को समझना मेरे लिए एक सुखद एवं सुंदर अनुभव रहा । बाल साहित्यकार के रूप में दी... more »

कविता जो पुरस्कृत हुयी



दोस्तों नेता जी सुभाष इंस्टीटयूट (NSIT) KE IEEE BRANCH में आयोजित "WOMEN EMPOWERMENT AND WOMEN SECURITY "प्रतियोगिता में मेरी कविता "शतरंज के खेल में शाह और मात देना अब मैंने भी सिख लिया है " को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ और एक टी शर्ट ,२ ० ० रूपये का चैक , एक पैन और सर्टिफिकेट प्राप्त हुआ ।
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कुछ और लिंक्स भी है जिन पर एक बार निगाह डालना मौजूदा परिवेश मे लाज़मी हो जाता है !

खुसदीप भाई, पोपट और ब्लॉगर्स...खुशदीप

 खुसदीप भाई, आप सफेद झूठ बोल रहे हो।

हद है जी .....

ब्लॉग-जगत में 'नारी' की असलियत !!

बेटा डोइचेवैले ! पटना, दिल्ली , नखलऊ होते तो .........ढिच्क्याउं , ढुम ढुम ढुम

ब्लॉग पुरस्कार के अंतर्गत शीर्ष 10 ब्लॉग का नामांकन स्तरीय नहीं : रवीन्द्र प्रभात

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अब आज्ञा दीजिये ...
जय हिन्द !!!

लेखागार