नमस्कार साथियो,
आज दुनिया-जहान की बात न करके कुछ अपनी लिखी पढ़ा दें आप सबको. गद्य लिखते रहने की नियमितता के कारण पद्य लिखना बहुत ज्यादा अनियमित होता जा रहा है. कभी-कभी मूड बन जाता है तो उकेर लेते हैं कुछ पंक्तियाँ. ग़ज़ल, कविता, गीत के नाम पर कुछ तुकबंदी कर लेते हैं. मीटर, पैमाना, व्याकरण की बंदिशों को दरकिनार करते हुए जैसा मन कहता जाता है, वैसा उतारते जाते हैं. निर्णय आप सब करें कि क्या लिखा, कैसा लिखा?
महसूस करते हैं तुमको
हर एक पल में,
लगता है सिर्फ़ तुम
हो हर एक पल में.
दिल यूँ निकाल के न
रख दो अचानक से,
दिल को दिल से मिला
दो हर एक पल में.
बहकी-बहकी बातों को
यूँ ज़ाहिर न करो,
शायराना से हो रहे
हो हर एक पल में.
एक पल को छूकर तुझे
कुछ यूँ लगा,
छू लिया हो ज़िंदगी
को हर एक पल में.
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