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गुरुवार, 15 अगस्त 2019

स्वतंत्रता और रक्षा की पावनता के संयोग में छिपा है सन्देश : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
स्वतंत्रता दिवस की और पावन पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

इस वर्ष का सावन माह अपने आपमें अभूतपूर्व घटनाओं का गवाह रहा है. इस अभूतपूर्व स्थिति में इए सुखद और पावन संयोग ही कहा जायेगा कि स्वतंत्रता का महोत्सव और भाई-बहिनों के स्नेह का पर्व एक दिन ही मनाया जा रहा है. इसी को किसी न किसी रूप में हम सभी संयोग कहते हैं, सितारों की चाल कहते हैं, सौभाग्य कहते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यदि हम सावन माह की गतिविधियों को देखें तो देशहित में कई सारे निर्णय संपन्न हुए.


देश के वैज्ञानिकों की सफल यात्रा चंद्रयान के रूप में आरम्भ हुई. इस यात्रा की कमान देश की मातृशक्ति के हाथ में थी, यह भी अपने आपमें गौरवशाली क्षण था. इस अभियान के द्वारा जो कदम अन्तरिक्ष क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकता रखने जा रही है, वैसा आज तक किसी भी देश द्वारा उठाया नहीं गया है.


चंद्रयान से शुरू वैज्ञानिक सफलता यात्रा अभी आरम्भ ही  हुई थी, देशवासी अभी इस उमंग की सराबोर से उबरे भी न थे कि एक कदम सामाजिक भेदभाव दूर करने के लिए उठाया गया. तीन तलाक की समाप्ति भले ही एक समुदाय विशेष से संदर्भित हो मगर इसके समाप्त होने से देश की मातृशक्ति को समानता का अधिकार प्रदान किया गया, उनके व्यक्तित्त्व को एक इन्सान समझने की परिभाषा से अलंकृत किया गया.


इसके ठीक एक सप्ताह बाद ही एक देश, एक संविधान के विधान को स्पष्ट स्वरूप प्रदान किया गया. किसी समय राजनैतिक प्रतिस्थितियों के चलते उठाया गया कदम कालांतर में न केवल राजनैतिक विभेद का कारक बना बल्कि देश के भूभाग को भी एक तरह से अलग-थलग किये रहा. धारा 370 की समाप्ति के साथ ही दो राज्यों का निर्माण होने ने राजनैतिक सजगता की दिशा में कदम बढ़ाया तो देश को वास्तविक रूप में कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक होने का सन्देश दिया. यह भी देश की स्वतंत्रता के प्रति सार्थकता कही जा सकती है.


इन घटनाओं का होना शायद पूर्व-निर्धारित रहा होगा, शायद एक संयोग रहा होगा कि स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन एकसाथ, एक दिन मनाने का अवसर मिला. इसको एक सन्देश के रूप में देखने की आवश्यकता है. रक्षाबंधन को महज भाई-बहिन के पवित्र प्रेम के रूप में, सुरक्षा के रूप में देखने से इतर अब व्यापकता में देखने की आवश्यकता है. सरकारी स्तर पर स्वतंत्रता के सच्चे अर्थ स्पष्ट करते हुए वैज्ञानिकता को स्थापित किया, सामाजिकता को मान्यता दी और राष्ट्रीयता को एकता प्रदान की. अब हम सभी नागरिकों की जिम्मेवारी बनती है कि इस स्वतंत्रता को सुरक्षा प्रदान करें. अपने कार्यों से, अपनी जिम्मेवारियों से, अपने कर्तव्यों से देश को, समाज को, नागरिकों को सफलता की राह प्रदान करें, सुरक्षा की भावना का विकास करें, उनको आज़ादी का भान बना रहने दें.


आशा है कि हम सभी स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन के एकसाथ मनाये जाने के सन्देश को समझेंगे, इसमें अन्तर्निहित भावना को आपस में मिलकर और पुष्ट करेंगे. यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित ही हम सभी स्वतंत्रता का महोत्सव को सही आयाम प्रदान करेंगे, रक्षाबंधन की पवित्रता को अक्षुण्य रख सकेंगे. इसी पावन भावना के साथ आइये आज की बुलेटिन का आनंद उठायें और एक कदम समानता, भाईचारे, स्नेह, सुरक्षित स्वतंत्रता की ओर बढ़ाएं.

जय हिन्द

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गुरुवार, 20 जून 2019

जमीनी काम से ही समस्या का समाधान : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
ये साहब हैं आनन्द दत्ता. एक बेहतरीन पत्रकार, फोटोग्राफर, रांची में रहते हैं. बिहार के कुख्यात चमकी बुखार के खिलाफ जागरुकता अभियान में जमकर लगे हुए हैं. रांची से चले, सुबह मुजफ्फरपुर पहुंचे. अस्पताल में कैम्प किया. पब्लिक फंडिंग से प्राप्त पैसों से पहले मरीज के परिजनों के लिये खाने का इन्तजाम कराया फिर पीने के पानी की व्यवस्था में जुट गये. दो वाटर प्यूरिफायर लगवा चुके हैं, तीसरा लगवा रहे हैं. इस बीच इनकी नजर गयी कि अस्पताल परिसर में 13-14 प्यूरिफायर पहले से लगे हैं जो छोटी-छोटी गड़बड़ी की वजह से बन्द हैं, सो उनको ठीक कराने में जुट गये. इसी दौरान इनकी नजर गयी कि परिजनों के बैठने की जगह लगे कई पंखे खराब हैं. इसके लिये इलेक्ट्रिशियन बुला लिए. मुश्किल से 70-80 हजार रुपये खर्च हुए होंगे लेकिन इन्होंने मरीजों के परिजनों के खाने-पीने और इस भीषण गर्मी में चैन से बैठने की व्यवस्था कर दी है. 

आनंद दत्ता ने अपनी वाल पर लिखा है कि शुरुआती काम हो चुका, भले ही अब पैसा मत भेजिए परन्तु गाँव-गाँव जाकर चमकी बुखार के खिलाफ जमीन पर काम करके जागरूकता अभियान के लिए वालंटियरों की अधिक आवश्यकता है. इसे कहते हैं पत्रकारिता और अभी उमर भी ज्यादा नहीं है बंदे की.


वाकई ऐसे लोगों से सीखने की आवश्यकता है. मीडिया या पत्रकारिता का काम सिर्फ समाचार बनाना भर नहीं होना चाहिए. लोगों का काम सिर्फ आश्वासन देना भर नहीं होना चाहिए. जमीनी काम ही असलियत में समस्या का समाधान होता है. आनंद दत्ता को साधुवाद.


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गुरुवार, 6 जून 2019

बच्चों का बचपना गुम न होने दें : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
स्कूल जाते बच्चों की गर्मियों की छुट्टियाँ हो गईं हैं. इसके बाद भी बच्चे तनावमुक्त नहीं दिख रहे हैं. वे प्रफुल्लित नहीं दिख रहे हैं. छुट्टियों के उत्साह में, उल्लास में, मस्ती में, शरारत में, शैतानियों में वे नहीं दिख रहे हैं. मोहल्ले में, बाजार में, किसी पार्क में टहलते-खेलते बच्चे यदि दिख भी रहे हैं तो उनके चेहरों पर आज भी वैसा ही तनाव दिख रहा है जैसा कि स्कूल खुले होने के समय दिखाई देता है. तब के तनाव में और अब के तनाव में बस इतना अंतर समझ आ रहा है कि तब बच्चे स्कूल की ड्रेस में, पीठ पर भारी-भरकम बस्ता टाँगे हुए तनावग्रस्त दिखाई देते थे, अब इनके बिना तनाव में दिख रहे हैं.


भले ही स्कूल जाने की बाध्यता न हो मगर स्कूल जैसे वातावरण से बच्चों के मन को, दिमाग को मुक्ति नहीं मिल सकी है. उनके समय को, उनकी छुट्टियों को, उनके मन को, दिमाग को स्कूल के अप्रत्यक्ष माहौल ने अपने बंधन में बाँध रखा है. स्कूल से मिलने वाला मिला हुआ ढेर सारा गृहकार्य, प्रोजेक्ट आदि बच्चों को अभी भी बोझिल वातावरण प्रदान कर रहे हैं. यही वो बोझ है जिसके दबाव में बचपन गुम हो जाता है, छुट्टियों की मस्ती गुम हो जाती है. बच्चे अब मैदानों में खेलने की बजाय या अपनी कॉपी-किताबों में खोये होते हैं. स्कूल से मिले तमाम सारे अनावश्यक प्रोजेक्ट पूरा करने में व्यस्त रहते हैं. इन सबसे यदि थोड़ा-बहुत समय उन्हें मिलता है तो वह कंप्यूटर में बीतता है या फिर मोबाइल में. अभिभावक भी अपने बच्चों को सबसे आगे देखने की अंधी दौड़ में उनको जबरन पढ़ाई के दबाव में पीसे डाल रहे हैं.

अब बच्चों में कुछ नया सीखने-सिखाने जैसी स्थिति ही नहीं दिखती. अब वे आपस में अपने अनुभव शेयर करने के स्थान पर, कुछ नया बनाने की जगह पर वे ऊटपटांग हरकतों वाले वीडियो बनाते नजर आते हैं. गलियों में मस्ती-शरारत करने के स्थान पर सड़कों पर तेज रफ़्तार बाइक दौड़ाते नजर आते हैं. उनकी सक्रियता, उनकी रचनात्मकता को जैसे ग्रहण लग गया है. इसमें यदि समय दोषी है तो स्कूल, शिक्षक, अभिभावक भी दोषी हैं. अधिक से अधिक अंक लाने की अंधी दौड़ ने बच्चों को उनकी नैसर्गिक प्रतिभा से वंचित कर दिया है. ऐसे में वे जैसे किसी हाथ की कठपुतली बन गए हैं. उनके आचरण में, उनके व्यवहार में एक तरह की कृत्रिमता देखने को मिल रही है. शिक्षकों को, अभिभावकों को इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है. यह ध्यान देने की जरूरत है कि बचपन एक बार ही आता है और इस दौर में मस्ती, शरारत, अपनत्व के बीच अपनाई गई शिक्षा, सीखे गए काम सारे जीवन काम आते हैं.

आइये, अपने बच्चों में, अपने आसपास के बच्चों में उनकी छिपी प्रतिभा को जानने-उजागर करने का काम करें. इसके साथ ही आज की बुलेटिन का भी आनंद उठायें.

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गुरुवार, 30 मई 2019

हिन्दी के पहले समाचार-पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' की स्मृति में ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज, 30 मई को हिन्दी के पहले समाचार-पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ हुआ था. पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने सन 1826 में पहले हिन्दी समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया. वे मूल रूप से कानपुर संयुक्त प्रदेश के निवासी थे. उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन कलकत्ता के कोलू टोला नामक मोहल्ले की 37 नंबर आमड़तल्ला गली से से एक साप्ताहिक पत्र के रूप में शुरू हुआ था. उस समय अंग्रेज़ी, फारसी और बांग्ला में तो अनेक पत्र निकल रहे थे किंतु हिन्दी में एक भी पत्र नहीं निकलता था. इसका प्रकाशन एक क्रांतिकारी घटना मानी जा सकती है. 


उदन्त मार्तण्ड का शाब्दिक अर्थ है समाचार-सूर्य. अपने नाम के अनुरूप ही इस समाचार पत्र ने हिन्दी की समाचार दुनिया में कार्य किया. यह पत्र ऐसे समय में प्रकाशित हुआ था जब हिन्दी भाषियों को अपनी भाषा के पत्र की आवश्यकता महसूस हो रही थी. इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उदन्त मार्तण्ड ने समाज में चल रहे विरोधाभासों एवं अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध आम जन की आवाज़ को उठाने का कार्य किया था. क़ानूनी और आर्थिक कारणों के चलते 19 दिसम्बर 1827 को उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन बंद हो गया. इसके अंतिम अंक में एक नोट प्रकाशित हुआ था जिसमें उसके बंद होने की पीड़ा झलकती है. इसमें कहा गया था,
आज दिवस लौ उग चुक्यों मार्तण्ड उदन्त।
अस्ताचल को जाता है दिनकर दिन अब अंत।।

यह साप्ताहिक पत्र पुस्तकाकार (12x8) छपता था और प्रति मंगलवार को निकलता था. इसके कुल 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए थे. वर्तमान में पत्रकारिता एक बड़ा कारोबार बन गया है. इन 193 वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में काफ़ी तेजी आई है. इसके द्वारा साक्षरता बढ़ी भी है. पंचायत स्तर पर राजनीतिक चेतना बढ़ी है. इसके लिए उदन्त मार्तण्ड के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता है. इस पत्र को हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर कहा जाता है. इसके सम्मान में ही प्रतिवर्ष 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है.

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गुरुवार, 23 मई 2019

पक्ष-विपक्ष दोनों के लिए राजनीति का नया दौर शुरू - ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज समूचा देश लोकसभा चुनाव परिणामों को जानने की चाह में किसी न किसी रूप में मीडिया से जुड़ा हुआ है. अभी तक जिस तरह से रुझान आये हैं, उनसे स्थिति एकदम साफ़ हो चुकी है. भाजपा की, NDA की धमाकेदार वापसी दिख रही है. विपक्ष और महागठबंधन जैसी स्थितियों को मतदाताओं ने नकारा है. यदि इन रुझानों, जो जल्द ही अंतिम परिणाम के रूप में भी पहचाने जायेंगे, को पूर्वाग्रहरहित होकर देखा जाये तो इस बार मतदाताओं ने निवर्तमान केंद्र सरकार के कार्यों पर भरोसा जताते हुए उसे एक अवसर और दिया है. इसके साथ ही उसने विगत लम्बे समय से चले आ रहे विपक्ष के तमाम आरोपों को एकतरह से खारिज भी किया है. 

इस परिणाम के बाद दोनों पक्षों के लिए राजनीति का नया ट्रेंड शुरू होने वाला है. अभी तक भाजपा को साम्प्रदायिक, हिन्दू ध्रुवीकरण के रूप में ही प्रचारित किया जाता रहा है किन्तु इन चुनावों परिणामों के बाद इससे बहुत हद तक मुक्ति मिलेगी. ऐसे में केंद्र की भाजपा को अपनी वर्तमान ईमानदारी वाली, कार्य करने वाली सरकार की छवि को और निखारना होगा. महज मोदी के नाम पर टिके रहने की प्रवृत्ति से उसके सभी जनप्रतिनिधियों को बाहर आना होगा. 


इसी तरह विपक्ष को भी विचार करना होगा कि हर बार महज ईवीएम के नाम पर, राफेल, नोटबंदी अथवा किसी अन्य मुद्दे के नाम पर शोर मचाकर सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता है. महज जाति के नाम पर लामबंदी करके मतदाताओं को लुभाया नहीं जा सकता है. मुफ्तखोरी के नाम पर मतदाताओं को आकर्षित नहीं किया जा सकता है. अब आम मतदाता भी तकनीकी रूप से अपडेट है. उसके हाथ में भी तकनीक होने से उसको भी पल-पल की जानकारी मिल रही है. उसे भी सही, गलत का आभास हो रहा है. ऐसे में विपक्ष को आने वाले समय के लिए सशक्त बनने के लिए, केंद्र सरकार के कार्यों की पारदर्शिता को बनाये रखने के लिए उसे जनता के बीच जाकर काम करना होगा. सरकार की छवि को झूठे आरोपों के द्वारा धूमिल करने की कोशिशों के बजाय खुद अपनी छवि को सशक्त, मजबूत, स्वच्छ करना होगा.

फ़िलहाल, अंतिम परिणामों का सभी को इंतजार है. सभी को शुभकामनायें कि आने वाले समय के देश और सशक्त हो, मजबूत हो, सुरक्षित हो.

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गुरुवार, 9 मई 2019

राष्ट्रगौरव महाराणा प्रताप को सादर नमन और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
दृढप्रतिज्ञ और विलक्षण व्यक्तित्व के धनी महाराणा प्रताप का जन्म वि०स० 1597 ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया यानि कि 9 मई 1540 को कुम्भलगढ, राजस्थान में सिसोदिया राजपूत राजवंश में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कँवर की संतान के रूप में हुआ था. पिता के निधन बाद उनका राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को हुआ. विरासत में उन्हें मेवाड की प्रतिष्ठा और स्वाधीनता की रक्षा का दायित्व मिला. अपने यशस्वी पूर्वज महाराणा कुम्भा तथा राणा सांगा की शौर्य कथाओं को तथा देश, धर्म और आन-बान-शान, मान-मर्यादा पर मरने का पाठ बचपन में ही पढ़ने के कारण उन्होंने बिना घबराये, बिना भयभीत हुए लगातार संघर्ष किया. 


उनके नाम के साथ वीरता के किस्से जुड़े होने के साथ-साथ हल्दीघाटी का युद्ध और उनका घोड़ा चेतक सर्वाधिक चर्चा में रहते हैं. कहते हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक बाज की तरह उछल कर अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊँचाई तक पहुँच गया था. इस कारण ही महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया था. इसी युद्ध में घायल होने के बाद चेतक को वीरगति प्राप्त हुई थी.

हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को मेवाड़ की राजपूत सेना तथा मुगलों के मध्य हुआ था. मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया जबकि मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था. हल्दीघाटी के इस युद्ध में बीस हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सेना के अस्सी हजार सैनिकों का सामना किया था. यह युद्ध चला तो केवल एक दिन परन्तु इसमें सत्रह हजार लोग मारे गए. इतिहासकारों के अनुसार युद्ध में किसी के विजयी न होने के बाद भी महाराणा प्रताप विजयी रहे. आमने-सामने चले इस युद्ध में उन्होंने अकबर की विशाल सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था, यह उनकी जीत कही जाएगी.  

इसके बाद 1579 से 1585 तक की स्थिति ऐसी बनी कि महाराणा प्रताप एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे. उधर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे. इसका लाभ उठाकर महाराणा प्रताप ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और जल्द ही उदयपुर समेत कई महत्वपूर्ण स्थान महाराणा के अधिकार में आ गए. महाराणा प्रताप के सिंहासन पर बैठते समय मेवाड़ की जितनी भूमि पर उनका कब्ज़ा था, उतने पर पुनः उनका शासन स्थापित हो गया. इस स्थिति में बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर कोई परिवर्तन न कर सका. महाराणा प्रताप लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और यह मेवाड़ के लिए स्वर्ण युग साबित हुआ. मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण सन 1585 में समाप्त हुआ.

इसके बाद महाराणा प्रताप राज्य के विकास में जुट गए. यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 19 जनवरी 1597 को अपनी नई राजधानी चावंड में महाराणा प्रताप का निधन हो गया. महाराणा प्रताप से भयभीत होने का उदाहरण अकबर के इसी कदम से मिलता है कि वह डर के मारे अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया था और महाराणा के निधन के बाद पुनः आगरा लौट आया.

महाराणा प्रताप का नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है. वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी ही नहीं अपितु मंत्रदाता भी कहे जा सकते हैं. वे स्वतंत्रता, स्वाभिमान, सहिष्णुता, पराक्रम और शौर्य के परिचायक कहे जाते हैं. मातृभूमि के गौरव के लिए वे कभी कितनी ही बड़ी मुसीबत से विचलित नहीं हुए, न ही कभी किसी के आगे झुके. यही कारण है कि महाराणा प्रताप आज भी हिंदुस्तान के जन-जन के हृदय में बसे हुए हैं.

आज उनकी जन्मजयन्ती पर बुलेटिन परिवार की ओर से सादर नमन सहित आज की बुलेटिन प्रस्तुत है.

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गुरुवार, 28 मार्च 2019

अब अंतरिक्ष तक सर्जिकल स्ट्राइक करने में सक्षम... ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार मित्रो,
कल, 27 मार्च को जब डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम आईलैंड लॉन्च कॉम्पलेक्स से रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक मिसाइल ने बतौर परीक्षण एक सैटेलाइट को मार गिराया तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जो अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता रखते हैं. भारत से पहले अभी तक यह क्षमता रूस, अमेरिका और चीन के पास थी. यह एक एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण था, जिसे मिशन शक्ति नाम दिया गया. इसके लिए DRDO के बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया गया. यह मौजूदा बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का हिस्सा है. 


इस मिशन में जिस सैटेलाइट को निशाना बनाया गया, वह निचली कक्षा में घूम रहा था. यह परीक्षण इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने इसके जरिये यह साबित किया है कि वह अपनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से बाहरी अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को निशाना बना सकता है. चूँकि हमारा पड़ोसी देश चीन बहुत पहले यह क्षमता विकसित कर चुका है ऐसे में भारत पर काफी दबाव था. यह सत्य किसी से छिपा नहीं है कि आज की दुनिया में पारंपरिक हथियारों से शत्रु का मुकाबला नहीं किया जा सकता है और वह भी तब जबकि पड़ोसी देशों से आपके संबंध अच्छे नहीं हों. ऐसे में देश की तरफ से किया गया यह परीक्षण भारतीय रक्षा शक्ति को कई गुना मजबूत करता है. 

इस सफल परीक्षण के लिए सभी वैज्ञानिकों और शुभेच्छुजनों को शुभकामनायें, बधाई.

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गुरुवार, 21 मार्च 2019

बुरा मानना हो तो खूब मानो, होली है तो है... ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आखिरकार होली हो ली. दिन भर धमाचौकड़ी चलती रही, कभी बच्चों की, कभी बड़ों की. इसी धमाचौकड़ी में मित्र-मंडली संग शहर की सुनसान पड़ी सड़कों पर टहलना हुआ. अलग-अलग रंग के, अलग-अलग जीव दिखाई दिए. कुछ रंग में मस्त, कुछ भंग में मस्त. कुछ तेज रफ़्तार बाइक में मगन, कुछ दारू के नशे में टुन्न. एक मित्र मिले, अनजाने से. अनजाने से इसलिए क्योंकि पूरी तरह अपने रंग में थे. न कदमों का होश था, न हमें पहचान पाने का. पता नहीं किस झोंक में चले आये सड़क के इस पार. आकर गले लगे और बोले बुरा न मानो होली है. हमने कहा इसमें बुरा क्या मानना मित्र, आखिर होली है ही ऐसा त्यौहार. उनके चेहरे पर एकदम चमक आ गई, बोले वाह दोस्त, क्या बात कही. फिर एकदम से उनके अन्दर के तरल पदार्थ ने शायद किक मारी. चेहरे को जरा सा सख्त करके बोले, बुरा मानना हो तो खूब मानो. होली है तो है.


हम समझ गए कि उनके और उनके तरल पदार्थ के बीच रस्साकशी चल रही है. अन्दर का तरल पदार्थ उन्हें नाली में पटकने को आतुर दिख रहा था और हमारे मित्र थे कि बिना गिरे-पड़े घर पहुँचने की आतुरता में थे. उनको एक पान की दुकान के किनारे पड़ी बेंच पर बिठाया और सलाह दी कि उतनी ही लिया करो अपने प्याले में, जो न पटके किसी नाले में.

वे हमारा मंतव्य समझ गए तो हो-हो-हो करके हँस दिए. इतनी देर में उनके दिमागी कंप्यूटर ने अपने सॉफ्टवेयर को अपडेट किया और वे हमें पहचान गए. भटकती जीभ के सहारे हमारे हाथ को थाम बड़े भावुक हो गए और बोले, कहाँ रोज-रोज प्याले में भरते हैं, कहाँ रोज-रोज नाले में गिरते हैं. हमने भी उसी भावुकता में वाह-वाह कह दिया.

उस वाह-वाह ने उनके अन्दर के कवित्व को जगा दिया और चंद पंक्तियाँ पटक दी सामने. उसके बाद लगा कि उसे अकेले छोड़ना सही नहीं, सो मित्र-मंडली ने उसे अपने में समेटा और बजाय मयखाने के घर ले जाकर छोड़ा.

उसकी पटकी-पटकाई वही पंक्तियाँ आपके सामने ज्यों की त्यों, बिना लड़खड़ाए. होली की शुभकामनाओं के साथ आनंद लीजिये, आज की बुलेटिन का. 



लोगों ने बड़ा ही गलत काम किया है,
नाहक ही पीने-पिलाने को बदनाम किया है.
कहाँ बह गए लोगों के दरो-दीवार जश्न में,
बैठकर मयखाने में जाम को ही पिया है.

पीने का मजा क्या जानें दूर रहने वाले,
पूछो उसे जो हैं नशे में चूर रहने वाले.
अपने में खोये रहते हैं दीवानों की तरह,
शहंशाह खुद को जहाँ का बना लिया है.

जाम पर जाम टूट कर बिखर गए कितने,
महकती शाम के दीवाने हो गए कितने.
मदहोशी के आलम में अब होश नहीं अपना,
जाना है घर पता मयखाने का दिया है.

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गुरुवार, 14 मार्च 2019

फाउंटेन पैन का शौक और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो, 
आज थोड़ी सी चर्चा फाउंटेन पैन की हो जाये. ऐसा इसलिए क्योंकि अपने लगभग सैकड़ा भर फाउंटेन पैन की सफाई के दौरान यह ख्याल आया. यह हम सभी जानते हैं कि यह एक ऐसा पैन होता है जिसकी निब (नोंक) नुकीली होती है. इसके अंदर स्याही के भरने के लिए जगह होती है. उपयोग के दौरान स्याही समाप्त हो जाने के बाद दोबारा स्याही भरकर उसे उपयोग में लाया जाता है. गुरुत्वाकर्षण बल के कारण स्याही नीचे निब की पिन में आती है और कागज़ पर अक्षर रूप में उतर कर रचनाओं को जन्म देती है. फाउंटेन पैन से लिखने की आदत हमारे चाचा जी द्वारा डलवाई गई है. उनका कहना था कि फाउंटेन पैन से लिखने से राइटिंग अच्छी होती है.


उनके द्वारा पैन से लिखने की जो आदत बचपने में पड़ी वो अभी तक बनी हुई है. पैन को लेकर स्थिति यह है कि एकदम लालच जैसी स्थिति है. आये दिन कोई न कोई पैन खरीदा ही जाता है, बस इसके लिए एक मौका चाहिए होता है, बहाने के रूप में. कभी अपने जन्मदिन पर, कभी अपने परिजनों के जन्मदिन पर, कभी किसी ख़ुशी के मौके पर, कभी किसी त्यौहार पर. कभी-कभी हमें उपहार में भी ये मिल जाते हैं. अपने सभी पैन की देखभाल भी हम बहुत ध्यान से करते हैं. सस्ते से सस्ता पैन भी हम कभी बर्बाद न होने देते हैं. हमारे कई मिलने वाले, कई अनजान, अपरिचित मुलाकाती करने वाले, मित्र, कॉलेज के सहयोगी, विद्यार्थी हमारे फाउंटेन पैन से लिखने को लेकर आश्चर्यचकित रहते हैं.  

बहरहाल, आज के समय में जैसी कमी फाउंटेन पैन से लिखने वालों की दिख रही है वैसी ही कमी इंटरनेट पर फाउंटेन पैन से सम्बंधित जानकारी/सामग्री की दिख रही है. हिन्दी में तो कहीं जानकारी मिली ही नहीं, एक-दो जगह अंग्रेजी में अवश्य कुछ देखने को मिला है. (पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.) ये भी हो सकता है कि हमारी पहुँच में जानकारी न आ रही हो, तो ऐसे में यदि आपमें से किसी के पास यदि फाउंटेन पैन से सम्बंधित जानकारी-सामग्री हो तो हमें अवश्य भेजिएगा.

हम सभी जानते हैं कि फाउंटेन पैन का आविष्कार लेविस वाटरमैन ने 1884 में USA में किया था. उन्होंने लकड़ी को छील कर उसका निब और अंगूर के रस से स्याही बनाई. इन दोनों की सहायता से उनके द्वारा फाउंटेन पैन का जन्म हुआ. इसके बाद भी यदि देखा जाये तो समाज में मानवीय संरचना होने के काफी सालों बाद पैन जैसी चीज़ का आविष्कार भले हुआ हो मगर लेखन सम्बन्धी कार्य के लिए कोई न कोई सामग्री लगभग 24000 साल पहले ही तैयार कर ली गई थी. तत्कालीन मानव समाज द्वारा रेखाचित्र बनाने के लिए, साज-सज्जा करने के लिए पत्थर, लकड़ी आदि से इस तरह की वस्तु निर्मित कर ली गई थी. उनके द्वारा अपनी खेती, फसल, शिकार किए गए जानवरों आदि के चित्र दीवार पर बनाने के लिए पत्थर से बने औजार का प्रयोग किया गया. बाद में मिस्र के लोगों ने पेड़-पौधे का उपयोग करके कागज बनाया गया और उस पर लिखने के लिए बांस द्वारा निर्मित पैन बनाया गया. कई सालों तक इसी तरह के पैन उपयोग में लाये जाते रहे. इसके बाद अलग अलग तरीकों से पैन बनाने के लिए लिए बहुत से लोग इस काम में लग गए लेकिन हर पैन में कोई न कोई कमी बनी रही.


M. Klein and Henry W. Wynne received U.S. Patent 68,445 in 1867 for an ink chamber and delivery system in the handle of the fountain pen

लगातार होते रहे विकासपरक आविष्कारों के बाद फाउंटेन पैन का सफल आविष्कार सामने आया. यद्यपि स्याही के देर से सूखने, हाथों के स्याही से गंदे होने, पैन की स्याही बह जाने से कपड़ों के ख़राब होने सम्बन्धी दिक्कतें लगातार बनी रहीं. इसके बाद भी फाउंटेन पैन से लेखन-कार्य अनवरत चलता रहा. इसकी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए कालांतर में बॉल पैन का आविष्कार हुआ और 1938 में बॉल पैन का पहला पैटेंट Laszlo Biro को मिला. आज अनेक तरह के रंग-बिरंगे और आकर्षक बॉल पैन बाज़ार में उपलब्ध हैं. नई पीढ़ी के लेखन का यह महत्त्वपूर्ण अस्त्र बना हुआ है, इसके बाद भी फाउंटेन पैन के शौक़ीन आज भी हैं जो अपने संग्रह में लगातार फाउंटेन पैन एकत्र करते जा रहे हैं.

यह बुलेटिन भले ही फाउंटेन पैन से न लिखी गई हो मगर आप इसका आनंद लीजिये, फाउंटेन पैन पर दी गई संक्षिप्त जानकारी के साथ.

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गुरुवार, 7 मार्च 2019

नकलीपने का खेल : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
अपने आपको तीसमारखां समझने वाला एक नेता टाइप युवक अपने समर्थकों सहित घूमते हुए एक गाँव जा पहुँचा. समर्थकों पर अपना प्रभाव जमाने के लिए उसने कहा कि देखो अभी सिद्ध करके बताता हूँ कि गाँव के लोग बेवकूफ होते हैं. ऐसा कह कर वह गाँव में बनी एक दुकान पर जा पहुँचा. दुकान में एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठे थे. उस युवक ने उनको पैंतीस रुपये का एक नोट देते हुए कहा कि बाबा जरा इसके खुले पैसे दे दो. 

बुजुर्ग नोट देखकर बोले, बेटा ये नोट तो नकली है. पैंतीस रुपये का कोई नोट होता ही नहीं है.

तब वह युवक बड़े ही घमंड में बोला, बाबा ये पैंतीस रुपये का नोट अभी शहर वालों के लिए आया है. गाँव तक आने में समय लगेगा.

बुजुर्ग ने सहमति में सिर्फ हिलाया और फिर अपनी संदूकची से कुछ नोट निकाल कर उस युवक को दिए.

युवक ने देखा कि बुजुर्ग द्वारा दिए गए रुपयों में एक सत्तरह रुपये का और एक अठारह रुपये का नोट है. उसने कहा, बाबा ये क्या? एक सत्तरह का और एक अठारह का, ये तो नकली हैं.

बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा, नहीं बेटा ये नकली नहीं. सरकार ने अभी ये गाँव वालों के लिए ही छपवाए हैं. शहर तक आने में समय लगेगा.



सोच सकते है कि उस युवक की क्या हालत हुई होगी अपने समर्थकों के बीच. मगर समर्थक तो समर्थक ही होते हैं. वे फिर भी उसके साथ हँसते-मुस्कुराते, उसके नारे लगाते आगे बढ़ गए. ऐसा ही कुछ आजकल समाज में हो रहा है. सब अपने-अपने नकलीपने को समाज में चलाने में लगे हैं. दूसरों को आरोपित करने में लगे हैं. और हाँ, सबके समर्थक बस नारेबाजी में मगन हैं, खुश हैं.

आइये हम सब भी खुश हों, आज की बुलेटिन के साथ, यह नकली नहीं, गाँव-शहर सबके लिए एक जैसी है.

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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो,
आज, 28 फरवरी का दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (नेशनल साइंस डे) के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने का उद्देश्य दैनिक जीवन में वैज्ञानिक अनुप्रयोग के महत्व के संदेशों को लोगों के बीच फैलाना, मानव कल्याण के लिए विज्ञान के क्षेत्र की सभी गतिविधियों, प्रयासों और उपलब्धियों को प्रदर्शित करना है. इसके साथ-साथ विज्ञान के विकास के लिए चर्चा करके नई प्रौद्योगिकी को लागू करना भी इसका उद्देश्य है. इस दिवस को देश के प्रसिद्द भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर चंद्रशेखर वेंकटरमन रमन के सम्मान में सन 1986 से प्रतिवर्ष मनाया जाता है. उन्होंने सन 1928 में कोलकाता में इसी दिन एक उत्कृष्ट खोज की थी, जिसे रमन प्रभाव के नाम से जाना जाता है. इस कार्य के लिए उनको 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.  

रमन प्रभाव में एकल तरंगदैर्ध्य प्रकाश (मोनोक्रोमेटिक) किरणें जब किसी पारदर्शक माध्यम ठोस, द्रव या गैस से गुजरती है, उस दौरान प्रकाश की तरंगदैर्ध्य में बदलाव दिखता है. इसका अर्थ यह है कि जब प्रकाश की एक तरंग एक द्रव्य से निकलती है तो इस प्रकाश तरंग का कुछ भाग एक ऐसी दिशा में प्रकीर्ण हो जाता है जो कि आने वाली प्रकाश तरंग की दिशा से भिन्न है. छितराई किरणों का अध्ययन करने पर पता चला कि मूल प्रकाश की किरणों के अलावा स्थिर अंतर पर बहुत कमजोर तीव्रता की किरणें भी उपस्थित होती हैं. इन्हीं किरणों को रमन-किरण भी कहते हैं.


विज्ञान के क्षेत्र में आज रमन किरणों अथवा रमन प्रभाव का ही प्रयोग किया जाता है. जहां भी सैंपल को बिना क्षति पहुंचाए, द्रुतगति से पदार्थ विशेष के कुछ कण पहचान कर निष्कर्ष निकाले जा सकते हों, वहां रमन प्रभाव सबसे अधिक प्रभावी तकनीक प्रदान करता है. रमन प्रभाव का वर्तमान में मुख्य रूप से निम्न प्रक्रियाओं में उपयोग किया जाता है.
औषधियों, पेट्रोकेमिकलों और प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण प्रक्रमों के अध्ययन, मॉनीटरन और गुणवत्ता निर्धारण में.
अपराध विज्ञान में पैकेट्स या बक्सों को बिना खोले उनके अन्दर विद्यमान विशिष्ट पदार्थों (जैसे मादक पदार्थों) के संसूचन (डिटेक्शन) में.
पेंट उद्योग में जैसे-जैसे पेंट सूखता है तो उसमें क्या रसायनिक अभिक्रियाएं होती हैं, इसका अध्ययन करने में.
हानिकारक अथवा रेडियोएक्टिव पदार्थों का सुरक्षित दूरी से अध्ययन करने में.
प्रकाश रसायनज्ञ और प्रकाश-जीववैज्ञानिक 1011 तक औसत आयु के क्षणजीवी रसायनों तक के स्पेक्ट्रम प्राप्त करने में.  
भूगर्भशास्त्र और खनिज-वैज्ञानिक रत्नों और खनिजों की पहचान तथा विभिन्न दशाओं में खनिज-व्यवहार आदि का अध्ययन करने के लिए.  
कार्बन नैनोट्यूबों एवं हीरों की गुणवत्ता और गुणों के अध्ययन के लिए.
जीवन-अध्ययनों जैसे डीएनए/आरएनए विश्लेषण में, रोग निदान, एकल सेल विश्लेषण आदि में.

सम्पूर्ण विश्व में भारतीय मेधा की पताका फहराने वाले इस महान वैज्ञानिक को नमन करने के साथ आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रस्तुत है.

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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज, 21 फरवरी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है. इसको मनाये जाने का उद्देश्य भाषाओं और भाषाई विविधता को बढ़ावा देना है. देखा जाये तो मातृभाषा व्यक्ति के संस्कारों की संवाहक है. मातृभाषा के बिना किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है. यही हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश प्रेम को उत्प्रेरित करती है. मातृभाषा वह भाषा नहीं जो किसी व्यक्ति की माँ बोलती है बल्कि मातृभाषा वह है जो किसी इन्सान को सबसे पहले सोचने-समझने और व्यवहार की अनोपचारिक शिक्षा और समझ देती है.


अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाये जाने के पीछे बांग्लादेश का अपनी भाषा के प्रति समर्पण और उसके लिए संघर्ष प्रमुख है. सन 1948 में पाकिस्तान सरकार ने उर्दू को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दिया. वर्तमान बांग्लादेश को उस समय पूर्वी पाकिस्तान के रूप में जाना जाता था. 21 फरवरी 1952 को ढाका विश्विद्यालय के विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संयुक्त रूप से पाकिस्तान सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए बांग्ला भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देने के लिए प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन को दबाने के लिए पुलिस ने बड़ी बेरहमी दिखाते हुए गोलियाँ बरसाना शुरू कर दिया. इसमें अनेक विद्यार्थी मारे गए. इसके बाद भी विरोध प्रदर्शन बंद न हुए. अंततः 29 फरवरी 1956 को पाकिस्तान सरकार को बांग्ला भाषा को आधिकारिक दर्ज़ा देना पड़ा. बांग्लादेश की मातृभाषा की विजय हुई. परिणामतः यूनेस्को ने 1999 में 1952 के प्रदर्शन में शहीद हुए युवाओं की स्मृति में 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाये जाने की घोषणा की. पहला अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी 2000 को मनाया गया.

आइये अपनी मातृभाषा का सम्मान करते हुए आज की बुलेटिन का आनंद लें.

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