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रविवार, 13 मार्च 2016

बिजय बाबू, बैंक और बेहद बुरी ब्लॉग बुलेटिन

अभी अगिला हफ्ता (बिहार में बहुत सा लोग पिछला को अगिला कहते हैं जैसे अगिला साल आपसे मुलाकात हुआ ‘था’) के हीरो थे लाल देह लाली लसै वाले सफेद दाढ़ी मोंछ अऊर चोटी रखने वाले सिरीमान बिजय मालया जी. इस बीच उनको जेतना गाली मिला उससे जादा गाली बैंक वालों को मिला. लोग के मन में टैक्स देने (टैक्स चोराने वाले भी ई भीड़ में सामिल हो जाता है) वाले का पइसा डूब जाने का बहुत बड़ा अफसोस भी था. बहुत सा लोग के मन में गरीब-मजदूर-किसान के प्रति भी दरद देखने को मिला कि अगर ऊ बेचारा करजा नहीं चुका पाता है त बैंक वाला कइसे उसका देह का खाल उतार लेता है. मीडिया में वीडियो देखाकर साबित करने का कोसिस किया गया कि बैंक वाला भी पूँजीपति का साथ देता है अऊर गरीब-मजदूर-किसान का बिरोधी है.

जाने दीजिये ऊ सब बात. तनी इलेक्सन के टाइम में नेता लोग का भासन पर गौर कीजिये. “हमारी पार्टी अगर सत्ता में आएगी तो आप लोगों के सारे कर्ज़ माफ़ कर देगी.” “हमारी पार्टी सभी जरूरतमन्द उद्यमी और किसान को नया कर्ज़ देगी ताकि वो अपना खोया रोजगार पा सकें”. भाई साहेब, ई जो कर्जा आप माफ़ किये हैं, चाहे जो आँख बन्द करके लोन देने का घोसना कर रहे हैं ऊ पइसा का आपके पापाजी रख गये थे कि दहेज में मिला था आपको.

आप सिसु, किसोर, तरुन लोन का घोसना कर दिये. अखबार में पूरा पेज का बिग्यापन छाप दिये हाथ जोड़कर फोटो लगा दिये कि अपना घर के सामने जाओ और ले लो लोन. अऊर बैंक को लाठी देखा दिये कि एतना करोड़ लोन मार्च तक करना है. अब सुनिये हमरे बैंक से का फोन आता है.
”वर्मा जी! आपके कितने शिशु हो गये?”
”सर! कोशिश कर रहा हूँ हो जाएँगे!”
”हो जाएँगे का क्या मतलब! परमार के 15 शिशु हो गये!”
”सर! वो जवान लड़का है. मेरी उम्र भी तो देखिये!”
”वो सब बहाना नहीं चलेगा. 25 तारीख़ तक 25 शिशु हो जाने चाहिये!”
उधर बैंक के दरवाजे पर मेला लगा हुआ है कि हमको लोन दो, सरकार ने हमारे लिये योजना बनाई है. सुनिये जल्दी से लोन मंजूर कीजिये यहाँ से दूसरा बैंक में भी लोन लेने जाना है.
“ठीक है! ये बताइये आपको किस काम के लिये लोन चाहिये?”
”आप लोन दे दीजिये, काम हम सोच लेंगे!”
बचपन से एही सुनते आये हैं कि चोरी चाहे हजार का हो चाहे लाख का, चोरी त चोरिये होता है. अब सरकार का दखल (सरकारी बैंक का मालिक है सरकार) एतना है कि बैंक साँप अऊर छुछुन्दर वाला हाल में होता है. सबको अपना प्रोमोसन, तरक्की का चाह हो न हो, सजा अऊर झूठा इल्जाम में सजा से बहुत डर लगता है. नतीजा “किंगफिशर”.

सब लोग बैंक को गाली दे रहे हैं अऊर सब आजकल प्रोजेक्ट फायनेंस का एक्स्पर्ट बने घूम रहे हैं. बाकी सोचिये जो बात आपको बुझाता है, ऊ स्टेट बैंक को नहीं बुझाता होगा? जबकि ऊ लोग का लोन देने का तरीका बहुत सख्त है. मगर पॉलिटिक्स जो न कराए.

बिजय बाबू को कोई नेता सफेद कॉलर वाला आतंकवादी बताया. ए भाई, ई नेता लोग पावर नाम का पिस्तौल कनपटी पर रखकर देस का हवाई जहाज हाइजैक किये जा रहा है, उसको कोई आतंकवादी नहीं कहता है.

बहुत खराब हो गया ई बुलेटिन. मगर का कीजियेगा, हम भगवान सिव थोड़े न हैं कि मुँह का स्वाद कड़वा हो तब्बो नीलकण्ठ कहाएँ. आप लोग अच्छा अच्छा पोस्ट का आनन्द लीजिये, रहे हम... त बिहारी है बिहारी के बात का क्या!!

(डिस्क्लेमर: इस पोस्ट में जहाँ भी सरकार, नेता आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है उसका तात्पर्य देश की राजनैतिक व्यवस्था से है, न कि किसी पार्टी विशेष अथवा सरकार विशेष से है.)

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