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ब्लॉग बुलेटिन - ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो,
आज, 28 फरवरी का दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (नेशनल साइंस डे) के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने का उद्देश्य दैनिक जीवन में वैज्ञानिक अनुप्रयोग के महत्व के संदेशों को लोगों के बीच फैलाना, मानव कल्याण के लिए विज्ञान के क्षेत्र की सभी गतिविधियों, प्रयासों और उपलब्धियों को प्रदर्शित करना है. इसके साथ-साथ विज्ञान के विकास के लिए चर्चा करके नई प्रौद्योगिकी को लागू करना भी इसका उद्देश्य है. इस दिवस को देश के प्रसिद्द भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर चंद्रशेखर वेंकटरमन रमन के सम्मान में सन 1986 से प्रतिवर्ष मनाया जाता है. उन्होंने सन 1928 में कोलकाता में इसी दिन एक उत्कृष्ट खोज की थी, जिसे रमन प्रभाव के नाम से जाना जाता है. इस कार्य के लिए उनको 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.  

रमन प्रभाव में एकल तरंगदैर्ध्य प्रकाश (मोनोक्रोमेटिक) किरणें जब किसी पारदर्शक माध्यम ठोस, द्रव या गैस से गुजरती है, उस दौरान प्रकाश की तरंगदैर्ध्य में बदलाव दिखता है. इसका अर्थ यह है कि जब प्रकाश की एक तरंग एक द्रव्य से निकलती है तो इस प्रकाश तरंग का कुछ भाग एक ऐसी दिशा में प्रकीर्ण हो जाता है जो कि आने वाली प्रकाश तरंग की दिशा से भिन्न है. छितराई किरणों का अध्ययन करने पर पता चला कि मूल प्रकाश की किरणों के अलावा स्थिर अंतर पर बहुत कमजोर तीव्रता की किरणें भी उपस्थित होती हैं. इन्हीं किरणों को रमन-किरण भी कहते हैं.


विज्ञान के क्षेत्र में आज रमन किरणों अथवा रमन प्रभाव का ही प्रयोग किया जाता है. जहां भी सैंपल को बिना क्षति पहुंचाए, द्रुतगति से पदार्थ विशेष के कुछ कण पहचान कर निष्कर्ष निकाले जा सकते हों, वहां रमन प्रभाव सबसे अधिक प्रभावी तकनीक प्रदान करता है. रमन प्रभाव का वर्तमान में मुख्य रूप से निम्न प्रक्रियाओं में उपयोग किया जाता है.
औषधियों, पेट्रोकेमिकलों और प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण प्रक्रमों के अध्ययन, मॉनीटरन और गुणवत्ता निर्धारण में.
अपराध विज्ञान में पैकेट्स या बक्सों को बिना खोले उनके अन्दर विद्यमान विशिष्ट पदार्थों (जैसे मादक पदार्थों) के संसूचन (डिटेक्शन) में.
पेंट उद्योग में जैसे-जैसे पेंट सूखता है तो उसमें क्या रसायनिक अभिक्रियाएं होती हैं, इसका अध्ययन करने में.
हानिकारक अथवा रेडियोएक्टिव पदार्थों का सुरक्षित दूरी से अध्ययन करने में.
प्रकाश रसायनज्ञ और प्रकाश-जीववैज्ञानिक 1011 तक औसत आयु के क्षणजीवी रसायनों तक के स्पेक्ट्रम प्राप्त करने में.  
भूगर्भशास्त्र और खनिज-वैज्ञानिक रत्नों और खनिजों की पहचान तथा विभिन्न दशाओं में खनिज-व्यवहार आदि का अध्ययन करने के लिए.  
कार्बन नैनोट्यूबों एवं हीरों की गुणवत्ता और गुणों के अध्ययन के लिए.
जीवन-अध्ययनों जैसे डीएनए/आरएनए विश्लेषण में, रोग निदान, एकल सेल विश्लेषण आदि में.

सम्पूर्ण विश्व में भारतीय मेधा की पताका फहराने वाले इस महान वैज्ञानिक को नमन करने के साथ आज की बुलेटिन आपके समक्ष प्रस्तुत है.

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बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

88वां बलिदान दिवस - पंडित चंद्रशेखर आजाद जी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
Chandrashekhar-Azad.jpg
पंडित चंद्रशेखर आज़ाद (अंग्रेज़ी: Pt. Chandrashekhar Azad, जन्म- 23 जुलाई, 1906; मृत्यु- 27 फ़रवरी, 1931) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। 17 वर्ष के चंद्रशेखर आज़ाद क्रांतिकारी दल ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ में सम्मिलित हो गए। दल में उनका नाम ‘क्विक सिल्वर’ (पारा) तय पाया गया। पार्टी की ओर से धन एकत्र करने के लिए जितने भी कार्य हुए, चंद्रशेखर उन सबमें आगे रहे। सांडर्स वध, सेण्ट्रल असेम्बली में भगत सिंह द्वारा बम फेंकना, वाइसराय को ट्रेन बम से उड़ाने की चेष्टा, सबके नेता वही थे। इससे पूर्व उन्होंने प्रसिद्ध ‘काकोरी कांड’ में सक्रिय भाग लिया और पुलिस की आंखों में धूल झोंककर फरार हो गए। एक बार दल के लिये धन प्राप्त करने के उद्देश्य से वे गाजीपुर के एक महंत के शिष्य भी बने। इरादा था कि महंत के मरने के बाद मरु की सारी संपत्ति दल को दे देंगे।

चन्द्रशेखर आज़ाद घूम–घूमकर क्रान्ति प्रयासों को गति देने में लगे हुए थे। आख़िर वह दिन भी आ गया, जब किसी मुखबिर ने पुलिस को यह सूचना दी कि चन्द्रशेखर आज़ाद 'अल्फ़्रेड पार्क' में अपने एक साथी के साथ बैठे हुए हैं। वह 27 फ़रवरी, 1931 का दिन था। चन्द्रशेखर आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार–विमर्श कर रहे थे। मुखबिर की सूचना पर पुलिस अधीक्षक 'नाटबाबर' ने आज़ाद को इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में घेर लिया। "तुम कौन हो" कहने के साथ ही उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना नाटबाबर ने अपनी गोली आज़ाद पर छोड़ दी। नाटबाबर की गोली चन्द्रशेखर आज़ाद की जाँघ में जा लगी। आज़ाद ने घिसटकर एक जामुन के वृक्ष की ओट लेकर अपनी गोली दूसरे वृक्ष की ओट में छिपे हुए नाटबाबर के ऊपर दाग़ दी। आज़ाद का निशाना सही लगा और उनकी गोली ने नाटबाबर की कलाई तोड़ दी। एक घनी झाड़ी के पीछे सी.आई.डी. इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह छिपा हुआ था, उसने स्वयं को सुरक्षित समझकर आज़ाद को एक गाली दे दी। गाली को सुनकर आज़ाद को क्रोध आया। जिस दिशा से गाली की आवाज़ आई थी, उस दिशा में आज़ाद ने अपनी गोली छोड़ दी। निशाना इतना सही लगा कि आज़ाद की गोली ने विश्वेश्वरसिंह का जबड़ा तोड़ दिया।

बहुत देर तक आज़ाद ने जमकर अकेले ही मुक़ाबला किया। उन्होंने अपने साथी सुखदेवराज को पहले ही भगा दिया था। आख़िर पुलिस की कई गोलियाँ आज़ाद के शरीर में समा गईं। उनके माउज़र में केवल एक आख़िरी गोली बची थी। उन्होंने सोचा कि यदि मैं यह गोली भी चला दूँगा तो जीवित गिरफ्तार होने का भय है। अपनी कनपटी से माउज़र की नली लगाकर उन्होंने आख़िरी गोली स्वयं पर ही चला दी। गोली घातक सिद्ध हुई और उनका प्राणांत हो गया। इस घटना में चंद्रशेखर आज़ाद की मृत्यु हो गई और उन्हें पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया। उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उन्हें तीन या चार गोलियाँ लगी थीं।


आज अमर बलिदानी तथा महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित चंद्रशेखर आजाद जी के 88वें बलिदान दिवस पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं। सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

कुछ बड़ा हो ही गया : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार मित्रो,
सुबह आँख खुले और खबर ऐसी मिले तो निश्चय ही सीना 56 इंच से कहीं अधिक बड़ा समझ आने लगता है. समाचार-पत्रों की अपनी बाध्यताएं होने के कारण यह खुशखबरी उनके द्वारा तो नहीं मिली मगर नियमित रूप से सुबह-सुबह ताजा खबरों के लिए जैसे ही नेट की खिड़की को खोला तो गौरवपूर्ण एक झोंका अन्दर उतरता चला गया. अपनी तसल्ली के लिए कई-कई जगहों पर घूम-फिर कर देखा तो सभी जगह उसी तरह की आनंदित, गौरवशाली बयार चल रही थी. सभी उसकी शीतलता में, उसके जोश में उत्साहित नजर आ रहे थे. सब भारत माता की जय, जय हिन्द, जय हिन्द की सेना के जयघोष के साथ उल्लासित दिखाई दे रहे थे.

आखिर खबर ही ऐसी थी. पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर बड़ी कार्रवाई की खबर. भारत के 12 मिराज 2000 जेट ने पाकिस्तान में 1000 किलो के बम गिराए. भारतीय वायुसेना के इस एयरस्ट्राइक में 200-300 आतंकवादी मारे जाने की खबर.


ऐसी खबरें सुनकर किसी भी उस भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो ही जायेगा जो पुलवामा में आतंकी हमले में जवानों की मौत का बदला लेना चाहता होगा. यद्यपि पुलवामा हमले के कुछ घंटों के भीतर ही उस हमले के मास्टरमाइंड को सेना ने मार गिराया था किन्तु कुछ बड़ा होने वाला है की सोच के साथ भारतीय नागरिक उससे संतुष्ट नहीं थे. ऐसे में भारतीय वायुसेना के 12 मिराज 2000 एयरक्राफ्ट ने बालाकोट, चकोटी और मुजफ्फराबाद में बम गिराए जाने, कई आतंकी लॉन्च पैड ध्वस्त होने की खबर ने कुछ राहत दी है. खबर यह भी है कि इस हमले में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का कंट्रोल रूम अल्फा-3 भी पूरी तरह ध्वस्त हो गया है. पुलवामा हमले के बाद ऐसी एक प्रतिक्रिया की आवश्यकता भी महसूस हो रही थी. इससे न केवल पाकिस्तान को सबक मिलेगा वरन भारतीय सेना का, सैनिकों का हौसला भी बढ़ेगा.

इस कार्यवाही का तिथिवार भी अपना महत्त्व है. पुलवामा में हमारे सैनिकों पर हमला हुआ था 14 फरवरी को. 26 फरवरी उनके त्रयोदशी संस्कार पर भारतीय वायुसेना ने सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है जवानों को.

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सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

122वीं जयंती - अमरनाथ झा और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
अमरनाथ झा
अमरनाथ झा (अंग्रेज़ी: Amarnath Jha, जन्म: 25 फ़रवरी, 1897; मृत्यु: 2 सितम्बर, 1955) भारत के प्रसिद्ध विद्वान, साहित्यकार और शिक्षा शास्त्री थे। वे हिन्दी के प्रबल समर्थकों में से एक थे। हिन्दी को सम्माननीय स्तर तक ले जाने और उसे राजभाषा बनाने के लिए अमरनाथ झा ने बहुमूल्य योगदान दिया था। उन्हें एक कुशल वक्ता के रूप में भी जाना जाता था। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना भी की। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 1954 में 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया था।

जन्म तथा शिक्षा

अमरनाथ झा का जन्म 25 फ़रवरी, 1897 ई. को बिहार के मधुबनी ज़िले के एक गाँव में हुआ था। उनके पिता डॉ. गंगानाथ झा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान् थे। अमरनाथ झा की शिक्षा इलाहाबाद में हुई। एम.ए. की परीक्षा में वे 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' में सर्वप्रथम रहे थे। उनकी योग्यता देखकर एम.ए. पास करने से पहले ही उन्हें 'प्रांतीय शिक्षा विभाग' में अध्यापक नियुक्त कर लिया गया था।

अमरनाथ झा ने सन 1903 से 1906 तक कर्नलगंज स्कूल में पढ़ाई की। सन 1913 में स्कूल लिविंग परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण और अंग्रेज़ी, संस्कृत एवं हिंदी में विशेष योग्यता प्राप्त की। फिर 1913 से 1919 तक आप म्योर सेंटर कॉलेज, प्रयाग में शिक्षा ग्रहण करते रहे। इन्हीं दिनों 1915 में इंटरमीडिएट में विश्वविद्यालय में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। फिर 1917 में बीए की परीक्षा एवं 1919 में एम.ए. की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। सन 1917 में म्योर कॉलेज में 20 वर्ष की अवस्था में ही अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर हुए। सन 1929 में विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर हुए। 1921 में प्रयाग म्युनिसिपलिटी के सीनियर वाइस चेयरमैन हुए। उसी वर्ष पब्लिक लाइब्रेरी के मंत्री हुए। आप पोएट्री सोसाइटी, लंदन के उपसभापति रहे और रॉयल सोसाइटी ऑफ लिटरेचर के फेलो भी रहे। 1938 से 1947 तक प्रयाग विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे। 1948 में अमरनाथ पब्लिक सर्विस कमीशन के चेयरमैन हुए।

अमरनाथ झा की नियुक्त 1922 ई. में अंग्रेज़ी अध्यापक के रूप में 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' में हुई। यहाँ वे प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहने के बाद वर्ष 1938 में विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर बने और वर्ष 1946 तक इस पद पर बने रहे। उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय ने बहुत उन्नति की और उसकी गणना देश के उच्च कोटि के शिक्षा संस्थानों मे होने लगी। बाद में उन्होंने एक वर्ष 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' के वाइस चांसलर का पदभार सम्भाला तथा उत्तर प्रदेश और बिहार के 'लोक लेवा आयोग' के अध्यक्ष रहे।

रचनाएं

अमरनाथ झा की रचनाएं निम्नलिखित हैं
  1. संस्कृत गद्य रत्नाकर (1920)
  2. दशकुमारचरित की संस्कृत टीका (1916)
  3. हिंदी साहित्य संग्रह (1920)
  4. पद्म पराग (1935)
  5. शेक्सपियर कॉमेडी (1929)
  6. लिटरेरी स्टोरीज (1929)
  7. हैमलेट (1924)
  8. मर्चेंट ऑफ वेनिस (1930)
  9. सलेक्शन फ्रॉम लार्ड मार्ले (1919)
  10. विचारधारा (1954)
  11. हाईस्कूल पोएट्री

प्रतिभाशाली

अमरनाथ झा कई महत्वपूर्ण कार्यों के लिए विदेश गए। शिक्षा जगत के आप स्तंभ थे। आप एक उच्च कोटि के शासक थे और साथ ही खिलाड़ी भी। शिक्षा जगत में आपके कार्य अत्यंत सराहनीय हैं। अमरनाथ जी का अध्ययन विशाल था। हिंदी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेज़ी सभी भाषाओं के साहित्य से बहुत प्रेम करते थे। ‘विचारधारा' नामक हिंदी पुस्तक में आपकी आलोचनाओं से इसका पता चलता है। आप बंगाली के भी अध्येता थे और संगीत प्रेमी भी थे। साथ ही आपको चित्रकला से भी लगाव था। आपकी भावना सीमा बद्ध नहीं थी। आधुनिकता से प्रभावित एक वैज्ञानिक विचारक थे।

झा साहब 'नागरी प्रचारिणी सभा' के अध्यक्ष रहे तथा हिंदी साहित्य के वृहत इतिहास के प्रधान संपादक थे। विभिन्न रूपों में की गई आपकी सेवाएं चिरस्मरणीय रहेंगी।

पुरस्कार व सम्मान

डॉ. अमरनाथ झा अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। इलाहाबाद और आगरा विश्वविद्यालयों ने उन्हें एल.एल.ड़ी. की और 'पटना विश्वविद्यालय' ने डी.लिट् की उपाधि प्रदान की थी। वर्ष 1954 में उन्हें 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया।

हिन्दी को राजभाषा बनाने के प्रश्न पर विचार करने के लिए जो आयोग बनाया था, उसके एक सदस्य डॉ. अमरनाथ झा भी थे। वे हिन्दी के समर्थक थे और खिचड़ी भाषा उन्हें स्वीकर नहीं थी। डॉ. अमरनाथ झा ने अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।

निधन 

एक कुशल वक्ता के तौर पर भी अमरनाथ झा जाने जाते थे। उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना भी की। देश और समाज के लिए अपना बहुमूल्य योगदान देने वाले इस महापुरुष का 2 सितम्बर, 1955 को देहांत हो गया।


आज महान साहित्यकार और शिक्षाविद अमरनाथ झा जी की 122वीं जयंती पर हम सब उन्हें स्मरण करते हुए शत शत नमन करते हैं। सादर।।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~

कश्मीरियों को जोड़िए, तोड़िए नहीं

सम्भल के रहना अपने घर में .....

समकालीन हिन्दी चिट्ठों के मार्फत एक विमर्श।

व्हाटसएप, फेसबुक और ट्विटर आदि की चौपालों पर आ बैठा मुफ्तिया सलाहकारी का धंधा

अब इसका क्या शीर्षक हो भला...

रोहितास गढ़ और उराँव समाज-----!

भारत पाक के बीच पानी के लेकर पुरानी है खींचतान

रिश्ते भी स्मार्ट होने चाहिए

क्या अब कार्टून कम नहीं हो गए हैं?

छोड़ आए हम वो गलियां... यादों की अंगनाई में जालंधर

हाथ पर हाथ क्यों धरे बैठे ? इतनी कुर्षी से मुहब्बत क्यों है

डर कैसा

आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभसंध्या। सादर ... अभिनन्दन।।

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

भारतीय माता-पिता की कुछ बातें - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

चित्र गूगल से साभार
आज आपको भारतीय माता-पिता की कुछ बातें बता रहा हूँ जो किसी भी काल खण्ड में सटीकता से फिट होती हैं ...

1. पैसे पेड़ पे नहीं उगते।

2. बेटा: माँ मैं पार्टी के लिए जाऊं? माँ: पिता जी से पूछ लो। पिता जी: माँ से पूछ लो।

3. अगर 8 बजे तक घर नहीं आये तो वापस आने की ज़रूरत नहीं है।

4. अगर पढ़-लिख कर कुछ अच्छा नहीं करोगे तो उसकी तरह बन जाओगे।(किसी बेरोज़गार, बेघर की उदाहरण देकर)

5. बेटे अभी पढ़ लो बाद में तो ऐश ही ऐश है।

6. ज़रा तुम्हारे अपने बच्चे होने दो।

8. अंकल-आंटी के पैर छुओ, चलो आशीर्वाद लो।

9. बेटा: माँ मेरे गणित में 100 में से 90 नंबर आये। माँ: क्लास में सबसे ज्यादा नंबर किसके आये हैं।

10. जाओ और जाकर पढाई करो। ये दोस्त नही आने वाले तुम्हारे एग्जाम देने।

11. तुमको ही सब पता है, हमने तो दुनिया देखि ही नहीं है न।

12. हमारी बात सुनना कब शुरू करोगे?

13. कहाँ थे लाट साहब? ये कोई टाइम है घर आने का।

14. घुस जा टीवी के अंदर, जीतने के बाद कप तुझे ही मिलने वाला है।

15. हमारे टाइम में तो ऐसे नहीं होता था।

16. जब खुद कमाओगे तब पता चलेगा।

17. क्या तुम्हारे दोस्त भी अपने माँ-बाप से ऐसे ही बात करते हैं।

18. इसके तो पर निकल आये हैं।

19. दोपहर में भी लाइट क्यों जलाते हो?

20. क्या सोचा है तुमने आगे के बारे में?


सादर आपका
शिवम् मिश्रा

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हुवा हुवा का शोर हुवा कहीं हुवा कुछ जैसे और बड़ा जबरजोर हुवा

गाली गलोच और बलात्कार जैसी घृणित टिप्पणियों का सोशल मीडिया

मैं तुझसे लड़ने आया ग़म

चोरी

भाई का घर

आईने तोड़ देने से शक्ले नही बदला करती

थोड़ा दोस्ताना हो जायें--

नापाक को पाक करो

समकालीन हिन्दी ब्लॉग: एक विहंगवालोकन

जन्नत लहूलुहान

झाँसी ओरछा की घुमक्कड़ी #5: मंदिर, कोठियाँ ,छतरियाँ इत्यादि

सूरज कुण्ड ग्वालियर

सूरज कुंड मेले में बिताया कुछ वक्त

सफाईकर्मियों के पैर धोकर प्रधानसेवक ने किया वंदन 

'अमर' अंकल पई की आठवीं पुण्यतिथि पर उन्हें नमन

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!! 

शनिवार, 23 फ़रवरी 2019

अनियमित जमा योजनाओं पर प्रतिबंध लगाने का कदम और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने अनियमित जमा योजना और चिट फंडों (संशोधन) पर प्रतिबंध लगाने के नए विधेयकों, अनियमित जमा योजनाओं पर प्रतिबंध लगाने संबंधी विधेयक 2018 और चिट फंड (संशोधन) विधेयक 2018 को मंजूरी दी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने निवेशकों की बचतों की रक्षा करने के लिए एक प्रमुख नीतिगत पहल करते हुए अनियमित जमा योजनाओं पर प्रतिबंध लगाने संबंधी विधेयक 2018 को संसद में पेश करने की मंजूरी दे दी. इसका उद्देश्य देश में गैर-कानूनी जमा राशि से जुड़ी समस्याओं से निपटना है. ऐसी योजनाएं चला रही कंपनियां/संस्थान वर्तमान नियामक अंतरों का लाभ उठाते हैं और कड़े प्राशासनिक उपायों के अभाव में गरीबों और भोले-भाले लोगों को ठगते हैं.

इस विधेयक के द्वारा निम्न कानूनी कदम उठाये जायेंगे.
(क) अनियमित जमा राशि से संबंधित गतिविधियों पर पूर्ण रोक.
(ख) अनियमित जमा राशि लेने वाली योजना को बढ़ावा देने अथवा उनके संचालन के लिए सजा.
(ग) जमाकर्ताओं को अदायगी करते समय धांधली के लिए कड़ी सजा.
(घ) जमा करने वाले प्रतिष्ठानों द्वारा चूक की स्थिति में जमा राशि की अदायगी सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा एक सक्षम प्राधिकार की नियुक्ति.
(ङ) चूक करने वाले प्रतिष्ठान की संपत्ति कुर्क करने के लिए अधिकार देने सहित सक्षम प्राधिकार की शक्तियां और कामकाज.
(च) जमाकर्ताओं की अदायगी की निगरानी और अधिनियम के अंतर्गत अपराधों पर कार्रवाई करने के लिए अदालतों का गठन.
(छ) विधेयक में नियमित जमा योजनाओं को सूचीबद्ध करना, जिसमें सूची का विस्तार करने अथवा काट-छांट करने के लिए केन्द्र सरकार को सक्षम बनाने का खंड हो.


विधेयक में प्रतिबंध लगाने संबंधी एक मूलभूत खंड हैं, इसका प्रमुख नियम यह है कि विधेयक अनियमित जमा राशि लेने वाली गतिविधियों पर रोक लगाएगा. इसे वर्तमान कानून और नियामक ढांचे के बजाय प्रत्याशित अपराध माना जाएगा, जो पर्याप्त समय के साथ यथार्थ निवेश पर लागू होगा. इसमें तीन अलग-अलग प्रकार के अपराध, (1) अनियमित जमा योजनाओं को चलाना, (2) नियमित जमा योजनाओं में धांधली (3) अनियमित जमा योजनाओं को गलत तरीके से प्रोत्साहन, निर्धारित किए गए हैं. इसके साथ-साथ विधेयक में सक्षम प्राधिकार द्वारा संपत्तियों/परिसंपत्तियों को कुर्क करने और जमाकर्ताओं को अदायगी के लिए सम्‍पत्ति की अनुवर्ती वसूली का प्रावधान किया गया है. एक विस्तृत केन्द्रीय कानून होने के कारण विधेयक में कानून की सर्वश्रेष्ठ प्रक्रियाओं को अपनाया गया है साथ ही कानून के प्रावधानों को लागू करने की प्रमुख जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई है.

इस विधेयक के द्वारा पोंजी स्कीम पर नियंत्रण लगने की बात कही जा रही है. पोंजी स्कीम से आशय ऐसे फर्जी निवेश ऑपरेशन से है, जिसमें ऑपरेटर पुराने निवेशकों को रिटर्न नए निवेशकों से प्राप्त धनराशि से देता है. इस स्कीम में वास्तव में कोई कारोबार या किसी व्यावसायिक गतिविधि में पैसा नहीं लगाया जाता बल्कि कुछ व्यक्तियों से पैसा इकठ्ठा कर एक व्यक्ति को रिटर्न के रूप में दे दिया जाता है. इस तरह यह एक चेन बन जाती है जिसमें ज्यादातर लोगों का पैसा डूब जाता है. इटली का एक व्यावसायी चा‌र्ल्स पोंजी ऐसी ही स्कीम चलाकर लोगों का पैसा हजम करता था. इसी कारण ऐसी स्कीम को पोंजी स्कीम के नाम से जाना जाता है.


इस कामना के साथ कि लोगों का धन किसी धोखेबाज द्वारा लूटा न जाये, आज की बुलेटिन का आनंद उठायें.

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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

भाखड़ा नांगल डैम" पर निबंध - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

हिंदी की परीक्षा में "भाखड़ा नांगल डैम" पर निबंध लिखने को आया।

भाखड़ा नांगल डैम सतलज नदी पर बना हुआ है।

सतलज नदी पंजाब में है।

पंजाब सरदारो का देश है।

सरदार पटेल भी एक सरदार थे।

उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा जाता है।

लोहा टाटा में बनता है।

टाटा हाथ से किया जाता है।

क़ानून के हाथ बड़े लंबे होते हैं।

पंडित जवाहर लाल नेहरू भी क़ानून जानते थे।

उन्हें बच्चे चाचा नेहरू के नाम से पुकारते थे।

चाचा नेहरू को गुलाब बहुत पसंद था।

गुलाब 3 किस्म के होते हैं।

पीने वाला शरबत, खिलने वाला और गुलाबरी होता है।

गुलाबरी बहुत मीठा होता है।

मीठी तो चीनी भी होती है।

चीनी अक्सर चींटी खाती है।

हाथी की चींटी से सख्त नफरत है।

लन्दन का हाथी बहुत विख्यात है।

लन्दन जर्मनी के पास है।

जर्मनी का वार बहुत फेमस है।

वार 8 तरह के होते हैं....

सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार और वर्ल्डवार।

वर्ल्ड वार बहुत खतरनाक होते हैं।

खतरनाक तो शेर भी होता है।

40 सेर का एक मन होता है।

मन बहुत चंचल होता है।

चंचल मेरे पीछे बैठती है।

चंचल मधुबाला की छोटी बहन है।

मधुबाला ने फ़िल्म शक्ति में काम किया है।

शक्ति मुठ्ठी में होती है।

छोटे छोटे झगडे में मुठ्ठी बांध कर मारने का शौक़ पंजाबियों का होता है।

पंजाबी पंजाब में रहते हैं।

पंजाब में भाखड़ा नांगल डैम है।

कॉपी चेक करने वाला आज भी इस अद्भुत बालक को ढूंढ रहा हैं।


सादर आपका 
 शिवम् मिश्रा
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टुकड़े दिल के

दोस्ती ज़िंदाबाद

मिजोरम की चोटियाँ

सलाह

धीर पड़त नही पल छिन

सच क्या है

ताना बाना : अश्वत्थामा

हिंदुस्तान में कितने पाकिस्तान?

क़रार

अर्चना वर्मा की स्मृति और उनकी कविताएँ : कर्ण सिंह चौहान

क्या है धारा 370

बच्चा-ईश्वर का मनोरंजक खिलौना

शत्रु कपटी हो, शक्तिशाली हो तो कपट से या छिप कर मारें

मातृभाषा

बारूदी खेती (लघुकथा)

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अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!! 

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
आज, 21 फरवरी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है. इसको मनाये जाने का उद्देश्य भाषाओं और भाषाई विविधता को बढ़ावा देना है. देखा जाये तो मातृभाषा व्यक्ति के संस्कारों की संवाहक है. मातृभाषा के बिना किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है. यही हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश प्रेम को उत्प्रेरित करती है. मातृभाषा वह भाषा नहीं जो किसी व्यक्ति की माँ बोलती है बल्कि मातृभाषा वह है जो किसी इन्सान को सबसे पहले सोचने-समझने और व्यवहार की अनोपचारिक शिक्षा और समझ देती है.


अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाये जाने के पीछे बांग्लादेश का अपनी भाषा के प्रति समर्पण और उसके लिए संघर्ष प्रमुख है. सन 1948 में पाकिस्तान सरकार ने उर्दू को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दिया. वर्तमान बांग्लादेश को उस समय पूर्वी पाकिस्तान के रूप में जाना जाता था. 21 फरवरी 1952 को ढाका विश्विद्यालय के विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संयुक्त रूप से पाकिस्तान सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए बांग्ला भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देने के लिए प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन को दबाने के लिए पुलिस ने बड़ी बेरहमी दिखाते हुए गोलियाँ बरसाना शुरू कर दिया. इसमें अनेक विद्यार्थी मारे गए. इसके बाद भी विरोध प्रदर्शन बंद न हुए. अंततः 29 फरवरी 1956 को पाकिस्तान सरकार को बांग्ला भाषा को आधिकारिक दर्ज़ा देना पड़ा. बांग्लादेश की मातृभाषा की विजय हुई. परिणामतः यूनेस्को ने 1999 में 1952 के प्रदर्शन में शहीद हुए युवाओं की स्मृति में 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाये जाने की घोषणा की. पहला अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी 2000 को मनाया गया.

आइये अपनी मातृभाषा का सम्मान करते हुए आज की बुलेटिन का आनंद लें.

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बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

नमन - नामवर सिंह और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
26 जुलाई 1926 में यूपी के चंदौली जिले के जीयनपुर गांव में पैदा हुए डॉ. नामवर सिंह हिंदी साहित्य के बड़े रचनाकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे। उनकी गिनती हिंदी साहित्य जगत के बड़े समालोचकों में थी।

हिंदी के मशहूर साहित्यकार और समालोचक डॉक्टर नामवर सिंह का निधन हो गया है। दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मंगलवार रात तकरीबन 11.50 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। खराब सेहत की वजह से पिछले कुछ समय से वह एम्स में भर्ती थे।

इसी साल जनवरी में वह अपने घर में अचानक गिर गए थे। इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों के मुताबिक लोधी रोड स्थित श्मशान घाट पर बुधवार दोपहर बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। 26 जुलाई 1926 में यूपी के चंदौली जिले के जीयनपुर गांव में पैदा हुए डॉ. नामवर सिंह हिंदी साहित्य के बड़े रचनाकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे। उनकी गिनती हिंदी साहित्य जगत के बड़े समालोचकों में थी। उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था।

डॉ. नामवर सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के अलावा दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में लंबे अरसे तक अध्यापन कार्य किया था। बीएचयू से हिंदी साहित्य में एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल करने वाले नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य जगत में आलोचना को नया मुकाम दिया। जेएनयू से पहले उन्होंने सागर और जोधपुर यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाया। जनयुग और आलोचना नाम की दो हिंदी पत्रिकाओं के वह संपादक भी रहे। 1959 में उन्होंने चकिया-चंदौली सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ा लेकिन हार के बाद बीएचयू में पढ़ाना छोड़ दिया।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने उनके निधन पर ट्वीट में लिखा, 'हिंदी में फिर सन्नाटे की खबर। नायाब आलोचक, साहित्य में दूसरी परम्परा के अन्वेषी, डॉ नामवर सिंह नहीं रहे। मंगलवार को आधी रात होते-न-होते उन्होंने आखिरी सांस ली। कुछ समय से एम्स में भर्ती थे। 26 जुलाई को वह 93 के हो जाते। उन्होंने अच्छा जीवन जिया, बड़ा जीवन पाया। नतशीश नमन।'

रचनाएं
बकलम खुद - व्यक्तिव्यंजक निबन्धों का संग्रह, कविताओं तथा विविध विधाओं की गद्य रचनाओं के साथ संकलित

शोध 
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग - 1952
पृथ्वीराज रासो की भाषा - 1956 (अब संशोधित संस्करण 'पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य' नाम से उपलब्ध)

आलोचना
आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां - 1954
छायावाद - 1955
इतिहास और आलोचना - 1957
कहानी : नयी कहानी - 1964
कविता के नये प्रतिमान - 1968
दूसरी परंपरा की खोज - 1982
वाद विवाद और संवाद - 1989


आज हम सब हिंदी साहित्य में नामवर सिंह जी के स्थान और योगदान का स्मरण करते हुए उन्हें शत शत नमन करते हैं।

~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

आइये बनें हम भी सैनिक परिवार का हिस्सा : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
पुलवामा में आतंकी हमले के बाद से पूरे देश में सेना के प्रति, सैनिकों के प्रति संवेदनात्मक माहौल बना हुआ है. किसी हादसे के बाद इन वीर शहीदों के परिजनों के प्रति चंद दिनों तक तो लोगों की संवेदना बनी रहती है परन्तु कुछ दिनों, महीनों बाद उस शहीद के परिजन अकेले से पड़ जाते हैं. चंद दिनों के बाद वे जीवन की वास्तविक कठिनाइयों से जूझने लगते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि बहुतायत सैनिकों के परिवार मध्यम अथवा निम्न मध्यम आय वर्ग से आते हैं. किसी-किसी परिवार में वही सैनिक एकमात्र कमाऊ पूत होता है. कहीं-कहीं वही एक सैनिक समूचे परिवार का आधार होता है. किसी-किसी घर में वही एक सैनिक अपने छोटे भाई-बहिन के भविष्य का ख्याल रखने वाला होता है. किसी-किसी परिवार में कोई शहीद सैनिक नव-विवाहित होते हैं, कहीं-कहीं वे नवजात शिशु के पिता बने होते हैं. ऐसे में स्पष्ट है कि शहीद हुए उस जवान के घर पर चंद दिनों के बाद वास्तविक कठिनाइयाँ सिर उठाना शुरू कर देती हैं. वर्ष भर के पर्व-त्यौहार, आस-पड़ोस के आयोजन आदि के समय भी उन परिवारों को अपने खोये हुए सदस्य की याद बहुत गहराई से आती होगी. 


यही वह बिंदु होता है जहाँ जवानों के परिजनों को वास्तविक रूप से हमारे साथ की आवश्यकता होती है. हम नागरिक जो किसी जवान की शहादत के समय संवेदित होकर एकजुट होना शुरू कर देते हैं उनको सतत एकजुट और संवेदित बने रहने की आवश्यकता है. इसके लिए हम अपने-अपने जिले में, अपने-अपने क्षेत्र के सैनिकों की जानकारी कर सकते हैं और उनके परिजनों से समय-समय पर मिल सकते हैं. उनके साथ पर्व-त्यौहार को मना सकते हैं. उनकी किसी भी तरह की समस्या का समाधान बन सकते हैं. शहीद सैनिकों के बच्चों की शिक्षा से सम्बंधित, उनके माता-पिता के स्वास्थ्य, चिकित्सा से सम्बंधित समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं. उनके अन्य परिजनों की परेशानियों का समाधान भी कर सकते हैं. हमारे एक कदम इस तरह से उठाने पर उन परिजनों को भी गर्व की अनुभूति होगी और वे अपने आपको कभी भी अकेला महसूस नहीं करेंगे. ये आवश्यक नहीं कि हर मदद आर्थिक रूप से हो, यह भी जरूरी नहीं कि हर शहादत के बाद ही संवेदित हुआ जाये, हम सभी ऐसा कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं और अपने वीर सैनिकों के परिजनों का हिस्सा बन सकते हैं.

ऐसा हम सभी उन सैनिक परिवारों के साथ भी कर सकते हैं, जो अपने घर-परिवार से दूर अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं. हमारी आज़ादी, हमारी सुरक्षा के लिए कहीं किसी मोर्चे पर तैनात डटे हुए होते हैं. आइये मिलकर एक प्रयास करें अपने सैनिकों के लिए, उनके परिजनों के लिए.  

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सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

एयरमेल हुआ १०८ साल का - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय  ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

वर्तमान में ई-मेल का जमाना है क्लिक करते ही संदेश एक स्थान से दूसरे तक पहुंच जाता है किंतु पिछले दशक तक लाल नीले स्ट्रिप बार्डर वाले पत्र की खास अहमियत थी और एयरमेल सेवा ही सबसे तेज थी। हार्ड कापी को जल्द से जल्द भेजने का माध्यम आज भी एयरमेल सेवा ही बनी हुई है जिसे शुरू हुए अब एक सौ आठ साल हो रहे हैं।
फ्रेंच पायलट हैनरी पिक्वइट ने पहला एयरमेल लेटरों के पैकेट को इलहाबाद से एयर लिफ्ट करके नैनी पहुंचाया था। इस पहली एयरमेल फ्लाइट के आयोजकों को भलीभांति आभास हो गया था कि वह एक इतिहास बनाने जा रहे हैं, इसी लिये इस लोक उपयोगी सेवा की शुरूआत को एक अन्य चेरिटी के काम से जोड़ते हुए शुरू किया। 18 फरवरी 1911 को हुई इस पहली फ्लाइट से भेजे गये पत्रो से हुई आय को बैंगलूर के ट्रिनिटी चर्च के एक हॉस्टल निर्माण के लिये दान कर दिया गया।
राइट्स बंधुओं के द्वारा पहली पावर फ्लाइट की कामयाबी के बाद महज सात साल बाद हुई इस ऐतिहासिक उडान में 6500 पत्र ले जाये गये थे जिनमें पं. मोतीलाल नेहरू द्वारा अपने पुत्र जवाहर लाल नेहरू को लिखे चर्चित खत के अलावा किंग जार्ज पंचम और नीदरलैंड की महारानी के नाम लिखे गये खत भी शामिल थे। 

हैनरी पर भी जारी हुआ था डाक टिकट 

 
सन 2011 मे विश्व की पहली एयरमेल सेवा के लिए इस्तेमाल होने वाले वायुयान को चलाने वाले फ्रेंच पाइलट हैनरी पिक्वट पर भी उनकी यादगार शुरूआत में साहसिक योगदान के लिए फ्रांस में एक स्पेशल पोस्टल स्टाप भी जारी किया गया था| 
 
सादर आपका

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देश-समाज के प्रति समर्पित लोगों को मिडिया में तवज्जो मिले

बस चुप हो देखिये

बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता ....

बेगूसराय में रंग-ए-माहौल

लघुकथा : ध्वज

बडा सवाल !

शहादत को नमन

जैसे को तैसा

दर्द

बदला लो

जलसेना विद्रोह (मुम्बई) - १८-२३ फ़रवरी सन् १९४६ की ७३ वीं वर्षगांठ

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अब आज्ञा दीजिए ... 

जय हिन्द !!! 

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

136वां बलिदान दिवस - वासुदेव बलवन्त फड़के और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
वासुदेव बलवन्त फड़के
वासुदेव बलवन्त फड़के (अंग्रेज़ी:Vasudev Balwant Phadke, जन्म- 4 नवम्बर, 1845 ई. 'महाराष्ट्र' तथा मृत्यु- 17 फ़रवरी, 1883 ई. 'अदन') ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का संगठन करने वाले भारत के प्रथम क्रान्तिकारी थे। वासुदेव बलवन्त फड़के का जन्म महाराष्ट्र के रायगड ज़िले के 'शिरढोणे' नामक गांव में हुआ था। फड़के ने 1857 ई. की प्रथम संगठित महाक्रांति की विफलता के बाद आज़ादी के महासमर की पहली चिंंनगारी जलायी थी। देश के लिए अपनी सेवाएँ देते हुए 1879 ई. में फड़के अंग्रेज़ों द्वारा पकड़ लिये गए और आजन्म कारावास की सज़ा देकर इन्हें अदन भेज दिया गया। यहाँ पर फड़के को कड़ी शारीरिक यातनाएँ दी गईं। इसी के फलस्वरूप 1883 ई. को इनकी मृत्यु हो गई।


आज वासुदेव बलवन्त फड़के जी की 136वें बलिदान दिवस पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।। 

लेखागार