Subscribe:

Ads 468x60px

कुल पेज दृश्य

एक लाइना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
एक लाइना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 26 जून 2013

दुर्घटनाएं जिंदगियां बर्बाद करती हैं और आपदाएं नस्ल ..........



उत्तराखंड आपदा , अभी पूरे देश के ज़ेहन में सिर्फ़ यही कौंध रहा है , उस भयावह आपदा जो कयामत बनके आई थी , बीते गुजरे एक सप्ताह से भी अधिक का समय बीत चला है , आज भी खबर यही है कि हज़ारों लोग अब भी मौत के मुंह में हैं । जिंदगियों के जाने का आंकडा , वो आंकडा जो सरकार बता रही है बढता जा रहा है और और इससे कई गुना ज्यादा वो संख्या होगी जो दिन बीतने के साथ ही उत्तराखंड की जमींदोज़ हो चुकी धरती और पहाड के बीच अब गुमनाम होने जैसी होती जा रही है । वो जो पिछले नौ दिनों से अपनों की तलाश में भटक रहे हैं , उनके बारे में जानने के लिए बेताब हैं , परेशान हैं , मायूस हैं जाने उनकी ये बेताबी , ये परेशानी और ये मायूसी कितनी लंबी होने वाली है कईयों की तो शायद उम्र भर के लिए ।

इस आपदा ने इंसानियत के रक्षक हमारे वीर जांबाज़ सैनिकों को अपना फ़र्ज़ निभाने का मौका दिया तो वहीं कुछ आदमखोर इंसानों के झुंड ने लाशों तक से व्याभिचार करके ये साबित कर दिया कि , इंसान अब जीवन स्तर की मानसिकता में पशुओं से कहीं अधिक घृणित और नीच हो गया है । ऐसे में एक कही हुई बात मुझे याद आ रही थी कि ,दुर्घटनाएं तो जिंदगियां बर्बाद करती हैं मगर आपदाएं नस्लों को तबाह कर देती हैं , युगों के लिए ।


हिंदी अंतर्जाल के विभिन्न प्लेटाफ़ार्मों पर , सभी अपनी अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं , लेकिन इसी बीच मैं फ़ेसबुक पर अचानक नज़र पडती है , सुनीता भास्कर , पेशे से पत्रकार ,
जिनका ब्लॉग ही है , पत्रकार की डायरी और जितना मैं पढता जाता हूं दिल दिमाग सन्न होते जाते हैं ,

अपनी ताज़ा रिपोर्ट में वे लिखती हैं ,
" कईयों के परिजन खुद जान हथेली में रखकर ग्रुप में गुप्तकाशी या गौरीकुंड तक हो आए हैं, लेकिन उन्हें अपने कहीं नजर नहीं आए। कई परिजन चार चार हिस्सों में बंटे हैं। संगठनों द्वारा रात गुजारने के लिए दिए आशियाने से मुंह अंधेरे ही यह लोग उठ जाते हैं और चारों दिशाओं में फैल जाते हैं। एक सहस्त्रधारा हैलीपैड पर तो दूजा जौलीग्रांट एयरपोर्ट के गेट के बाहर अड्डा डालता है। तीसरा ऋषिकेश तो चौथा हरिद्वार में अपनों के इंतजार में खड़ा हो जाता है। उन्हें नहीं मालूम कि बचाव व राहत कार्य के बाद कौन किस रास्ते कब व कहां लाया जाएगा। कुछ लोग सभी अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं तो कोई दिन भर कैफे में सरकारी वेबसाइट खंगालते रहते हैं। आलम यह है कि मुंह अंधेरे की सुबह से शाम की कालिमा छंटने तक कोई भी मंत्री, अधिकारी उनके कांधे पर हाथ रख दिलासा देने वाला नहीं है। इसके उलट यह अधिकारी फोन स्वीच आफ कर वातानुकुलित कमरो में रहकर  उनके जले पर नमक ही छिडक़ने का काम कर रहे हैं।"


इस त्रासदी के आठ दिनों बाद कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी के आपदाग्रस्त क्षेत्र के दौरे पर कटाक्ष करते हुए गोदियाल जी अपने ब्लॉग अंधड पर लिखते हैं ,

"निकले तो थे गुपचुप दर्द बांटने 
बाढ़ पीड़ितों का,  
दर्मियाँ सफर तो भेद उनका 
किसी पे उजागर न हुआ, 
 मगर खुला भी तो कब, 
जब मंजिल पे वो पूछ बैठे;  
"आखिर इस जगह हुआ क्या था ?"


और इसके बाद शिवम मिश्रा जी ने एक पोस्ट लिंक प्रेषित की , जिसमें नित्यानंद जी ने बडे ही मार्मिक रूप से , पहाड की मां ’ को चित्रित किया है देखिए ,


पहाड़ की माँ ---------------


सीता 
पांच बच्चों की माँ है 
पार चुकी है पैंतालीस वर्ष 
जीवन के 
दार्जिलिंग स्टेशन पर 
करती है कुली का काम 
अपने बच्चों के भविष्य के लिए |


सिर पर उठाती है
भद्र लोगों का भारी -भारी सामान
इस भारी कमरतोड़ महंगाई में
वह मांगती है
अपनी मेहनत की कमाई
बाबुलोग करते उससे मोलभाव
कईबार हड़तालों में
मार लेती है पेट की भूख |


ब्लॉगर प्लेटफ़ार्म के अतिरिक्त , जागरण जंक्शन और नवभारत टाइम्स ब्लॉग्स जैसे अन्य प्लेटफ़ार्मों पर भी यही विषय सबसे ज्यादा मथा जा रहा है , देखिए वहां यतीन्द्रनाथ , टिहरी बांद और हिमालय को मुद्दा बनाते हुए कहते हैं

"
1972 में योजना आयोग द्वारा टिहरी बाँध परियोजना को मंजूरी के साथ ही टिहरी और आस-पास के इलाके में बाँध का व्यापक विरोध शुरू हो गया था। जब विरोध के स्वर तत्कालीन केंद्र सरकार तक पहुंचा तब संसद की ओर से इन विरोधों की जांच करने के लिए 1977 में पिटीशन कमेटी निर्धारित की गई।1980 में इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी ने बाँध से जुड़े पर्यावरण के मुद्दों की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाई। इस समिति ने बाँध के विकल्प के रूप में बहती हुई नदी पर छोटे-छोटे बाँध बनाने की सिफ़ारिश की। पर्यावरण मंत्रालय ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर गंभीरता पूर्वक विचार करने के बाद अक्टूबर,1986 में बाँध परियोजना को एकदम छोड़ देने का फैसला किया। नवंबर, 1986 में तत्कालीन सोवियत संघ सरकार ने टिहरी बाँध निर्माण में आर्थिक मदद करने की घोषणा की। इसके बाद फिर से बाँध निर्माण कार्य की सरगर्मी बढ़ने लगी। फिर बाँध से जुड़े मुद्दों पर मंत्रालय की ओर से समिति का गठन हुआ। फरवरी, 1990 में इस समिति ने बाँध स्थल का दौरा करने के बाद रिपोर्ट दी कि “टिहरी बाँध परियोजना पर्यावरण के संरक्षण की दृष्टि से बिलकुल अनुचित हैं।”

 वहीं ब्लॉगर श्री जे एल सिंह , अपने ब्लॉग में बरसात से बर्बादी , को शब्दों में कुछ यूं पिरोते हैं ,
"

सूरज ताप जलधि पर परहीं, जल बन भाप गगन पर चढही.
भाप गगन में बादल बन के, भार बढ़ावहि बूंदन बन के.
पवन उड़ावहीं मेघन भारी, गिरि से मिले जु नर से नारी.
बादल गरजा दामिनि दमके, बंद नयन भे झपकी पलके!
रिमझिम बूँदें वर्षा लाई, जल धारा गिरि मध्य सुहाई
अति बृष्टि बलवती जल धारा, प्रबल देवनदि आफत सारा "

नवभारत टाइम्स ब्लॉगस पर राजेश कालरा कहते हैं कि अब कभी सामने नहीं आ पाएगी सच्चाई

"बर्बादी के जितने भी अंदाजे लगाए जा रहे हैं, उनमें एक बात विशिष्ट है। मरने वालों की तादाद। शुरुआत 200 लोगों की मौत से हुई थी। फिर उत्तराखंड के सीएम ने कहा कि एक हजार लोग मरे हैं। फिर राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री ने कहा कि मरने वालों की तादाद 5000 तक पहुंच सकती है। अब अंदाजे लगाने का तो ऐसा है कि जिसका जो जी करे उतनी संख्या बता दे। समस्या यह है कि सभी अंधेरे में तीर चला रहे हैं क्योंकि सचाई यह है कि हमें कभी पता नहीं चलेगा कि असल में कितने लोग मारे गए।"

तो डाक्टर सामबे , आपदा प्रबंधन पर सवाल उठाते हुए कहते हैं , " 

kedarnath1.jpgईश्वर-अल्लाह पर हम आगे विचार करेंगे। पहले एक साधारण-सी बात कहते हैं और वह यह कि जो खतरों से खुद को बचाता है, खुदा उसी को बचाता है। अंग्रेजी कहावत है- 'God helps those who help themselves'। हम नदी, झील, पहाड़ और समुद्र के समीप जाएं, तो राम भरोसे न जाएं। अपनी समझदारी साथ लेकर जाएं। वहां की भौगोलिक स्थिति और संभावित खतरों के बारे में सजग होकर जाएं। यह पता करके जाएं कि अगर वहां आफत आई, तो वहां बचाव की क्या व्यवस्था है? वहां का आपदा प्रबंधन का रेकार्ड क्या है? हादसों के रेकार्ड आनेवाले खतरों से निपटने में मददगार होते हैं। कुदरत के कहर से बचने के लिए हम क्या कर सकते हैं?"

वहीं ब्लॉगर तृप्ति अपने ब्लॉग कच्ची लोई में कहती हैं कि बारी हमारी भी बहुत जल्दी आनी है , अपनी पोस्ट को समाप्त करते हुए वो कुछ पंक्तियां लिखती हैं , 

"

तरक्की कर रहे हैं हम तरक्की करते जाएंगे
बहुत कुछ खो चुके हैं हम बहुत कुछ खोते जाएंगे
हैं जिंदा हम बड़ी बेशर्म सांसों के सहारे पर
मरेगा सामने वाला मगर हम जीते जाएंगे
कहानी सामने वाले की अपनी भी कभी होगी
वही तब आसमां होगा वही तब ये जमीं होगी
जो समझो बात इतनी सी तो फिर हर बात छोटी है
नहीं तो चाह में जीने की हम बस मरते जाएंगे..."

इधर पिछले दिनों ब्लॉगिंग में भी भूस्खलन का दौर जारी है , यानि कि उठापटक जी , अविनाश वाचस्पति जी ने अपने ब्लॉग को ही अलविदा करने का मन बना लिया , या शायद कह ही दिया और घोषणा कर डाली कि अब वे सिर्फ़ फ़ेसबुक पर ही नुमाया होंगे , इसी उहापोह में डाक्टर अरविंद मिश्रा जी की पोस्ट आई और क्या लबाबल बहस से लबरेज हो गई पोस्ट देखिए , डा मिश्रा ने लिखा ,
"वे पिछडे हैं जो ब्लॉगिंग तक ही सिमटे हैं " , जिसमें उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि ,
" आज भी मैं यह बल देकर कहता हूँ कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद  माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख  सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं .यह पोस्ट भी वहां दिखेगी ही ...." 

जब पोस्ट इतनी धारदार, वारदार हो तो फ़िर प्रतिक्रिया तो आनी ही थी और क्या खूब आईं देखिए , 




  1. ब्लॉग अभिव्यक्ति का सहज माध्यम है। इसकी प्रासंगिगता कभी खत्म नहीं होगी।

    फ़ेसबुक और ट्विटर तुरंता जुमलेबाजी के माध्यम हैं। फ़ेसबुक मेरे लिये नोटिसबोर्ड की तरह है जहां अपने ब्लॉग की नोटिस लगाते हैं, जुमलेबाजी करते हैं, फ़ूट लेते हैं। ब्लॉग हमारे लिये घर की तरह है जहां हमेशा लौटने का, रहने का मन करता है।

    लिखने वाले की सबसे बड़ी इच्छा होती है कि लोग उसे पढ़ें और सराहें। प्रिंट मीडिया में छपना वाह-वाही समझी जाती हैं क्योंकि ब्लॉग के मुकाबले ज्यादा लोग पढ़ते हैं उसे। प्रिंट भले ही खबरों के लिये आउटडेटेड हो गया हो लेकिन बाकी लिखे पढ़े के लिये उसमें छपने का मजा ही कुछ और है। इसे स्वीकारने में कोई संकोच नहीं करना चाहिये।

    लेकिन प्रिंट मीडिया की अपनी सीमायें हैं। अगर आप बहुत बड़े सेलिब्रिटी नहीं हैं तो आपका लिखा सब कुछ वहां नहीं छप जायेगा। आपके अपने मन के भाव, उद्गार, संस्मरण , चिरकुटैयों, अपीलों , धिक्कार के लिये वहां कोई जगह नहीं होगी। उसके लिये आपको लौट के अपने यहां ही आना होगा और उसके लिये ब्लॉग से उपयुक्त कोई माध्यम नहीं है।

    ब्लॉगिंग ने आम लोगों को अभिव्यक्ति का जो सहज माध्यम प्रदान किया है उसकी तुलना और किसी माध्यम से नहीं हो सकती। लोग अपने भाव, कवितायें, सोच, संस्मरण अपने ब्लॉग पर लिखते हैं। ट्विटर पर शब्द सीमा है, फ़ेसबुक पर सर्चिंग लिमिटेशन। ब्लॉग पर आप अपनी सालों पहले की किसी भी पोस्ट पर डेढ़ -दो मिनट में पहुंच सकते हैं, फ़ेसबुक अपना दस दिन पुराना स्टेटस खोजने में भी घंटा लग सकता है। ब्लॉग जैसी आजादी और सुविधा और कहां?

    इस बीच एक घालमेल और हुआ है कि, ब्लॉग जो कि अभिव्यक्ति का माध्यम है और जिसकी कोई सीमा नहीं है को, साहित्यप्रेमियों और पत्रकार बिरादरी ने हाईजैक जैसा करके इसको साहित्यमंच या फ़िर पत्रकारपुरम जैसा बनाने की कोशिश करके इसको सीमित करना शुरु कर दिया है। जबकि ऐसा है नहीं- ब्लॉग आज के समय में दुनिया का सबसे तेज दुतरफ़ा माध्यम है। लेखक/पाठक के बीच अभिव्यक्ति और प्रतिक्रिया का इससे तेज और कोई खुला माध्यम नहीं है।

    ब्लॉग और फ़ेसबुक से पैसे कमाने की बात जो करते हैं वे लहरें गिनकर भी पैसा कमा सकतें हैं। उसके लिये व्यक्ति को लेखन सक्षम नहीं कमाई सक्षम होना चाहिये। पैसे कमाने और नाम कमाने और इनाम जुगाड़ने के लिये भी लोग तरह-तरह की तिकड़में लगानी होती हैं। वे सब आम आदमी के बस की नहीं होती।

    मैं ब्लॉग लेखन से क्यों जुड़ा हूं उसका यही कारण है कि अपनी तमाम अभिव्यक्तियों के लिये ब्लॉग ही सबसे मुफ़ीद माध्यम है। और कोई माध्यम इतना सहज और सुगम नहीं है जितना कि ब्लॉग। इसीलिये अपन इससे जुड़े हैं और इंशाअल्लाह जुड़े रहेंगे। आप भी यह पोस्ट सिर्फ़ ब्लॉग पर ही लिख सकते थे। लिख तो फ़ेसबुक पर भी सकते थे लेकिन अगर वहां लिखते तो हम इत्ता लंबा कमेंट वहां नहीं लिखते। रात को पढ़कर लाइक करके फ़ूट लिये होते। आपकी तमाम बहस-विवाद वाली तमाम पोस्टें जो ब्लॉग पर हैं वे हम फ़ौरन खोजकर पढ़ सकते हैं। फ़ेसबुक और दूसरे तुरंता माध्यमों पर -इट इज हेल ऑफ़ द टॉस्क! :)

    समय के साथ लोगों की धारणायें भी बदलती हैं। डेढ़ साल पहले हमने एक पोस्ट लिखी थी - ब्लॉगिंग, फ़ेसबुक और ट्विटर . उस पर आपका कहना था- ब्लॉग जगत में निश्चय ही एक मरघटी का माहौल बन रहा है ..हमें कोई खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए ….

    इसी पोस्ट पर आपके घोषित शिष्य संतोष त्रिवेदी की टिप्पणी थी- फेसबुक की लत छूट चुकी है,ट्विटर पर यदा-कदा भ्रमण कर लेते हैं पर ब्लॉगिंग पर नशा तारी है ! जब तक खुमारी नहीं मिटती,लिखना और घोखना जारी रहेगा !

    आज की स्थिति में ब्लॉग के प्रति आपका लगाव बरकरार है। और आपने लिखा भी -अपने आब्सेसन के चलते ब्लागिंग का दामन थामे हुए हैं मरघट में किसी का इंतजार करेंगे कयामत तक। संतोष त्रिवेदी उदीयमान ब्लॉगर से ब्लॉगिंग में अस्त से हो चुके हैं। फ़ेसबुक की लत दुबारा लगा गयी है। प्रिंट मीडिया में घुसड़-पैठ शुरु है और काफ़ी जम भी गयी है। आगे और जमेगी, जमे शुभकामनायें।

    जो सूरमा ब्लॉग को पिछड़ा बताकर फ़ेसबुक और ट्विटर पर जाने की बात कह रहे हैं उनको यह याद रखना चाहिये कि उनकी पहचान अगर है, कुछ लोग उनको जानते हैं तो वह सब एक ब्लॉगर होने के चलते है। वर्ना फ़ेसबुक और ट्विटर में अनगिन लोगों के हजारों, लाखों फ़ालोवर होंगे। कौन जानता है उनको?

    और किसी का पता नहीं लेकिन अपन ब्लॉगिंग अपन के लिये घर जैसा लगता है। जितनी सहजता यहां हैं मुझे उतना और कहीं नहीं। इसीलिये अपन ब्लॉगिंग से जुड़े हैं और लगता है कि आगे भी जुड़े सहेंगे।
    प्रत्‍युत्तर दें
    उत्तर
    1. अनूप जी ,
      प्रिंट मीडिया की व्याप्ति /पहुंच अब बहुत सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक रह गई है ! सोशल मीडिया वैश्विक है!
      भारत की किसी भी पत्रिका /समाचार पत्र की कितने दूर तक पहुँच है ?
    2. प्रिंटमीडिया की भौगोलिक व्याप्ति सिमटी है लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया के कंधे पर चढ़कर तो अभी भी यह दुनिया जहान तक पहुंचती है। :)
 और अभी तो प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है ,

चलिए अब चलते चलते आपको कुछ एक लाइना पोस्ट लिंक थमाए देते हैं ,

१.पढ लें धनुष के बारे में : सिलेमा इसके बाद देख लीजीएगा

२.जो तेरा है वो मेरा है : फ़िर क्यों चिंताओं ने घेरा है

३.उत्तराखंड के संकट में लोकतंत्र लापता :  न लोक का ही न ही तंत्र का है पता

४.जिंदगी यूं ही कटती रही : धूप छांव सी सिमटती रही

५.विंडो ८ में लगाएं विंडो ७ जैसा स्टार्ट बटन : और स्टार्ट करते ही पोस्ट लिखें :)

६.संजय जी कुमुद और सरस को अब तो मिलाइए : जी आप सीरीयल देखते जाइए

७.राहुल बाबा का जन्मदिन बडा या मदद : अकल बडी या भैंस :)

८.पीने में रम गया है मन : रम का नाम सुनके ही मन हुआ प्रसन्न :)

९.ये आपदा सीख भी देती है : मगर हम कतई नहीं लेते , आदत से मजबूर

१०.आज का प्रश्न : हल करिए जी

चलिए आज के लिए इतना ही फ़िर मिलते हैं , नई बुलेटिन में , नए ब्लॉग पोस्टों और नई प्रतिक्रियाओं को समेटे हुए , तब तक उत्तराखंड पीडितों के लिए दुआ करते रहें , पढते रहें , लिखते रहें ।

शुक्रिया .....................

रविवार, 23 सितंबर 2012

मैनेजर पुराण... ब्‍लॉग बुलेटिन


मित्रों कल की पोस्ट की सफलता के बाद लीजिये मैनेजर पुराण ... अजी यह पोस्ट हमने कोई दो साल पहले लिखी थी। ओरिजिनल लिंक यह रही

परिभाषा

१. मैनेजर दुनिया का वह प्राणी है, जो सोचता है की नौ औरते मिलकर एक महीने में संतान उत्पन्न कर सकती हैं
२. यह ऐसा प्राणी है, जो आपको उसी टाइम पर बुलाएगा जब आप काफी का एक गरमा गरम कप लेकर अपनी डेस्क पर आये हो, और उसका काम उतनी ही देर में ख़त्म हो जायेगा जितनी देर में आपकी काफी ठंडी हो जाए....
३. इसकी आँखे केवल टार्गेट डेट देखती हैं
४. इसको चमचा-गिरी पसंद होती है, मगर एक लिमिट तक
५. अगर आप अपने मैनेजर के पहले ऑफिस से घर जा रहे हैं, तो फिर समझिये की आप गए... विधाता भी नहीं बचा सकता (यह उड़न तश्तरी जी की कुंडली से उठाया है, सो इसके द्वारा होने वाले उंच नीच के लिए कृपया कान्टेक्ट समीर लाल :)) )
६. कोई भी शहर हो कोई भी गाँव को मैनेजर की जात एक जैसी ही होती है
७. मैनेजर को इस धोके में रखना बहुत ज़रूरी है, की आप उसके वफादार हैं... गलती से भी उसको आपकी असलियत पता लगी... समझ लीजिये की आपकी बैंड बजी...
८. आपको भ्रम होगा की आपकी हरकतों पर वह ध्यान नहीं दे रहा है... मगर ऐसा नहीं है, वह आपकी हर गतिविधि पर पूरा ध्यान दे रहा है... बेचारे को यही करने के लिए तो मैनेजर बनाया है...
९. मैनेजर कभी भी आपसे रिपोर्ट मांग सकता है, तो हमेशा तैयार रहिये... गलत या सही अपना कान्फिडेंस बनाये रहिये. ससुरा अपने आप पट जायेगा.
१०. अगर आप अपने मैनेजर को पटा नहीं सकते, तो फिर उसको कन्फ्यूज़ करिए... अगर वह आपका बाप हुआ तो फिर कन्फ्यूज़ नहीं होगा, बल्कि आपकी ही लाइफ के बारह बजा देगा.... तो प्लीज़ टेक एक्स्ट्रा केयर हेयर
११. प्रमोसन पाने के लिए असरदार नुस्खा... मुझे एक असरदार सरदार ने दिया था... अपने मैनेजर को बोलिए... अगर तूने मेरे को प्रोमोसन नहीं दिया तो मैं जाके सबको बता दूंगा तो की मेरा प्रमोसन हो गया है.... बेचारा टेंसन में आ जायेगा
१२. अपनी सैलेरी और प्रमोसन का ज़िक्र अपने बॉस के अलावा और किसी से ना करिए...
१३. ऑफिस में होने वाली हर छोटी छोटी सी बातों पर कान और ध्यान दीजिये, क्या मालूम कौन सी बात कितनी ज़रूरी है..
१४. अपने कान एकदम साफ़ रखिये....
१५. मैनेजर की कोई भी कठोर बात एक कान से सुनिए दुसरे से निकाल दीजिये.... माई बाप है आपका
१६. याद रखिये बड़े बड़े तेनालिरामो, बड़े बड़े बीरबलों ने अपने बॉस को पटाकर ही अपना उल्लू सीधा किया था, सो उनके आदर्श अपने सामने रखिये
१७. अपने मैनेजर से जब भी बात करें, तो उसे बोलने दें.. क्योंकि वह भी अपने मैनेजरों से सुन के आ रहा है ना
१८. याद रखिये मैनेजरों के मैनेजरों से जितनी दूरी बना कर रख सकें उतना ज़रूरी है
१९. मैनेजर को इस छलावे में रखना ज़रूरी है की आप उसकी हर बात सुन रहे हैं... अगर उसको कहीं असलियत पटा लगी तो फिर जिम्मेदार आप खुद होंगे.
२०. याद रखिये, ऑफिस में ना कोई आपका दोस्त है और ना कोई दुश्मन... सारे आप ही की तरह हैं... अपना उल्लू सीधा करो और सुखी रहो.
२१. प्रोजेक्ट में डाक्य़ूमेंटेसन ऐसा करिए की वह आपके मैनेजर को समझ में ना आये... अगर गलती से वह समझ गया तो फिर आपको डबल काम करना पड़ेगा
२२. टार्गेट डेट कभी भी सही मत दीजिये, हमेशा अपना सहूलियत मार्जिन रखना ज़रूरी है
२३. चाय और काफी के ब्रेक में अगर मैनेजर साथ हो तो फिर गलती से भी क्रिकेट, हाकी गिल्ली डंडा वगैरह वगैरह का ज़िक्र आए तो भी चुप रहिये. केवल और केवल ऑफिस के काम का ज़िक्र आये तो ही अपना मुंह खोलिए
२४. जब आप कुछ नहीं कर रहे हो, तब भी आपका व्यस्त दिखना ज़रूरी है
२५. शराफत का लबादा ओढ़े रहिये, और अपनी गलती कभी भी मत मानिए...
२६. ऑफिस में अपने हिस्से ढेरों काम ले कर रखिये, आप पर लोग निर्भर रहे.... मगर आप अपना काम कर रहे हैं... मैनेजर का भरोसा बनाये रखिए
२७. मैनेजर का जन्मदिन और शादी की साल-गिरह, वगैरह वगैरह याद रखिये....
२८. ऑफिस में होने वाली हर लड़ाई... हर बहस... से दूर रखिये... कम से कम मैनेजर को पटा नहीं लगना चाहिए.
२९. ज़रूरत से ज्यादा ईमानदारी आपको ले डूबेगी... सो समझदारी से काम लीजिये
३०. याद रखो तुम्हारे आने के पहले भी ऑफिस का काम चलता था और तुम्हारे जाने के बाद भी चलता रहेगा... सो क्या नया जोड़ लिया और क्या छोड़ लिया....
३१. जब कोई नया मैनेजर आये, तो शुरूआती दिन बहुत ज़रूरी हैं, इससे पहले की आपका सहकर्मी फायदा उठा ले जाए आप आगे बढिए.
३२. मैनेजर की सत्य है और जगत मिथ्या... समझे की नहीं...
३३. जो बीत गया, सो बीत गया। अपने हाथ से कोई गलत काम हो गया हो तो भी पीछे नहीं हटना चाहिए.... अबे जो छुट्टी पे है या नौकरी छोड़ कर चला गया है उस पर दोष दल दो और क्या
३४. असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं। बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति मैनजर को पटते हैं और अपना रास्ता खुद बनाते हैं।
३५. अपनी डेस्क पर फाइलें, पानी की कुछ बोतलें, ज़रूर रखें... फीलिंग आती है की आप काम काज करने वाले आदमी हैं
३६. कंप्यूटर का वाल-पेपर किसी भगवान् की फोटो लगा लें... बॉस सोचेगा की धर्म कर्म वाला आदमी है... वैसे इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है
३७. ऑफिस में जिसके पास मैनेजर का साथ है, उसके अनेक मित्र, भाई बन्धु हो जाते हैं
३८. उतना ही काम करो जितना ज़रूरी है... अगर गलती से भी ज्यादा काम करोगे तो फिर खुद तो मरोगे भी और अपने आने वाले को भी मारोगे...
३९. कंप्यूटर पर काम करो तो कम से कम पचास विंडो ओपन कर लो... इससे अगर कोई कंप्यूटर मानिटर देखेगा तो समझ जायेगा की आप कितना ज्यादा काम करते हैं
४०. मैनेजर का फोन, बीवी के फोन से ज्यादा जरुरी है.. सो कभी भी मिस मत करिए...

(अभी चालीसा मारा है, बाकी का गुरु मंत्र भी जल्दी ही दुंगा)

-देव

चलिए आज के बुलेटिन की और चलें।

----------------------------------------------------
कुत्ता दिवस!

----------------------------------------------------
अस्मिता ,वर्चस्व और अमेरिकी जेल व्यवस्था
----------------------------------------------------
मुझे तो मार दोगे
----------------------------------------------------
एक वोटर का पत्र : सेकुलर नेता जी के नाम
----------------------------------------------------
समय ठहर उस क्षण,है जाता
 ----------------------------------------------------
1989 की कवितायें - दो तिहाई ज़िन्दगी
----------------------------------------------------
बच्चों की भाषा और अध्यापक” पुस्तक को पढ़ते हुए...
----------------------------------------------------
सद्‍भावना का अंतर्राष्ट्रीय चेहरा
----------------------------------------------------
लेखन के लिए बस जूनून चाहिए ....
----------------------------------------------------
लब-प्यार से लबालब
----------------------------------------------------
चोट पानी जब करता है तो पत्थर टूट जाते हैं
----------------------------------------------------
टाइगर पटौदी को पहली बरसी पर विनम्र श्रद्धांजलि
----------------------------------------------------

मित्रो आज का बुलेटिन यहीं तक, कल फिर मिलेंगे एक नए मुद्दे के साथ। तब तक देव बाबा को इजाजत दीजिये।

जय हिंद 


रविवार, 19 अगस्त 2012

कितने जागरूक हैं हम... ब्लॉग बुलेटिन

ज के बुलेटिन में देश दुनियां की समस्याओं से इतर कुछ और बात की जाए... आज अपनें देश के समॄद्ध ऐतेहासिक विरासत की बात करते हैं और हिन्दुस्तानियों की उनके प्रति उदासीनता की... एक से एक धरोहर हैं हमारे देश में लेकिन हम किसी का रखरखाव नहीं रख पाते। चलिए एक नज़र डाली जाए कुछ उदाहरणों पर..

(चित्र गूगल से साभार)
देखिए प्यार का इज़हार कीजिए लेकिन हमारी इमारतों को क्यों बरबाद कीजिए.... एक से एक किले और एक से एक सुन्दर जगह हैं लेकिन हमें किसी की कद्र नही है। आखिर इतने उदासीन क्यों हैं हम... मैं जब भी विदेश गया हूं मैनें देखा है की विदेशों में एक छोटा सा तालाब भी होगा तो इतनें कायदे से मेनटेन होगा की क्या कहें... उसकी फ़ीस होगी और उस फ़ीस का पूरा पैसा उस तालाब के रखरखाव में खर्च हो रहा होगा।  हिन्दुस्तान में तो ऐसे कितने तालाब होंगे और कितनें मेनटेन होंगे ? 

मुम्बई से नज़दीक एलीफ़ैंटा केव्स के बारे में आपने सुना होगा, विश्व प्रसिद्ध यह गुफ़ाएं पांचवी शताब्दी की एक बेहतरीन विरासत हैं... इसमें एक व्यक्ति का पांच रुपया और एक विदेशी के लिए ढाई सौ रुपये का शुल्क लिया जाता है... मैं पिछली बार मेरे एक विदेशी मित्र को लेकर गया था.. ढाई सौ रुपया देनें के बाद उसे अन्दर आने दिया गया और मुझे केवल पांच रुपये में... पहले तो यही भेद उसे अखर गया और फ़िर       अन्दर के टायलेट और आम आदमी के लिए तथा-कथित सुविधाएं देखकर उस फ़्रांसिसी नें प्रतिक्रिया में इतना ही कहा की तुम्हारी सरकार विदेशियों से बहुत पैसा लेती है लेकिन रखरखाव के लिए कुछ नहीं करती आखिर टायलेट इतना गन्दा क्यों है। मैं निरुत्तर था... वाकई कोई जवाब न था... वह बिल्कुल सही कह रहा था.. हर जगह बिखरे पालीथीन बैग्स, खाली बोतलें और गन्दगी का साम्राज्य को देख वाकई एक अपराधबोध हो रहा था। धन्य हैं हम हिन्दुस्तानी... कमोबेश यही स्थिति अजन्ता और एलोरा की गुफ़ाओं की भी हैं... 

बनारस के घाटों की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है... देखिए.. 

(चित्र गूगल से साभार)
अपनी विरासत को जितना बरबाद हमनें किया है उतना शायद किसी ने न किया होगा... पैसा लेने में कोई पीछे न रहेगा लेकिन सुविधा देने और साफ़ सफ़ाई देनें में सबके बारह बज जाएंगे... आखिर क्यों... थोडा सोचिएगा और अगली बार जब किसी पर्यटक स्थल जाएं तो ध्यान रखें हिन्दुस्तान हम और आप से ही है और हिन्दुस्तान की क्षवि को बिगाडनें और गन्दगी बढानें से अपना ही नुकसान है....  

चलिए तो फ़िर इसी संदेश के साथ हम आज के बुलेटिन् को आगे बढाते हैं 

----------------------------------------------
साँझ के बादल। जी बिल्कुल बरसे या नहीं...
----------------------------------------------
दर्द की महक और हरकीरत...। भई वाह..
----------------------------------------------
हे भ्रष्टाचार ! तुम्हें नमन है .......... । आज के भारत का भगवान है भाई...
----------------------------------------------
स्त्रियाँ सावधान रहें ऐसों से--। एक सार्थक जानकारी..
----------------------------------------------
जिला अनुपपुर अपना। जी धीरेन्द्र जी कभी न कभी आपके अनूपपुर आएंगे...
----------------------------------------------
क्यों कहते,तुम अकेले हो। हम हैं ना...
----------------------------------------------
हर अदा पर निसार हो जाएँ...। वाह
----------------------------------------------
स्माइल प्लीज़..आज वर्ल्ड फोटोग्राफी डे है !!। ईशमाईल प्लीज़...
----------------------------------------------
वित्त मंत्री ने बैंकों से कर्ज सस्ता करने को कहा.। हो जाए तो अच्छा है.. उम्मीद तो न के बराबर ही है..
----------------------------------------------
एक बात जो कहनी है तुमसे ...। कहिए न फ़िर...
----------------------------------------------
तुम से प्यार करने की ऋत छा गई है ।। वाह..
----------------------------------------------
पीड़ा पर दुमदार दोहे। जै हो जै हो...
----------------------------------------------
जन्मदिन की मुबारकबाद गुलज़ार साहेब...। हैप्पी बड्डे गुलज़ार साहब...
----------------------------------------------
18 अगस्त पर कुछ चुभते सवाल। इन सवालों के ज़वाब हर हिन्दुस्तानी को चाहिए...
----------------------------------------------
नेताजी सुभाषचंद्र बोस : सच्चाई सिद्ध हो चुकी हैं| लेकिन बहुत कुछ जानना अभी भी बाकी है...
----------------------------------------------

मित्रों आज का बुलेटिन यहीं तक.. कल फ़िर मुलाकात होगी... तब तक के लिए देव बाबा को अनुमति दीजिए...

जय हिन्द

शनिवार, 18 अगस्त 2012

आज़ाद भारत के मुजरिम... ब्‍लॉग बुलेटिन

मित्रो... आइये आज के बुलेटिन में बात करते हैं समाज में फैले वैमनस्य और बैर भाव की ... अफवाहों से घिरे हिंदुस्तान में कहीं खो चुके हमारे सामाजिक ताने बने की ... और सरकारी तंत्र में विश्वास खो चुके उस आम इंसान की जो यह सोच कर ट्रेन पकड़ रहा है की अगर ट्रेन ना पकड़ी को ज़िन्दगी ही कहीं छुट जाएगी.. आखिर गड़बड़ हो कहाँ रही है... क्या हम अपने ही देश में अपने ही लोगों को सुरक्षित रखने में नाकामयाब हैं? आखिर क्या कारण है जो राज्य और केन्द्र दोनों मिलकर भी कुछ नहीं कर पा रहे... या निर्णय न ले पानें की कोई राजनीतिक मजबूरी है। आखिर हुआ क्या है जो असम से निकली आग मुम्बई और अब उत्तर प्रदेश के सात शहरों को अपनें लपेटे में ले चुकी है, आखिर समस्या की जड क्या है? चलिए जाननें की कोशिष करते हैं।भारत के गृह सचिव आरके सिंह ने आरोप लगाया है कि भारत में पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ भारत में जो दहशत फैली है उसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है। पिछले कुछ दिनों से बंगलौर, चेन्नई और मुंबई समेत भारत के कई बड़े शहरों से पूर्वोत्तर के रहने लोग पलायन कर रहे हैं. एसएमएस और एमएमएस के जरिए ऐसी अफवाहें उड़ रही हैं कि उन पर हमला किया जाएगा. इस आशंका के डर से हजारों लोग शहर छोड़ कर भाग गए हैं. हैदराबाद में असम और अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों से आए लोगों के बीच भय का माहौल है।  जी बिल्कुल ऐसा हो सकता है, हमारे मुल्क के दुश्मनों को पता है की उन्हें केवल यहाँ के लोगों को बांटना है और बिखरी हुई हमारी जनता और बिना रीढ़ की हड्डी के हमारा प्रशासन कुछ नहीं कर पायेगा... हमारे देश में देश द्रोहियों की एक बहुत बड़ी फ़ौज है, जो खाते यहाँ की हैं और गाते वहां की हैं.. थाली में छेद करनें वाले यह लोग आखिर हमारे हिंदुस्तान में इतनी पैठ क्यों बनाये हुए है... मुम्बई में हुए हादसे के वक्त हमारे एक बड़े करीबी मित्र वहीँ मौजूद थे और उन्होंने जो देखा वह था की चौदह पंद्रह साल के बच्चे पुलिस की गाड़ी पर पत्थर फेक रहे थे और वहीँ कुछ और लोग भी थे जो यह भी कह रहे थे की कुछ लोगों की वजह से सबको पूरी कौम को गाली देने का मौका मिलता है... हम यह कतई नहीं कहते की पूरी कौम में समस्या है लेकिन वाकई एक बडे तबके में समस्या है.... आखिर अमर जवान जैसी जगह को ध्वस्त करने वाला अपना देशभक्त तो कतई नहीं हो सकता... क्या कार्यवाही होगी? या अब तक क्या हुई होगी ? आखिर चंद लोग पूरे देश पर हावी कैसे हो सकते हैं.. हमारे दुश्मन जानते हैं की वोट-बैंक से ग्रसित हमारी सरकार कोई निर्णय नहीं लेगी और मामला रफ़ा-दफ़ा हो जायेगा। मोदी को लेके दस साल के बाद भी चिल्लानें वाला हमारा सेकुलर मीडिया अमर-जवान पर तोड-फ़ोड करनें वाले और पाकिस्तानी झंडे लहरानें वाली की तस्वीर भी नहीं दिखाता? माइक्रो ब्लागिंग ना होती तो फिर यह तस्वीरें कभी बाहर भी ना आती.. आखिर देश भक्तों के इस देश में इस प्रकार की साजिश के लिए क्या जगह है... 
(गूगल से साभार)

(गूगल से साभार)

दर-असल आज़ाद भारत के बाद से ही भारत में बांटो और राज करो की राजनीति चमक रही है, वोट बैंक की राजनीति को चमकाते रहना और सम्प्रदाय विशेष के प्रति अनुराग बनाये रखना कहाँ तक न्याय और तर्क सांगत है.. कांग्रेस इस लिए कुछ नहीं करती क्योंकि उसे कुछ करना ही नहीं है और उसने ऐसे मुद्दों पर कुछ ना करने का निर्णय ले रखा है... कांग्रेस का आज तक का इतिहास यही कहता है की कभी मुद्दों के समाधान की तलाश ना करो हमेशा मुद्दों पर राजनीति करो और जनता को छलावे में रखो...  आज कल के नए भारत में जब बाज़ार-वाद और कारपोरेट-वाद ही सरकार की अर्थ-नीति का निर्धारण करते हैं, राजनैतिक फैसले हमेशा "बांटो और राज करो" को ध्यान में रखकर किये जाते हैं... और जनता को उसके दैनिक जीवन में ही इतना उलझा दिया जाता है की उसके पास कुछ और सोचने की फुरसत ही ना हो तो ऐसे में जनता का तो भगवान् ही मालिक है...  लेकिन जनता के सहन की भी एक सीमा है... कोई भी राजनीति देश से बढ़कर नहीं होगी... एक आतंकी केवल एक आतंकी है, वह किसी धर्म से जुडा व्यक्ति नहीं हो सकता..

चलते चलते एक कहानी पर ध्यान दिया जाए..... 

एक गरीब लड़के को एक जादुई चिराग मिला... उसने उस चिराग को उठाया और जोर से घिसा.. चिराग के घिसते ही जोर का धमाका हुआ और कई लोग मारे गए...
शिक्षा... : जादुई चीजे मिलने का अब ज़माना नहीं रहा... और आप किसी भी लावारिस वस्तु को हाथ न लगायें...

ब्लाग बुलेटिन की पूरी टीम विनती करती है की किसी भी अफ़वाह पर ध्यान न दें... सुरक्षित रहें और सतर्क रहें।  किसी भी संदिग्ध की सूचना दें... आपकी सतर्कता ही आपका बचाव हैं...

------------------------------------------------------------

------------------------------------------------------------
LN स्टार में 'शब्द-सृजन की ओर' : कैप्टन लक्ष्मी सहगल । जै हो नेताजी की और नेताजी के सेनानियों की
------------------------------------------------------------
सीमा पर तनाव, लोगों ने गाँव खाली किये. । इस पाकिस्तान की तो...
------------------------------------------------------------
प्रेम और सुभाषचन्द्र बोस: An Indian Pilgrim ...Ich denke immer an Sie  । सटीक और सार्थक
------------------------------------------------------------
पथिक पवन बन जाता है : । कितनी सुन्दर कविता
------------------------------------------------------------
फव्वारा चौक का अन्ना ? । वाकई विचारणीय चिट्ठी
------------------------------------------------------------
१८ अगस्त १९४५ और नेताजी सुभाष चंद्र बोस । विचारोत्तेजक और आम आदमी को झकझोडती पोस्ट
------------------------------------------------------------
होनी होनी है सच सच है ...। जी बिल्कुल... 
------------------------------------------------------------
चलना तो तुम्‍हें ही होगा मुझे लेकर .... । नहीं तो फ़िर हम हैं न....
------------------------------------------------------------
परमानेंट मेमोरी इरेज़र से मुलाक़ात के पहले तक... । वाह जी वाह....
------------------------------------------------------------
बाबा फ़रीद - शैख़ फ़रीदउद्दीन मसूद गंज-ए-शकर । जै हो
------------------------------------------------------------
यह कैसी आतंक पिपासा । क्या कहें...
------------------------------------------------------------
*** मेरा प्यारा ख्वाब *** । आमीन... सच हो जाए यही कामना है...
------------------------------------------------------------

तो मित्रों कल फ़िर मिलेंगे... आज देव बाबा को इजाज़त दीजिए.. तब तक के लिए सुरक्षित रहिये, सतर्क रहिए और जाग्रत रहिए... एक सतर्क देशभक्त नागरिक सैकडों देशद्रोहियों पर भारी होगा.... 

जय हिन्द

सोमवार, 23 जुलाई 2012

आज़ाद भारत के घोटाले... ब्लॉग बुलेटिन

आज़ाद भारत में कितनी तरक्की हुई है भाई क्या कहें.... आज यूंही इन्टरनेट पर समाचार पढ रहे थे, ना जानें कैसे इस लिंक पर पहुंच गये....  लीजिए आप भी हमारी तरक्की को जानिए...  आज़ाद भारत के घोटाले....  लीजिए एक संक्षेप में भारतीय घोटाले...

जीप खरीदी (१९४८) : आजादी के बाद भारत सरकार ने एक लंदन की कंपनी से २००० जीपों को सौदा किया। सौदा ८० लाख रुपये का था। लेकिन केवल १५५ जीप ही मिल पाई। घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन का हाथ होने की बात सामने आई। लेकिन १९५५ में केस बंद कर दिया गया, जल्द ही मेनन नेहरु केबिनेट में शामिल हो गए।

साइकिल आयात (१९५१): तत्कालीन वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के सेकरेटरी एस.ए. वेंकटरमन ने एक कंपनी को साइकिल आयात कोटा दिए जाने के बदले में रिश्वत ली। इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा।

मुंध्रा मैस (१९५८) : हरिदास मुंध्रा द्वारा स्थापित छह कंपनियों में लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के १.२ करोड़ रुपये से संबंधित मामला उजागर हुआ। इसमें तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी, वित्त सचिव एच.एम.पटेल, एलआईसी चेयरमैन एल एस वैद्ययानाथन का नाम आया। कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा और मुंध्रा को जेल जाना पड़ा।

तेजा ऋण : १९६० में एक बिजनेसमैन धर्म तेजा ने एक शिपिंग कंपनी शुरू करने केलिए सरकार से २२ करोड़ रुपये का लोन लिया। लेकिन बाद में धनराशि को देश से बाहर भेज दिया। उन्हें यूरोप में गिरफ्तार किया गया और छह साल की कैद हुई।

पटनायक मामला: १९६५ में उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को इस्तीफा देने केलिए मजबूर किया गया। उन पर अपनी निजी स्वामित्व कंपनी 'कलिंग ट्यूब्स को एक सरकारी कांट्रेक्ट दिलाने केलिए मदद करने का आरोप था।

मारुति घोटाला : मारुति कंपनी बनने से पहले यहां एक घोटाला हुआ जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम आया। मामले में पेसेंजर कार बनाने का लाइसेंस देने के लिए संजय गांधी की मदद की गई थी।

कुओ ऑयल डील: १९७६ में तेल के गिरते दामों के मददेनजर इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने हांग कांग की एक फर्जी कंपनी से ऑयल डील की। इसमें भारत सरकार को १३ करोड़ का चूना लगा। माना गया इस घपले में इंदिरा और संजय गांधी का भी हाथ है।

अंतुले ट्रस्ट: १९८१ में महाराष्ट्र में सीमेंट घोटाला हुआ। तत्कालीन महाराष्ट्र मुख्यमंत्री एआर अंतुले पर आरोप लगा कि वह लोगों के कल्याण के लिए प्रयोग किए जाने वाला सीमेंट, प्राइवेट बिल्डर्स को दे रहे हैं।

एचडीडब्लू दलाली (१९८७): जर्मनी की पनडुब्बी निर्मित करने वाले कंपनी एचडीडब्लू को काली सूची में डाल दिया गया। मामला था कि उसने २० करोड़ रुपये बैतोर कमिशन दिए हैं। २००५ में केस बंद कर दिया गया। फैसला एचडीडब्लू के पक्ष में रहा।

बोफोर्स घोटाला  : १९८७ में एक स्वीडन की कंपनी बोफोर्स एबी से रिश्वत लेने के मामले में राजीव गांधी समेत कई बेड़ नेता फंसे। मामला था कि भारतीय १५५ मिमी. के फील्ड हॉवीत्जर के बोली में नेताओं ने करीब ६४ करोड़ रुपये का घपला किया है।

सिक्योरिटी स्कैम (हर्षद मेहता कांड) : १९९२ में हर्षद मेहता ने धोखाधाड़ी से बैंको का पैसा स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया, जिससे स्टॉक मार्केट को करीब ५००० करोड़ रुपये का घाटा हुआ।

इंडियन बैंक : १९९२ में छोटे कॉरपोरेट और एक्सपोटर्स ने बैंक से करीब १३००० करोड़ रुपये उधार लिए। ये धनराशि उन्होंने कभी नहीं लौटाई। उस वक्त बैंक के चेयरमैन एम. गोपालाकृष्णन थे।

चारा घोटाला : १९९६ में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और अन्य नेताओं ने राज्य के पशु पालन विभाग को लेकर धोखाबाजी से लिए गए ९५० करोड़ रुपये कथित रूप से निगल लिए।

तहलका: इस ऑनलाइन न्यूज पॉर्टल ने स्टिंग ऑपरेशन के जारिए ऑर्मी ऑफिसर और राजनेताओं को रिश्वत लेते हुए पकड़ा। यह बात सामने आई कि सरकार द्वारा की गई १५ डिफेंस डील में काफी घपलेबाजी हुई है और इजराइल से की जाने वाली बारक मिसाइल डीलभी इसमें से एक है।

स्टॉक मार्केट: स्टॉक ब्रोकर केतन पारीख ने स्टॉक मार्केट में १,१५,००० करोड़ रुपये का घोटाला किया। दिसंबर, २००२ में इन्हें गिरफ्तार किया गया।

स्टांप पेपर स्कैम : यह करोड़ो रुपये के फर्जी स्टांप पेपर का घोटाला था। इस रैकट को चलाने वाला मास्टरमाइंड अब्दुल करीम तेलगी था।

सत्यम घोटाला : २००८ में देश की चौथी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स के संस्थापक अध्यक्ष रामलिंगा राजू द्वारा ८००० करोड़ रूपये का घोटाले का मामला सामने आया। राजू ने माना कि पिछले सात वर्षों से उसने कंपनी के खातों में हेरा फेरी की।

मनी लांडरिंग : २००९ में मधु कोड़ा को चार हजार करोड़ रुपये की मनी लांडरिंग का दोषी पाया गया। मधु कोड़ा की इस संपत्ति में हॉटल्स, तीन कंपनियां, कलकत्ता में प्रॉपर्टी, थाइलैंड में एक हॉटल और लाइबेरिया ने कोयले की खान शामिल थी।




अब एक नज़र डालिए घोटालों में हुई सज़ा पर... 

बोफर्स घोटाला- ६४ करोड़ रु: मामला दर्ज हुआ - २२ जनवरी, १९९०
सजा - किसी को नहीं
वसूली - शून्य

एच.डी. डब्ल्यू सबमरीन- ३२ करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - ५ मार्च, १९९०
(सीबीआई ने अब मामला बंद करने की अनुमति मांगी है।)
सजा - किसी को नहीं
वसूली - शून्य

स्टाक मार्केट घोटाला- ४१०० करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - १९९२ से १९९७ के बीच ७२
सजा - हर्षद मेहता (सजा के १ साल बाद मौत) सहित कुल ४ को
वसूली - शून्य

 एयरबस घोटाला- १२० करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ - ३ मार्च, १९९०
सजा - अब तक किसी को नहीं
वसूली - शून्य

चारा घोटाला- ९५० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - १९९६ से अब तक कुल ६४
सजा - सिर्फ एक सरकारी कर्मचारी को
वसूली - शून्य

दूरसंचार घोटाला-१२०० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - १९९६
सजा - एक को, वह भी उच्च न्यायालय में अपील के कारण लंबित
वसूली - ५.३६ करोड़ रुपए

यूरिया घोटाला- १३३ करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ - २६ मई, १९९६
सजा - अब तक किसी को नहीं
वसूली - शून्य

(गूगल से साभार लिए गये चित्र)






अब साहब कामनवेल्थ घोटाले और फ़िर हालिया में चमका कोयला खनन घोटाला, अरे टू-जी को कैसे भूल गये.... दिमाग पर जोर डालिए और खोजिये की आपनें आज तक कितने घोटालों का नाम सुना है... फ़िर उनमें किस किस को सज़ा हुई है.. या फ़िर कितनें की वसूली हुई है....   फ़िर कहिए की मेरा भारत महान क्योंकि सौ में से निन्यानबै ........ काका हाथरसी जी की लाईनें....

कह काका कवि कांप रहा क्यूं रिश्वत लेकर
रिश्वत पकडी जाए छूट जा रिश्वत देकर....  


--------------------------------------------
आईए बुलेटिन को आगे बढाते हैं और आज ब्लाग जगत की हलचलों से आप सभी को रूबरू कराते हैं... आज एक लाईना अंदाज़ में....
--------------------------------------------



क्या श्रीनरेन्द्र मोदीजी मस्तीख़ोर सी.एम. हैं? :- आराम तलबी किसको पसन्द नहीं है भाई.... भईया किस किस को गाईए किस किस को रोईए... आराम बडी चीज़ है चद्दर तान के सोईए..

नाग पंचमी का त्यौहार है बाबाजी :- नाग पंचमी तो है दद्दा.. लेकिन आस्तीनों में पल रहे सांपो का क्या ?

पर्यावरण पर सुमित के तड़के :- न रहे पेड और न रहे पंछी... बच गये तो कंक्रीट इमारतें है और उसमें रहनें वाले मशीनी लोग...

आदिवासी महिलाओं की नेतृत्व विकास कार्यशाला के नोट्स...... भई वाह....

मौन का जंगल .. मौन... वाकई बडा हथियार है यह... 

कर्नल डा॰ लक्ष्मी सहगल का निधन.. विनम्र श्रद्धांजलि...

तुम्‍हें ढूंढने के क्रम में ... मिला क्या ?

प्रणय के स्रोत का अनवरत कल-कल कितनी अच्छी है न कवि की कल्पना.... वाकई, जितनी तारीफ़ की जाए उतनी कम..

डोनाल्ड हाल : मछलियों के लिए लोकतंत्र.. लोकतंत्र है भाई....

गौमुख तपोवन का नक्शा और जानकारी... बहुत अच्छी जानकारी....

मेरा मन पंछी सा : एक वर्ष पूरा करनें पर बधाई...


तो फ़िर मित्रों फ़िर आज देव बाबा को इज़ाजत दीजिए... जल्दी ही मुलाकात होगी....

-देव

बुधवार, 11 जुलाई 2012

पढ़ पढ़ के ही तो शख्श वो बेकार हुआ है.......ब्लॉग बुलेटिन



सच कहा है किसी ने अगर आपको लिखने पढने का नशा हो जाए तो फ़िर वो छूटे नहीं छूटता और कमाल की बात ये है कि दुनिया में किसी की हिम्मत नहीं है जो आपसे इस नशे को छोडने के लिए खुल्लम खुल्ला कह सके । अलबत्ता पीछे से आपको यार दोस्तों की गालियां जरूर मिलती होंगे जब भी वे आपकी इस किताबचिपकू आदत से परेशान हो जाते होंगे । ऐसा मैंने भी महसूस किया है कि लोग अब पढने में कम रुचि ले रहे हैं शायद । जब भी ब्लॉग पोस्टों पर टहलने निकलता हूं , देखिए जी मैं तो आदत से मजबूर हूं और इसलिए मैं पोस्टों के बीच टहलता ही रहता हूं सच कहूं तो लिखने का तो है ही आप सबको पढने का कुछ और मज़ा है । और ये मज़ा उन तमाम पत्र पत्रिकाओं में लिखे पढे से अलग होता है ।

कभी यकायक ही कोई पोस्ट , कुछ शब्द , कुछ पंक्तियां , और उनके निकले निकाले और निकलवाए गए निहातार्थों से ब्लॉगिंग की लय जरूर कुछ गडबडाती है । कमाल ये है कि ऐसा करने वालों की एक पूरी फ़ौज़ इस दिशा में लगातार पूरे मनोयोग से लगी हुई है और बीच बीच में उन्हें मौका मिलता है तो वे इसका भरपूर लाभ उठाते हैं । पिछले दिनों देखा गया कि कुछ एसोसिएशननुमा सामूहिक ब्लॉग्स में कुछ पोस्टें ऐसी लगाई गईं जिनका यकीनन ही खुद उस ब्लॉग के सहयोगियों ने भी विरोध किया और फ़िर उन पोस्टों टिप्पणियों का जैसा दुरूपयोग और इस सारे प्रकरण को मुद्दा बना कर पेश किया गया , उसने मुझे फ़िर एक बार आश्वस्त कर दिया कि देर सवेर यहां ब्लॉगर्स अपनी इसी मानसिकता , भाषा और शब्दों का दुरूपयोग एवं अपनी गैरजिम्मेदाराना पोस्ट , टिप्पणियों आदि के कारण विधिक हस्तक्षेप आमंत्रित कर रहे हैं ।

"छोटे में समझा जाए तो जो लोग किसी भी अन्य व्यक्ति के अपमान , उपहास , मानसिक यंत्रणा एवं दुर्व्यवहार करने में शेखी बघारते नज़र आ रहे हैं , उनकी खुशकिस्मती है कि अब तक हिंदी ब्लॉगिंग में कोई रसूखदार , बडा ओहदेदार , राजनीतिज्ञ, अभिनेता , खिलाडी आदि उस रूप में नहीं सक्रिय हैं और जो हैं उनकी पोस्ट पर ये करतबबाजी दिखाने की जुर्रत अभी किसी नहीं की , कोशिश करके देखना चाहिए उनको , परणाम सब कुछ स्व्यं कह देगा । मेरे ख्याल से गलत को गलत और सही को सही कहना बहुत जरूरी है , न सिर्फ़ दूसरे के लिए बल्कि स्व्यं के लिए भी , चलिए देखें आज की पोस्टें क्या कह रही हैं । "




देश से बाहर रह रहे हमारे कुछ साथी अपने हिंदी प्रेम को जिस ज़ज़्बे के साथ बरकरार रखे हुए हैं उसे देख कर कभी कभी ये कहने को मन करता है कि कहें उन नेता अभिनेताओं से और उन कुछ देशी ब्लॉगर्स से भी कि इज़्ज़त जो करनी हो अपनी भाषा से और प्यार जो हुआ हो अपनी मिट्टी से तो फ़िर वो यूं ही बयां होता है । शिखा वार्षेणेय मेरे प्रिय लेखकों में से एक हैं । विषयों की विविधता उनकी खासियत है , आज अपनी पोस्ट में वे रिश्तों का गुणाभाग करते हुए समलैंगिकता पर कहती हैं ,


"यूँ किसी भी इंसान का  अपनी रूचि अनुसार जीवन जीने के अधिकार को लेकर मेरे मन में कोई शंका नहीं है. हर इंसान को अपने मनपसंद साथी के साथ रहने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए.परन्तु इस खबर ने मेरे मन में अजीब सी उथल पुथल मचा दी है  कि आखिर क्यों जो लोग एक विपरीत सामाजिक परिवेश में एक अप्राकृतिक कहा जाने वाला जीवन अपनी रूचि से स्वीकारते हैं, यह कहते हुए कि वह सामाजिक बन्धनों को नहीं मानते, उनकी जरूरतें और रुचियाँ अलग हैं, और उन्हें उनके अनुसार ही जीवन जीने दिया जाना चाहिए, वैसे ही स्वीकार किया जाना चाहिए . फिर वही लोग शिशु जन्म और बच्चे की चाह को लेकर वही सामान्य इच्छा रखते हैं और वो भी उस हद  तक कि उसके लिए कोई भी अप्राकृतिक तरीका अपनाते हैं. इस बारे में मैंने जब कुछ जानने की कोशिश की तो ना जाने कितने ही तरह के तथ्य सामने आये, कितने ही सवाल मैंने नेट पर देखे यह जानने के लिए, कि कैसे  लिस्बियन अपने साथी को गर्भधारण करा के बच्चा पा सकते हैं ? और मुझे आश्चर्य हुआ यह जानकार कि मेडिकल साइंस इतनी आगे बढ़ गई है कि उसके लिए कितने आसान तरीके बताये और अपनाये जाते हैं. "




इस पोस्ट पर पाठकों की बेबाक राय आनी शुरू हो गई है देखिए ,


  1. बहुत लम्बे समय से यह विषय मेरे भी दिमाग को मथ रहा है..आज की किशोर और युवा पीढी के बच्चों से इस विषय में खुलकर बातें और बहस की है और अंततः अभी जिस निष्कर्ष पर खड़ी हूँ,उसमे यही समझ में आया है कि कुछ हटके/विशेष /रोमांचक कर गुजरने की लालसा खींचकर लोगों को इस ओर लिए जा रही है..लोग जा तो रहे हैं,पर चूँकि यह प्रकृति के विपरीत है, तो नेचुरल उन आवश्यकताओं की ओर भी एक समय के बाद सहज ही इनका झुकाव हो जाता है..
    Reply
  2. दुनिया के आधुनिक कहे जाने वाले लोग कितनी भी उत्श्रृंखलता कर लें। आखिर प्रकृति के नियमों को तोड़ने की सजा भुगतनी ही पड़ेगी। ईश्वर ने प्रकृति को स्त्री-पुरुष के रुप में सृजनकर्ता दिया है। इससे इतर सब हा हा कारी ही होगा।
    Reply
  3. मेरी चिन्ता तो उस बच्चे के साथ ही है शिखा, जिसे आगे जाकर सामाजिक मखौल और तिरस्कार का सामना करना पड़ेगा. कम से कम बच्चे की चाह ऐसे जोड़ों को नहीं करनी चाहिये, ऐसा करके वे एक बच्चे की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करते हैं.

और ,


  1. शिखा जी,
    आपने एक अच्छा प्रश्न उठाया है.जहाँ तक बच्चों की बात है तो माना यही जाता है कि एक बच्चे का मानसिक विकास तभी अच्छी तरह हो पाता है जब उसे माता और पिता दोनों का साथ मिले.लेकिन अब तो समाज बदल रहा है.अविवाहित रहकर भी लोग बच्चे गोद ले रहे हैं.दुनियाभर में एकल माताओं और पिताओं की संख्या बढती जा रही हैं.समाज ने भी इन्हें स्वीकारना शुरू कर दिया है भारत में भले ही ये चलन थोडा कम हैं.तो यदि समलैंगिक जोडे भी बच्चे पालना चाहें तो उन्हें रोका तो नहीं जा सकता यदि समाज ऐसे संबंधों को स्वीकारना शुरू कर देगा तो इनके बच्चों को कोई समस्या नहीं आएगी.लेकिन पहले दुविधा तो इस बात की है कि ऐसे संबंध प्राकृतिक और स्वाभाविक भी होते हैं या नही? पहले यह तो तय हो जाए लेकिन इस बारे में ही कोई एकमत नहीं है.खुद दुनियाभर के विशेषज्ञों में ही गंभीर मतभेद है कुछ इसे प्राकृतिक मानते है तो कुछ इसे बीमारी बताते है.ऐसे में आम आदमी तो कनफ्यूज़ होगा ही.
    हाँ यदि यह प्राकृतिक हैं तो फिर देर सवेर ऐसे संबंधों को स्वीकारना ही पडेगा.क्योंकि हम पारंपरिक नजरिये को ही देखेंगे तब तो किसी व्यक्ति का अविवाहित रहना भी अप्राकृतिक और समाज के खिलाफ माना जाएगा.


  1. आप लन्दन में हैं तो इस विषय को थोड़ी असहजता से ही सही यहाँ प्रस्तुत कर तो ले रही हैं -
    अपने यहाँ की देवियों के लिए यह वर्जित अलेर्जिक विषय है -
    मानव व्यवहार एक ऐसी देहरी पर आ खड़ा है कि न जाने ऐसे कितने अकल्पित घटनाएं -बात व्यवहार आये दिन सामने आयेगें
    पश्चिमी देशों में कृत्रिम गुड्डे गुड्डियों को पालना ,पूरा ध्यान रखना ,वात्सल्य भाव का पूरा शमन करना सहज घटना बनती जा रही है... ....
    एक आंख खोलने वाला और विचारणीय लेख !
    Reply
  2. भले ही परम्पराएँ बदलती हैं .... बदलाव आवश्यक भी है .... अप्राकृतिक सम्बन्धों को जहां कानूनी मानिता मिलती जा रही है ... हो सकता है समाज भी इसे धीरे धीरे स्वीकार कर ले .....हो सकता है आने वाले समय में इन बच्चों को कोई कठिनाई न हो .... लेकिन फिर भी मासूम बच्चों की ज़िंदगी से या उनकी भावनाओं से खेलने का तो अधिकार किसी को नहीं है .... ज्वलंत विषय पर अच्छा और सार्थक लेख .... विचार विनिमय भी अच्छा चल रहा है ...



वाकई, है तो यह सब बड़ा confusing इसमें कोई संदेह नहीं है। सब की अपनी-अपनी मांससिकता है और सबको अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का सम्पूर्ण अधिकार भी, लेकिन यहाँ अंत में उठाया गया बच्चों की ज़िम्मेदारी और परवरिश से जुड़ा सवाल सोचने पर मजबूर कर रहा है। बाकी तो रंजना जी की बात से सहमत हूँ परंतु दूसरी बात जो लोग भारतीय-भारतीय कर रहे हैं..।तो क्या अपने यहाँ ऐसा नहीं होता है? ऐसा नहीं है अपने हाँ भी यह सब होता है या यूँ कहें की अब तो अपने हाँ भी यह संस्कृती पनप रही है अब यह अच्छी है या बुरी यह अलग बात है।

मुझे ताज्जुब होता जब अंतर्जाल के विश्लेषक कैसे इन बातों को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं कि ऐसे विषयों पर ऐसी बेबाक और जीवंत बहस सिर्फ़ अंतर्जाल पर ही संभव हो सकती है ।


आखिरकार मिसर जी पांडेय जी के ज्वाइंट वेंचर ब्लॉग पर प्रधान जी की रिपोर्टकार्ड ने शिव जी क लिए उत्प्रेरक का काम कर ही दिया और उन्होंने प्रधान जी के लिए एक ओवर एचीवर यंत्र की जानकारी देते हुए कहते हैं कि ,

"श्री चन्दन सिंह हाटी, मैनेजर हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान; "क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से परेशान रहते हैं? क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से दुखी रहते हैं? क्या आप ओवर-अचीव करते हैं और फिर भी लोग़ आपको अंडर-अचीवर कहते हैं? क्या इसकी वजह से आपका दिन का चैन और रात की नींद गायब हो जाती है? तो फिर खुश हो जाइए क्योंकि हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान पहली बार लेकर आया है ओवर-अचीवर यन्त्र. जी हाँ, यह ओवर-अचीवर यन्त्र वैदिक मन्त्रों के जाप और उनकी शक्ति से परिपूर्ण है. आपको ओवर-अचीवर कहलाने के लिए अब मेहनत करने की जरूरत नहीं है. आपको बस यह यन्त्र हमारे द्वारा बताये गए विधि के अनुसार अपने कार्यालय में पूजा के बाद लगा लेना है. फिर देखिएगा कि दुनियाँ कैसे आपको न सिर्फ ओवर-अचीवर मानने लगेगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाएँ आपकी तस्वीर कवर-पेज पर छापकर नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखकर आपको ओवर-अचीवर बतायेंगी. जी हाँ, भारतवर्ष में पहली बार....."

देखते हैं कि अगले दो बरस इस यंत्र के प्रधान जी को कित्ते नफ़े नुकसान में आना पडता है । ब्लॉगजगत में अपने बमचक सुर के लिए प्रसिद्ध हो चुके और हिंदी ब्लॉग जगत के एकमात्र व्हाइट हाउस के बाशिंदे सतीश दा कब किसको धर के बमचक से चमचक तक पहुंचा दें कह नहीं सकते आप । कभी नौटंकी के छोरों की फ़ोटो खींच लाएंगे तो कभी आम के बगिया के बीच , कभी मुंबई के किसी लोकल स्टेशन से तो कभी किसी शताबुद्दीन का साक्षात्कार ले डालने में महारथी 
"
"तुम्हारा नाम क्या है" ?

"शताबुद्दीन"


"तो इतने दूर आने का कुछ खास कारण" ?


"थोड़ा कमजोरी था...."


"क्या" ?


"कमजोरी था अभी हो गया सब"

"हम्म....तो वापस जाओगे" ?"


पूरा साक्षात्कार आप व्हाइट हाउस  पर पढ सकते हैं । लुप बाजपेयी जी भी प्रधान जी के रिपोर्टकार्ड का विश्लेषण कर रहे हैं ..अरे बाजपेयी जी बोले तो पुण्य प्रसून बाजपेयी , वे टाइम के आलेख पर कहते हैं ,

"कटघरे में मनमोहन सरकार ही खडी हुई । और उसके छिंटे कही ना कही उन संस्थानो पर भी पडे जिनकी भूमिका लोकतंत्र के लिहाज से चैक एंड बैलेस बनाने वाली होनी चाहिये थी । पूर्व चीफ जस्टिस बालाकृष्णन से लेकर सेना के पूर्व चीफ तक के नाम घोटालो से जुडे । राडिया टेप ने तो दिग्गज मिडिया घरानो के दिग्गज पत्रकारो को कटघरे में खडा कर दिया । संसद के भीतर हवा में लहराये नोटो के पीछे का खेल जो स्टिग आपरेशन के जरीये कैमरे में कैद हुआ उसे भी उसी सार्वजनिक नहीं किया गया । जबकि इस दौर में लगातार विपक्ष सरकार पर हमले भी करते रहा और सौदेबाजी से मुंह भी नहीं मोडा । सीपीएम ने मनमोहन सरकार को गिराना चाहा तो मुलायम-अमर की जोडी ने बचा लिया । भाजपा ने नोट के बदले वोट का खेल बताना चाहा तो संसदीय व्यवस्था ने सत्ता की व्यवस्था का खेल दिखलाकर व्हीसिल ब्लोअर को ही कटघरे में खडा कर दिया । इस पूरी प्रक्रिया में ऐसा क्या है जिसे टाईम पत्रिका ने समझा लेकिन भारत की मिडिया ने नहीं समझा । अगर बारिकी से हर परिस्थिति को देखे तो सत्ता के साथ मिडिया की जुगलबंदी का खेल पहली बार टाईम पत्रिका ही सामने लाती है । क्योकि मनमोहन सिंह को लेकर लगातार मिडिया की भूमिका एक ईमानदार प्रधानमंत्री वाली ही रखी गई ।" 



विभा श्रीवास्तव दीदी आज अपने ब्लॉग छम्मकछल्लो कहिस पर एक  पापा को कुछ खास लिखते हुए कह रही हैं ,

"किन मेरी समझ में नहीं आया पापा कि आपने हमारी जान क्यों ली? मैं इतनी नन्हीं! आँखें तक खोलना नहीं आया था मुझे। आपको पहचानना भी नहीं। आप तो साइंस को जानते -मानते होंगे पापा। बाकी में भले न मानें, इलाज- बीमारी में तो मानना ही पड़ता है। तो आप यह भी जानते होंगे कि किसी बच्चे का जन्म भी एक वैज्ञानिक प्रक्रिया ही है। विज्ञान ने साबित कर दिया है कि हम बेटियों का जन्म आपके ही एक्स-एक्स से होता है। अब जब आपने ही हमें एक्स-वाई नहीं दिया तो हम खुद से अपने एक्स को वाई में कैसे बदल लेते? काश, साइंस इतनी तरक्की कर गया होता कि आप खुद ही मेरी माँ को एक्स-वाई दे देते या मैं ही उसे एक्स-वाई में तब्दील कर के आपकी बेटी के बदले बेटा बनकर जनमती और आपकी मुराद पूरी कर देती।  "





आजकल अपने लंठ बाबू , देवताओं से ही दो दो हाथ करने में भिडे हुए हैं , बता रहे  हैं कि देवता नाराज़ नहीं पगला गए हैं   ,


"Boys! अभी अभी The Gods Must be Crazy देखनी खत्म की है। देवता सचमुच में पगला गये हैं। पिछ्ले दिनों में ऐसा बहुत बार हुआ है कि मैंने जो कहा है उसे कुछ और ही समझा गया है। :) फिल्म वाकई देखने लायक है - हल्के फुल्के हास्य से भरी। कुछ नमूने"


माना कि जिंदगी आपाधापी भरी और मशीननुमा हो गई है इसलिए फ़ुर्सत भी जरूरी है लेकिन सर्टिफ़ाइड फ़ुरसतिया होने का खतरा ई भी है कि आपको फ़िर सूरज चचा अपना सौर टेलिफ़ोन से मिस्ड कॉल करने लगते हैं ,देखिए अनूप शुक्ल जी क्या कह रहे हैं ,

                                                                        " भर में खिलखिलाहट को इंद्रधनुष के नाम से पेटेंन्ट करा लिया।
सूरज ने शायद मुझे आनलाइन देख लिया होगा ऊपर से। उसका मेसेज आया -भाई साहब ये आपके मोहल्ले की बारिश की बूंदे हमारी किरणों को भिगो के गीला कर रही हैं। आप इनको मना कर दो वर्ना मैं सागर मियां को उबाल के धर दूंगा।
मैंने तीन ठो इस्माइली भेज के सूरज को समझाया -अरे खेलने-कूदने दो किरणों और बूंदों को आपस में यार तुम काहे के लिये हलकान हो रहे हो। उमर हो गयी लेकिन जरा-जरा सी बात पर उबलना अभी तक छोड़ा नहीं।
इस बीच एक बूंद अचानक उछली। लगा कि वापस गिरेगी तो हड्डी-पसली का तो प्रमुख समाचार हो के ही रहेगा। लेकिन उसके नीचे गिरने के पहले ही तमाम बूंदे चादर की तरह खड़ीं हो गयीं। उसको गोद में लेकर गुदगुदी करने लगीं। किरणें भी बूंद के गाल पर गुदगुदी करने लगीं। सब खिलखिलाने लगीं।"
 


अब जब सूरज भी मिस्ड कॉल कर देता है तो फ़िर भला हमारे ब्लॉगर काहे पीछे रहते , उन्होंने भी द्न्न टीप कर बताया ,

  1. देवांशु निगम
    ये तो चीटिंग है, कल हम फोन कर रहे थे तो सूरज चाचू का फोन बिजी आ रहा था, बाद में सेक्रेटरी ने कॉल बैक किया और बोलीं कि सूरज चाचू को बादल ने अपने घर में नज़रबंद कर दिया है….पर आप से तो वो बात कर लिए …ये गलत बात है…अब हम बादलों की साइड में आ गए हैं :) :) :)
    अब हम उनका फोन-फान नहीं उठाएंगे :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..ना जीना ना मरना
  2. Swapna Manjusha 'ada'
    अच्छा..!!
    एक ज़माना से लोग चाँद को फोन मिलाता है, रोमिंग कटता है तैयो, और आप सूरज से बतिया रहे हैं…
    हाँ बाबा, वड्डे लोग, वड्डी बातें…टोप किलास का आदमी टोपे किलास से न बात करेगा..रेजगारी लोगन को थोड़े पूछेगा..
    अब मजाक से अलग की बात, बिंबों का बहुत ही उत्तम प्रयोग..मान गए आपको..
    थान्कू
    Swapna Manjusha ‘ada’ की हालिया प्रविष्टी..हम होंगे क़ामयाब…
  3. shikha varshney
    ये बूंदों के चक्कर में सूरज को इग्नोरे करना ठीक नहीं हाँ…वो तो बेटियों की याद में उसने फोन फिर से कर लिया,कहीं ज्यादा गुस्से में आ गया तो ठंडा करना मुश्किल होगा.:):)
    जोक्स अपार्ट ..इतने खतरनाक टाइप के आइडियाज आपको आते कैसे हैं?

जब हम घूम घूम के पोस्ट तलाश रहे थे तो देखा कि रेखा श्रीवास्तव भी किसी को तलाश रही थीं , अच्छा अच्छा लुंगी मंत्री जी के आम आदमी को , जो पंद्रह रुपये की आइसक्रीम खाकर दाल चावल पर बढे  एक रुपए के लिए लडता है ,रेखा जी ने सही लताडते हुए कहा है ,

"महोदय आप अपने मंत्रित्व के चश्में को  उतारिये और आम आदमी के बीच में आइये  तब आपको पता चलेगा कि  -- वो हजारों किसान जो ख़ुदकुशी कर रहे हैं और कर चुके हैं , वे अगर आइसक्रीम खाने की हालत में होते  तो अपने परिवार को अनाथ छोड़ कर ख़ुदकुशी करने पर मजबूर न होते। आप संसद में बैठ कर लाखों रूपये हर महीने लेकर ऐसा बयान  दे सकते हैं लेकिन अगर आपसे   पूछा जाय कि  आम आदमी लौकी और तरोई जैसी  सब्जियां किस भाव खरीद कर खा रहा है? ये आपको पता नहीं होगा। कितने लोग सिर्फ एक वक़्त खाकर सोते हैं इसके आंकड़े आपके पास नहीं होंगे .  सड़क के किनारे लगे सरकारी नलों से बदबूदार पानी भर कर पीने वालों की संख्या आप तो क्या आपका मंत्रालय भी नहीं बता सकेगा.  दिन 12 से 14 घंटे काम करके रोटी जुटाने वाला आइसक्रीम नहीं खा सकता  . आपको पता भी है कि  कितने साठ  साल के ऊपर के व्यक्ति  श्रम करके अपने परिवार को पाल रहे हैं - नहीं और बिलकुल भी नहीं।"



आज अमित भाई ने भारीभरकम खुलासा करते हुए साबित कर दिया है कि "नेट लैग "..."असल में "जेट लैग "का बाप है ,

"
थोड़ी देर बाद गर्म चाय आएगी , मुझे कई बार फब्तियां सुनने को मिलेंगी , रात भर नेट पर करते क्या रहते हैं , अरे ब्लॉग व्लाग तो हम भी लिखते हैं , दिन में एक दो घंटे नेट पर बैठे ,हो गया , आप रात भर क्या करते हैं | 'फेस बुक' पर सबको घूम घूम कर 'लाइक' करते रहेंगे बस | अरे कभी हिसाब लगाया , कितने 'लाइक' आपने किये और कितनों ने आपको किया | ( मै मन ही मन सोचता हूँ , चाहने में भी गणित और हिसाब किताब , यह मुझसे नहीं होने वाला ) |  मैं चुप चाप चाय उठाउंगा , जो ( चाय ) अब तक मलाई के नीचे अपना यौवन छुपा चुकी होगी , उसके यौवन को उद्घाटित करता हुआ एक ही घूँट में निपटा दूँगा  | अब काम तो सारे दिनचर्या वाले करने ही होते हैं, पर वो सारे काम डाँट डपट के बैक ग्राउंड म्युज़िक के साथ ही होंगे |

बारिश के मौसम में बिजली कुछ ज्यादा ही आती जाती रहती है , उस पर कमेन्ट मिलते हैं कि जब सारी रात नेट पर रहेंगे, फिर तो आफिस में सोते होंगे | काम धाम वहां कुछ करते नहीं होंगे, तब बिजली क्या ख़ाक आएगी | अब कौन समझाए, बिजली का आना जाना हमारे काम करने या न करने से बिलकुल जुदा है | अरे ! बिजली की अपनी मर्जी , आये न आये | ( बिजली जितनी देर बंद रहती है , विभाग को फायदा ही होता है , दस रुपये का माल हम लोग तीन रुपये में बेचते हैं , उसमे से भी ६०   प्रतिशत चोरी में जाती है , अरे न रहे बिजली न हो चोरी ) | "

इस पोसट पर  आई एक टीप भी देखिए जरा ,
"नेट लैग " ...यह "जेट लैग" का बाप है .......|
ये तो उसी तरह का बयान है जैसे कोई कवि कहे कविता लिखना प्रसव वेदना से गुजरने के समान है। अरे जब अभी तक जेट लैग झेला नहीं तो उसको नेट लैग का बच्चा कैसे बता रहे हो!

लाइक करने का तो जैसा बताया कि-कुछ लोग फ़ेसबुक पर अपने दोस्तों के स्टेटस इतनी तेजी से ’लाइक’ करते हैं मानों बिजली वाले रैकेट से पटापट मच्छर मार रहे हों। :)

बाकी ये अलग-अलग जागना ये क्या लफ़ड़ा है भाई! :)


उत्तर
  1. भावनाओं को समझिये | 'भावना' स्त्रीलिंग होती है , उसका सम्मान करना चाहिए , पर आप तो ठहरे पुराने बलात्कारी ..|



आइए कुछ एकलाइना हो जाए ,वो होता है न रैपिड फ़ायर राउंड ,

नाखून बढ गए हैं तो काटते क्यों नहीं ;     आप एक मुफ़्स नेलकटर बांटते क्यों नहीं ।


पानी का व्यापार :सऊदी अरब वालों से कराना चाहिए , उन्हें असली महत्व पता है इसका


स्वर्ग और नर्क :   दोनों ही सिचुएशन में बीमा पॉलिसी वैलिड रहती है


रविकर करे ठिठोलियां , खाय गालियां खूब :     सींच सींच कर रोज़ उगाए , हथेलियों पे दूब


ब्लॉग पहेली ३२ :  हल करिए फ़टाफ़ट


दिल लगाने को तुला है :  तो फ़िर दे दे न तू ही क्यों इत्ता अडा है


धीमी इंटरनेट स्पीड पर ब्लॉगिंग (मोबाइल ब्लॉगिंग ) :   भी कर रहे हैं भाई लोग


क्योंकि जिंदा बुतों के ताज़महल नहीं बना करते :   आजकल के शाहज़हां इत्ते मोटे असामी नहीं हुआ करते


क्यों मुझे गांधी पसंद नहीं है :    लेकिन करें क्या हर नोट पे वही और वही हैं


क्या बेटियां पराई होती हैं :    पता नहीं किसने ये बातें फ़ैलाई होती हैं


गाड पार्टिकल का सत्य :खुद अभी गॉड को भी नहीं पता है


क्या आपको भी है भूलने की आदत :      इतनी नहीं कि स्वास्थ्य टिप्स भी न पढ सकें


कुमार अंबुज : की कविताएं यहां पढें


रंगमंच के जनक्षेत्र में एक दर्शक का खुला पत्र :   जाकर अभी पढें , आपके ही नाम है 



बरसात के रंग , देखो मेरे संग :हाय हाय हम यहां हैं , गर्मी से तंग



क्राकोव डायरीज़-२ , गायब हुए देश की कहानियां :      देश गायब हो गया , मगर कहानियां ढीठ निकलीं , गायब न हुईं



बींग सिंगल :     वांट टू मिंगल


करूणामय हे रूद्र महेश्वर : दया दया प्रभु परमेश्वर


सत्यमेव जयते :     हर रविवार सुबह 11 बजे इश्टार पिलस पे


शुक्तिका का वार : डोलची में तैयार


प्रतिबंधों के बाद आज़ाद जिंदगी जीने का मज़ा :     पोस्ट बहुत चकाचक लिखे हो रज्जा ।


अपने काजल कुमार जी की तूलिका हर वक्त वार मोड में ही रहती है , इधर हलचल हुई और उधर तूलिका चल निकलती है , फ़िर तो जहां जहां लगती है बस पूछिए मत , देखिए ,

जिन्हें ये शाम गज़लों से खूबसूरत बनानी है उनके लिए आज रचनाकार पर बहुत माल मसाला उपलब्ध है , वहां आज हीरालाल प्रजापति की गज़लें रौशनी बिखेर रही हैं , मुझे जो सबसे ज्यादा पसंद आई वो है


नुकसान कुछ न कुछ हरेक बार हुआ है II
दिल जब भी  मुहब्बत में गिरफ्तार हुआ है II
इतने से गम हाल जो बेहाल है उसका ,
दुःख दर्द से वो आज ही दो चार हुआ है  II
सच क्या है इसी की तलाश में वो पस्त है ,
पढ़ पढ़ के ही तो शख्श वो बेकार हुआ है II
करते हैं मुहब्बत मगर वो मिल नहीं सकते ,
मजहब जो उनके बीच में दीवार हुआ है II
इक वो ही अकेला यहाँ खुदगर्ज़ नहीं है ,
मतलब परस्त सारा ही संसार हुआ है II
मंदिर में मस्जिदों में नहीं वो तलाशता ,
जिसको खुदा का खुद में ही दीदार हुआ है II
बुजदिल न थे न भागे थे मैदाने जंग से ,
दुश्मन का छुप के पीठ पे ये वार हुआ है II


लेखागार