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रविवार, 22 जुलाई 2018

राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार। 
तिरंगा
राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस हर वर्ष 22 जुलाई को मनाया जाता है। इस दिन अर्थात 22 जुलाई, 1947 को राष्‍ट्रीय ध्‍वज तिरंगे को भारत के संविधान द्वारा अपनाया (अंगीकृत) गया था। 'तिरंगा' भारत का राष्ट्रीय ध्वज है जो तीन रंगों से बना है इसलिए हम इसे तिरंगा कहते हैं। तिरंगे में सबसे ऊपर गहरा केसरिया, बीच में सफ़ेद और सबसे नीचे गहरा हरा रंग बराबर अनुपात में है। ध्‍वज को साधारण भाषा में 'झंडा' भी कहा जाता है। झंडे की चौड़ाई और लम्‍बाई का अनुपात 2:3 है। सफ़ेद पट्टी के केंद्र में गहरा नीले रंग का चक्र है, जिसका प्रारूप अशोक की राजधानी सारनाथ में स्थापित सिंह के शीर्षफलक के चक्र में दिखने वाले चक्र की भांति है। चक्र की परिधि लगभग सफ़ेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर है। चक्र में 24 तीलियाँ हैं।



~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

शनिवार, 21 जुलाई 2018

यह इश्क़ नहीं आसान - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

फ़ेसबुक पर लड़के को अचानक एक ख़ूबसूरत लड़की की फ़ोटो दिखायी दी, लड़के ने तुरंत मेसेज किया।

लड़का: आइ लव यू

लड़की: कौन हो तुम?

लड़का: मेरा नाम आशिक़ कुमार है।

लड़की: अच्छा क्या करते हो?

लड़का: मैं तुमसे प्यार करता हूँ।

लड़की: कहाँ रहते हो, पता क्या है तुम्हारा?

लड़का: मैं आपके दिल में रहता हूँ, मेरा पता है प्यार के बाज़ार के पास, इश्क़ वाली गली, प्रेमपुर, और तुम कहाँ रहती हो, क्या करती हो?

लड़की: मैं गोरखपूर में योगी आदित्यनाथ के घर के पास रहती हूँ, मेरे भैया बजरंग दल के अध्यक्ष और शिवसेना के महा सचिव हैं। उन्ही के अकाउंट का काम मैं देखती हूँ।

लड़का: माफ़ करना बहन, मेरी बात का बुरा मत मानना, मैं तो मज़ाक़ कर रहा था।

और उसके बाद लड़के ने फेसबुक से अकाउंट ही डिलीट कर दिया।

सादर आपका
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 

बनारस में मैकबेथ

रामानुजन् पर किताब

भीड़तंत्र की विरोधाभासी व्याख्या

हिन्दी, रोजगार और छत्तीसगढ़

कितना कुछ दिया उस देश ने

स्वाद!

मातृभूमि ! क्यों कहा जाता है ?

अमर क्रांतिकारी स्व॰ श्री बटुकेश्वर दत्त जी की 53 वीं पुण्यतिथि

भाप इंजन से बुलेट ट्रेन तक का भारतीय रेल का सफ़र ( भाग- 1 )

" चामुण्डा देवी मंदिर “(काँगड़ा )

नयी-सी लगे

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

गुबार देखते रहे ...



कहाँ से हम चलते हैं कहाँ के लिए, और मिट्टी का तन मिट्टी में मिल जाता है - फिर सिर्फ गुबार !
याद है मुझे अपना वो बचपन, जब मैं स्कूल में कवि नीरज बनी थी और पढ़ा था, कौन समझे मेरी आँखों की नमी का मतलब, ज़िन्दगी वेद थी, पर ज़िल्द बंधाने में कटी ...
अम्मा ने पत्र लिखकर कवि नीरज को बताया था, उन्होंने अपने आशीर्वाद के साथ अपना फ़ोटो भेजा था 🙏 ।मिलें न मिलें, एक गर्व मिल जाता है, शब्दों का रिश्ता बन जाता है । 
एक दिन शब्द चूक जाते हैं या व्यक्ति, कुछ तो हो जाता है और साँसें थम जाती हैं । थम गईं साँसें उस कवि की, जिनका रूप लेकर मैं मंच पर उतरी थी । 
कफ़न बढ़ा तो किसलिए नज़र तू डबडबा गई,
श्रृंगार क्यूँ सहम गया, बहार क्यूँ लजा गई,
न जन्म कुछ,न मृत्यु कुछ,बस इतनी सिर्फ बात है 
किसी की आँख खुल गई, किसी को नींद आ गई ।


Devendra Kumar Pandey


तेरा कारवां बड़ा लंबा था
हम भी शरीक हुए,
हमारे पिताजी भी 
और ..
हमारे बच्चे भी।
मजे की बात यह
कि तेरा कारवां अभी ख़तम नहीं हुआ
चलता रहेगा
यूं ही
तेरी यादों के सहारे
दीप जलाते वक्त
लब से फूटेंगे बोल..
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए!
राह चलते वक्त
कहेगा दिमाग
ए भाई! जरा देख के चलो...!!!
आज तू
मरा नहीं है नीरज
जमाने को
तेरेअमर होने की
पहचान मिली है।
... विनम्र श्रद्धांजलि।

Harkirat Heer


कवि गोपालदास नीरज का निधन हो गया है। वो पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे। बुधवार की शाम को तबियत ज्यादा बिगड़ने पर उन्हें आगरा से दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यहां उन्हें ट्रामा सेंटर के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। 93 साल के महाकवि नीरज आगरा के बल्केश्वर में रहने वाली बेटी कुंदनिका शर्मा के घर आए थे। यहां मंगलवार को सुबह के नाश्ते के बाद तबीयत बिगड़ गई थी।
उन्हें सांस लेने में दिक्कत हुई। इसके बाद उन्हें दीवानी कचहरी के पास स्थित लोटस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। यहां उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था। मगर फेफड़ों में संक्रमण से बढ़ती तकलीफ ज्यादा बढ़ने से उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगी और अंततः वे हम सब से विदा ले गए ....
नीरज जी ने अपनी काव्य रचनाओं से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। उन्हें भावनाओं और अनुभूतियों को व्यक्त करने में दक्षता हासिल थी। उनकी काव्य पुस्तकों में दर्द दिया है, आसावरी, बादलों से सलाम लेता हूँ, गीत जो गाए नहीं, नीरज की पाती, नीरज दोहावली, गीत-अगीत, कारवां गुजर गया, पुष्प पारिजात के, काव्यांजलि, नीरज संचयन, नीरज के संग-कविता के सात रंग, बादर बरस गयो, मुक्तकी, दो गीत, नदी किनारे, लहर पुकारे, प्राण-गीत, फिर दीप जलेगा, तुम्हारे लिये, वंशीवट सूना है और नीरज की गीतिकाएँ शामिल हैं। गोपाल दास नीरज ने कई प्रसिद्ध फ़िल्मों के गीतों की रचना भी की है। नीरज ने कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे’, ‘ए भाई जरा देख कर चलो’, ‘कहता है जोकर सारा ज़माना’ जैसे यादगार गीतों की रचना की ।
नीरज मूलतः एक कवि थे , जिन्होंने फिल्मों के लिए भी कई यादगार गीत लिखे हैं। कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के बाद नीरज को मुंबई से फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ के गीत लिखने का बुलावा आया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही फिल्म में संगीतकार रोशन के साथ उनके लिखे कुछ गाने जैसे ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे’, और ‘देखती ही रहो आज दर्पण न तुम’, ‘प्यार का यह मुहूर्त निकल जायेगा’ बेहद लोकप्रिय हुए। उसके बाद नीरज का फ़िल्मों में गीत लिखने का सिलसिला शुरू हो गया जो ‘मेरा नाम जोकर’, ‘शर्मीली’ और ‘प्रेम पुजारी’ जैसी अनेक चर्चित फिल्मों तक जारी रहा। नीरज को फिल्म जगत में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये 70 के दशक में लगातार तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिल चुका है। जिन गीतों पर उन्हें यह पुरस्कार मिला वो हैं- ‘काल का पहिया घूमे रे भइया! (फ़िल्म: चन्दा और बिजली-1970), ‘ बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं (फ़िल्म: पहचान-1971) और ‘ए भाई! ज़रा देख के चलो’ (फ़िल्म: मेरा नाम जोकर-1972)। 'प्रेम पुजारी' में देवानंद पर फिल्माया उनका गीत 'शोखियों में घोला जाए ..' भी उनके एक लोकप्रिय गीतों में शामिल है जो आज भी सुने जाते हैं।
उनके निधन से हिंदी साहित्य और फिल्मी जगत में शोक की लहर दौड़ गई है. बड़े-बड़े साहित्याकार, फिल्मी दुनिया और कई राजनेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है.
नीरज को उनके गीतों के लिए भारत सरकार ने 'पद्मश्री' और 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया था. उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए भी अनेक गीत लिखे और उनके लिखे गीत आज भी गुनगुनाए जाते हैं. हिंदी मंचों के प्रसिद्ध कवि नीरज को उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती पुरस्कार से भी सम्मानित किया था.
इस महान हस्ती को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ....😢😢

बहुत याद आयेंगे नीरज .......🙏💐
ऐसे गीत गन्धर्व जिसने भाषा की चाँदनी बिखेरी धरा पर यक्ष की भांति विचरण किया .....
जीवन कटना था, कट गया
अच्छा कटा, बुरा कटा
यह तुम जानो
मैं तो यह समझता हूँ
कपड़ा पुराना एक फटना था, फट गया
जीवन कटना था कट गया।
रीता है क्या कुछ
बीता है क्या कुछ
यह हिसाब तुम करो
मैं तो यह कहता हूँ
परदा भरम का जो हटना था, हट गया
जीवन कटना था कट गया।
क्या होगा चुकने के बाद
बूँद-बूँद रिसने के बाद
यह चिंता तुम करो
मैं तो यह कहता हूँ
कर्जा जो मिटटी का पटना था, पट गया
जीवन कटना था कट गया।
बँधा हूँ कि खुला हूँ
मैला हूँ कि धुला हूँ
यह विचार तुम करो
मैं तो यह सुनता हूँ
घट-घट का अंतर जो घटना था, घट गया
जीवन कटना था कट गया।


श्रद्धांजलि
19 नवम्बर 2017 मे दिए गए नई दुनिया अखबार मैं दिए गए नीरज जी के साक्षात्कार का अंश-
*साहित्य को सत्ता के संरक्षण की जरूरत आप किस हद तक महसूस करते है ?
★★साहित्य को सत्ता की कोई जरूरत नही है।
सत्ता को साहित्य की जरूरत है।साहित्य सत्ता का मार्गदर्शन करता है।सत्ता साहित्य की नही।साहित्य सत्ता को सही रास्ते पर लाने का कार्य करता है।
💐💐💐💐💐
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।
माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।
लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों! लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफानों तक ने छेड़ा पर,
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफरत गले लगाने वालों! सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है!

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

आज़ादी के पहले क्रांतिवीर की जन्मतिथि और ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार साथियो,
बंधुओ! उठो! उठो! तुम अब भी किस चिंता में निमग्न हो? उठो, तुम्हें अपने पावन धर्म की सौगंध! चलो, स्वातंत्र्य लक्ष्मी की पावन अर्चना हेतु इन अत्याचारी शत्रुओं पर तत्काल प्रहार करो. ये वो घोष है जो 29 मार्च 1857 को बैरकपुर की संचलन भूमि में गूंजा था. आज, 19 जुलाई को इस घोष के बाद प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन की लौ भड़काने वाले मंगल पांडे का जन्मदिन है. 5वीं कंपनी की 34वीं रेजीमेंट के 1446 नं. के सिपाही वीरवर मंगल पांडे को तत्कालीन सर्वाधिक प्रसिद्द नारा मारो फिरंगी को का जन्मदाता और आज़ादी का प्रथम क्रांतिकारी माना जाता है. उनका जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के नगवा गाँव में हुआ था. इनके पिता का नाम श्री दिवाकर पांडे तथा माता का नाम श्रीमती अभय रानी था. अंग्रेजों की गुलामी में सोये पड़े भारतवासियों को जगाने का काम मंगल पांडे ने किया. उनके द्वारा बैरकपुर में दो अंग्रेजों की बलि लेने के साथ ही सन 1857 के स्वाधीनता संग्राम का आरम्भ हुआ.


देश की आज़ादी के पहले क्रांतिवीर को उनके जन्मदिन पर बुलेटिन परिवार की तरफ से श्रद्धा-सुमन अर्पित हैं.


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बुधवार, 18 जुलाई 2018

100वां जन्म दिवस - नेल्सन मंडेला और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
Nelson-Mandela.png
नेल्सन मंडेला (अंग्रेज़ी: Nelson Mandela, जन्म:18 जुलाई, 1918 - मृत्यु: 5 दिसम्बर, 2013) दक्षिण अफ़्रीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति थे। नेल्सन मंडेला यहाँ के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बने थे। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के 27 वर्ष रॉबेन द्वीप पर कारागार में रंगभेद नीति के ख़िलाफ़ लड़ते हुए बिताए।

मबासा नदी के किनारे ट्राँस्की के मवेजों गाँव में 'नेल्सन रोहिल्हाला मंडेला' का 18 जुलाई, 1918 को जन्म हुआ था। उनके पिता ने उन्हें नाम दिया 'रोहिल्हाला' अर्थ पेड़ की डालियों को तोड़ने वाला या फिर प्यारा शैतान बच्चा। नेल्सन के पिता 'गेडला हेनरी' गाँव के प्रधान थे। उनका परिवार परम्परा से ही गाँव का प्रधान परिवार था। घर का कोई लड़का ही इस पद पर सुशोभित होता था। नेल्सन के परिवार का सम्बन्ध क्षेत्र के शाही परिवार से था। अठारहवीं शताब्दी में यह इस क्षेत्र का प्रमुख शासक परिवार रहा था, जब तक कि यूरोप ने इस क्षेत्र पर अधिकार नहीं कर लिया।


आज महान व्यक्तित्व नेल्सन मंडेला जी के 100वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।






आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

इमोजी का संसार और ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
सोशल मीडिया के इस दौर में उसके सभी मंचों पर इमोजी (Emoji) का प्रयोग बातचीत में खूब हो रहा है. कोई बातचीत बिना इमोजी के पूरी नहीं होती है. इमोजी का आरम्भ जापान से हुआ था. सन 1999 में जापान के डिजायनर शिगेताका कुरिया ने इमोजी का निर्माण किया. वे एक सेलफोन कंपनी में काम किया करते थे. इसी कंपनी के मोबाइल में इस्तेमाल के लिए उन्होंने इमोजी का अविष्कार किया. इमोजी को वैश्विक बाजार में ले जाने का श्रेय एप्पल कंपनी को जाता है. एप्पल ने सन 2007 में अपने i-phone में दो तरह के कीबोर्ड बनाये, जिसमें एक को इमोजी कीबोर्ड के नाम से जाना गया. इसके बाद धीरे-धीरे समूची दुनिया में इमोजी प्रसिद्द होने लगा. सन 2013 में एंड्राइड मोबाइल ने भी इमोजी को अपना लिया.


समय गुजरता रहा, इमोजी लोगों की बातचीत में शामिल होता रहा. उसको मिलती लगातार प्रसिद्धि के चलते इमोजिपेडिया नामक वेबसाइट का उदय हुआ. इसमें सभी तरह की इमोजी मिल जाती हैं. कालांतर में सन 2014 में इमोजिपेडिया के संस्थापक जेरेमी बर्ज ने विश्व इमोजी दिवस की शुरुआत की. तभी से प्रतिवर्ष 17 जुलाई को विश्व इमोजी दिवस का आरम्भ हो गया. इस दिन को विश्व इमोजी दिवस के रूप में मनाये जाने का कारण यह है कि इसी दिन एप्पल कंपनी ने अपने i-phone में इमोजी कैलेण्डर लांच किया था. सन 2013 में इमोजी (Emoji) शब्द को ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में शामिल किया गया. यहाँ एक जानकारी और देते चलें कि इमोजी (Emoji) का अर्थ किसी भी रूप में Emotion से नहीं है. असल में यह एक जापानी शब्द है जो e और moji से मिलकर बनाया गया है. जापानी में e का अर्थ Picture से और moji का अर्थ Character से लगाया जाता है. इमोजी के इस्तेमाल को लेकर माना जाता है कि दुनिया भर में प्रतिदिन 600 करोड़ इमोजी का उपयोग सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर किया जाता है.

सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला इमोजी - Face with Tears of Joy

उपयोग के मामले में दूसरे नंबर वाला इमोजी - Smiling Face with Heart-Eyes

इमोजी अब एक नई भाषा के रूप में जन्म ले चुकी है और लगातार वृद्धि भी कर रही है. बातचीत को सहज और आसान बना रही है किन्तु इसी इमोजी का गलत उपयोग नुकसानदेह भी साबित हो सकता है. एक खबर के अनुसार फ़्रांस में एक युवा को तीन माह की कैद की सजा सुनाई गई थी. उसने अपनी गर्लफ्रेंड को पिस्तौल वाली इमोजी भेज दी. जिसके चलते अदालत ने माना कि उस लड़के ने अपनी गर्लफ्रेंड को जान से मारने की धमकी दी है. ऐसी कोई खबर अभी अपने देश में नहीं आई है फिर भी इमोजी का सहज, सरल, सुरक्षित, अर्थपरक इस्तेमाल करते हुए आनंद लीजिये आज की बुलेटिन का.  

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सोमवार, 16 जुलाई 2018

जगदीशचन्द्र माथुर और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिंदी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
जगदीशचन्द्र माथुर
जगदीशचन्द्र माथुर (अंग्रेज़ी: Jagdish Chandra Mathur, जन्म: 16 जुलाई, 1917; मृत्यु: 14 मई, 1978) हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकारों में से एक थे, जिन्होंने आकाशवाणी में काम करते हुए हिन्दी की लोकप्रियता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। टेलीविज़न उन्हीं के जमाने में वर्ष 1949 में शुरू हुआ था। हिन्दी और भारतीय भाषाओं के तमाम बड़े लेखकों को वे ही रेडियो में लेकर आए थे। सुमित्रानंदन पंत से लेकर रामधारी सिंह 'दिनकर' और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे दिग्गज साहित्यकारों के साथ उन्होंने हिंदी के माध्यम से सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सूचना संचार तंत्र विकसित और स्थापित किया था।


आज हिन्दी के लोकप्रिय साहित्यकार जगदीशचन्द्र माथुर जी के 101वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।



आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।। 

रविवार, 15 जुलाई 2018

ज़िन्दगी - कभी चॉकलेट,कभी सजा




ज़िन्दगी जब चॉकलेट होती है,
सरस्वती माँ के आगे अ से बिल्ली कह देने पर भी,
सब प्यार से हँसते हैं,
हर वक़्त दुनिया मुट्ठी में लगती है ।
फिर अचानक एक दिन,
A for के आगे चुप्पी साधे रहने पर,
खींच जाता है कान,
और सज़ा में चॉकलेट नहीं मिलती,
तब ये सारे बड़े बहुत बहुत बुरे लगते हैं 



शनिवार, 14 जुलाई 2018

लीला चिटनिस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को नमस्कार।
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लीला चिटनिस (अंग्रेज़ी: Leela Chitnis, जन्म: 9 सितंबर, 1909; मृत्यु: 14 जुलाई, 2003) हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। लीला चिटनिस ने 52 वर्ष तक अभिनय किया और अशोक कुमार की नायिका रहीं, तो बाद में अनेक फ़िल्मों में वे दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद की माँ की भूमिकाओं में आईं। लीला चिटनिस ने अभिनय करने के अलावा एक फ़िल्म 'आज की बात' (1955) का निर्माण और निर्देशन भी किया।


  • हिंदुस्तानी सिनेमा में आने वाली स्नातक अभिनेत्रियों में दुर्गा खोटे के बाद लीला चिटनिस का नाम शिखर पर है। अपने जीवन में भी पति गजानन यशवंत चिटनिस से तलाक के बाद चार बच्चों की परवरिश उन्होंने बड़े जतन से की और 93 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु भी अमेरिका में उनके ज्येष्ठ पुत्र के घर हुई।
  • लीला चिटनिस ने अपने पति के साथ स्वतंत्रता संग्राम में इस तरह सहयोग किया कि क्रांतिकारी मानवेंद्र नाथ राय को अपने घर में ब्रिटिश पुलिस की निगाह से बचाकर रखा।
  • वे पहली भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्होंने 1941 में 'लक्स' साबुन के लिए विज्ञापन फ़िल्म में काम किया। उनके पूर्व केवल हॉलीवुड नायिकाओं को लिया जाता था। परंतु 1930 वाले दौर में पारंपरिक समाज स्त्री को किसी तरह आज़ादी और सुविधा नहीं देता था, तब इन महिलाओं ने रंगमंच पर अभिनय किया है, फ़िल्में की हैं और स्वतंत्रता संग्राम में भी सहयोग किया है।
  • लीला चिटनिस को देविका रानी जैसी विरल सुंदर महिला के स्टूडियो में उनके प्रिय नायक अशोक कुमार के साथ अपनी काबिलियत सिद्ध करनी थी। देविका रानी कठोर प्रशासक थीं। प्रेमिका की भूमिकाओं से नए लोगों द्वारा विस्थापित होने के बाद कभी अपने नायक रहे कलाकारों की माँ की भूमिका करना आसान यात्रा नहीं थी। लीला चिटनिस अपनी लंबी पारी में कभी भी किसी विवाद में नहीं उलझीं।



आज लीला चिटनिस जी के 109वें जन्म दिवस पर हम सब उन्हें अभिनय और मनोरंजन जगत में योगदान के लिए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर ... अभिनन्दन।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~


एक कीड़े ने पुराना समय याद दिलाया।

सोना पाने वाले प्रदर्शन से अधिक महत्वपूर्ण अंग्रेजी?

जितना चाहो ,देखो और दिखाओ

.....सूचना मन्त्री को सूचना नहीं मिली

वो हो सकता है जो आपने सोचा ही नहीं!

क्या हमें टेलीस्कोप से चांद पर लगे झंडे दिख सकते हैं?

मैक्सिकन वेव

अपना काम स्वयं करो

जल्द ही मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा

लकीरों मे कैद गौरैया

इसलिए मेरे अवसाद से डरता है


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  ... अभिनन्दन।। 

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

समान अधिकार, अनशन, जतिन दास और १३ जुलाई

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज १३ जुलाई है...आज ही के दिन सन १९२९ को लाहौर जेल में, क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण, क्रान्तिकारियों ने अनशन आरम्भ कर दिया था| जोकि ६३ दिनों तक जारी रहा और इस दौरान जतिन दास की मौत के सदमे ने पूरे भारत को हिला दिया था | स्वतंत्रता से पहले अनशन या भूख हड़ताल से शहीद होने वाले एकमात्र व्यक्ति जतिन दास हैं... जतिन दास के देश प्रेम और अनशन की पीड़ा का कोई सानी नहीं है | जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई, 1929 से अनशन आरम्भ कर दिया। जतीन्द्र भी इसमें सम्मिलित हुए। उनका कहना था कि एक बार अनशन आरम्भ होने पर हम अपनी मांगों की पूर्ति के बिना उसे नहीं तोड़ेंगे। कुछ समय के बाद जेल अधिकारियों ने नाक में नली डालकर बलपूर्वक अनशन पर बैठे क्रांतिकारियों के के पेट में दूध डालना शुरू कर दिया। जतीन्द्र को 21 दिन के पहले अपने अनशन का अनुभव था। उनके साथ यह युक्ति काम नहीं आई। नाक से डाली नली को सांस से खींचकर वे दांतों से दबा लेते थे। अन्त में पागल खाने के एक डॉक्टर ने एक नाक की नली दांतों से दब जाने पर दूसरी नाक से नली डाल दी, जो जतीन्द्र के फेफड़ों में चली गई। उनकी घुटती सांस की परवाह किए बिना उस डॉक्टर ने एक सेर दूध उनके फेफड़ों में भर दिया। इससे उन्हें निमोनिया हो गया। कर्मचारियों ने उन्हें धोखे से बाहर ले जाना चाहा, लेकिन जतीन्द्र अपने साथियों से अलग होने के लिए तैयार नहीं हुए। 

अमर शहीद जतिंद्र नाथ दास जी के बारे में यहाँ पढ़ें ... 

 ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से जतिन दास और उन के साथियों को शत शत नमन |

सादर आपका
 शिवम् मिश्रा

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केशों का तिलिस्म (बाल कहानी)

एक गजल - कुर्सी (अरुण कुमार निगम)

मोहलतें

बचपने वाला बचपन ......

यह बारिश नहीं प्रेम है...

मेरी जमा पूंजी

निमंत्रण

स्वयंवर

जेल के अन्दर एक जेल होती है जिसे तन्हाई कहते हैं

यह लड़ाई है अच्छाई और बुराई की

इस तिरंगे की छाँव में

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

बार-बार बहाए जाने के बीच ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आज की बुलेटिन अपनी एक लघुकथा के साथ. कृपया दोनों का आप आनंद लें.
सादर....
++
मात्र दस वर्ष की उम्र में मछली की तरह तैरते हुए उसने जैसे ही अंतिम बिन्दु को छुआ वैसे ही वह तैराकी का रिकॉर्ड बना चुकी थी। स्वीमिंग पूल से बाहर आते ही उसको साथियों ने, परिचितों ने, मीडियाकर्मियों ने घेर लिया। सभी उसे बधाई देने में लगे थे। उसके चेहरे पर अपार प्रसन्नता दिख रही थी। इस भीड़भाड़, गहमागहमी के बीच पत्रकारों ने तैराकी, प्रशिक्षक, सफलता का श्रेय किसे जैसे सवालों को दागना शुरू कर दिया।

कैमरों के चमकते फ्लैश के बीच दमकते चेहरे के साथ पूरे आत्मविश्वास से उसने कहा-पिछले कई दशकों से पैदा होते ही कभी नदी, कभी नाले, कभी तालाब, कभी फ्लश में बहाये जाने ने तैरना बखूबी सिखाया है। उनके बार-बार बहाये जाने के अहंकार और मेरे बार-बार पैदा होने की जिद ने इसे दृढ़ता प्रदान की है।

उसका जवाब सुनकर भीड़ खामोश थी, गहमागहमी थम गई थी, कैमरे के फ्लैश चमकना भूल गये थे। लोगों को पानी से भीगे उसके चेहरे पर आंसुओं की धार अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी।


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बुधवार, 11 जुलाई 2018

एक पुरुष, एक स्त्री (अपवाद हर जगह है )










एक पुरुष 
शरीर की मांग के लिए,
विकृत चाह के लिए,
किसी भी तबके की स्त्री के साथ हो सकता है,
वह स्त्री पागल ही क्यूँ न हो,
मरणासन्न ही क्यूँ न हो ...
सहज, विनम्र, सुसंस्कृत, संयमी पुरुष 
बहुत कम होते हैं ।...
एक स्त्री, 
प्रेम के नाम पर किसी भी पुरुष के साथ चल सकती है,
वह गरीब हो, अपाहिज हो,
मृत्युशय्या पर ही क्यूँ न हो...
एक स्त्री , 
समर्पण कर सकती है,
कुछ लेने के लिए 
किसी भी स्तर पर नहीं उतर सकती,
व्यवहारिक स्त्रियाँ बहुत कम होती हैं !!!
...लेकिन,
वक़्त बदल गया है,
स्त्रियाँ अति व्यवहारिक हो गई हैं,
किसी के साथ नहीं चल सकती अब,
पूरे हिसाब-किताब के साथ रिश्ते बनाती हैं,
बहुत व्यवहारिक चाह हो गई है उनकी,
तथाकथित प्यार से पहले वह जानना चाहती है,
घर,गाड़ी, बैंक बैलेंस ...
.....
अब हीर होने से ज्यादा,
अमीर हो जाना चाहती हैं स्त्रियाँ ।
(अपवाद हर जगह है )



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