Subscribe:

Ads 468x60px

कुल पेज दृश्य

ग़ज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ग़ज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

एहसासों के दीप जलाना, अच्छा है पर कभी-कभी - ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो,
एक स्व-रचित रचना के साथ आज की बुलेटिन. आशा है कि दोनों पसंद आयेंगे आपको.
+
एहसासों के दीप जलाना, अच्छा है पर कभी-कभी
बीते लम्हे याद दिलाना, अच्छा है पर कभी-कभी.

शब्द तुम्हारे जादू जैसे, सम्मोहित कर जाते हैं,
दिल को बातों से बहलाना, अच्छा है पर कभी-कभी.

चाँद सितारे, फ़ूल और कलियाँ, तुमको घेरे रहते हैं,
हमें छोड़ सबसे मिल आना, अच्छा है पर कभी-कभी.

जो पल गुज़रे संग में तेरे, यादें बन कर महक रहे,
यादों में आँखें भर आना, अच्छा है पर कभी-कभी.


++++++++++









गुरुवार, 1 नवंबर 2018

नींद ख़ामोशियों पर छाने लगी - ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार मित्रो,
आज स्व-रचित ग़ज़ल आपके लिए....
++

नींद ख़ामोशियों पर छाने लगी,
इक कहानी फिर ठहर जाने लगी.

दर्द को रोका धीरे-धीरे मगर,
सैलाब दिल में लहर लाने लगी.

कब बदल जाए मौसम क्या पता,
तेज़ बारिश में धूप मुस्काने लगी.

हौसलों से हारती हैं मुश्किलें,
लौ दिए की अंधियारा मिटाने लगी.

आ रही वीरानियों में भी रौनक़ें,
बस्ती ख़ुद को फिर से बसाने लगी.

ज़ुल्म मिल करने लगे हैं रात-दिन,
अब तो क़ुदरत भी क़हर ढाने लगी.

ज़ख़्म कुरेदने का हुनर सीखकर ज़ुबां,
मुहब्बतें मिटा नफ़रतें फैलाने लगी. 


++++++++++












शनिवार, 2 सितंबर 2017

हिन्दी ग़ज़ल सम्राट दुष्यंत कुमार से निखरी ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय मित्रों,


हिन्दी ग़ज़ल में जो लोकप्रियता दुष्यंत को मिली,
वो किसी विरले कवि को है मिलती.
हिन्दी के ऐसे कवि-ग़ज़लकार हैं वे अब तक,
जिनका लेखन गूँजता है सड़क से संसद तक.  
यूँ तो अनेक विधाओं में उनकी कलम चली,
किन्तु ग़ज़लों को ही अपार लोकप्रियता मिली.
जन्मस्थान बिजनौर का ग्राम राजपुर नवादा,
दिन था वो 1 सितम्बर 1933 का.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करके,
आकाशवाणी भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर बने.
नाम दुष्यंत कुमार त्यागी स्वभाव से सहज-मनमौजी,
आरम्भ में रचनाएँ की बनकर दुष्यंत कुमार परदेशी.
साहित्य की दुनिया में पदार्पण किया था जब,
प्रगतिशील शायरों, कवियों का राज था तब.  
ग़ज़लों में ताज भोपाली औ क़ैफ़ भोपाली छाये थे,
अज्ञेय और मुक्तिबोध हिन्दी की कठिन बनाये थे.
तब सहज ग़ज़ल लिख उसे कठिनता से निकाला,
प्रसिद्धि पाई और हिन्दी में ग़ज़ल को निखारा.
साये में धूप एकमात्र ग़ज़ल संग्रह उनका,
आज भी साहित्य-प्रेमियों के बीच जाता है सराहा.
30 दिसम्बर 1975 को हिन्दी गज़लकार सो गया,
42 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया.
उनका नाम अमर रहेगा हिन्दी ग़ज़ल में,
आवाज़ बन उभरेगा जन-जन के दिल में.


हिन्दी ग़ज़ल के निर्विवाद नायक को काव्यात्मक श्रद्धांजलि के साथ काव्यात्मक-बुलेटिन

++++++++++














शनिवार, 13 जून 2015

अपना कहते मुझे हजारों में

प्रिये ब्लॉगर मित्रगण,

दोस्तों सुबह दिल्ली से बाहर जाना है तो तड़के निकलना है इसलिए जल्दी सोना है आज तो फिर ये बुलेटिन ज़रा जल्दी में प्रस्तुत रहा हूँ इसलिए कुछ विशिष्ट और विस्तृत ना लिख कर बस अपनी लिखी नई नज़्म पेश कर रहा हूँ। उम्मीद कर रहा हूँ आपको पसंद आएगी और आप सब की टिप्पणियां और समीक्षा पढ़ने को मिलेगी। तो पेश-ए-ख़िदमत है :-

अपना कहते मुझे हजारों में
-----------------------------------------------------------------------------
जो वफ़ा होती खून के रिश्तों में बाक़ी
तो जज़्बात क्यों बिकते बाज़ारों में

जो हर कोई देता साथ ज़मानें में अपना
तो तनहा चांद ना होता सितारों में

जो हर गुल की ख़ुशबू लुभाती दिल को
तो गुलाब ख़ास ना होता बहारों में

जो मिले मौक़ा तुरंत नज़र बदलते हैं 
तो बात है ख़ास खुदगर्ज़ यारों में

बख़ुदा 'निर्जन' भी ख़ुशक़िस्मत होता
जो वो अपना कहते मुझे हजारों में

--- तुषार राज रस्तोगी ---

आज की कड़ियाँ

सूर्या नमस्कार - ज़ील

कार्टून:- न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी - काजल कुमार

ज़िन्दगी का खटराग - भावना लालवानी

उन दीवारो पर - संध्या आर्य

चिराग जलता रहेगा - इश मिश्रा

पुरुषों के स्वभाव को प्रभावित करते नव गृह - उपासना सिअग

कभी तुम रूठो हमसे तो कभी हम मनायें तुम्हे - रेखा जोशी

अक्ल वालों की नजर गाय पर होती है बेवकूफ खुद ही बैल हो जाते हैं -  सुशील कुमार जोशी

पर्यावरण पथ के पथिक - 15 : अर्चना बाली - श्रीवास्तव

इन शब्दों के बिना - सुषमा 'आहुति'

राहे जिंदगी में - अनीता

आज के लिए इतना ही अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी तब तक के लिए - सायोनारा

नमन और आभार
धन्यवाद्
तुषार राज रस्तोगी
जय बजरंगबली महाराज | हर हर महादेव शंभू  | जय श्री राम

लेखागार