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रविवार, 27 जनवरी 2019

पूर्वाग्रह से ग्रसित लोग : ब्लॉग बुलेटिन


नमस्कार दोस्तो,
पूर्वाग्रह में ग्रसित होकर हम सब कैसे मशीन बनते जा रहे हैं, इसका उदाहरण हमें खुद अभी मिला, जबकि हम एक एक कार्यक्रम में सहभागिता करके वाराणसी से वापस उरई आ रहे थे. वातानुकूलित कोच होने के कारण कागज के लिफाफे में चादर, तौलिया आदि यथास्थान रखे हुए थे. चादर, तौलिया निकाल लेने के बाद यह कागज़ का लिफाफा हमारे बहुत काम आता है. ट्रेन में यह कागज़ हमारी रचनाशीलता का गवाह बनता है, हमारी सक्रियता का साथी बनता है. इसके अलावा ऐसा कोई कागज़ जिसमें किसी भी तरफ लिखा जा सकता है, सदैव हमारे काम का रहता है. 


उस दिन दोपहर बाद चली ट्रेन आधी रात के आसपास लखनऊ पहुँची. लखनऊ में आने वाले लोग एकसाथ आये. वे लोग अपने-अपने लेटने की सुविधा का दोहन करने का विचार बनाकर चादर वगैरह लिफाफों से निकालकर उन्हें कोच की धरती की भेंट चढ़ा चुके थे. कई हिस्सों में फटे लिफाफे गंदगी सी फैलाये हुए दरवाजे के पास ही पड़े थे. बजाय उन लोगों से कुछ कहने के हमने उन लिफाफों को ये सोचकर उठाया कि एक तो गन्दगी साफ़ हो जाएगी और यदि ज्यादा बुरी हालत में नहीं होने तो हमारे काम आ जायेंगे.

लिफाफों के उठाते ही एक ज्यादा स्मार्ट से सज्जन ने टोका, क्यों भाईसाहब आप भाजपा से जुड़े हैं? लिफाफे जिस मुद्रा में हाथ में थे सोचा कि उनके मुँह पर मारते हुए जवाब दे ही दें मगर उनकी उम्र का ख्याल कर हँस दिए. उन लिफाफों को तह बनाते हुए हमने देखा वे सज्जन मंद-मंद मुस्कुराते हुए कभी हमें, कभी उन लिफाफों की तरफ देखे जा रहे थे. उनकी मानसिकता समझ आ ही चुकी थी, सोचा कि कुछ झटकेदार इनकी खोपड़ी में घुसा ही दें. काम आ सकने वाले लिफाफों की तह बनाकर उन्हें अपने बैग के हवाले किये तो उनकी आँखें कुछ चौड़ी हुईं. उनके हावभाव में प्रश्नवाचक देखकर उनकी तरफ जवाब फेंका, आपको पता नहीं मोदी जी की योजना? उनके प्रश्नवाचक चिन्ह को और बड़ा होते देखा और उसे अपनी तरफ से और बड़ा कर दिया यह कहते हुए कि उपयोग किये गए ये कागज़ के लिफाफे सही से तह करके किसी स्टेशन पर जमा कर दो तो प्रति लिफाफे बीस रुपये मिलते हैं. अबकी वे महाशय कुछ सन्नाटा सा खींचते समझ आये और हमने भी बैग पर ऐसे कब्ज़ा जमाया जैसे उसमें कोई बड़ा खजाना रखा हुआ हो.

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गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

एक पर एक ग्यारह - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आजकल समाज में कुछ ऐसा चलन देखने को मिल रहा है कि जिसे देखो वो खुद को ही एकमात्र बुद्धिमान समझ रहा है. सामने वाले को उसने जन्मजात बेवकूफ समझ रखा है. राजनीति हो, व्यवसाय हो, नौकरी हो या फिर कोई अन्य क्षेत्र सभी में सब अपनी-अपनी ढपली पीटने में लगे हैं. अपनी ही बात को सत्य सिद्ध करना चाह रहे हैं. दूसरे की मानना ही नहीं चाहते. यही कारण है कि सब एक पर एक ग्यारह बने हुए हैं और न केवल अपना वरन समाज का नुकसान कर रहे हैं.
ऐसी सोच वालों के साथ कुछ ऐसा ही होता है जैसा कि उस शहरी ठग के साथ हुआ. क्या हुआ, ये जानने के लिए पढ़ जाइए, पूरे आनंद के साथ. पहले ये कथा फिर आज की बुलेटिन.


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एक गाँव में रात के समय एक शहरी ठग पहुँचा. उसने सोचा कि रात के अँधेरे में गाँव के किसी बूढ़े व्यक्ति को ठगा जाये. ऐसा सोच वह एक छोटी सी दुकान पर पहुँचा, दुकान पर एक बहुत ही बुजुर्ग व्यक्ति बैठा था.
उस शहरी युवक ने एक नोट देकर उस बूढ़े व्यक्ति से कहा - बाबा, छुट्टे दे दो.
बूढ़े ने देखा कि नोट तेरह रुपये का है. उसने कहा - बेटा ये नोट तो नकली है. अभी तक तेरह रुपये का नोट आया ही नहीं है.  
युवक ने कहा - बाबा, नोट तो असली है. सरकार ने ये नया नोट चलाया है. अभी शहर में ही आ पाया है, गाँव तक आने में कुछ समय लगेगा.  
बूढ़े व्यक्ति ने सहमति में सिर हिलाया और अंदर से दो नोट लाकर उस शहरी ठग को दिये. युवक ने नोट देखे और कहा - बाबा, ये क्या? एक नोट छह रुपये का और एक नोट सात रुपये का, ये तो नकली हैं.  
बूढ़े ने कहा - नहीं बेटा, ये दोनों नोट असली हैं, अभी सरकार ने नये-नये चलाये हैं. गाँव में आये हैं, शहर तक आने में समय लगेगा.

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गुरुवार, 14 जुलाई 2016

जाने-अनजाने आतंकवाद का समर्थन - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आतंकवादियों के समर्थन में नारे लगना, उनके समर्थन में रैलियाँ करना, उनको शहीद घोषित करना, सेना के विरोध में खड़े होना, आतंकवादी के अंतिम संस्कार में अप्रत्याशित भीड़ का जुटना आदि वे बातें हैं जो सामान्य नहीं कही जा सकती हैं. हाल ही में एक आतंकी की मौत के बाद सेना का विरोध, राज्य में हिंसात्मक घटनाओं का होना, किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए. केंद्र सरकार का विरोध करने के लिए, मुस्लिमों के समर्थन में खड़े होने के लिए जिस तरह से आतंकवादियों का समर्थन किया जा रहा है वो निंदनीय है. जो लोग इन घटनाओं के सन्दर्भ में जम्मू-कश्मीर को आज़ाद किये जाने के पक्ष में, वहाँ जनमत-संग्रह कराये जाने के समर्थन में, जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का अंग मान लेने के पक्ष में वकालत करते दिख रहे हैं वे वास्तविक रूप में जम्मू-कश्मीर के समर्थन वाली नहीं वरन केंद्र सरकार के विरोध वाली मानसिकता से काम कर रहे हैं. सोचना होगा कि जम्मू-कश्मीर को आज़ाद कर देने से क्या देश भर में आतंकी घटनाओं की समाप्ति हो जाएगी? न सही देश भर में, क्या जम्मू-कश्मीर में ही शांति हो जाएगी? जनमत-संग्रह समर्थकों को समझना होगा कि विगत कई दशकों से जिस तरह से वहाँ के मूल निवासियों को हिंसात्मक गतिविधियों के द्वारा प्रताड़ित करके भगाया गया, उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा किया गया उसके बाद से वहाँ मूल निवासियों की संख्या नाममात्र को रह गई है. पाकिस्तान समर्थित आतंकी सोच वाले, स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर की माँग करने वाले अलगाववादी मानसिकता वाले लोगों ने वहाँ कब्ज़ा कर रखा है. ऐसे में जनमत-संग्रह का कोई अर्थ नहीं रह जाता है. उस राज्य की आज़ादी से देश में अन्य दूसरे राज्य अपनी स्वतंत्रता के लिए हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेना शुरू कर देंगे.


यहाँ केंद्र सरकार को कठोर कदम उठाये जाने की जरूरत है. उसके कठोर कदमों के साथ-साथ नागरिकों को भी संयम बरतने की आवश्यकता है. उन्हें महज राजनैतिक कठपुतली न बनते हुए देश-हित में अपनी आवाज़ उठानी चाहिए. उन्हें समझना होगा कि सेना अपने लिए नहीं वरन देश के लिए, देशवासियों के लिए अपनी जान जोखिम में डाल कर आतंकियों का मुकाबला करती है. ऐसे में महज विरोध के लिए नागरिकों का आतंकियों के समर्थन में खड़े हो जाना, आतंकी को शहीद बताने लगना दुर्भाग्यपूर्ण है. आज़ाद देश में आज़ादी की माँग करने वाले आतंकियों की मानसिकता स्पष्ट है, उसी मानसिकता का परिचय देते आम नागरिक भी किसी रूप में आतंकवादी से कम नहीं. आतंकी जहाँ बम-बन्दूक का इस्तेमाल करते हुए मौत बाँट रहे हैं वहीं तथाकथित बुद्धिजीवी केंद्र सरकार के विरोध के लिए आतंकियों का समर्थन कर मौत बाँटने में सहयोगी बन रहे हैं. वे किसी न किसी रूप में अपने को जम्मू-कश्मीर का, आतंकवादी का, मानवाधिकार का सच्चा समर्थक नहीं वरन आतंकवादी ही सिद्ध कर रहे हैं.

देश में सबकुछ सामान्य हो जाये, सामान्य रहे इसी कामना के साथ आज की बुलेटिन आपके सामने प्रस्तुत है.

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(चित्र गूगल छवियों से साभार)

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

विस्फोटक स्थिति के बीच हलकी-फुल्की ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
भारतीय नववर्ष की शुभकामनाओं सहित आज की बुलेटिन लिए हम फिर उपस्थित हैं. कितना औपचारिक सा होता जा रहा है, शुभकामनाओं का आदान-प्रदान. कुछ भी तो बदलता नहीं दिखता अपने आसपास. सब कुछ और भी बिगड़ता सा महसूस होता है. कोई आतंकी मारा जाता है तो वो बेटी-बेटा बताया जाने लगता है; कोई आतंकी फांसी चढ़ाया जाता है तो वो शहीद बताया जाने लगता है और कोई अधिकारी मारा जाता है तो ख़ामोशी अख्तियार कर ली जाती है. देश की बर्बादी के नारे लगने वालों की गिरफ़्तारी को कानूनी राय ले जाती है किन्तु तिरंगा फहराने पर देश में ही लाठीचार्ज सहना पड़ता है. ऐसी विस्फोटक, विध्वंसक स्थिति में अनेकानेक बार मन-मष्तिष्क संज्ञा-शून्य हो जाता है. संभव है आप सभी का भी होता होगा. इसलिए आज की बुलेटिन को कुछ हलके-फुल्के रूप में प्रस्तुत करने का मन हो आया है.

इस स्व-लिखित लघुकथा के साथ आज की बुलेटिन का आनंद लीजिये. विश्वास है कि आज के तनाव भरे दौर में आप कुछ हल्का महसूस करेंगे.

मोबाइल में मैसेज के नोटिफिकेशन की घंटी ने आवाज़ दी, उसने लपक कर मोबाइल की स्क्रीन पर खेलना शुरू कर दिया. स्क्रीन पर उभर कर आई तस्वीर देख उसकी आँखें और बड़ी हो गईं. स्क्रीन नग्न स्त्री देह के साथ चमक रही थी, जिसके अंग-प्रत्यंग एक-एक कर बदलती फोटो के साथ सामने आते जा रहे थे. अपने आसपास एक जासूसी, जाँचनुमा निगाह डालने के बाद वो फिर स्क्रीन पर महिला की नग्न देह से खिलवाड़ करने में लग गया. चार-पाँच मिनट खुद खेलने के बाद अब उसके द्वारा उन तस्वीरों को शेयर करने का उपक्रम शुरू कर दिया गया.
तस्वीरें तो शेयर हो ही रही थी और हर शेयर में मृत नारी की नग्न देह की चंद तस्वीरें लोगों की मानसिकता को शेयर कर रही थीं. ये मानसिकता कुछ और बलात्कारियों को जन्म दे रही थी.

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मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

कैसे कैसे लोग ???

नमस्कार दोस्तों 

सबसे पहले आप सबसे माफ़ी चाहूँगा कि पिछले दो दिन १५ - १६ दिसम्बर को बुलेटिन आप तक नहीं पहुँच पाई | कुछ तकनीकी कारणों के चलते बुलेटिन लगा पाने में असमर्थ रहे | खैर चलिए आज बहुत समय बाद बुलेटिन लगाने का अवसर प्राप्त हुआ है | पिछले दिनों रश्मि दी ने जो अवलोकन कर पोस्ट लगाई वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण रहीं | उनके अवलोकन के कारण सभी को बहुत हौसला प्राप्त हुआ | अपनी-अपनी लेखनी में और ज्यादा परिपक्वता लाने और सुधार करने का भी मौका मिलेगा | आज आप सभी के साथ मैं अपना एक निजी अनुभव साँझा करना चाहता हूँ | उम्मीद करता हूँ आप सबके विचार और बहुमूल्य टिप्पणियां ज़रूर प्राप्त होंगी | 


अभी हाल ही में एक बहुत ही गहन अनुभव हुआ | जीवन में हम सब को बहुत से उतार चढ़ाव और विषम परिस्थितियों से गुज़ारना पड़ता है | ऐसी परिस्थियों में हमें अपना संयम बनाये रखने की आवश्यकता होती है | अपनी बुद्धि, विवेक और चेतना के सहारे से ही ऐसे कठिन समय में  अपने निर्णय लेने होते हैं | ऐसे समय में हमारा सामना और संपर्क अनेक प्रकार के लोगों से भी होता है | उनमें से कुछ लोग हमारा मनोबल तोड़ने की कोशिश करते हैं, कुछ हमें सांत्वना देते नज़र आते हैं, कुछ अपनी बातों से आपका अपमान भी करते हैं, कुछ अपने अनुभवों के आधार पर हमें नए रास्ते दिखने की कोशिश करते हैं, कुछ हमारे ऊपर दोषारोपण करते हैं, कुछ लोग हमें इस्तेमाल करना चाहते हैं, कुछ ना जानते हुए भी हमें परखने लगते हैं, कुछ सिर्फ अनुमान के बल पर अपना मत देने लग जाते हैं और कुछ दोस्ती का झूठा चोगा पहन कर आप से आपकी निजी ज़िन्दगी के बारे में सब कुछ जानने की कोशिश करते हैं और सब कुछ जान लेने पर वह आपका उपभोग करना चाहते हैं या अपनी कटीली विचारधारा से आपको चोट पहुंचाते हैं | आज ऐसे ही कुछ लोगों के बारे में मैं आपके ख्याल जानने की इच्छा से यह लेख आप तक पहुंचा रहा हूँ | 

ऐसे लोग दरअसल दो मुंहे सांप की तरह होते हैं | जो आपकी तकलीफ़ में अपने आनंद को ढूंढते हैं और अपनी संकीर्ण मानसिकता के चलते या फिर अपने झूठे अहम के चलते आपकी हर बात को गलत ठहराने मैं लगे रहते हैं और आपको छोटा महसूस करा नीचा दिखने का प्रयास करते हैं | एक तरफ वो दोस्ती का दम भरते हैं और दूसरी ओर आपको ही चोट पहुँचाने की चेष्टा करते हैं | कुछ जान बूझ कर और कुछ अनजाने में भी ऐसा करते हैं | 

अभी हाल ही में मेरा भी एक ऐसे व्यक्ति से सामना हुआ | हालाँकि वह पुराने परिचित थे | परन्तु कई सालों बाद उनसे मुलाक़ात हुई | शुरू शुरू में वार्तालाप बहुत सुखद रहा | वक़्त गुज़रते बातों का सिलसिला बढ़ा और निजी ज़िन्दगी के अनुभवों का आदान प्रदान होना शुरू हुआ | मुझे उन्हें समझकर और उनकी मानसिकता को देखकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि उन्हें मेरे जीवन के बारे में जानने में ज्यादा दिलचस्पी थी बनिज्बत अपने बारे में बताने और बात करने के | बात बात पर दोस्ती का उलाहना दिया जाता और जताया जाता कि वह मेरे कितने घनिष्ट है | परन्तु जब भी उनसे उनके विषय में कोई सवाल किया जाता तो वह तुरंत बात को घुमा देते, या उस दौरान हो रही बातचीत से पलायन कर लेते या फिर सवाल के जवाब में एक और सवाल खड़ा कर देते | हमेशा खुश रहने वाले, ज़िंदादिल और जीवंत रहने का दिखावा करने वाला वह प्राणी मुझे मानसिक रूप से बहुत ही बीमार प्रतीत हुआ | धीरे धीरे उन्होंने अपने खयालातों को शब्दों को चाशनी में भिगो भिगो कर परोसना प्रस्तुत किया और यह दर्शाना प्रस्तुत किया कि वह कितने बड़े विद्वान् हैं | उन्हें मेरी हर बात काटने में बेहद ख़ुशी होने लगी | उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे वो मुझे अपने समक्ष कितना तुच्छ और अज्ञानी समझते हैं | किसी बात पर यदि उन्हें ज़िरह या चर्चा करने या उनके विचार जानने की इच्छा जताई तो तुरंत बात को वहीँ खत्म कर देने की कवायत शुरू हो गई | मुझे आश्चर्य हुआ कि इतनी किताबें पढने वाला व्यक्ति भला ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता है | हर बात में अपनी बातों को सिद्ध करना, तर्क-वितर्क तो छोड़िये तुरंत कुतर्क पर उतर आना और बहस में पड़ जाना किसी समझदार और शिष्ट इंसान के व्यक्तित्त्व पर प्रश्न चिन्ह अंकित कर ही देता है | खैर नतीजा यह सामने आया के मैंने उनके समक्ष हाथ जोड़ दिए और उनसे अब किनारा कर लिया है | 

मेरा सवाल सभी से बस इतना है कि ऐसे लोग जो सोशल मीडिया साइट्स पर या निजी जीवन में आपसे जुड़ते हैं या आप उनकी पोस्ट्स पढ़कर उन्हें जोड़ते हैं या अपना दोस्त बनाते हैं, वह कहाँ तक सही होता हैं ? क्या ऐसे लोगों के साथ अपने निजी अनुभवों को बांटा जाना चाहियें ? क्या जो सामग्री वह पोस्ट करते हैं उनकी मानसिकता भी वैसी ही होती है ? क्या जो चेहरा वह लोगों को दिखाते हैं वह उनका असली चेहरा होता है ? क्या वह अपने को दूसरों से ऊपर समझते हैं और श्रेष्टता मनोग्रन्थि रुपी बीमारी उनसे चिपकी होती है ? क्या सोशल मीडिया के ज़रिये वह अपने मानसिक स्तर से विपरीत आचरण करते हैं ? क्या अपनी खीज, खिन्नता और अपने जीवन में मिले खालीपन को भरने की कोशिश करने के लिए वह यहाँ जुड़ते हैं और दूसरों से दोस्ती करते हैं ? क्या दूसरों की ज़िन्दगी में झाँकने, उन्हें अपमानित करने और दूसरों की परिस्थितियों का मज़ाक बनाना उनका शौक होता है ? ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना उचित होगा ? ऐसे लोगों की मानसिक संतुलन के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ? ऐसे लोगों को मानवीयता की किस श्रेणी में रखा जाना चाहियें ? 

बस आज इस बात को लेकर मेरा चर्चा करने का मन है | मेरे सवालों के जवाब आपकी टिप्पणियों के रूप में मिलें तो बहुत अच्छा लगेगा |  

आज की कड़ियाँ 












अब इजाज़त | आज के लिए बस यहीं तक | फिर मुलाक़ात होगी | आभार
जय श्री राम | हर हर महादेव शंभू | जय बजरंगबली महाराज 

लेखागार