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रविवार, 25 नवंबर 2018

हम घर से बहुत दूर निकल आये !















जब घर से पहचान हुई 
संबोधनों की समझ हुई
तो कभी लगा स्वर्ग है
तो कभी पिंजड़े सा एहसास हुआ ।
सीख एक हद तक अच्छी लगती है,
वह भी सबके बीच नहीं,
ऐसे में मन उदण्ड हुआ
विरोध के स्वर पनपे,
लेकिन जब भी,
जहाँ भी,
जैसे भी - औंधे मुँह गिरे,
घर की याद आई,
सबके बीच दी गई सीख का अर्थ समझ में आया,
जबरदस्त डांट में कितनी सुरक्षा थी,
इसका भान हुआ ।
घर क्या होता है,
रिश्ते क्या होते हैं,
ये जब तक जाना और माना,
हम घर से बहुत दूर निकल आये !

प्रेम ने मुझे
शालीनता सिखाई
खुद से बेहतर बात करना
प्रेम के कारण सीख पाया मैं
प्रेम ने मुझे आदर करना सिखाया
और बिना बात अड़ने की खराब आदत
प्रेम के कारण ही छोड़ पाया मै
प्रेम के कारण मै सीख पाया
हंसी और आंसू में बुनियादी भेद
वरना मुद्दत तक
हंसते हुए लोग मुझे लगते थे रोते हुए
और हंसी आती थी किसी के रोने पर
प्रेम मुझे बदलने नही आया था
प्रेम मुझे ये बताने आया था कि
मनुष्य अपने चयन से अकेला हो सकता है
या फिर कमजोरियों के कारण
वरना
ईश्वर ने नही बनाया मनुष्य को
मात्र खुद के लिए
उस पर हक होता है
किसी और का भी
कितनी अवधि के लिए?
ये बात नही बताई
किसी प्रेमी युगल ने मुझे
अनुभव के साक्षात्कार के बाद भी
शायद
यही बात बताने प्रेम आया था जीवन में
और बताकर चला गया
अपनी कूट भाषा में।

्एक गँवई सा सपना है ........
गली के भाई बहिन मिलकर
लाल पीली झंडियाँ बनायें .....
गली की नालियों को
कनातों से ढंक कर महफ़िल बने 
कोई कुर्सी वुरसी न हो
दरी पै बैठ जायें सब
पत्तलों में पंचमेल मिठाई परोसी जाय
सकोरों में साग रायता ......
काशीफल यानी कौले का साग पत्तलों पे हो
कुल्हड़ में पानी
बस हो जाये ज्यौनार चाचियाँ भाभियों के हाथों सजकर बन्नो
जयमाला डाले लजाती हुई
सादा कपडों में व्यस्त से माता पिता
कर दें कन्यादान
या ले आयें बहू विदा कराके ....!
मेकअप की चिन्ता किये बिना
रोये बेटी लिपट लिपट कर माँ से
बिना फ़िल्मी हुए .....
हो जाये ये थीम शादी .....!
काश ! ये कड़की लौटा दे
मेरा सपना .......
ख़ास महानगर कहलाने वाले
इन कंकरीट के जंगलों में ......!

बहुत अच्छी तरह जानता हूँ
कि कोई रस्ता, घर की ओर नहीं जाता !
एक छलावा है फ़क़त...
जो हम ख़ुद से ख़ुद को दिया करते हैं।
जगहें शांत नहीं होतीं
बेचैनियाँ दफ़्न होना चाहती हैं बस !!
हर बेचैनी,
विश्राम करने का बहाना ढूँढती है...
और हम ;
उसे घर का नाम दे दिया करते हैं।
कम्बल ओढ़ कर
अपना चेहरा छिपाता लाचार बाप
एक बेबस से भी ज़्यादा बेबस माँ
और अतीत से अनजान जवान बेटा !
लेकिन घर....
घर कहाँ ?
यक़ीन मानो मेरा
कभी भी
कोई रस्ता ;
घर की ओर नहीं जाता !
 



7 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

Gopesh Mohan Jaswal अपने पागलपन के प्रयोग में उलूक आज उर्दू-दां हो गया है और मयनोशी का फ़लसफ़ा झाड़ रहा है. लेकिन उसे तलाशे-सुकूं के लिए कहीं जाने की ज़रुरत नहीं है, बस, अल्मोड़ा में रहकर ही वह देशभक्तों और विद्यादेवी के क़ातिलों से दूर रहे, उसे सुकूं मिल जाएगा.

प्रयोग करते ही पत्थर पड़े और आप ऐसे प्रयोग को यहाँ ले आयी। आभारी हूँ। सुन्दर बुलेटिन प्रस्तुति ।

sadhana vaid ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचनाओं का चयन ! बहुत ही सुन्दर !

Gopesh Jaswal ने कहा…

उलूक ने हमेशा की तरह अपनी उलटवासियों से हमारे दिलो-दिमाग को झकझोर दिया है.
डॉक्टर राजरानी शर्मा का गंवई सा सपना काश कि सच हो और हम बनावट-दिखावे से दूर होकर बच्चों जैसी सादगी-सच्चाई भरी मौज-मस्ती के आलम में खो जाएं.

Anita Saini ने कहा…

बेहतरीन रचनाओ का चयन.. ..अच्छी प्रस्तुति 👌

yashoda Agrawal ने कहा…

वाह..
बेहतरीन बुलेटिन
सादर

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति

shyam kori 'uday' ने कहा…

शानदार ...

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