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बुधवार, 31 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019(अड़तीसवां दिन)लघुकथा,कविता

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 का अड़तीसवां दिन, समापन दिन है।  यूँ तो यह 24 जुलाई को खत्म होना था, परन्तु, पहली बार को ध्यान में रखते हुए प्रोत्साहन के तौर पर हमने इसे 31 तक कर दिया।

मेरा फोटो

हज़ारों वर्षों की नारकीय यातनाएं भोगने के बाद भीष्म और द्रोणाचार्य को मुक्ति मिली। दोनों कराहते हुए नर्क के दरवाज़े से बाहर आये ही थे कि सामने कृष्ण को खड़ा देख चौंक उठे, भीष्म ने पूछा, "कन्हैया! पुत्र, तुम यहाँ?"

कृष्ण ने मुस्कुरा कर दोनों के पैर छुए और कहा, "पितामह-गुरुवर आप दोनों को लेने आया हूँ, आप दोनों के पाप का दंड पूर्ण हुआ।"

यह सुनकर द्रोणाचार्य ने विचलित स्वर में कहा, "इतने वर्षों से सुनते आ रहे हैं कि पाप किया, लेकिन ऐसा क्या पाप किया कन्हैया, जो इतनी यातनाओं को सहना पड़ा? क्या अपने राजा की रक्षा करना भी..."

"नहीं गुरुवर।" कृष्ण ने बात काटते हुए कहा, "कुछ अन्य पापों के अतिरिक्त आप दोनों ने एक महापाप किया था। जब भरी सभा में द्रोपदी का वस्त्रहरण हो रहा था, तब आप दोनों अग्रज चुप रहे। स्त्री के शील की रक्षा करने के बजाय चुप रह कर इस कृत्य को स्वीकारना ही महापाप हुआ।"

भीष्म ने सहमति में सिर हिला दिया, लेकिन द्रोणाचार्य ने एक प्रश्न और किया, "हमें तो हमारे पाप का दंड मिल गया, लेकिन हम दोनों की हत्या तुमने छल से करवाई और ईश्वर ने तुम्हें कोई दंड नहीं दिया, ऐसा क्यों?"

सुनते ही कृष्ण के चेहरे पर दर्द आ गया और उन्होंने गहरी सांस भरते हुए अपनी आँखें बंद कर उन दोनों की तरफ अपनी पीठ कर ली फिर भर्राये स्वर में कहा, "जो धर्म की हानि आपने की थी, अब वह धरती पर बहुत व्यक्ति कर रहे हैं, लेकिन किसी वस्त्रहीन द्रोपदी को... वस्त्र देने मैं नहीं जा सकता।"

कृष्ण फिर मुड़े और कहा, "गुरुवर-पितामह, क्या यह दंड पर्याप्त नहीं है कि आप दोनों आज भी बहुत सारे व्यक्तियों में जीवित हैं, लेकिन उनमें कृष्ण मर गया..."

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मेरी फ़ोटो


कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे
कहने लगी , कुछ प्रश्नों के मुझको जवाब दे
मैंने कहा माँ तुम तो स्वयं ज्ञान की दाता
कौन सा सवाल , जो तुमको भी न आता ?
मैं अदना सी अनजान सी , कुछ भी तो न जानूं
फिर भी हैं क्या सवाल ? एक बार तो सुनूं

पहला सवाल -फ़ैली क्यों भारत में भुखमरी?
आज़ाद भारत में भी क्यों फ़ैली है बेकारी ?
क्यों सोन चिडिया भूल रही अपने ही रास्ते ?
मर रहा क्यों आदमी पैसे के वास्ते ?
लालच में अंधा हो के क्यों ईमान वार दे ?
कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे |

दूसरा सवाल- ज्ञान खो गया किधर ?
भ्रष्टाचार दीखता क्यों मैं देखती जिधर ?
गलियों में पनपे बाबा , कहते खुद को जग-गुरु
भारत में हो गयी ये कैसी सभ्यता शुरू ?
कहाँ गयी वो माँ जो अच्छे संस्कार दे |
कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे |

तीसरा सवाल- जल रही क्यों बेटियाँ ?
रानी बनाकर राज कर रही क्यों चेटियाँ ?
क्यों माँ लगाती मोल स्व बेटे का इस तरह
व्यापारी बेचता हो कुछ सामान जिस तरह ?
क्यों बेटियों को जन्म से पहले ही मार दे ?
कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे

चौथा सवाल – बोलो ये है जाति-पाति क्या ?खो गयी क्यों आज सारी कोमलता दया ?क्यों धर्म के नाम पर भगवान को बांटा ?मानवता के नाम पर क्यों चुभ रहा काँटा ?शर्मो-हया के गहने नारी क्यों उतार दे ?कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे

पाँचवें सवाल ने मुझको हिला दिया |कहते हुए उसनें तो माँ को भी रुला दिया |कहती समझ न पाई मैं -नेता हैं चीज क्या ?धब्बा राजनीति पे , जिसनें लगा दिया |कहते स्वयं को सेवक . पर कुर्सी के लालचीसाम , दाम,दंड , भेद की न है कमी |कुर्सी बिना न रह सकें , ऐसा भी मोह क्या ?क्यों दीन दुखियों पर इन्हें आती नहीं दया ?इनकी चले तो देश का सर्वस्व वार दें |कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे

सवाल है छटा , है लगता मुझको अटपटा |
खो गयी कहाँ -हरी सावन की थी घटा ?
सुन्दरता भी कुदरत की क्यों नष्ट हो रही ?
साँस लेने को भी वायु शुद्ध न रही |
मानव भू पे गन्दगी को ,क्यों पसार दे ?
कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे

ध्यान से सुनो -ये मेरा प्रश्न सातवाँ |
मैंने कहा कर जोड़ -माँ मुझको करो क्षमा |
अब कहाँ हनुमान औ श्रीराम है बसा ,
इसीलिए सर उठा रही , धरती पे अब सुरसा
दे दो हमें वो शक्ति , जो सब-कुछ संवार दे |
कल रात मेरे पास आ गयी माँ शारदे
कहने लगी , कुछ प्रश्नों के मुझको जवाब दे
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 नूपुर शांडिल्य (मेरी जुस्तजू ही मेरी पहचान है)


नानाजी ने दी थी
नारायण की चवन्नी ।

कहा था,
संभाल कर रखना
इसे कभी मत खोना ।

ये भी कहा था,
जब सब खो जाता है,
तब काम आती है
नारायण की चवन्नी ।

बात सच्ची निकली ।
जब किस्मत खोटी निकली
तब चवन्नी ही काम आई ..
नारायण की चवन्नी ।

क्या नहीं खरीद सकती ?
चांदी-सोने की गिन्नी ?
पर मन का चैन देती
नारायण की चवन्नी ।

इस चवन्नी के बल पर
हम दुनिया से लड़ गए ।
बहुत हारे, पर हारे नहीं ।
हमारी मुट्ठी में जो थी,
नारायण की चवन्नी ।

अमीरी का हमारी
ठिकाना नहीं !
ठाकुरजी के दिए
ठाठ हैं सभी !
प्रारब्ध की कील
गड़ती नहीं ।
विरासत में हमको
सेवा मिली ।

रसास्वादन की
कला दी थी ..
रस में पगी
कथा दी थी ..

नानाजी ने दी थी
नारायण की चवन्नी ।

9 टिप्पणियाँ:

विभा रानी श्रीवास्तव 'दंतमुक्ता' ने कहा…

समापन कहाँ शुरुआत तो अब हुई नए दौर की
एक से बढ़ कर ब्लॉगर रतन से हमारा परिचय हुआ
वाहः भाई ! लघुकथा का सशक्त हस्ताक्षर को सस्नेहाशीष संग हार्दिक बधाई

Anita ने कहा…

दिल को छू लेने वाली लघुकथा..
माँ शारदे ने जो सवाल पूछे उनके जवाब हमें ही ढूँढने होंगे, हर भारतीय को.
नारायण की चवन्नी जिसे मिल जाती है उसकी किस्मत पल में संवर जाती है..
सभी रचनाकारों को बधाई !

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत बढ़िया लघुकथा।

noopuram ने कहा…

प्रोत्साहित करने के लिए हार्दिक आभार अनीता जी ।

noopuram ने कहा…

रश्मिप्रभा जी, इस मंच पर स्थान देने के लिए हृदय तल से आभार । आशा है, कुछ और पाठकों तक बात पहुंचेगी । और आगे बढ़ेगी । नमस्ते ।
सुंदर रचनाओं का जमघट पनघट जैसा तरल है । मनभावन है ।

yashoda Agrawal ने कहा…

व्वाहहहह..
सभी को बधाइयाँ..
सादर नमन..

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सभी को बधाई !

Anuradha chauhan ने कहा…

सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

दोनो कविताएँ प्यारी हैं, लघु कथा का जवाब नहीं 😊

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