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सोमवार, 15 जुलाई 2019

ब्लॉग बुलिटेन-ब्लॉग रत्न सम्मान प्रतियोगिता 2019 (बाईसवां दिन) कविता/कहानी




हाइकु,कविता,कहानी,लघुकथा - हर विधा में ऋता शेखर ने अपनी एक जबरदस्त पहचान बनाई है, मौसम,उत्तरदायित्व,सपने,हकीकत उनकी लेखनी में एक उम्र जीते हैं, हौसला परछाईं बन चलता है।  इस गरिमामई ब्लॉगर से भी आपसब परिचित होंगे ही, आज इस प्रतियोगिता मंच पर वे उपस्थित हैं, पढ़िए उनकी एक कविता और एक कहानी -




वसुधा मिली थी भोर से जब, ओढ़ चुनरी लाल सी।
पनघट चली राधा लजीली,  हंसिनी  की  चाल  सी।।
इत वो ठिठोली कर रही थी,   गोपियों  के साथ में ।
नटखट कन्हैया उत छुपे थे,   कंकड़ी  ले  हाथ  में ।१।


भर नीर मटकी को उठाया, किन्तु भय था साथ में ।
चंचल चपल इत उत  निहारें, हों   न   कान्हा  घात  में।।
ये भी दबी सी लालसा थी, मीत के दर्शन  करूँ।
उनकी मधुर मुस्कान पर निज, प्रीत को अर्पण करूँ।२।


धर धीर, मंथर चाल से वो, मंद मुस्काती चली ।
पर क्या पता था राधिके को, ये न विपदा है टली ।।
तब ही अचानक, गागरी में, झन्न से कँकरी लगी ।
फूटी गगरिया,  नीर फैला, रह  गई  राधा ठगी ।३।


कान्हा नजर के सामने थे, राधिका थी चुप खड़ी।
अपमान से मुख लाल था अरु, आँख धरती पर गड़ी ।।
बोलूँ न कान्हा से कभी मैं, सोच कर के वह अड़ी ।
इस दृश्य को लख कर किसन की, जान साँसत में पड़ी।४।


चितचोर ने झटपट मनाया, अब न छेडूंगा तुझे ।
ओ राधिके, अब मान भी जा, माफ़ भी कर दे मुझे ।।
झट  से  मधुर  मुरली  बजाई,  वो  करिश्मा  हो  गया ।
मनमीत की मनुहार सुनकर,  क्रोध  सारा  खो   गया ।५।


मनुहार सुनकर सांवरे की, राधिका विचलित हुई ।
हँसकर लजाई इस अदा पर, प्रीत  भी बहुलित हुई ।।
ये  प्रेम  की  बातें  मधुरतम,  सिर्फ़  वो ही जानते।
जो प्रेम से बढ़ कर जगत में, और कुछ ना मानते।६।

और ये कहानी,



रात बीतने को आई किन्तु वकील साहब की आँखों में नींद नहीं थी| सारी सात वे अँधेरे में ही कमरे की छत की ओर आँखें गड़ाए ताकते रहे| कभी करवट बदलते, कभी उठकर बैठ जाते| लग रहा था बहुत ही उधेड़बुन में थे| जिन्दगी में अक्सर दोराहों का सामना हो जाता है जिनमें किसी एक रास्ते को चुनना बहुत कठिन लगता है| किन्तु निर्णय तो लेना ही पड़ता है उन्हें, जो सभ्य और संस्कारी होते हैं| जिनमें दूरदर्शिता नहीं होती उनके सामने कभी दोराहे नहीं आते...जीवन जैसे चल रहा है, बस ठीक है|
    वकील साहब का एक सुखी परिवार था| सुंदर पत्नी और शादी के लायक एक बेटा था जिसे वे बहुत प्यार करते थे| गाँव में अपनी खेती-बाड़ी थी, प्रैक्टिस भी खूब चलती थी| धनाढ्‌यों में गिनती होती थी उनकी| महल जैसा घर और घर में नए मॉडल की दो गाड़ियाँ थीं, एक उनके लिए और दूसरी उनके सुपुत्र के लिए| वकील साहब दिन भर किताबों में उलझे रहते| बेटे की देख-रेख का सारा भार उनकी पत्नी पर था| नवाबों की तरह वह पल रहा था| जब भी पैसे की जरूरत होती माँ इन्कार नहीं करती| बेटे से सख्ती नहीं कर पाती थीं| नतीजा यह रहा कि वह बिगड़ैल नवाब के रूप में जाना जाने लगा| किसी तरह से उसने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की थी| आकर्षक डीलडौल, घुँघराले बाल, गोरा चिट्टा था| बचपन से कभी अभाव नहीं जाना था इसलिए पैसे को पानी की तरह बहाता था| गुस्सा तो नाक पर ही रहता| जब वह किसी तरह की कोई नौकरी में नहीं जा सका तो वकील साहब ने बिजनेस में लगा दिया| यहाँ वह सफल हुआ, क्योंकि उस बिजनेस में दबंग की ही जरुरत थी|
   इतने धनी-मानी घर में अपनी बेटी को देने के लिए कई पिता उत्सुक थे| खूब रिश्ते आने लगे| अन्त में हर प्रकार से जिसे योग्य समझा गया वह निहारिका थी| लड़की की सारी खूबियों से सुशोभित...अर्थात लम्बी , गोरी, घर के कामकाज में निपुण, सुशील और आज्ञाकारिणी| सभी खुश थे| वकील साहब की पत्नी बड़े ही शौक से शादी की खरीदारियाँ कर रही थीं| निश्चित समय पर विवाह संपन्न हुआ| घर में खूब रौनक आ गई| इस घर में आकर निहारिका भी अपने भाग्य सराह रही थी|
  सुंदर पत्नी पाकर वकील साहब का बेटा भी प्रसन्न था| हमेशा दोस्तों के साथ घूमने के बजाय घर में ही रहता| किन्तु अपने बेटे के स्वभाव को लेकर वकील साहब सदा सशंकित रहते| बहू की हर जरूरत और सुख सुविधा पर नजर रखते| बहू भी सास-ससुर की सेवा में तल्लीन रहती| समय बीता...वकील साहब और उनकी पत्नी दादा-दादी बने| पोते को गोद में ले फूले न समाते थे| दिन बीतने लगे|
एक दिन वही हुआ जिसका डर था...सभी लोग डायनिंग टेबल पर बैठे खाना खा रहे थे| बेटे ने निहारिका को गरम पराठा लाने को कहा...तभी मुन्ना रोने लगा| निहारिका उसे संभालने चली गई| नवाबज़ादे ने इसे अपनी तौहीन समझा और खाने की प्लेट जमीन में पटक दिया| माता-पिता तो उसके गुस्से से वाकिफ़ थे ही, किन्तु निहारिका के लिए पति का यह रूप नया था| वह सहम गई और रोने लगी| वकील साहब ने भी खतरे की घंटी को समझा| किसी तरह से बहू को समझाया| निहारिका बच्चे के कारण उसपर अधिक ध्यान नहीं दे पाती थी| इस कारण वह रईसजादा अधिकतर समय घर के बाहर बिताने लगा और बुरी  संगति में पड़ने लगा|
  उसके बाद इस तरह की घटनाएँ अक्सर घटने लगीं| मैके के अच्छे संस्कार लेकर आई थी, इसलिए घर को अखाड़ा नहीं बनाना चाहती थी| वह हरसंभव चुप रहने का प्रयास करती| निहारिका की चुप्पी वकील साहब के बेटे की हिम्मत बढ़ाती गई| अब वह कभी- कभी निहारिका पर हाथ भी उठा देता| यह निहारिका को बहुत बुरा लगता फिर भी सास- ससुर का ख्याल करके चुप रह जाती क्योंकि उनसे उसे कोई शिकायत नहीं थी|
  गुस्सैल तो वह था ही, किन्तु हर हमेशे  मार-पीट का माहौल निहारिका को बरदाश्त नहीं होने लगा| अब तो वह किसी किसी रात घर भी नहीं आता था| वकील साहब की चिन्ता बढ़ती जाती थी| बेटे को समझाना चाहा, लेकिन उसका मन तो कहीं और उलझ गया था| वह निहारिका की ओर देखना भी पसन्द नहीं करता था| एक बार निहारिका का मन हुआ कि वह सब कुछ छोड़छाड़ कर वापस मैके चली जाए किन्तु संस्कार यह कदम उठाने की इजाजत नहीं दे रहे थे|
  एक दिन तो हद ही हो गई...वह नशे में धुत लड़खड़ाता हुआ आया और पत्नी को घर से निकल जाने का आदेश दिया| वह सकते में आ गई| उसने ससुर जी की ओर देखा| वकील साहब ने उसे समझाने की कोशिश की किन्तु वह कहाँ समझने वाला था| उसने उनके साथ भी बदतमीजी से बात की| निहारिका कुछ बोलना चाह रही थी तो नवाबज़ादे ने उसे जोर से धक्का मारा| अचानक हुए इस प्रहार को वह झेल नहीं पाई| गोद में मुन्ना भी था| दोनों ही औंधे मुँह गिर पड़े| उसने किसी तरह मुन्ने को तो बचा लिया किन्तु खुद उसका सर जमीन से टकरा गया| सर से खून निकलने लगा| मुन्ना बेतहाशा रोए जा रहा था|  माँ ने कुछ कहना चाहा तो उन्हें भी चुप कर दिया| परिस्थिति बेकाबू हो गई थी| वकील साहब बेटे की इस हरकत से बहू के सामने शर्मिन्दगी महसूस कर रहे थे| समय पर बेटे पर अंकुश न लगाने का परिणाम सामने था| उन्होंने डॉक्टर को बुलाया और बहू की मरहम पट्टी करवाई| डॉक्टर से उन्होंने झूठ बोल दिया कि वह सीढ़ियों से गिर गई है|
  अभी तक निहारिका ने अपने मैके में कुछ नहीं बताया था| किन्तु वह पढ़ी-लिखी लड़की थी| जहाँ तक हो सका उसने सहनशीलता दिखाई...किन्तु कब तक? यह सवाल उसके जेहन में बार-बार उठने लगे| मुन्ने के भविष्य का सवाल भी सामने था|
     उसने घर छोड़ने का फैसला ले लिया| अश्रुपूरित नजरों से उसने सास-ससुर से विदाई ली| वकील साहब के पास कहने के लिए कोई शब्द ही नहीं थे|
   निहारिका पिता के घर के दरवाजे पर खड़ी थी| उसे विश्वास था कि पिता जी उसका साथ देंगे| काँपते हाँथों से उसने कॉलबेल बजाया| दरवाजा पिता ने ही खोला| बेटी के सर पर बँधी पट्टी देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया| अनुभवी आदमी थे, पल भर में ही सारा माजरा समझ गए| बेटी को गले से लगा लिया|पिता का स्नेहिल स्पर्श पाते ही वह फूट पड़ी| उसने रोते-रोते सबकुछ बताया| पिता ने निर्णय सुना दिया कि अब वह उस हैवान के पास वापस नहीं जाएगी|
     इधर सारी दुनिया के लिए लड़ने वाले वकील साहब को अचानक सामने दोराहा नजर आने लगा| एक तरफ बेटा था तथा दूसरी ओर बहू और पोता| इसी उधेड़बुन में उन्हें सारी रात नींद नहीं आई थी| बेटा को घर छोड़ने के लिए कहें , दिल यह मानने को तैयार नहीं था| बहू जिसने कभी शिकायत का मौका नहीं दिया, उसे कैसे बेघर कर दें| उनका दिमाग काम नहीं कर रहा था| बहुत सोच-विचार कर उन्होंने फैसला ले लिया| पत्नी मानने को राजी न थी| उसे भी समझाया|
  वकील साहब बहू के मैके पहुँचे| निहारिका और उसके पिता ने आवभगत में कोई कसर नहीं रखा| वकील साहब ने कहा-“ बहू, घर चलने के लिए तैयार हो जाओ|”
निहारिका ने पिता की ओर देखा|
पिता ने कहा-“ क्षमा कीजिए वकील साहब, मैं आपकी इज्जत करता हूँ किन्तु बेटी को न भेजूँगा| मुझे उसकी जान पर खतरा नजर आ रहा है| शार्ट टेम्पर्ड व्यक्ति कब क्या कर बैठे, इसका कोई ठिकाना नहीं| आप यहाँ आते-जाते रहें, पर निहारिका को न भेजूँगा|”
   “मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, ऐसा कुछ न होगा| मेरा घर बहू और पोते का है, अपने बेटे को मैंने घर से निकाल दिया है| निहारिका सम्मान के साथ वहाँ रहेगी|”
   निहारिका के पिता अवाक् रह गए| ऐसा भी होता है कि बहू के सम्मान के लिए इकलौते बेटे को घर से निकाल दें| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दाँतों तले ऊँगली दबाकर रह ग‌या| वकील साहब बहू और पोते को आदर के साथ घर ले आए| बहू अपने स्वभाव के अनुरूप घर को सँभालती हुई मान मर्यादा से रहने लगी| पोते को उन्होंने बहुत अच्छी शिक्षा दी| अब वह एक ऊँचे पद पर कार्यरत था| एक बार वकील साहब के बेटे ने घर आने की कोशिश की किन्तु पिता से दो टूक जवाब सुनकर वापस लौट गया|
धीरे-धीरे वकील साहब का शरीर वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा था| निहारिका और मुन्ना जी जान से उनकी सेवा करते| कभी किसी भी काम के लिए उन्हें दोबारा नहीं बोलना पड़ता| वकील साहब की पत्नी बेटे के लिए दुखी रहती थी पर बहू और पोते से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी| समय बीता, मौत आनी थी, आई| वकील साहब का निधन हो गया| निहारिका निःशब्द रोए जा रही थी| उसे यही लग रहा था कि यदि उन्होंने सहारा नहीं दिया होता तो पिता के घर में वह जी जाती किन्तु एक बेचारी की तरह जिन्दगी हो जाती| माता-पिता बेटी को घर में रखकर समाज की आलोचना का शिकार बनते सो अलग|
  अब दाह-संस्कार की बारी आई|वकील साहब का बेटा भी पिता के अन्तिम दर्शन के लिए मौजूद था| मुखाग्नि वही देना चाहता था| वकील साहब ने कह रखा था कि मरने के बाद उनकी वसीयत तुरत पढ़ी जाए और उस अनुसार ही काम किया जाए| वसीयत में यह लिखा था कि दाह-संस्कार का काम पोते के हाथो ही संपन्न हो| पत्नी के निधन के उपरांत सारी जायदाद निहारिका के नांम लिखी गई थी| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दंग रह गया| अपने बेटे को छोड़ दूसरे की बेटी को सहारा देकर वकील साहब ने समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था|


29 टिप्पणियाँ:

विभा रानी श्रीवास्तव 'दंतमुक्ता' ने कहा…

हाइगा गुरु को नमन
हर विधा पर सधी लेखनी
उम्दा प्रस्तुतीकरण

vandan gupta ने कहा…

लाजवाब कहानी .........आज समाज को ऐसे ही उदाहरणों की जरूरत है

anshumala ने कहा…

कहानी अच्छी हैं अच्छा उदहारण रखती हैं कि आप गलत सही के समय सही के साथ खड़े रहें ना की अपना पराया देखे | लेकिन एक सवाल हैं क्या वास्तव में ये न्याय है | न्याय तो तब होता जब वकील साहब बेटे से तलाक दिला कर बहु की दूसरी शादी करा देतें | एक स्त्री को जीवनभर अपने जीवनसाथी के अभाव में मात्र एक सेवक की तरह जीवन जीना पड़ा , क्या ये किसी स्त्री के साथ न्याय हैं | वकील साहब का जीवन तो अच्छा गुजर गया लेकिन बहु क्या केवल बच्चे पालने और सास ससुर की सेवा के लिए होती हैं उसका अपना जीवन इच्छाए और जरूरते नहीं होती |

Anita ने कहा…

राधा और कृष्ण की मान-मनुहार से सजा सुंदर गीत..और समाज को दिशा देती हुई भावपूर्ण कहानी..ऋता शेखर जी को बहुत बहुत बधाई...रश्मि प्रभाजी आपकी भूमिका का अंदाज हर बार निराला होता है.

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

दोनों 👌👌

shikha varshney ने कहा…

कविता कमाल की है.

yashoda Agrawal ने कहा…

बेहतरीन निर्णय...
वकील साहब ने कह रखा था कि मरने के बाद उनकी वसीयत तुरत पढ़ी जाए और उस अनुसार ही काम किया जाए| वसीयत में यह लिखा था कि दाह-संस्कार का काम पोते के हाथो ही संपन्न हो| पत्नी के निधन के उपरांत सारी जायदाद निहारिका के नांम लिखी गई थी| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दंग रह गया| अपने बेटे को छोड़ दूसरे की बेटी को सहारा देकर वकील साहब ने समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था|
सादर..

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

सादर आभार विभा जी ������

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

सादर आभार वन्दना जी

Jyoti Dehliwal ने कहा…

कहानी अच्छी हैं लेकिन मैं अंशुमाला जी से सहमत हूं।

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

विस्तृत प्रतिक्रिया हेतु आभार आ अंशु जी।
यहाँ कहानी का उद्देश्य एक ससुर के न्याय को दिखाना है जिसने बहू को घर से बेघर न होने दिया। वह चाहती तो विवाह भी कर सकती थी।
वैसे हर कहानी अपने पीछे कुछ सवाल अवश्य छोड़ जाती है।

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

बहुत आभार दी प्रतियोगिता में स्थान देने के लिए। आपका परिचय देने का अंदाज़ सदा मनमोहक रहता है। आज भी...

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

जाने कितनी बहुएँ बेघर हो जाती हैं और पिता धृतराष्ट्र बने देखते रह जाते हैं। बहू का विवाह एक अलग कहानी होती। एक ससुर का निर्णय कहानी का मूल उद्देश्य है।
प्रतिक्रिया हेतु आभार आ ज्योति जी।

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

यदि सभी पिता नालायक पुत्र से मोहभंग करके बहू को बेघर होने से बच लें तो समाज कितना सुंदर हो जाये न।
कितने पिता इस तरह के मामलों में बहू का साथ दे पाते हैं यह भारतीय परिवेश में सोचने की बात है।
बहू का विवाह एक अलग कहानी होती।
प्रतिक्रिया हेतु सादर धन्यवाद ज्योति जी।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

छंदबद्ध रचना ने मन मोह लिया । कहानी समाज के लिए अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर रही है । ज़रूरी नहीं कि दूसरी शादी के बाद बहु का जीवन सुखी ही रहता । अभी कम से कम श्वसुर ने उसे सम्मानित जीवन दिया है ।

संध्या शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर छंद बद्ध रचना और अच्छी कहानी...शानदार प्रस्तुतिकरण

shobhana ने कहा…

बहुत सुंदर कविता भी और प्रेरक कहानी भी।

वाणी गीत ने कहा…

बहुत साहस चाहिए होता है जब न्याय के दोनों पक्ष अपने हों. प्रेरक कहानी...
गीत भी बहुत बढ़िया...

Sadhana Vaid ने कहा…

राधा कृष्ण की मनमोहक मान मनुहार और छेड़छाड़ से सिक्त रचना बहुत प्रीतिकर है ! कहानी भी हृदयग्राही है ! वकील साहब के कोमल एवं न्यायप्रिय व्यक्तित्व का परिचय मन को कहीं न कहीं आश्वस्त करता है कि स्त्री को ससुराल में संबल के लिए मात्र पति पर ही निर्भर होने की ज़रुरत नहीं है परिवार के अन्य सदस्य भी हितैषी और शुभचिंतक हो सकते हैं ! दोनों ही रचनाएं बहुत सुन्दर !

Meena sharma ने कहा…

कविता बहुत ही मधुर है। कहानी भी बहुत अच्छी। कहानी में बहू को अंत तक दूसरा विवाह करते नहीं दिखाया गया, यह एक पहलू हुआ। यदि वह दूसरा विवाह करना भी चाहती तो हितैषी ससुर मना न करते। समाज को नई राह दिखाती है कहानी।

Satish Saxena ने कहा…

बहुत खूब , ऋता इस सम्मान की हकदार भी हैं , बधाई !

Mukesh Rawat ने कहा…

सुप्रभात
बहुत सुंदर लिंकों का सार्थक संयोजन। रचनाकार को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
कृपया मुझे भी पढ़े व अच्छा लगे तो follow करे मेरा blog है
Gym Status In Hindi and also Gym Status In English

सदा ने कहा…

दोनों ही रचनाएँ बेहद उत्कृष्ट ....बधाई सहित शुभकामनाएं

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुंदर कविता और प्रेरक कहानी

Preeti 'Agyaat' ने कहा…

कितना बढ़िया गीत और समाज को सकारात्मक सन्देश देती कहानी. वाह दी! ख़ूब सारी शुभकामनाएँ

Anita Lalit (अनिता ललित ) ने कहा…

मनमोहक कविता और प्रेरक कहानी के लिए बहुत बधाई ऋता जी!

~सादर
अनिता ललित

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

आजकल जब मुक्त छंद की कविताओं का प्रचलन है और लोग स्वतंत्रता लिए लिख रहे हैं वहाँ ऋता जी की छंदबद्ध कविता पर दिल झूम झूम जाता है। एक शास्त्रीय रचना और सुन्दर व मनमोहक लयात्मक सलिल प्रवाह सा वर्णन... बहुत सुंदर।
कहानी के विषय में कुछ नहीं कहूँगा, क्योंKई यह विषय बड़ा संवेदनशील है और बस महसूस कर सकूँ लेखिका की भावनाओं को तो वही सबसे बड़ी प्रतिक्रिया होगी।

Mukesh ने कहा…

ऋता दी, लाजवाब !! लाजवाब !!!

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