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रविवार, 13 मई 2018

जिसको नहीं देखा हमने कभी - 2050वीं ब्लॉग-बुलेटिन


ऊ एकदम अंधेरा कमरा था. हमको कुछ भी देखाई नहीं देता था. आँख बंद होने के बाद भी हमको समझ में नहीं आता था कि हमको नींद आ रहा है कि हम जगे हुये हैं. कोनो-कोनो समय लगता था कि एही अंधेरा हमरा दुनिया है अऊर इसके आगे कुच्छो नहीं है. ईहो समझ नहीं पाते थे कि ई सजा है कि हिफाजत. दिन भर में जब हमको भूख लगता त एगो नली का मार्फत हमको खाना एकदम टाइम पर मिल जाता था. माने हमको कभी भूख मिटाने के लिये सोचने का जरूरत नहीं हुआ. हमरे सोचने के पहिले ही खाना मिल जाता था.

ऊ काल कोठरी में बंद रहते-रहते हमको ओही हमारा दुनिया मालूम होने लगा था. छोटा सा कोठरी, कहीं से कोई हवा आने का साधन नहीं. मगर साँस लेने में हमको कोनो दिक्कत नहीं महसूस हुआ. का मालूम कोन किसिम का इंतजाम था कि हम कभी दम घुटने जैसा महसूस नहीं किये. बस एगो नली था जिसके मार्फत हमको खाना मिलता था अऊर ओही से हमको बाँध कर रखा गया था. समझे में नहीं आता था कि ऊ बंधन हमको बचाने के लिये था कि बाँध कर रखने के लिये.

जब कभी सन्नाटा होता तो हमको “लब-डब... लब-डब” का आवाज सुनाई देता था. हमरे मन में ऊ संगीत के तरह गूँजता रहता था. कभी लगता था कि संगीत बज रहा है कहीं. हमको भले ऊ संगीत का समझ नहीं था, लेकिन सुनकर बहुत अच्छा लगता था. सच कहें त हमको ऊ काल-कोठरी से प्यार हो गया था. हमको लगता था कि जो हमको कैद करके रखे है, ऊ बास्तव में हमको कैद नहीं किया है, हमको सारा दुनिया से बचाकर, छिपा कर रखा है. नहीं त एतना खयाल कौन रखता है जेतना ऊ हमारा रखता था.

हमको धीरे-धीरे उससे प्यार होने लगा जिसको हम कभी देखे भी नहीं थे. जब उसका कोनो सकल हमको नहीं बुझाया त हम अपने मन से एगो सकल सोच लिये, काहे कि सकल त हमको भी अपना नहीं देखाई देता था. ऊ अनजान पहरेदार हमको जान से प्यारा बुझाने लगा. कभी–कभी हमको लगता कि ऊ बहुत उदास है, त हम उदास हो जाते. कभी-कभी हम उसके खुसी में सामिल होकर कोठरी के दीवाल पर जोर जोर से लात मारने लगते थे, मानो खुसी में नाच रहे हैं. हमरे लात मारने से उसको भी बहुत खुसी होता था, काहे कि हमरे कान में उसके हँसने का आवाज सुनाई देता था. हम भी खुसी में लोट-पोट करने लगते थे अऊर उसके भी खुसी का ठिकाना नहीं रहता था.

एही सब लुका-छिपी में कब महीना दर महीना टाइम बीत गया हमको पता नहीं चला. एक रोज हमको लगा कि हमरा सजा खतम होने वाला है. हमको समझ में नहीं आ रहा था कि हम खुस होएँ कि दुखी होएँ. दुख ई बात का कि ई जगह से प्रेम हो गया था, अऊर खुसी ई बात का कि हमको अपना पहरेदार का सकल देखकर उसको धन्यवाद कहने का मौका मिलेगा.

खैर, जब हम आजाद हुये दुनिया का चकाचौंध देखकर रोलाई छूट गया. हम रो रहे थे अऊर सबलोग हँस रहा था. पहिला बार हम अपना आँख खोलकर देखे अऊर हमको लगा कि दुनिया का सबसे महफूज अऊर सुरच्छित जगह पर हम बैठे हैं. कान में आवाज आया जिसका मतलब हमको उस समय भले नहीं समझ में आया हो, आज समझ में आता है. ऊ आवाज था – अले मेला बाबू, देखो तो माँ के गोद में कैसे सो रहा है!” तब जाकर हमको पता चला कि हमरा पहरेदार का नाम “माँ” है. बस तब्बे से हमरे जिन्नगी का एक्के मंत्र बन गया –

जिसको नहीं देखा हमने कभी, फिर उसकी ज़रूरत क्या होगी
ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग, भगवान की सूरत क्या होगी!

आज मातृ-दिवस पर ब्लॉग बुलेटिन का 2050 वाँ पोस्ट, ब्लॉग जगत के तमाम माँओं को समर्पित!!

                                                                                   - सलिल वर्मा 

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574. प्यारी-प्यारी माँ (माँ पर 10 हाइकु)












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16 टिप्पणियाँ:

Meena Sharma ने कहा…

मातृदिवस पर बुलेटिन की सुंदर प्रस्तुति

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

आ आ ...कैद प्यारी होतती है पर आजादी उससे भी प्यारी . कैदी और पहरेदार एक दूसरे के सामने होते हैं . बहुत प्यारी पोस्ट ।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

मदर्स डे पर बहुत ही खूबसूरत प्रस्तूति। मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Kavita Rawat ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Kavita Rawat ने कहा…

मातृदिवस पर अपने अनूठे मर्मस्पर्शी लेखन के साथ सार्थक सामयिक बुलेटिन प्रस्तुति हेतु आभार!

vibha rani Shrivastava ने कहा…

गज़ब
यूँ तो यहाँ सभी उम्दा संकलन तैयार करते हैं लेकिन आपके पोस्ट की विशेषता कुछ अलग होता है मुझे बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है
सस्नेहाशीष व शुभकामनाओं के संग शुक्रिया

अर्चना तिवारी ने कहा…

काश कि हम ओहीं रहते..पहरे में।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

दो हजार और ऊपर से पचास और ऊपर से सलिल जी की चर्चा यानी सोने पै सुहागा। माँ की याद की यादागार बुलेटिन पेश करने पर बधाई और शुभकामनाएं।

SKT ने कहा…

लेख का अंत तो आपने सुबह ही पढ़वा दिया था, साथ ही उसकी सरल व्याख्या भी! किंतु बाकी का किस्सा 'फ्लैश बैक'के लिए रख छोड़ा था, जो शाम को रिलीज़ किया। यह था किस्सा-ए-जन्म नाल! रहस्यमय ही है कि फिर भी हमारे अंदर अंधेरों का इस कदर खौफ होता है!!

संगीता पुरी ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति ....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अले मेला बाबू, देखो तो माँ के गोद में कैसे सो रहा है!” ... और बाबू, गोद , दोनों निहाल
अब इसे माँ का दिन कहो या बच्चे का, एक ही बात है

Digvijay Agrawal ने कहा…

वाह..
सलिल जी को आभार...
इस बढ़िया बुलेटिन के लिए...
बबुआ सो रहा है...
सादर....

Anita ने कहा…

जिसको नहीं देखा हमने कभी, फिर उसकी ज़रूरत क्या होगी
ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग, भगवान की सूरत क्या होगी!

जितना सुंदर यह गीत है उतना ही सुंदर बुलेटिन की भूमिका में लिखा अद्भुत आलेख है. अन्य सभी रचनाकारों को बधाई, मुझे भी इस बुलेटिन में शामिल करने के लिए आभार !

वाणी गीत ने कहा…

माँ को इस खूबसूरती से किसने याद रखा होगा!विलक्षण दृष्टि है आपकी.
आभार!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सभी सुधिपाठक का नम्र आभार!

Usha Kiran ने कहा…

🙏मॉं को प्रणाम

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