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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग से फेसबुक नागेश्वर पांचाल

मुझे पाना अब आसान नही यारा,
मैं समंदर की आख़िरी बूंद हो गया हूँ ।
- नागेश


मैं सोचने लगी  ... यह आखिरी बूंद है कहाँ ? क्या वह भी खारा होगा ? या उसमें उलझा होगा एक सीप मोती लिए ? क्या समंदर उसके साथ आंखमिचौली खेलते हुए उसे पहली बूंद नहीं बना देगा ?  ... पढ़ते जाओ तो कल्पना में क्या नहीं हो सकता, असंभव संभव - संभव असंभव  .... 
है ना ? 


मेरी ज़िदगी 
______________________________________
केवल कुछ ही तारीख़े फाड़ी मैंने
दीवार पर लटके 
लक्ष्मीजी के पचांग वाले
कैलेंडर से |
दो- तीन केक ही काटे होंगे
खाई जाने कितनी दफ़ा दाल बाटी
एक ही दफ़ा किया प्रेम और
पांच लडकियाँ आई अब तक पसंद |
कहानियां जितनी लिखी, अब स्क्रिप्ट होना चाहती है
कविताये मुझे नहीं, पाठक को चाहने लगती है
कुछ फिल्मे जब बनाई तो अक्ल आई
कैसे कैसे देखता है कैमरा |
शायद ईश्वर भी यूँही देखता होगा
उसके पास भी होगा एक कैमरा |
मैं ईश्वर को दोष नहीं देता अब
जब से देखी रेंडरिंग के बाद अपनी फिल्मे |
सारी डिग्री, अवार्ड्स, उपलब्धिया यारो
कंधो को अब भारी करती रहती है |
माताजी चाहती है बहु, पिता नोकरी
और मैं ढूंढता रहता हूँ अपना किरदार |
मैं भारवहिन होने ही वाला था कि तभी
न्यूटन नवमी की विज्ञान से बाहर आ जाता है |
मैं मुक्त होना चाहता था
लेकिन गीता कहती है आत्मा नश्वर है |
हज़ार गलतियां की, खाये कई धोखे
घुठने छीले, आँखे नम हुई |
किताबो और फिल्मों ने दिया सहारा
हो गया आवारा एक प्याली चाय की खोज में
तब जाकर, यूँ ही नहीं
यूँ ही नहीं मैं छब्बीस का हो गया हूँ | 


हज़ार राहे मुड़ कर देखी, कही से कोई सदा ना आई 
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एक बेबुनियाद शक की जद में आकर शबाना, काका को छोड़ मायके जा बसती है । राहे बदलने से मंजिल क्या अपना स्थान बदल लेती है ? मंजिल और राहों का राब्ता किसी समीकरण में बैठाने से नही बैठता । ना गणित का कोई सिद्धान्त ना न्यूटन का कोई नियम, नीत्शे का दर्शन भी नही और गीता का सार भी नही ।
दूरियों को नापने का कोई पैमाना सटीक तो नही होता लेकिन संभवतः खत्म करने की कोशिशें जरूर है , अलग अलग तरीके है । दूरियां केवल आंखों की होती है । शबाना जैसे काका को देखती है, यहाँ आप केवल आप नही होते । जब कोई आपको देख रहा होता है तो ये वो उस दृश्य की बात करता है जिसमे आप आते हो । फिल्मे जैसे फ्रेम की बात करती है, कहानियाँ जैसे भूमिका की, मैं चाय की और वो पहाड़ों की ।
अलबत्ता काका एक किरदार को अपने हाथों से लड्डू ख़िलाते है और शबाना की आंखे उसे सौतन देखती है । जिसे आप माँ कहते है वो सास कहती है , जिसे एक वर्ग अहिंसा का देवता मानता है एक दूसरा वर्ग उसे बरदाश्त नही कर सकता ।
"बड़ी वफ़ा से निभाई तूने हमारी थोड़ी सी बेवफाई"
नाराजगी खत्म होने पर अहसास जिरह करने लगता है कि कैसे नादानी और छोटी छोटी गलतियां बेवजह ही दूरी की वजह बनी हुई है। लेकिन तब तक दोस्त इनर्सिया आपको जकड़ लेता है । एक लंबी खामोशी, चुप्पी तोड़ना तो चाहती है लेकिन कैसे । ये जो नयूटन का पहला सिद्धान्त है कि जो जैसी स्थिति में है वैसे ही रहेगा जब तक बाहरी बल, लेकिन कम्बख्त तेरे मेरे बीच ये बल तो भोराया हुआ है ।
शबाना आज भी वही चश्मा लगाती है जो काका ने भेजा था अपनी पसंद का । वो चश्मा पहने आईने के सामने तन्हा बैठी रहती है । एक निर्मोही पति उसी मौड़ पर इंतज़ार करता है जहाँ से उनके रास्ते बदल गए थे । मुझे याद आता है कि वो अक्सर मुझसे कहती है कि मूव आंन कर जाओ ।
" जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गये थे, वो मोड़ अब भी वही खड़े हैं "
जब रिश्ते गहरे होते है तब हम कितनी शिद्दत से एक दूसरे हो विचारों के विरोधाभास के बाद भी स्वीकार कर पाते है । गर ऐसा संभव नही है तब एक कदम भी भँवर बन जाता है और खिलाफ उठाया गया वो कदम वामन की तरह जिंदगी नाप लेता है ।
"हम अपने पैरों में जाने कितने, भंवर लपेटे हुए खड़े हैं"
दूरियों में एक पड़ाव ये भी आता है जब हम हमारी स्थिति को उससे रूबरू करना चाहते है । ये वो वक़्त होता है जब दोनों तन्हा है, दोनों के हालात नाकाबिले बर्दास्त है,दोनों की करवट खाली है, दोनों के दर्द का आलम चरम पर है । ये जो आग लगी है लगता है कि मेरा घर ज्यादा जला है और तभी एक अनभिज्ञ बात उतरती है कि
"कहीं किसी रोज़ यूं भी होता हमारी हालत तुम्हारी होती जो रातें हमने गुज़ारी मरके वो रात तुमने गुज़ारी होतीं "
विसाले यार अलसाई सी आंखों से देख रहा है वहीं हिज्र है कि अब भी ईगो की शिकार बनी है । आख़िर कब तक जब शबाना का बेटा भी उसी की तरह लस्सी पीने लगा है और वो अब भी उसी चाय की चुस्कियां ले रहा है । ये कौनसा किवाड़ है जो केवल एक धक्के का मुंतज़िर है जिसकी कुंडी तो खुल चुकी है । जिद की जद में इश्क़ सिसकियां लेता है । मिलन का तानपूरा बजने को आतुर है लेकिन उंगलियां है कि अब भी मुठ्ठी में कैद है । बानगी देखिए
"उन्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते हमें ये उम्मीद वो पुकारें
है नाम होंठों में अब भी लेकिन आवाज़ में पड़ गई दरारें"
और अंत मे मेरी उम्मीद, मेरे बिस्तर के तकिये में दबी आवाज़

"हज़ार राहें, मुड़ के देखीं कहीं से कोई सदा ना आई
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई"

5 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर।

Dhruv Singh ने कहा…

बहुत ही उम्दा ! लेखन ,सधी रोचक भाव आदरणीय आभार "एकलव्य"

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

भई वाह !!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही शानदार और रोचक.
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

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