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सोमवार, 31 जुलाई 2017

होरी को हीरो बनाने वाले रचनाकार मुंशी प्रेमचंद

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

वाराणसी शहर से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर लमही गांव में अंग्रेजों के राज में 31 जुलाई 1880 में पैदा हुए मुंशी प्रेमचंद न सिर्फ हिंदी साहित्य के सबसे महान कहानीकार माने जाते हैं, बल्कि देश की आजादी की लड़ाई में भी उन्होंने अपने लेखन से नई जान फूंक दी थी। प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय था।
 
वाराणसी शहर से दूर १३६ वर्ष पहले कायस्थ, दलित, मुस्लिम और ब्राह्माणों की मिली जुली आबादी वाले इस गांव में पैदा हुए मुंशी प्रेमचंद ने सबसे पहले जब अपने ही एक बुजुर्ग रिश्तेदार के बारे में कुछ लिखा और उस लेखन का उन्होंने गहरा प्रभाव देखा तो तभी उन्होंने निश्चय कर लिया कि वह लेखक बनेंगे। 
 
मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य को निश्चय ही एक नया मोड़ दिया और हिंदी में कथा साहित्य को उत्कर्ष पर पहुंचा दिया। प्रेमचंद ने यह सिद्ध कर दिया कि वर्तमान युग में कथा के माध्यम की सबसे अधिक उपयोगिता है। उन्होंने हिंदी की ओजस्विनी वाणी को आगे बढ़ाना अपना प्रथम कर्तव्य समझा, इसलिए उन्होंने नई बौद्धिक जन परंपरा को जन्म दिया।  
 
प्रेमचंद ने जब उर्दू साहित्य छोड़कर हिंदी साहित्य में पदार्पण किया तो उस समय हिंदी भाषा और साहित्य पर बांग्ला साहित्य का प्रभाव छा रहा था। हिंदी को विस्तृत चिंतन भूमि तो मिल गई थी, पर उसका स्वत्व खो रहा था। देश विदेश में उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ रही है तथा आलोचकों के अनुसार उनके साहित्य का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वह अपने साहित्य में ग्रामीण जीवन की तमाम दारुण परिस्थितियों को चित्रित करने के बावजूद मानवीयता की अलख को जगाए रखते हैं। साहित्य समीक्षकों के अनुसार प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों में कृषि प्रधान समाज, जाति प्रथा, महाजनी व्यवस्था, रूढि़वाद की जो गहरी समझ देखने को मिलती है, उसका कारण ऐसी बहुत सी परिस्थितियों से प्रेमचंद का स्वयं गुजरना था।
 
प्रेमचंद के जीवन का एक बड़ा हिस्सा घोर निर्धनता में गुजरा था।  प्रेमचंद की कलम में कितनी ताकत है, इसका पता इसी बात से चलता है कि उन्होंने होरी को हीरो बना दिया। होरी ग्रामीण परिवेश का एक हारा हुआ चरित्र है, लेकिन प्रेमचंद की नजरों ने उसके भीतर विलक्षण मानवीय गुणों को खोज लिया।  प्रेमचंद का मानवीय दृष्टिकोण अद्भुत था। वह समाज से विभिन्न चरित्र उठाते थे। मनुष्य ही नहीं पशु तक उनके पात्र होते थे। उन्होंने हीरा मोती में दो बैलों की जोड़ी, आत्माराम में तोते को पात्र बनाया। गोदान की कथाभूमि में गाय तो है ही।  प्रेमचंद ने अपने साहित्य में खोखले यथार्थवाद को प्रश्रय नहीं दिया। प्रेमचंद के खुद के शब्दों में वह आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद के प्रबल समर्थक हैं। उनके साहित्य में मानवीय समाज की तमाम समस्याएं हैं तो उनके समाधान भी हैं। 
 
प्रेमचंद का लेखन ग्रामीण जीवन के प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में इसलिए सामने आता है क्योंकि इन परिस्थितियों से वह स्वयं गुजरे थे। अन्याय, अत्याचार, दमन, शोषण आदि का प्रबल विरोध करते हुए भी वह समन्वय के पक्षपाती थे।  प्रेमचंद अपने साहित्य में संघर्ष की बजाय विचारों के जरिए परिवर्तन की पैरवी करते हैं। उनके दृष्टिकोण में आदमी को विचारों के जरिए संतुष्ट करके उसका हृदय परिवर्तित किया जा सकता है। इस मामले में वह गांधी दर्शन के ज्यादा करीब दिखाई देते हैं। लेखन के अलावा उन्होंने मर्यादा, माधुरी, जागरण और हंस पत्रिकाओं का संपादन भी किया। 
 
प्रेमचंद के शुरूआती उपन्यासों में रूठी रानी, कृष्णा, वरदान, प्रतिज्ञा और सेवासदन शामिल है। कहा जाता है कि सरस्वती के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी से मिली प्रेरणा के कारण उन्होने हिन्दी उपन्यास सेवासदन लिखा था। बाद में उनके उपन्यास प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि और गोदान छपा। गोदान प्रेमचंद का सबसे परिपक्व उपन्यास माना जाता है। उनका अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र अपूर्ण रहा। समीक्षकों के अनुसार प्रेमचंद की सर्जनात्मक प्रतिभा उनकी कहानियों में कहीं बेहतर ढंग से उभरकर सामने आई है।
 
उन्होंने 300 से अधिक कहानियां लिखी। प्रेमचंद की नमक का दरोगा, ईदगाह, पंच परमेश्वर, बड़े भाई साहब, पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी और कफन जैसी कहानियां आज विश्व साहित्य का हिस्सा बन चुकी हैं। प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य में आते ही हिंदी की सहज गंभीरता और विशालता को भाव-बाहुल्य और व्यक्ति विलक्षणता से उबारने का दृढ़ संकल्प लिया। जहां तक रीति-काल की मांसल श्रृंगारिता के प्रति विद्रोह करने की बात थी प्रेमचंद अपने युग के साथ थे पर इसके साथ ही साहित्य में शिष्ट और ग्राम्य के नाम पर जो नई दीवार बन रही थी, उस दीवार को ढहाने में ही उन्होंने हिंदी का कल्याण समझा। हिंदी भाषा रंगीन होने के साथ-साथ दुरूह, कृत्रिम और पराई होने लगी थी। चिंतन भी कोमल होने के नाम पर जन अकांक्षाओं से विलग हो चुका था। हिंदी वाणी को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने एक नई बौद्धिक जन परम्परा को जन्म दिया। 

प्रेमचंद की कहानियों का वातावरण बुन्देलखंडी वीरतापूर्ण कहानियों तथा ऐतिहासिक कहानियों को छोड़कर वर्तमान देहात और नगर के निम्न मध्यवर्ग का है। उनकी कहानियों में वातावरण का बहुत ही सजीव और यथार्थ अंकन मिलता है। जितना आत्मविभोर होकर प्रेमचंद ने देहात के पा‌र्श्वचित्र लिए हैं उतना शायद ही दूसरा कोई भी कहानीकार ले सका हो। इस चित्रण में उनके गांव लमही और पूर्वाचल की मिट्टी की महक साफ परिलक्षित होती है। तलवार कहते हैं कि प्रेमचंद की कहानियां सद्गति, दूध का दाम, ठाकुर का कुआं, पूस की रात, गुल्ली डंडा, बड़े भाई साहब आदि सहज ही लोगों के मन मस्तिष्क पर छा जाती हैं और इनका हिंदी साहित्य में जोड़ नहीं है।
ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से होरी को हीरो बनाने वाले रचनाकार मुंशी प्रेमचंद जी को उनकी १३७ वीं जयंती पर शत शत नमन |
 
सादर आपका
 
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कलम का सिपाही

कलयुग की भग्वद गीता ( व्हाट्सऐप से प्राप्त ज्ञान )

जो भी होगा अच्छा होगा

वेरा पावलोवा की दो कविताएँ

स्मरणीय प्रसंग

"महामृत्युंजय मंत्र"

राजनीति का शिकार हुए शिक्षामित्र

अमर शहीद ऊधम सिंह जी की ७७ वीं पुण्यतिथि

किताबों की दुनिया - 136

नये सिरे से ब्लॉग-यात्रा का प्रारम्भ

दिल्ली दरबार

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

रविवार, 30 जुलाई 2017

तुलसीदास जयंती और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।।
गोस्वामी तुलसीदास
तुलसीदास जयंती विक्रम संवत् के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है। अधिकतर विद्वान् महाकवि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म इसी दिन मानते हैं। सम्पूर्ण भारतवर्ष में महान ग्रंथ रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास के स्मरण में तुलसी जयंती मनाई जाती है। श्रावण मास की अमावस्या के सातवें दिन तुलसीदास की जयंती मनाई जाती है। वर्ष 2017 में यह तिथि 30 जुलाई है। गोस्वामी तुलसीदास ने कुल 12 पुस्तकों की रचना की है, लेकिन सबसे अधिक ख्याति उनके द्वारा रचित रामचरितमानस को मिली। दरअसल, इस महान ग्रंथ की रचना तुलसी ने अवधी भाषा में की है और यह भाषा उत्तर भारत के जन-साधारण की भाषा है। इसीलिए तुलसीदास को जन-जन का कवि माना जाता है।

तुलसीदास जी का जन्म संवत 1589 को उत्तर प्रदेश (वर्तमान बाँदा ज़िला) के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। अपनी पत्नी रत्नावली से अत्याधिक प्रेम के कारण तुलसी को रत्नावली की फटकार "लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ" सुननी पड़ी, जिससे इनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। पत्नी के उपदेश से तुलसी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। इनके गुरु बाबा नरहरिदास थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी।



आज तुलसीदास जयंती पर हम सब तुलसीदास जी के अतुलनीय योगदान को याद करते हुए उन्हें नमन करते है। सादर।।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~  















आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ....अभिनन्दन।। 

शनिवार, 29 जुलाई 2017

राजमाता गायत्री देवी और ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज २९ जुलाई है ... आज ही के दिन सन २००९ में दुनिया की दस सबसे खुबसूरत महिलाओं में एक रही जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी का लंबी बीमारी के बाद ९० वर्ष की आयु में निधन हो गया था|

गायत्री देवी जयपुर की तीसरी महारानी थी और महाराज सवाई मान सिंह [द्वितीय] की पत्नी थीं। गायत्री देवी के पिता कूचबिहार के राजा थे। गायत्री देवी वर्ष 1939 से 1970 के बीच जयपुर की तीसरी महारानी थीं। उनका विवाह महाराज सवाई मान सिंह द्वितीय से हुआ। गायत्री देवी अपने अप्रतिम सौंदर्य के लिए जानी जाती थीं। वह एक सफल राजनीतिज्ञ भी रहीं। यही वजह थी कि वह अपने समय की फैशन आइकन मानी जाती थीं। राजघरानों के भारतीय गणराज्य में विलय के बाद गायत्री देवी राजनीति में आई और जयपुर से वर्ष 1962 में मतों के भारी अंतर से लोकसभा चुनाव जीता।

गायत्री देवी का जन्म 23 मई 1919 को हुआ था। वह अपने जमाने में दुनिया भर में अपनी अद्वितीय सुंदरता के लिए चर्चा में रहीं। यही कारण था कि दुनिया की खूबसूरत दस महिलाओं में गायत्री देवी शामिल थीं। पूर्व महारानी ने सुंदरता की दौड़ में अव्वल रहने के साथ साथ राजनीति क्षेत्र में भी अपना परचम लहराया और वर्ष 1967 और 1971 में भी उन्होंने जयपुर से लोकसभा सीट पर भारी मतों से जीत अर्जित की।

लंदन में जन्मी गायत्री देवी कूच बिहार के महाराज जितेंद्र नारायण की पुत्री थीं। उनकी मां राजकुमारी इन्दिरा राजे बडौदा की राजकुमारी थीं। गायत्री की आरभिंक शिक्षा शांतिनिकेतन में हुई। बाद में उन्होंने स्विटजरलैंड के लाजेन में अध्ययन किया।

उनका राजघराना अन्य राजघरानों से कहीं अधिक समृद्धशाली था। घुड़सवारी की शौकीन रही पूर्व राजमाता का विवाह जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के साथ हुआ। गायत्री ने 15 अक्टूबर 1949 को पुत्र जगत सिंह को जन्म दिया। महारानी गायत्री देवी को बाद में राजमाता की उपाधि दी गई। जगत सिंह का कुछ साल पहले ही निधन हो गया था। जगत सिंह जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह के सौतेले भाई थे।

गायत्री देवी की शुरू से ही लडकियों की शिक्षा को बढावा देने में रूचि रही यही कारण रहा कि गायत्री देवी ने गायत्री देवी र्ल्स पब्लिक स्कूल की शुरुआत की। इस स्कूल की गणना जयपुर के सर्वोत्तम स्कूलों में आज भी है। पूर्व राजमाता ने जयपुर की 'ब्लू पोटरी' कला को भी जमकर बढावा दिया।

गायत्री देवी ने खूबसूरती से दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई ठीक उसी तरह गायत्री देवी ने राजनीति के क्षेत्र में भी वर्ष 1962 में जयपुर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरीं और कुल दो लाख 46 हजार 516 मतों में से एक लाख 92 हजार नौ सौ नौ मत प्राप्त कर एक रिकार्ड कायम किया। इसके बाद उनका नाम गिनिज बुक आफ र्ल्ड रिकार्ड दर्ज किया गया। 

गायत्री देवी ने वर्ष 1967 और 1971 में जयपुर लोकसभा सीट से स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता था। उन्होंने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सी रामगोपालाचार्य को भी पराजित किया था। केंद्र सरकार ने वर्ष 1971 में राजघरानों के सभी अधिकार और उपाधियों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। तत्कालीन केंद्र सरकार के आंख की किरकिरी बन जाने के कारण उन्हें कर चोरी के आरोप में पांच महीने तक दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया। 

तिहाड़ से रिहा होने के कुछ समय बाद उन्होंने राजनीति से सन्यास की घोषणा कर दी और लेखन के क्षेत्र में कदम रखा। गायत्री देवी ने वर्ष 1976 में संत रामा राउ के सहयोग से अपनी आत्मकथा के रूप में 'एक राजकुमारी की याद' पुस्तक का लेखन किया। पूर्व राजमाता ने पुस्तक लेखन के अलावा विदेशी निर्देशक के सहयोग से हिंदू राजकुमारी फिल्म भी बनाई।

अपने स्कूल के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा की राह आसान करने वाली राजमाता गायत्री देवी को ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से शत शत नमन |

सादर आपका 

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♥अश्रु जल...♥

मकई के दानों की इडली

" मै ,तुम और हम ......."

सादा जीवन सुख से जीना

बरखा बहार आयी

प्रतिकार

आज के इंसान की सच्चाई

दर्द एक तिलिस्म है

व्हाट्स-एप ग्रुप-लघुकथा

एक व्यंग्य :---अन्तरात्मा की आवाज़

भारत की २ महान विभूतियों को समर्पित २९ जुलाई

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस, ब्लॉग बुलेटिन
विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस प्रत्येक वर्ष 28 जुलाई को मनाया जाता है। वर्तमान परिपेक्ष्य में कई प्रजाति के जीव जंतु एवं वनस्पति विलुप्त हो रहे हैं। विलुप्त होते जीव जंतु और वनस्पति की रक्षा का विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर संकल्प लेना ही इसका उद्देश्य है।

प्रकृति संरक्षण का समस्त प्राणियों के जीवन तथा इस धरती के समस्त प्राकृतिक परिवेश से घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रदूषण के कारण सारी पृथ्वी दूषित हो रही है और निकट भविष्य में मानव सभ्यता का अंत दिखाई दे रहा है। इस स्थिति को ध्यान में रखकर सन 1992 में ब्राजील में विश्व के 174 देशों का ‘पृथ्वी सम्मेलन’ आयोजित किया गया था। इसके पश्चात सन 2002 में जोहान्सबर्ग में पृथ्वी सम्मेलन आयोजित कर विश्व के सभी देशों को पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देने के लिए अनेक उपाय सुझाए गये। वस्तुतः प्रकृति के संरक्षण से ही धरती पर जीवन का संरक्षण हो सकता है, अन्यथा मंगल ग्रह आदि ग्रहों की तरह धरती का जीवन-चक्र भी एक दिन समाप्त हो जायेगा।






~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 












आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।।

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

न्यू यॉर्कर बिहारी के मन की बात

सनातन धर्म और संस्कृति में सबसे खुशहाल विरासत और इतिहास वाला बिहार देश के सबसे बीमारू राज्यों में से है और इसका जिम्मेदार बिहार और बिहारी खुद है। जब दुनिया आगे बढ़कर जातिवादी चंगुल से निकलकर वैश्विक पटल पर आने की बात कर रही थी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में सोच रही थी, जातिवाद के चंगुल में फंसा बिहार लालू राज आने पर खुशी में लीन था। बिहार ने खुद ही इस अपराधी प्रवत्ति वाली राजनीतिक विचारधारा को वोट देकर इतना बड़ा और विशाल बनाया है कि आज वह सत्ता की गलियों में बैठकर आसानी से सबको ठेंगा दिखाकर अपराध और अपहरण उद्योग को चला सकता है। ऐसा सब एक दिन में नहीं हुआ है.... सत्तर सालों से बिहार ने ही तो यह सब बोया है तो आज इतनी बिलबिलाहट क्यों?

बहरहाल नीतीश कुमार की बात की जाए तो अंतरआत्मा की आवाज पर नीतीश बाबू एनडीए में चले गए हैं और चार साल पहले इसी अंतरात्मा की आवाज पर एनडीए से चले गए थे? इन चार सालों के पहले भी बिहार के अलावा बाकी देश को पता था कि लालू चोर उचक्कों और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों में शीर्ष पर हैं लेकिन तब थाली के बैंगन श्री नीतीश बाबू ने भाजपा छोड़ लालू का दामन थामा। आज फिर से विक्टिम कार्ड खेल कर भ्रष्टाचार की बात करके भाजपा का हाथ पकड़ लिए? इन चार सालों के पहले भी लालू भ्रष्ट थे आज भी हैं तो यह अंतरआत्मा वाला ड्रामा दिखाकर नीतीश कुमार साबित क्या करना चाहते हैं?

बिहार भाजपा का एक नासूर हैं सुशील मोदी, इस आदमी के रहते बिहार में भाजपा अपने बलबूते आ नहीं सकती और हाल फिलहाल में और कोई चेहरा है भी नहीं.... सो लालू + नीतीश के अवसरवादी गठजोड़ से भाजपा + नीतीश के इस अवसरवादी गठजोड़ में एक ही फर्क है और वह है मोदी का बढ़ता हुआ कद। मोदी आज इतने विशाल हो गए हैं कि उनके बराबर का कोई भी नेता और विकल्प है ही नहीं। चार साल पहले नीतीश खुद को मोदी के बराबर मानते थे और चार सालों में उन्हे यह समझ आ गया कि अपने राजनैतिक अस्तित्व को बनाए रखने के लिए मोदी की शरण में जाना ही एकमेव विकल्प है।

और हाँ जो कोई भी नीतीश के इस दांव को भ्रष्टाचार और अंतरआत्मा की आवाज़ से जोड़ रहा है उसे क्लोरमिंट खाकर दिमाग की बत्ती जला लेनी चाहिए क्योंकि राजनीति में अंतरआत्मा जैसा कुछ नहीं होता है यह सब जनता को मूर्ख बनाने के तरीके हैं और कुछ नहीं।

ये तो हुई मुझे जैसे न्यू यॉर्कर बिहारी के मन की बात ... अब चलते है आज की बुलेटिन की ओर ...

बुधवार, 26 जुलाई 2017

18वां कारगिल विजय दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार 

कारगिल विजय दिवस प्रत्येक वर्ष '26 जुलाई' को मनाया जाता है। भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य में आज से 18 वर्ष पहले भारतीय सेना ने 26 जुलाई, 1999 के ही दिन नियंत्रण रेखा से लगी कारगिल की पहाड़ियों पर कब्ज़ा जमाए आतंकियों और उनके वेश में घुस आए पाकिस्तानी सैनिकों को मार भगाया था। पाकिस्तान के ख़िलाफ़ यह पूरा युद्ध ही था, जिसमें पांच सौ से ज़्यादा भारतीय जवान शहीद हुए थे। इन वीर और जाबांज जवानों को पूरा देश '26 जुलाई' के दिन याद करता है और श्रद्धापूर्वक नमन करता है। देश की इस जीत में कारगिल के स्थायी नागरिकों ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी।

कारगिल युद्ध, जो कि 'कारगिल संघर्ष' के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में मई के महीने में कश्मीर के कारगिल ज़िले से प्रारंभ हुआ था। इस युद्ध का महत्त्वपूर्ण कारण था बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों का 'लाइन ऑफ कंट्रोल' यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर घुस आना। इन लोगों का उद्देश्य था कि कई महत्त्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमज़ोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा करना। पूरे दो महीने से भी अधिक समय तक चले इस युद्ध में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने 'लाइन ऑफ कंट्रोल' पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। स्वतंत्रता का अपना ही मूल्य होता है, जो वीरों के रक्त से चुकाया जाता है।

इस युद्ध में भारत के पाँच सौ से भी ज़्यादा वीर योद्धा शहीद हुए और 1300 से ज्यादा घायल हो गए। इनमें से अधिकांश जवान अपने जीवन के 30 वसंत भी नहीं देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर भारतीय सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्र ध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।

पाकिस्तान के विरुद्ध लड़े गए चौथे युद्ध के चिह्न कारगिल में नज़र आ जाते हैं। पाकिस्तानी गोलाबारी से बचने के लिए घरों में बनाए गए बंकर भी मौजूद है। पर्यटन बढ़ने के साथ-साथ अब उन्हें गेस्ट हाउस व होटलों में परिवर्तित किया जा रहा है। कारगिल युद्ध को खत्म हुए 18 साल बीत जाने के बाद भी सेना काफ़ी सतर्क है। 168 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा जो द्रास, कारगिल और बटालिक से गुज़रती है, उस पर नज़र के लिए सेना की संख्या काफ़ी बढ़ा दी गई है। 1999 में यह तादाद जहाँ 4000 हज़ार थी, वो अब 20 हज़ार के क़रीब है। जिस कारगिल को पाने के लिए सैकडों जवानों को शहीद होना पड़ा, उसकी जीत के इतने साल पूरे होने पर सेना एक बार फिर उन्हें श्रद्धांजलि देकर ये दिखाना चाहती है कि आज भी उनकी यादें यहाँ की फिजाओं में ज़िंदा है।



कारगिल युद्ध के अमर शहीदों को समस्त हिन्दी ब्लॉग जगत शत शत नमन करता है। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~ 













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  .... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

भारत के 14वें राष्ट्रपति बने रामनाथ कोविन्द

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

रामनाथ कोविन्द ने आज भारत के 14वें राष्ट्रपति के रुप में शपथ ली, इस दौरान संसद भवन के सेंट्रल हॉल  में आयोजित इस शपथ ग्रहण समारोह में कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। चीफ जस्टिस ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई। इससे पहले आज शपथ ग्रहण से पहले कोविंद ने राजघाट जाकर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी इस दौरान उनकी पत्नी भी मौजूद थीं। नव-निर्वाचित राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश के सामने शपथ लेने के बाद उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई। इसके बाद राष्ट्रपति ने अपना भाषण दिया। 

इस समारोह में राज्य सभा के सभापति, प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोक सभा अध्यक्ष, मंत्री परिषद के सदस्य, राज्यपालगण, मुख्यमंत्रीगण, राजनयिक मिशनों के प्रमुख, संसद सदस्यगण और भारत सरकार के प्रमुख असैनिक और सैनिक अधिकारी सेंट्रल हॉल में शामिल रहे। 

राष्ट्रपति सेंट्रल हॉल में समारोह सम्पन्न होने पर राष्ट्रपति भवन के लिए प्रस्थान किया , जहां प्रांगण में सेना के तीनों अंगों द्वारा उन्हें गार्ड आफ आनर दिया और सेवा-निवृत हो रहे राष्ट्रपति को भी सौहार्दपूर्ण शिष्टाचार प्रदान किया गया|

रामनाथ कोविंद ने भारत के 14वें राष्‍ट्रपति के रूप में पहला भाषण देते हुए कहा कि सरकार अकेले ही विकास नहीं कर सकती है, इसके लिए सभी को साथ आना होगा। आइए आपको बताते हैं राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद के भाषण की 14 खास बातें।

1. मैं छोटे से गांव से आया हूं। मैं मिट्टी के घर में पला-बढ़ा हूं। मुझे राष्ट्रपति का पद सौंपने के लिए धन्यवाद। मैं पूरी विनम्रता के साथ इस पद को ग्रहण करता हूं। मैं अब राजेंद्र प्रसाद, राधाकृष्णन, एपीजे अब्दुल कलाम और प्रणब दा की विरासत को आगे बढ़ा रहा हूं।

2. सेंट्रल हॉल में आकर पुरानी यादें ताजा हुईं, सांसद के तौर पर यहां पर कई मुद्दों पर चर्चा की है। कुछ पर सहमति बनी, तो कुछ पर नहीं बनी। लेकिन इस दौरान सार्थक चर्चा हुई।

3. हमें सभी समस्या का हल बातचीत से करना होगा, डिजिटल राष्ट्र हमें आगे बढ़ाएगा। सरकार अकेले ही विकास नहीं कर सकती है, इसके लिए सभी को साथ आना होगा।

4. देश के नागरिक ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। हमें उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना है।

5. पूरा विश्व भारत की ओर आकर्षित है, अब हमारे देश की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं।

6. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरे देशों की मदद करना भी हमारा दायित्व है। यह काम हम बखूबी निभा भी रहे हैं।

7. साल 2022 में देश अपनी आजादी के 75 साल पूरा कर रहा है, हमें इसकी तैयारी करनी चाहिए।

8. हमें तेजी से विकसित होने वाली मजबूत अर्थव्यवस्था, शिक्षित समाज का निर्माण करना होगा। इसकी कल्पना महात्मा गांधी और दीनदयाल उपाध्याय ने की थी।

9. देश संस्कृति, परम्परा और अध्यात्म पर गर्व है। हमें भारत की विविधता पर गर्व है, हमें देश के कर्तव्यों पर गर्व है, हमें देश के नागरिक पर गर्व है।

10. देश का हर नागरिक राष्ट्रनिर्माता है। सैनिक, किसान, वैज्ञानिक, डॉक्‍टर, नर्स, छात्र राष्‍ट्र निर्माता हैं। घर और बाहर की देखभाल करने वाली महिलाएं राष्‍ट्र निर्माता हैं।

12. बाबा साहेब अंबेडकर को याद करते हुए कहा कि डॉ अंबेडकर ने कहा था कि केवल स्‍वतंत्रता ही काफी नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक स्‍वतंत्रता भी जरूरी है।

13. विविधिता ही देश की सफलता का मंत्र है. देश की सफलता का मंत्र उसकी विविधता है, हमें पंथो, राज्यों, क्षेत्रों का मिश्रण देखने को मिलता हैं हम कई रूपों में अलग हैं लेकिन एक हैं। 21 सदी भारत की सदी होगी।

14. हमें प्राचीन ज्ञान और समकालीन विज्ञान को एक साथ लेकर चलना है। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जिसकी कल्‍पना महात्‍मा गांधी ने की थी। पूरी दुनिया भारत की परंपरा और आधुनिकता के प्रति आकर्षित है।

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम महामहिम राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद जी को हार्दिक शुभकामनाएं देते हैं |

सादर आपका

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तरसता मन ....।।

बारिश की बूंदें और स्मृतियाँ

कश्मीर में शान्ति बहाली ही शहीदों को सच्ची श्रधांजलि होगी

जिंदगी की दौड़ एक मृगमरीचिका है ---

आ बैठ मेरे कोल

वक़्त ज़िंदगी और नैतिकता ...

कित गए बदरा पानी वारे ?

ब्लॉग कमेंट करने की ज़रूरत क्यों है – 2017

ब्लॉगिंग : कुछ जरुरी बातें...3

उत्तर : लघुकथा

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 2

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

सोमवार, 24 जुलाई 2017

जन्मदिवस : मनोज कुमार और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के अबोटाबाद में हुआ था। उनका असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी है। देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले में बस गया था। मनोज ने अपने करियर में शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम और 'क्रांति' जैसी देशभक्ति पर आधारित अनेक बेजोड़ फ़िल्मों में काम किया। इसी वजह से उन्हें भारत कुमार भी कहा जाता है।




आज भारतीय सिनेमा के मशहूर अभिनेता - निर्देशक मनोज कुमार जी 80 वर्ष के हो गए हैं। आज इस सुअवसर पर समस्त हिन्दी ब्लॉग जगत और हमारी ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देती है। हम सभी की ईश्वर से यही कामना है वे सदैव स्वस्थ रहे और दीर्घायु प्राप्त करें। सादर।। 


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर .... अभिनन्दन।।    

रविवार, 23 जुलाई 2017

स्व॰ कर्नल डा॰ लक्ष्मी सहगल जी की ५ वीं पुण्यतिथि

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |
लक्ष्मी सहगल (जन्म: 24 अक्टूबर, 1914 - निधन : 23 जुलाई , 2012 ) भारत की स्वतंत्रता संग्राम की सेनानी थी। वे आजाद हिन्द फौज की अधिकारी तथा 'आजाद हिन्द सरकार' में महिला मामलों की मंत्री थीं। वे व्यवसाय से डॉक्टर थी जो द्वितीय विश्वयुद्ध के समय प्रकाश में आयीं। वे आजाद हिन्द फौज की 'रानी लक्ष्मी रेजिमेन्ट' की कमाण्डर थीं।

परिचय
डॉक्टर लक्ष्मी सहगल का जन्म 1914 में एक परंपरावादी तमिल परिवार में हुआ और उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से मेडिकल की शिक्षा ली, फिर वे सिंगापुर चली गईं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब जापानी सेना ने सिंगापुर में ब्रिटिश सेना पर हमला किया तो लक्ष्मी सहगल सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गईं थीं।
वे बचपन से ही राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित हो गई थीं और जब महात्मा गाँधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन छेड़ा तो लक्ष्मी सहगल ने उसमे हिस्सा लिया। वे 1943 में अस्थायी आज़ाद हिंद सरकार की कैबिनेट में पहली महिला सदस्य बनीं। एक डॉक्टर की हैसियत से वे सिंगापुर गईं थीं लेकिन 87 वर्ष की उम्र में वे अब भी कानपुर के अपने घर में बीमारों का इलाज करती हैं।
आज़ाद हिंद फ़ौज की रानी झाँसी रेजिमेंट में लक्ष्मी सहगल बहुत सक्रिय रहीं। बाद में उन्हें कर्नल का ओहदा दिया गया लेकिन लोगों ने उन्हें कैप्टन लक्ष्मी के रूप में ही याद रखा। 

संघर्ष
आज़ाद हिंद फ़ौज की हार के बाद ब्रिटिश सेनाओं ने स्वतंत्रता सैनिकों की धरपकड़ की और 4 मार्च 1946 को वे पकड़ी गईं पर बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। लक्ष्मी सहगल ने 1947 में कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह किया और कानपुर आकर बस गईं। लेकिन उनका संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ और वे वंचितों की सेवा में लग गईं। वे भारत विभाजन को कभी स्वीकार नहीं कर पाईं और अमीरों और ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई का हमेशा विरोध करती रही ।

वामपंथी राजनीति
यह एक विडंबना ही है कि जिन वामपंथी पार्टियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान का साथ देने के लिए सुभाष चंद्र बोस की आलोचना की, उन्होंने ही लक्ष्मी सहगल को भारत के राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया। लेकिन वामपंथी राजनीति की ओर लक्ष्मी सहगल का झुकाव 1971 के बाद से बढ़ने लगा था। वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की संस्थापक सदस्यों में से थी । 

सम्मान
भारत सरकार ने उन्हें 1998 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया। डॉक्टर लक्ष्मी सहगल की बेटी सुभाषिनी अली 1989 में कानपुर से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद भी रहीं।

५ वीं बरसी पर स्व॰ कर्नल डा॰ लक्ष्मी सहगल जी को ब्लॉग बुलेटिन टीम और पूरे हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि और शत शत नमन !
 
सादर आपका
 
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शनिवार, 22 जुलाई 2017

यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त को नमन : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार दोस्तो,
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के नायकों में यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का नाम श्रद्धा-आदर से लिया जाता है. उनका जन्म 22 फ़रवरी 1885 को चटगांव, जो अब बांग्लादेश का हिस्सा है, में हुआ था. उनके पिता जात्रमोहन सेनगुप्त बंगाल विधान परिषद के सदस्य थे. बंगाल में शिक्षा पूरी करने के बाद सन 1904 में यतीन्द्र मोहन इंग्लैंड गए. सन 1909 में बैरिस्टर बनकर वापस लौटने पर उन्होंने कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत और रिपन लॉ कॉलेज में अध्यापक के रूप में कार्य करना आरम्भ किया. उन्होंने नेल्ली ग्रे नामक अंग्रेज़ लड़की से विवाह किया जो बाद में स्वाधीनता आन्दोलन में उनके साथ सक्रिय रहीं. वकालत और अध्यापन छोड़कर वे स्वाधीनता आन्दोलन में उतर आये. उन्हें बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया. उन्होंने असहयोग आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. स्वराज पार्टी बनने पर उनो बंगाल विधान परिषद का सदस्य चुना गया. सन 1925 में उन्होंने कोलकाता के मेयर का पद सम्भाला. अपने कार्यों की लोकप्रियता के चलते वे पांच बार कोलकाता के मेयर चुने गए.


स्वाधीनता आन्दोलन में उनकी सक्रियता के चलते अंग्रेजी शासन ने उन्हें अनेक बार जेल भेजा. कई अवसरों पर उनकी पत्नी नेल्ली सेनगुप्त भी जेल गईं. सन 1921 में सिलहट में चाय बाग़ानों के मज़दूरों के शोषण के विरुद्ध हड़ताल करने पर उन्हें जेल भेजा गया. सन 1928 के कोलकाता अधिवेशन में उनको बर्मा को भारत से अलग करने के सरकारी प्रस्ताव के विरोध में भाषण देने पर गिरफ़्तार किया गया. 1930 में कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष चुने जाने पर सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया. उनके साथ उनकी पत्नी नेली सेनगुप्त को भी गिरफ़्तार किया गया. सन 1932 में उनको फिर बन्दी बना लिया गया. सन 1933 में कोलकाता अधिवेशन के समय अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें मार्ग में ही गिरफ़्तार कर कोलकाता जाने से रोक दिया. ऐसी विषम स्थिति में उनकी पत्नी नेल्ली सेनगुप्त ने अधिवेशन की अध्यक्षता की. अभी वे अपने भाषण के कुछ शब्द ही बोल पाई थीं कि उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया.

अस्वस्थ अवस्था में ही जेल में बन्द रहने के कारण 48 वर्ष की अल्पायु में 22 जुलाई 1933 को रांची में यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का निधन जेल में ही हो गया. वे जीवनभर राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए संघर्ष करते रहने के कारण वे आज भी सबके मन-मष्तिष्क में देशप्रिय उपनाम से बसे हुए. भारत सरकार द्वारा सन 1985 में यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त और उनकी पत्नी नेल्ली सेनगुप्त के सम्मान में संयुक्त रूप से एक डाक टिकट जारी किया.


ब्लॉग बुलेटिन परिवार की तरफ से यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त को विनम्र श्रद्धांजलि सहित आज की बुलेटिन प्रस्तुत है.

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शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

"कौन सी बिरयानी !!??" - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

चित्र गूगल से साभार
एक बार एक आदमी समुद्र में नहाते हुए डूबने लगता तो वह भगवान् से प्रार्थना करते हुए कहता है,

"हे भगवान्! मैं बच गया तो 100 गरीबों को बिरयानी खिलाऊंगा"।

अभी उसकी बात ख़त्म ही हुई होती है की एक तेज़ लहर उसे किनारे पर फेंक देती है।

जैसे ही वह आदमी किनारे पर पहुंचा, उसने ऊपर देखा और कहा,

"कौन सी बिरयानी !!??"

तभी अचानक एक और लहर आयी और उसे वापस समुद्र में ले गयी।

आदमी: "मेरा मतलब था चिकन या मटन??"

सादर आपका
शिवम् मिश्रा 

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गर्मी बहुत है

यदि खुद 'खुश' रहना चाहते हैं...तो दूसरों को ‘क्षमा’ करें!

संघर्ष :: कुछ भाव दशाएं / डॉ. सत्य नारायण पाण्डेय

प्रासंगिकता ......

ताटंक छंद

बिना मेकअप की सेल्फियाँ

मोह से निर्मोह की ओर

गणपति बप्पा मोरया

याद तुम्हारी

वक्त.....वक्त की बात है!!!

अमावस की रात .......

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

देश के प्रथम नागरिक संग ब्लॉग बुलेटिन

आज, 20 जुलाई 2017 को देश के चौदहवें राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविन्द निर्वाचित हुए हैं. राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार और नवनिर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान कानपुर देहात के एक छोटे से गाँव परौंख में 01 अक्टूबर 1945 को हुआ था. स्‍नातक डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने का मन बनाया. पहले और दूसरे प्रयास में नाकाम होने के बाद तीसरे प्रयास में उनको कामयाबी मिली किन्तु उन्होंने IAS की नौकरी को ठुकरा दिया. इसका कारण उनका मुख्‍य सेवा के बजाय एलाइड सेवा में चयन होना था. इसके पश्चात् उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत प्रारम्भ की. वे 1977 से 1979 तक दिल्ली उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के वकील भी रहे. उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में 16 साल वकालत करने के बाद उन्होंने राजनीति में पदार्पण किया.


वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई के निजी सचिव रहे. बाद में सन 1991 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया. वे वर्ष 1994 और सन 2000 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. वह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी रहे. पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा और ईमानदारी को देखते हुए सन 2015 में उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया. अपनी निर्विवाद और स्वस्थ कार्यशैली के चलते वे विरोधियों में भी लोकप्रिय हैं. यही कारण है कि जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एनडीए के सर्वसम्मत राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में उनका नाम घोषित किया तो सबसे पहले बधाई देने वालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे.

आज 20 जुलाई 2017 को हुई मतगणना के आधार पर एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को 66 प्रतिशत मत (702044 वोट वैल्यू) प्राप्त हुए. वहीं विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को 34 प्रतिशत मत (367314 वोट वैल्यू) प्राप्त हुए. 14वें राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद 25 जुलाई 2017 को शपथ ग्रहण करेंगे.

ब्लॉग बुलेटिन परिवार की तरफ से उनको हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई.

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बुधवार, 19 जुलाई 2017

"मैं शिव हूँ ..." - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

चित्र गूगल से साभार
एक गाँव के बाहर बने शिवमंदिर मे चार-पाँच गंजेडी रोज गाँजा पीते थे, पिछले कई साल से जब भी वो गाँजा पीते थे तब "बम भोले" का जयकारा करते थे चिल्लम की हर फुँक के साथ,
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एक दिन खुद शिव जी उनके इस भक्ति माध्यम से प्रसन्न हो गये,
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वो एक साधारण मनुष्य के रूप मे उन गंजेडीयो के पास आ कर बैठ गये,
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गंजेडीयो ने चिल्लम बनाना शुरू किया तो एक गंजेडी ने शिव जी को गाँजा आफर किया,
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प्रायः गंजेडीयो मे मेहमानवाजी बडे उच्च स्तर की होती है, इसलिए गंजेडीयो ने पहला चिल्लम भोलेनाथ को ही दिया,
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एक फुँक मे ही शिव जी ने पुरा चिल्लम खाली कर दिया , गंजेडीयो को लग गया कि ये कोई उच्च कोटी का पीने वाला है, फिर उन्होने दुसरा चिल्लम बनाया और फिर पहला मौका भोलेनाथ को दिया...
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शिव जी ने फिर एक फुँक मे ही पुरा चिल्लम खाली कर दिया,
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हर फुँक के बाद एक गंजेडी, भोलेनाथ से पुछता रहा :
 
"नशा आया" ?
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जवाब मे शिव जी केवल मुस्कुरा के 'ना' मे सर हिला देते,
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ऐसे कर के जब पाँच चिल्लम खाली हो गये तो गंजेडी आखिरी चिल्लम भरने लगे तभी उनमे से एक गंजेडी ने पुछा : " क्यों अभी भी नशा नही हुआ ? "
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तब शिव जी ने कहा : "जानते हो मै कौन हुँ ?"
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गंजेडी : "कौन हो भाऊ ? "
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शिव जी : " मै इस ससांर का सहाँरक, सभी भुत, प्रेत, यक्ष, असुर, गंधर्व का स्वामी, ब्रम्हाड का आदिवासी, हिमालय का निवासी हुँ, आदि अंत - प्रारंभ, नाश और नशा सब की सीमा मुझसे प्रारंभ होती है और मुझ पर ही खत्म, शकंर नाम है मेरा, जिसको तुम लोग रोज याद करते हो !!"
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गंजेडी जोर से चिल्लाया : " अब इसको और चिल्लम मत देना बे , गाँजा चढ गया इसको!!!"

सादर आपका

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अक्टूबर क्रांति की सैद्धांतिकी

हिन्दू-विरोध से हाशिये पर आते राजनैतिक दल-व्यक्ति

चीनी सामान का बहिष्कार

हिम्मत और जिंदगी

सेफू! तू भी अपनी माँ की बदौलत है

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मैं साकी भी मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

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इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा...

प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पाण्डेय की १९० वीं जयंती

नूरपुर की रानी

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