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गुरुवार, 20 जुलाई 2017

देश के प्रथम नागरिक संग ब्लॉग बुलेटिन

आज, 20 जुलाई 2017 को देश के चौदहवें राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविन्द निर्वाचित हुए हैं. राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार और नवनिर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान कानपुर देहात के एक छोटे से गाँव परौंख में 01 अक्टूबर 1945 को हुआ था. स्‍नातक डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने का मन बनाया. पहले और दूसरे प्रयास में नाकाम होने के बाद तीसरे प्रयास में उनको कामयाबी मिली किन्तु उन्होंने IAS की नौकरी को ठुकरा दिया. इसका कारण उनका मुख्‍य सेवा के बजाय एलाइड सेवा में चयन होना था. इसके पश्चात् उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत प्रारम्भ की. वे 1977 से 1979 तक दिल्ली उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के वकील भी रहे. उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में 16 साल वकालत करने के बाद उन्होंने राजनीति में पदार्पण किया.


वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई के निजी सचिव रहे. बाद में सन 1991 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया. वे वर्ष 1994 और सन 2000 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. वह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी रहे. पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा और ईमानदारी को देखते हुए सन 2015 में उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया. अपनी निर्विवाद और स्वस्थ कार्यशैली के चलते वे विरोधियों में भी लोकप्रिय हैं. यही कारण है कि जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एनडीए के सर्वसम्मत राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में उनका नाम घोषित किया तो सबसे पहले बधाई देने वालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे.

आज 20 जुलाई 2017 को हुई मतगणना के आधार पर एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को 66 प्रतिशत मत (702044 वोट वैल्यू) प्राप्त हुए. वहीं विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को 34 प्रतिशत मत (367314 वोट वैल्यू) प्राप्त हुए. 14वें राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद 25 जुलाई 2017 को शपथ ग्रहण करेंगे.

ब्लॉग बुलेटिन परिवार की तरफ से उनको हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई.

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बुधवार, 19 जुलाई 2017

"मैं शिव हूँ ..." - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

चित्र गूगल से साभार
एक गाँव के बाहर बने शिवमंदिर मे चार-पाँच गंजेडी रोज गाँजा पीते थे, पिछले कई साल से जब भी वो गाँजा पीते थे तब "बम भोले" का जयकारा करते थे चिल्लम की हर फुँक के साथ,
.
.
एक दिन खुद शिव जी उनके इस भक्ति माध्यम से प्रसन्न हो गये,
.
वो एक साधारण मनुष्य के रूप मे उन गंजेडीयो के पास आ कर बैठ गये,
.
गंजेडीयो ने चिल्लम बनाना शुरू किया तो एक गंजेडी ने शिव जी को गाँजा आफर किया,
.
प्रायः गंजेडीयो मे मेहमानवाजी बडे उच्च स्तर की होती है, इसलिए गंजेडीयो ने पहला चिल्लम भोलेनाथ को ही दिया,
.
एक फुँक मे ही शिव जी ने पुरा चिल्लम खाली कर दिया , गंजेडीयो को लग गया कि ये कोई उच्च कोटी का पीने वाला है, फिर उन्होने दुसरा चिल्लम बनाया और फिर पहला मौका भोलेनाथ को दिया...
,
शिव जी ने फिर एक फुँक मे ही पुरा चिल्लम खाली कर दिया,
.
हर फुँक के बाद एक गंजेडी, भोलेनाथ से पुछता रहा :
 
"नशा आया" ?
.
जवाब मे शिव जी केवल मुस्कुरा के 'ना' मे सर हिला देते,
.
ऐसे कर के जब पाँच चिल्लम खाली हो गये तो गंजेडी आखिरी चिल्लम भरने लगे तभी उनमे से एक गंजेडी ने पुछा : " क्यों अभी भी नशा नही हुआ ? "
.
तब शिव जी ने कहा : "जानते हो मै कौन हुँ ?"
.
गंजेडी : "कौन हो भाऊ ? "
.
शिव जी : " मै इस ससांर का सहाँरक, सभी भुत, प्रेत, यक्ष, असुर, गंधर्व का स्वामी, ब्रम्हाड का आदिवासी, हिमालय का निवासी हुँ, आदि अंत - प्रारंभ, नाश और नशा सब की सीमा मुझसे प्रारंभ होती है और मुझ पर ही खत्म, शकंर नाम है मेरा, जिसको तुम लोग रोज याद करते हो !!"
.
.
.
.
गंजेडी जोर से चिल्लाया : " अब इसको और चिल्लम मत देना बे , गाँजा चढ गया इसको!!!"

सादर आपका

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अक्टूबर क्रांति की सैद्धांतिकी

हिन्दू-विरोध से हाशिये पर आते राजनैतिक दल-व्यक्ति

चीनी सामान का बहिष्कार

हिम्मत और जिंदगी

सेफू! तू भी अपनी माँ की बदौलत है

मुर्ख राधेश्याम

मैं साकी भी मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सफ़ेद कुरता

इश्क़ उचक कर देख रहा है, हुस्न छुपा है ज़रा-ज़रा...

प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पाण्डेय की १९० वीं जयंती

नूरपुर की रानी

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

काश ! समय रहते तुम मजबूत हो जाओ




कमज़ोरी यदि बीमारी बन जाए 
तो ज़िम्मेदार तुम 
निकलने का रास्ता भी तुम 
.... 
सोचना तुम्हें है 
जो साथ हैं उनको खो देना है 
या खुद खोकर यह साबित करना है 
कि उनका होना कोई मायने नहीं रखता था !

काश ! समय रहते तुम मजबूत हो जाओ 



सोमवार, 17 जुलाई 2017

थोड़ा कहा ... बहुत समझना - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज आप को एक छोटा सा लतीफ़ा सुना रहा हूँ पर दरअसल इस लतीफ़े में एक सबक छिपा है ...

पुलिस: तुम्हें पता कैसे लगा कि इनके घर पर कोई नहीं है?

चोर: फेसबुक पर पूरे परिवार के 15 फोटो डाले थे, लिखा था "मस्ती With Full Family In नैनीताल"
 
कुछ समझे ... !!??
 
सादर आपका

रविवार, 16 जुलाई 2017

१७५० वीं बुलेटिन - मेरी बकबक बेतरतीब: ब्लॉग बुलेटिन

इंसान का दिमाग खाली हो चाहे भरा हुआ, सैतान का घर होब्बे करता है. कुछ न कुछ सैतानी बिचार दिमाग में हमेसा चलते रहता है. एही कारण है कि हर आदमी को रहस्य बहुत पसंद आता है. अब रहस्य चाहे कोनो टाइप का काहे नहीं हो, जैसे ऑफिस में कऊन का कहता है, पड़ोस में का बात चल रहा है, किसका बेटा आजकल कोनो काम नहीं कर रहा है अऊर किसका बेटी आजकल फलाना से बहुत बतियाती है.
सिनेमा का पत्रिका में भी गॉसिप का ओही से बहुत महत्व होता है. फलाने ऐक्टर का आजकल का उसके साथ छुप छुपा कर रोमांस चालू है, उसका ब्रेक अप हो गया है, फलानी गर्भवती है, इहो बात सब गॉसिप कॉलम से पता चलता रहता है अऊर लोग को मजा भी आता है.

एही रहस्य के कारन टीवी का सीरियल एलास्टिक जइसा खींचाता चला जाता है. एगो एपिसोड के बाद लगता है कहानी आगे बढिए नहीं रहा है, लोग गरियाता है अऊर देखने का इंतज़ार भी करता है कि आखिर आगे का हुआ.

पिछला एक महीना से सोनी टीवी पर एगो नया सीरियल का प्रोमो चल रहा है. अब प्रोमो चाहे सिनेमा का हो चाहे सीरियल का एतना बढ़िया तरीका से बनाया जाता है कि देखने वाले का मन में तुरत उत्सुकता पैदा हो जाता है कि ई सिनेमा में चाहे सीरियल में का कहानी होगा. जइसे एगो सीरियल सुरू होने वाला है कल से सोनी टीवी पर – “पहरेदार पिया की”. हम सीरियल देखते नहीं हैं सिवा “क्राइम पैट्रोल” के – इहो सस्पेंस वाला सीरियल हो गया. लेकिन हर बार जब ब्रेक होता है तब एगो प्रोमो देखाता है ई आने वाला सीरियल का. एगो अठारह साल की औरत अऊर उसका पति एगो नौ साल का बच्चा. ऊ करवा चौथ का बरत भी ऊ लड़का का हाथ से पानी पीकर तोडती है, उसका हिफाजत के लिये हैंडबैग में पिस्तौल रखती है, बच्चा उसके माँग में सिन्दूर भरता है अऊर दुनो जोड़ी में फ़ोटो भी खिंचाते हैं.

अब ई प्रोमो देखकर अजीब सा सस्पेंस मन में आ गया. हमरी सिरीमती जी भी केतना बार पूछ चुकी हैं कि ए जी, ई तो गजब का खिस्सा लग रहा है, देखना पडेगा ई सीरियल. बस एही सफलता है चैनल का कि प्रोमो देखने के बाद लोग के मन में देखने का इच्छा पैदा होना. ई सीरियल में एगो डिस्क्लेमर भी देखाया जाता है कि ई सीरियल बाल विवाह को बढ़ावा नहीं देता है.

बाल विवाह का सबसे बड़ा नुकसान इतिहास में औरत लोग को उठाना पडता था. ई सीरियल के उलट छोटा-छोटा उमर में लड़की को बड़ा-बूढ़ा के साथ बियाह दिया जाता था और पति के मरने के बाद बेचारी बाल बिधवा को बहुत कस्ट का जिन्नगी गुजारना पडता था, इहाँ तक कि मरा हुआ पति के साथ सती भी हो जाना पडता था. लेकिन १८२६ में सती प्रथा का समाप्ति राजा राम मोहन राय के प्रयास से हुआ.

सती प्रथा त खतम हो गया, लेकिन बिधवा औरत के जीवन में कोई सुधार नहीं हुआ. तीस साल बाद बिधवा पुनर्विवाह क़ानून बना अऊर एक औरत को एक उपेक्छा का जिन्नगी से मुक्ति मिला. साल था १८५६ अऊर तारीख था १६ जुलाई, यानि आझे का दिन.

अऊर आज का दिन २०१७ में भी ब्लॉग बुलेटिन के लिये एगो महत्वपूर्ण दिन है काहे कि आज हम लिख रहे हैं १७५० वाँ पोस्ट. त मिलकर पूरा टीम को बधाई दीजिए अऊर सब पाठक जन को आभार कहते हुए आनन्द लीजिए सुन्दर-सुन्दर, प्यारा-प्यारा पोस्ट सब का. 

                                                                                                                       सलिल वर्मा 
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जागरूक और विवेकवान बनें बिहारवासी

आज भारत की जमीं पर ऐसा क्यूं आतंक है

जिस देश में इन्सान- गाय, शेर- आलू प्याज खाता है,-’’ऐसा देश है मेंरा’’

एक शाम ब्लॉगिंग के नाम .....

चीन ठहरा पक्का बणियां, ऊ धमकी से आगे कदी नी जायेगो

पुरुष तन के भीतर स्त्री मन ....

ऐडसेंस इनकम ज़्यादा कैसे कर सकते हैं

छिद्दन बाबू कहत रह चिंता में सरकार

महफूज़ के बुलावे पर जुटे ब्लॉगर्स लेकिन मीट नाम से बिदके...खुशदीप

फिल्मकारों को भी लुभाता है बेंगलुरु का कब्बन पार्क 

पवित्र गुफा में बाबा गुप्तेश्वर नाथ के दर्शन के साथ एक अद्भुत रोमांचक यात्रा (अंतिम भाग )

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शनिवार, 15 जुलाई 2017

सात साल पहले भारतीय मुद्रा को मिला था " ₹ "'

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

शायद ही किसी को याद हो ... पर सात साल पहले आज के ही दिन ... अपने रुपये को अपनी पहचान मिली थी ...



दुनिया भर में अब भारतीय मुद्रा की भी अपनी अलग पहचान होगी शायद यही सोच १५ जुलाई २०१० को भारतीय मुद्रा को एक नई पहचान दी गई इस से पहले तक यह सम्मान सिर्फ चार देशों की मुद्राओं को ही प्राप्त था। लेकिन तब की सरकार ने भारतीय रुपये को पहचान देते हुए इसके लिए एक प्रतीक चिन्ह या 'सिंबल' देने का ऐलान किया। अमेरिकी डॉलर, ब्रिटेन के पौंड स्टर्लिग, जापानी येन और यूरोपीय संघ के यूरो के बाद रुपया पांचवी ऐसी मुद्रा बन गया, जिसे उसके सिंबल से पहचाना जाएगा।
 
एक साथ देवनागरी के 'र' और रोमन के अक्षर 'आर' से मिलते जुलते इस प्रतीक चिन्ह [सिंबल] पर १५ जुलाई २०१० को कैबिनेट की मुहर लग गई। तत्कालीन सरकार ने तय किया कि इस पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए एक अभियान शुरू होगा ।

भारतीय रुपये की अलग पहचान बनाने की प्रक्रिया २००८ से चल रही थी। इसका ऐलान तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट भाषण में भी किया था। इसके लिए एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। इसके तहत सरकार को तीन हजार से ज्यादा आवेदन प्राप्त हुए थे। रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर की अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने भारतीय संस्कृति के साथ ही आधुनिक युग के बेहतर सामंजस्य वाले इस प्रतीक को अंतिम तौर पर चयन करने की सिफारिश की थी। यह प्रतीक चिन्ह आईआईटी, गुवाहाटी के प्रोफेसर डी. उदय कुमार ने डिजाइन किया।

कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बताया था कि राष्ट्रीय स्तर पर रुपये के प्रतीक को लागू करने में छह महीने का समय लगेगा जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस काम में 18 से 24 महीने का वक्त लगेगा। इसमें राज्यों का भी सहयोग लिया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लागू करने के लिए आईएसओ, आईईसी 10646 और आईएस 13194 मानक के तहत पंजीयन कराया जाएगा। साथ ही दुनिया भर की लिपियों में शामिल करने के लिए 'यूनिकोड स्टैंडर्ड' में इसे शामिल किया जाएगा।

यूनिकोड स्टैंडर्ड में शामिल होने के बाद दुनिया भर की सॉफ्टवेयर कंपनियों के लिए इसका इस्तेमाल करना आसान हो जाएगा। इससे अभी जिस तरह से डॉलर का प्रतीक चिन्ह हर कंप्यूटर या की बोर्ड में होता है, उसी तरह से रुपये का प्रतीक चिन्ह भी इनका हिस्सा बन जाएगा। आईटी कंपनियों के संगठन नासकॉम से कहा गया था कि वह सॉफ्टवेयर विकसित करने वाली कंपनियों के साथ मिलकर कर इस प्रतीक चिन्ह को लोकप्रिय बनाए। जब तक की-बोर्ड पर इसे चिन्हित नहीं किया जाता है, तब तक कंपनियां अपने सॉफ्टवेयर में यह व्यवस्था करें कि इसे कंप्यूटर पर लिखा जा सके। अभी यूरो के प्रतीक चिन्ह के साथ भी ऐसा ही होता है। पर अफसोस कि सात साल गुज़र जाने के बाद भी ये हर कीबोर्ड पर अपनी जगह नहीं बना पाया है |

प्रतीक चिन्ह का होना ग्लोबल अर्थंव्यवस्था में भारत के बढ़ते महत्व व आत्मविश्वास को बताता है। यह प्रतीक बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल व इंडोनेशिया में प्रचलित मुद्रा रुपये के सापेक्ष भारतीय मुद्रा को एक अलग पहचान देता है|

सादर आपका 

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हिन्दी ब्लॉगिंग : आह और वाह!!!...2

कहो तो ..........

नौशेरा के शेर - ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की १०५ वीं जयंती

एक क़ता----

"सुघड़ गृहणी "

कार्टून :- ... मरा तब मानि‍यो जो तेरहवीं हो जाए

उसकी कहानी (भाग -3 )

शब्द-शब्द हाइकू ...

आयो सखि सावन.....

टॉप टेन बरसात के गाने और सन्दर्भ सहित व्याख्या ---

२६८.ख़तरा

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

प्यार का मोड़ और गूगल मॅप

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |


 बहुत कोशिश की लेकिन Google Map अभी तक नहीं बता पाया कि, प्यार हमें किस मोड़ पर ले आया।

जो मित्र इस लतीफ़े को न समझ पाये हो वो नीचे दिये वीडियो को देख लें ...

 सादर आपका

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पंद्रह लाख वाला भरोसा

जागो ग्राहक जागो

बरसात

जाग जाओ देश मिलकर है बचाना

छ्त्तीसगढ की भैरी भौजी

लेखनी

कि यादों के मौसम रोज़ नहीं आते... !!

नाम शबाना

मदरसों की शिक्षा में परिवर्तन आज की ज़रूरत है

उपकार तुम्हारा

रात सुरमई

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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

संभव हो तो समाज के तीन जहरों से दूर रहें

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक आम आदमी सुबह जागने के बाद सबसे पहले टॉयलेट जाता है,
बाहर आ कर साबुन से हाथ धोता है,

दाँत ब्रश करता है,

नहाता है,

कपड़े पहनकर तैयार होता है, अखबार पढता है,

नाश्ता करता है,

घर से काम के लिए निकल जाता है,

बाहर निकल कर रिक्शा करता है, फिर लोकल बस या ट्रेन में या अपनी सवारी से ऑफिस पहुँचता है,

वहाँ पूरा दिन काम करता है, साथियों के साथ चाय पीता है,
 शाम को वापिस घर के लिए निकलता है,

घर के रास्ते में

बच्चों के लिए टॉफी, बीवी के लिए मिठाई वगैरह लेता है,

मोबाइल में रिचार्ज करवाता है, और अनेक छोटे मोटे काम निपटाते हुए घर पहुँचता है,

अब आप बताइये कि उसे दिन भर में कहीं कोई "हिन्दू" या "मुसलमान" मिला ?

क्या उसने दिन भर में किसी "हिन्दू" या "मुसलमान" पर कोई अत्याचार किया ?

उसको जो दिन भर में मिले वो थे.. अख़बार वाले भैया,

दूध वाले भैया,

रिक्शा वाले भैया,

बस कंडक्टर,

ऑफिस के मित्र,

आंगतुक,

पान वाले भैया,

चाय वाले भैया,

टॉफी की दुकान वाले भैया,

मिठाई की दूकान वाले भैया..

जब ये सब लोग भैया और मित्र हैं तो इनमें "हिन्दू" या "मुसलमान" कहाँ है ?

"क्या दिन भर में उसने किसी से पूछा कि भाई, तू "हिन्दू" है या "मुसलमान" ?

अगर तू "हिन्दू" या "मुसलमान" है तो मैं तेरी बस में सफ़र नहीं करूँगा,

तेरे हाथ की चाय नहीं पियूँगा,

तेरी दुकान से टॉफी नहीं खरीदूंगा,

क्या उसने साबुन, दूध, आटा, नमक, कपड़े, जूते, अखबार, टॉफी, मिठाई खरीदते समय किसी से ये सवाल किया था कि ये सब बनाने और उगाने वाले "हिन्दू" हैं या "मुसलमान" ?

"जब हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मिलने वाले लोग "हिन्दू" या "मुसलमान" नहीं होते तो फिर क्या वजह है कि "चुनाव" आते ही हम "हिन्दू" या "मुसलमान" हो जाते हैं ?

समाज के तीन जहर

टीवी की बेमतलब की बहस

राजनेताओ के जहरीले बोल

और  कुछ कम्बख्त लोगो के सोशल मीडिया के भड़काऊ मैसेज

इनसे दूर रहे तो  शायद बहुत हद तक समस्या तो हल हो ही जायेगी.

किसी पढ़े लिखे बंदे ने मुझे पढ़ा लिखा समझ कर यह व्हाट्सअप पर भेजा है मैंने भी कुछ ऐसा ही सोच कर आप लोगों को पढ़वा दिया | आगे आप की मर्ज़ी |

सादर आपका
शिवम् मिश्रा

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दोहा छन्द

आदिकवि

जब मैं माँ बनूँगी,...!!!

177. इस बार सावन बहका हुआ है...

आंटी की दूकान...

कैकेयी / मँथरा : पारस- स्पर्श : लेख मालिका

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (११)

धर्म की दीमकें

बादल, बारिश एवं सखियों संग भंडारधारा की सैर

गद्दारों सम्भल जाओ ....

मेरी ब्लॉग यात्रा

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

बुधवार, 12 जुलाई 2017

मेरी रूहानी यात्रा ... ब्लॉग से फेसबुक अंजना टंडन




आँसुओं से बचा कर सपनों की आँख रखी है
बारिशों के इंतज़ार में काग़ज़ों की नाव रखी है  -  ये भाव हैं अंजना टंडन के 

फेसबुक हो या ब्लॉग, मेरी कुछ यात्रायें तय होती हैं, जैसे सुबह की आहट होते चिड़िया घोंसले से ज़रूर झांकती है, ठीक उसी तरह आदतन मैं कुछ लोगों को अवश्य पढ़ती हूँ, भले लाइक बटन दबाना भूल जाऊँ या कुछ लिखना  ... जैसे प्रथम रश्मि को रंगिणी के सुगबुगाने का यकीं है, वैसे ही इन्हें भी यकीं होगा कि पंखों को खोलते ही मैं उनतक आई होउंगी :) 


भावों के नीड़ बनाने के लिए मैं अनगिनत भावों को संजोती हूँ, हर पंछी को नीड़ का उपहार देती हूँ 
आज यह उपहार -


अब कोई डूब कर नहीं मरता


सृष्टि के
तमाम वृक्षों की जड़े
 धरा के मनपसंद घाव
झरते सूखे पत्ते
लौटाया गया नमक
नमक
स्त्री देह की लोनाई मात्र नहीं
स्त्रीत्व का लौटाया गया उधार है
तमाम वर्जनाएँ जकड़न नही थी
तमाम पीड़ाएँ
कृतज्ञता के ककहरे सी लौटी
मोल केवल दूध का ही नहीं
ह्रदय के कृत्य सब
अपनी दक्षिणा ले लौटे
जिसके पास जो हैसियत थी
आखिर वो ही तो वो लौटता
किसी नांदा बच्चे की तरह
परमार्थ की किसी आदिम गुफ़ा में
अब भी बचने के
सारे अलोने वास उपवास
जैसे इलाज में प्रगाढ़ विश्वास
नमक के संतुलन का सम्पादन
रसोईघर से अधिक मन में है
छाती के रसघन की रसालता को
इस क्षारता से बचाने का हुनर
प्रत्येक बेटी के नाम माँ की वसीयत
ऋृणी है विज्ञान
दुनिया की हर औरत का
जिससे ज्ञात हुआ कि
जहर को मारने के लिए
नमक का लोहा चाहिए
पुरूषों की रंगशाला का सबसे खूबसूरत
और संतुष्टिप्रदत चित्र
मन की पेशानी पर उभरे स्वेद कणों के साथ दिखती स्त्री
अब बहुत दुर्लभ होता जा रहा
भरते भरते आत्मा
नोनसारी समंदर बन बैठी
खून में मिलते नमक से
ललछौंही से डैड सी में
अब कोई डूब कर नहीं मरता  ... 


मैंने सच में नहीं देखा


जानती हूँ
सप्तपदी पर लिए
सातवें वचन का मान
तुम्हारे बामअंग आने से पूर्व ही
मिली थी नियमावली
जिसमें विकल्प नहीं होते
" पर पुरूष देखना भी पाप था"
बस ध्यान ही तब गया जब
किसी ने काले और सफेद का झूठ ढूँढ निकाला
मालूम नहीं ये दुस्साहस था या परमार्थ
उकेर कर रख दी थी उसने
मुझ जैसी कई दारूण गाथाएँ अदब के पन्नों पर
पर सच मानो
मैंने कभी नहीं देखा
उसका चेहरा मोहरा
सिवाय शाब्दिक झलक के
किसी संवेदनशील समझदार सह्रदय मित्रवत्
और
स्त्री समझ दुख साझा कर लिया
वास्तव में
वो कोई पर पुरूष नहीं
मेरे ही ईश का कोई टुकड़ा निकला....
स्त्रियाँ जानती हैं
वचनों का मान क्या होता है
हाँ....मैंने सच में नहीं देखा


इस सत्य से आप वाकिफ होंगे - 
बड़े से बड़े हादसों को
निर्लिप्तता से देखना
और कुछ ना कहना
अंदर किसी नदी का सूखना है - अंजना टंडन 

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

मेरी रूहानी यात्रा - स्वयंसिद्धा अंजू शर्मा



कहानी नहीं रूकती, कविता भी नहीं रूकती 
न कौमा, न  ... पूर्णविराम लगा भी दो 
क्रमशः की ऊँगली थामे रहता है !
आज यह तो कल वह  ... 
न समय रुकता है न विचार 
लिखी जा रही कहानी हो या कविता 
कितने मोड़ आते हैं - 
|| कविता और कहानी के बीच ||
1.
कोई तो बताये, 
कैसे जानूँ कि ये कहानियाँ किस रेगिस्तान की प्यास हैं,
कभी पूरी क्यों नहीं होतीं?
ये किस ब्रह्मांड का छोर हैं
कि जिसकी यात्रा अनंत, निस्सीम, निरंतर है ....
2.
हर मोड़ पर बाँह पकड़ खींचती है कोई कहानी,
मचलती है, ठुनकती है, थमा देती है शिकायत भरी पर्ची,
"चलो, उठो न, आओ चलें
बढ़ाएं एक और कदम बेहतरी की ओर,
पूर्णता की ओर
आओ कि चलें संतुष्टि की ओर !!" ...
वह बुलाती है हर बार
अंत के बाद,
अक्सर स्वीकृति के बाद
और कभी कभी तो छपने के भी बाद...
3.
फिर हर कहानी के बीच
कहाँ से आ जाती है एक कविता,
जैसे विरही यक्ष पुकारता है
अपनी प्रिया को
कभी कराहती, कभी नृत्यरत तो कभी शाश्वत बेचैनी लिए,
और मैं,
जैसे तीव्र सम्मोहन के असर में,
चल देती हूँ उसके पीछे,
छोड़कर पीछे एक बिसूरती, नाराज़, रूठती कहानी.....
4.
कभी-कभी लगता है ,
मैं बदल गई हूँ एक चौबीस घण्टा पेंडुलम में,
जिसके एक छोर पर है
फुसलाकर बुलाती एक नई कविता
और दूसरे पर कोई उदास अधूरी कहानी....
5.
दोनों के बीच संतुलन साधने से बेजार हो,
मैं कुट्टी कहती हूँ दोनों से,
ओढ़ लेती हूँ झूठी नाराज़गी,
दिखा देती हूँ अंगूठा,
सुनने लगती हूँ कोई निर्गुण,
और जान ही नहीं पाती कब बुनने लगती हूँ
शब्दों की झीनी-झीनी चादर....
6.
जाने क्यों लगता है
कविता और कहानी दोनों में सौतिया डाह है,
दोनों को ही चाहिए कलम का बलम-रंगरसिया
और इनकी कलह मेरी रातों की लोरी है....

सोमवार, 10 जुलाई 2017

जन्म दिवस : सुनील गावस्कर और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार। 
सुनील गावस्कर के लिए चित्र परिणाम
सुनील गावस्कर (अंग्रेज़ी: Sunil Gavaskar) भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान हैं जिन्हें क्रिकेट के महानतम बल्लेबाजों में शुमार किया जाता है। सनी का जन्म 10 जुलाई, 1949 को बंबई (महाराष्ट्र) में हुआ था। उनकी पत्नी का नाम मार्शनील है। इनके पुत्र रोहन गावस्कर भी भारतीय क्रिकेट टीम में खेल चुके हैं।

इन्होंने बल्लेबाज़ी से संबंधित कई कीर्तिमान स्थापित किए। गावस्कर (अपने समय काल में) ने विश्व क्रिकेट में 3 बार, एक वर्ष में एक हज़ार रन, सर्वाधिक शतक (34), सर्वाधिक रन (नौ हज़ार से अधिक), सर्वाधिक शतकीय भागेदारियाँ एवं प्रथम शृंखला में सर्वाधिक रन बनाने वाले एकमात्र बल्लेबाज थे। 'सनी' गावस्कर की हर पारी एवं रन ऐतिहासिक होते हैं। उन्होंने भारतीय टीम का कुशल नेतृत्व किया और कई महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त कीं, जिनमें 'एशिया कप' एवं 'बेसन एंण्ड हेजेस विश्वकप' (BENSON & HAZES WORLD CUP) प्रमुख है।

'क्रिकेट के आभूषण' कहे जाने वाले गावस्कर ने एक दिवसीय मैचों में भी अपनी टीम के लिए ठोस आधार प्रस्तुत किया है। वे 100 कैंचों का कीर्तिमान भी इंग्लैंड में बना चुके हैं। गावस्कर क्रिकेट की एक अद्वितीय पहेली हैं। 1986 में उनके खेल जीवन का उत्तरार्ध होने के बाद भी उनके खेल में और निखार आया। अपने कॉलेज की ओर से क्रिकेट खेलते समय भी वे सबसे सफल बल्लेबाज माने जाते थे। 1971 में उन्हें टैस्ट टीम के वेस्टइंडीज दौरे के लिए चुना गया था। सनी को विश्व का सर्वोपरी खिलाड़ी माना जाता है।

जनवरी 1973 में कानपुर में इंग्लैण्ड के विरुद्ध अपने जीवन का 11वाँ टेस्ट खेलते हुए उन्होंने 1000 रन पूरे किए। अप्रैल 1976 में पोर्ट आफ़ स्पेन में वेस्टइंडीज़ के विरुद्ध अपना 23वाँ टेस्ट खेलते हुए उन्होंने 2000 रन पूरे किए। दिसम्बर 1977 में पर्थ में आस्ट्रेलिया के विरुद्ध अपना 34वाँ टेस्ट खेलते हुए 3000 रन पूरे किए। दिसम्बर 1978 में कलकत्ता में वेस्टइंडीज़ के विरुद्ध अपना 43वाँ टेस्ट खेलते हुए 4000 रन पूरे किए थे, और सितम्बर 1979 में बेंगलोर में 52वाँ टेस्ट खेलते हुए 5000 रन पूरे किए।

लम्बे अर्से से भारतीय क्रिकेट को जिस उदघाटक (ओपनर) बल्लेबाज़ की तलाश थी, उसकी सही खोज 1971 में पूरी हुई। जब सुनील गावस्कर ने वेस्टइंडीज़ के विरुद्ध अद्वितीय प्रदर्शन किया। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उस पहली शृंखला के चार टेस्ट मैचों में गावस्कर ने 774 रन (औसत 184.80) बनाकर एक कीर्तिमान स्थापित किया। पोर्ट आफ़ स्पेन के पाँचवें टेस्ट की पहली पारी में 124 व दूसरी पारी में 220 रन बनाकर वे विश्व विख्यात बल्लेबाज़ वाल्टर्स, जी. एस. चैपल और लारेन्स रौ की श्रेणी में आ खड़े हुए, जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में पहली पारी में शतक व दूसरी पारी में दोहरा शतक बनाने का रिकार्ड क़ायम किया है।

1975-76 में न्यूज़ीलैण्ड के दौरे के समय गावस्कर ने भारतीय टीम को नेतृत्व भी दिया, जिसमें भारत विजयी रहा। 1978-79 में वेस्टइंडीज़ की टीम ने भारत का दौरा किया था। उस समय उन्हें भारतीय टीम का कप्तान नियुक्त किया गया। उसमें सुनील गावस्कर ने एक साथ कई रिकार्ड और कीर्तिमान स्थापित किए। उन्होंने 34 शतक बनाए जो उस समय तक सबसे ज्यादा थे। इस प्रकार शतक बनाने और सबसे अधिक रन बटोरने के मामले में वह सबसे आगे निकल गए थे।

भारत में सुनील गावस्कर को 1975 में 'अर्जुन पुरस्कार' एवं 1980 में 'पद्म भूषण' प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त कई देशों में उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। 1980 में ही वे 'विस्डेन' भी प्राप्त कर चुके हैं।

गावस्कर ने क्रिकेट से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी हैं। जिनमें सनी डेज, आइडल्स, रंस एण्ड रूइंस तथा वन डे वंडर्स काफ़ी लोकप्रिय हुई हैं। आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी सुनील गावस्कर एक फ़िल्म में भी अभिनय कर चुके हैं।



आज भारत के इस महान खिलाड़ी के 68वें जन्मदिवस पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और समस्त हिन्दी ब्लॉग जगत उन्हें ढेर सारी बधाई और शुभकामनायें देते हैं। सादर।। 


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आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ....अभिनन्दन।। 

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