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बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

ब्लॉग बुलेटिन और 'देशद्रोही'

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।

दिल्ली के JNU में एक कार्यक्रम को लेकर तनाव, अफजल गुरु को दिया 'शहीद' का दर्जा

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में मंगलवार को उस वक्त भारी हंगामा हो गया जब वामपंथी छात्रों के समूह ने संसद हमले के दोषी अफजल गुरू और जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के को-फाउंडर मकबूल भट की याद में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस आयोजन के बाद यहां हालात इतने बिगड़ गए कि प्रशासन को पुलिस बुलाने की नौबत आ गई। विवाद की वजह यह रही कि इस कार्यक्रम को अफजल गुरु को शहीद का दर्जा दिया गया जिसका एबीवीपी के छात्रों ने भारी विरोध किया।
बताया जा रहा है कि इस कार्यक्रम को पहले इजाजत को मिल गई थी लेकिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) इसके खिलाफ यूनिवर्सिटी के वीसी एम जगदीश कुमार के पास चली गई। एबीवीपी की शिकायत के बाद जेएनयू प्रशासन ने दी गई इजाजत वापस ले ली। यह कार्यक्रम साबरमती होस्टल के सामने शाम 5 बजे आयोजित होना था। तनाव तब शुरू हुआ जब कार्यक्रम की पहले से दी गई इजाजत को रद्द कर दिया गया लेकिन इसके बावजूद कार्यक्रम हुआ जिसका विरोध एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने किया।
गौर हो कि अफजल गुरू को 9 फरवरी 2013 को फांसी दी गई थी। वहीं मकबूल भट को 11 फरवरी 1984 को फांसी दी गई थी। कार्यक्रम होने से नाराज एबीवीपी ने बुधवार को जेएनयू कैंपस में बंध का आह्वान किया है। वीसी एम जगदीश कुमार ने इस मसले पर कहा है कि यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के होने के नाते, यह मेरी जिम्मेदारी है कि कैंपस में शांति बनी रहे। एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक कि कैंपस में कोई अप्रिय घटना नहीं घटी लेकिन पुलिस ने सावधानी बरतते हुए ऐहतियातन सभी जरूरी कदम उठाए गए।

अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर..........


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आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे। तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  … अभिनन्दन।।

7 टिप्पणियाँ:

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

कौन हैं ये लोग जो खुलेआम आतंकियों का पक्ष लेते हैं फिर भी कोई कुछ कर नहीं पाता । क्या इतना लचीला कानून भी सही है ?
मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार । बाकि रचनाएँ भी बेहतरीन ।

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

कौन हैं ये लोग जो खुलेआम आतंकियों का पक्ष लेते हैं फिर भी कोई कुछ कर नहीं पाता । क्या इतना लचीला कानून भी सही है ?
मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार । बाकि रचनाएँ भी बेहतरीन ।

Anita ने कहा…

लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का हक है पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि देश की राजधानी में इस तरह के कार्यक्रम आयोजित होने दिए जाएँ, आभार !

आधारभूत ब्रह्माण्ड ने कहा…

1942 के दौरान जब अंग्रेजों और स्वतंत्रता सेनानियों के बीच टकराव जोरों पर था। उस समय अंग्रेजी हुकूमत को शक था कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय सरकार विरोधी गतिविधियों को पनाह दे रहा है। इसलिए प्रशासन ने विश्वविद्यालय में पुलिस भेजने का निर्णय लिया। इस निर्णय को लेकर जब तत्कालीन कुलपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को ज्ञापन दिया गया, तो उन्होंने इस निर्णय का कड़े शब्दों में विरोध करते हुए कहा : "मैं सरकार को आश्वासन देता हूँ कि कानून भंग करने वाली कोई भी गतिविधि विश्वविद्यालय में नहीं होगी। लेकिन मैं विश्वविद्यालय में पुलिस भेजने का सख्त विरोध करता हूँ। क्योंकि इस कदम से विश्वविद्यालय की स्वायत्ता को ठेस पहुँचती है। कुलपति के नाते मैं विश्वविद्यालय के प्रांगण में कानून एवं शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी लेता हूँ। लेकिन बाह्य हस्तक्षेप का विरोध करता हूँ।" इस आग्रह के बाद उत्तर प्रदेश के राज्यपाल महोदय जी ने कुलपति महोदय जी का आदर करते हुए अपने निर्णय और पुलिस बल को वापस ले लिया था।

आगे चलकर कुलपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति बने थे। इसे कहते हैं "धर्म" अर्थात आप जो भी (नागरिक, परिवार मुखिया, सदस्य, गृहणी, शिक्षक, कलेक्टर, अभिभावक, सरपंच इत्यादि) हो उस नाते आपके जो कर्तव्य होते हैं। उनका पालन करना ही धर्म है, और लोग जबरन का धर्म को बदनाम करते हैं।

सूची में स्थान देने के लिए धन्यवाद

Kavita Rawat ने कहा…

सार्थक चिंतनशील बुलेटिन प्रस्तुति हेतु आभार!

Jyoti Khare ने कहा…

सार्थक और विचारपूर्ण बुलेटिन के लिए साधुवाद
मुझे सम्मलित करने का आभार
सादर

Jyoti Khare ने कहा…

सार्थक और विचारपूर्ण बुलेटिन के लिए साधुवाद
मुझे सम्मलित करने का आभार
सादर

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