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गुरुवार, 30 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 16




नहीं पढ़ा है बहुत सारे लोगों को
नहीं जानती हूँ हर कविताओं का अर्थ
नहीं कर पाती व्याख्या
लेकिन तितली की तरह 
इधर से उधर उड़ती रहती हूँ
और कुछ पराग ले आती हूँ ... आज लाई हूँ निधि सक्सेना को 


और अंततः वो मर गई | झर रही है चाँदनी - निधि - WordPress.com



​और अंततः वो मर गई!
परलोक के द्वार पर
पाप पुण्य का लिखा जोखा हो रहा है
चित्रगुप्त बही खाता लिए बैठे हैं
वो अचरज से सब देख रही है!!
समय की इकाई तरल है यहाँ
निश्चित नही है वक्त के अंश
शीघ्र और विलंब मन की कल्पनायें भर हैं!
अब उसकी बारी है
चित्रगुप्त उसके बही खाते बांच रहे हैं
बगैर उसकी ओर देखे
एकाग्रता से!!
उसने सहज ही पूछा है
मेरा भी खाता है क्या यहाँ
चित्रगुप्त ने नीचे देखे देखे ही जवाब दिया
हर मनुष्य का खाता है यहाँ
ओह!! उसके दीर्घ निःश्वास छोड़ी
याने आज ये तो सुनिश्चित हो ही गया
की मैं भी मनुष्य हूँ!!
चित्रगुप्त ने इस बार उस पर उड़ती दॄष्टि डाली
थोड़ी शिष्ट थोड़ी तीखी
थोड़ी चकित थोड़ी व्यथित
बड़े बड़े भरे भरे नयन लिए थी वो!!
चित्रगुप्त पुनः गुणा भाग में तल्लीन हो गए
कुछ ही क्षणों में हिसाब हो गया
तुलन पत्र पर कुल पाप अधिक हैं
कि वो लांछित है
अपराधिनी है
धर्म पथ से भटक गई है
झूठी है
विभत्स लालसायें हैं उसकी!
चित्रगुप्त पढ़ते जा रहे हैं दोष
और उसकी आँखों से आगे से गुजर रही है
चलचित्र सी उसकी जिंदगी
वो पुनः महसूस कर रही है
उन लांछनों के पीछे की विपन्नता
उन अभियोगों के पीछे की परिस्थिति
 अधर्म के पीछे की आहुति
 अपराध के पीछे अपमान
 लालसा के पीछे समर्पण!!
चित्रगुप्त ने फ़ैसला सुनाया है
माफी लायक नही है उसका जीवननामा
नर्क जाना होगा!!
अब क्रोध और आँसू तिरोहित हो गए हैं उसके
सर झुकाए बस इतना ही कह पाई
ईश्वर मुझे शायद माफ कर भी दें
परंतु मैं ईश्वर को कभी माफ न करूंगी!!
आहिस्ता आहिस्ता उसने नर्क की ओर उसने कदम बढ़ाये

एक बार फिर!!!


4 टिप्पणियाँ:

कविता रावत ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

चित्रगुप्त का यह कैसा फरमान !!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह।

Sadhana Vaid ने कहा…

वाह ! "और अंतत: वह मर गयी " कमाल की रचना ! अत्यंत सटीक एवं प्रभावशाली ! बहुत सुन्दर ! अवलोकन का यह अंक बहुत भाया रश्मि प्रभा जी ! !

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