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शनिवार, 4 नवंबर 2017

सरकार, कानून, जनता, बवाल और ब्लॉग बुलेटिन

सिंगापुर ने फरवरी 2018 से कारों की सँख्या स्थिर करने का फैसला किया है, इसका अर्थ यह हुआ कि सिंगापुर में अब कार खरीदना और भी कठिन होगा। मित्रों सिंगापुर एक बहुत ही छोटा और शायद दुनिया में कारों के लिए सबसे कठिन बाजार है, बित्ते भर का देश जहाँ सड़कें पूरी तरह से भर चुकी हैं और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की विकास दर 0.25% थी जिसे अब सरकार 0% पर लाना चाहती है। यहाँ पहले ही कारों पर दो सौ प्रतिशत से भी अधिक टैक्स लगता है सो देश की भलाई के लिए लिया गया यह कदम भी ठीक ही लगता है। 

मित्रों मेरा मानना है कि किसी देश की तरक्की का आंकलन वहाँ की कारों से नहीं बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट से लगाया जाना चाहिए और ऐसी स्थिति से जहाँ जनता बिना कार के घर से ऑफिस की यात्रा कर सकता हो। न्यूयॉर्क, लन्दन, पेरिस, सिंगापुर, शंघाई से लेकर ब्राजील के रियो तक हर जगह शहरी ट्रांसपोर्ट गजब का है। बेहद सस्ता, सरल और तेज़ - उदाहरण के लिये मेट्रो ने दिल्ली की कैसे कायापलट की यह हम सभी जानते हैं। मुम्बई की लोकल ट्रेन ही देखिए - उसकी हालत चाहे जैसी भी हो लेकिन शायद एक बार में किसी भी देश की ट्रेन इतने यात्री कोई नहीं ले जाती होगी। 

हमने बात सिंगापुर से शुरू की थी तो वह तो एक बेहद आधुनिक देश है और यहाँ तकनीक और आधारभूत ढांचा विश्व के बड़े देशों के लिए भी एक आदर्श स्थापित करता है। एक ऐसा देश जो आकार में मुम्बई जितना बड़ा लेकिन जीडीपी में मुम्बई से लगभग पचास गुना - मेहनती और दुनिया भर के लोगों ने मिलकर इसे इतना विशेष बनाया है। सिंगापुर का कानून बहुत कठोर है और वहाँ किसी सरकार को वह तकलीफें नहीं होती जो भारत सरीखे किसी लोकतांत्रिक देश में हो सकती हैं। अब वहाँ का पब्लिक ट्रांसपोर्ट ऐसा है कि वह ऐसा कानून पास कर सकते हैं सो कोई बवाल नहीं होगा लेकिन क्या ऐसा हमारे यहाँ सम्भव है? देश की आबादी समस्या बनी है लेकिन इस आबादी को काबू में करने के लिए क्या कोई कानून लाया जा सकता है? सोच कर देखिए यदि हमारी केन्द्र सरकार कोई कानून लाए जिसमें अधिक सन्तान होने पर टैक्स में छूट की जगह पेनाल्टी लग जाए या फिर सुविधाओं में कटौती की घोषणा हो जाए तो क्या होगा? बवाल न मच जाए तो कहियेगा... 

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व्यामोह

भारतीय गणितज्ञ स्व॰ शकुंतला देवी जी की ८८ वीं जयंती

बातों से खुद सुलगी होती हैं बातें कहाँ किसी ने जलाई होती हैं

तू जो मेरे सुर में, सुर मिला ले, संग गा ले... 

........और मुझे गुरुद्वारे जाना पड़ा

ये मेरे हाथ जो छूते हैं मुझे...

अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा कराकर जाऊँगा ! - सतीश सक्सेना

लेह से पैंगोंग लेक -- लेह लद्दाख यात्रा का अंतिम पड़ाव :

धर्मध्‍वजा पर छाती चौड़ी करने वालों का एक सच यह भी

मुझे प्यार नही करते

सीट नं ६३

1 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर विषय उठाया है आज के बुलेटिन में । आभारी है 'उलूक' उसकी बकवास को भी जगह देन के लिये बातों की ही सही ।

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