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शनिवार, 16 अप्रैल 2016

नो प्लेस फॉर मूत्र विसर्जन इन दिस कंट्री

साफ़ और आसानी से उपलब्ध सार्वजानिक शौचालय किसी भी देश, शहर की सफाई के लिए एक बहुत बड़ी ज़रूरत है। सच कहूँ तो अमेरिका में मुझे बड़ा अजीब लगता है क्योंकि यहाँ सुलभ शौचालय हैं ही नहीं। पार्क के किनारे में रखे हुए खोमचे या फिर किसी भी दूकान(जैसे स्टारबक्स) में बने शौचालयों का कोई भी प्रयोग कर सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि ब्रुकलिन ब्रिज से लेकर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के बीच लगभग डेढ़ मील के दौरान एक भी सार्वजनिक शौचालय नहीं है... गूगल पर ज़िन्दगी में पहली बार यह खोजना पड़ा। बहरहाल ब्रूकफील्ड मॉल में जाकर शंका समाधान हुआ... इस घटना में बाद दिमाग में विचार कौंधा की आखिर हर देश का पब्लिक टॉयलेट में मामले में क्या हाल है और हम कितने विकसित है इसमें। आबादी के हिसाब से कहेंगे तो हमारा बहुत बुरा हाल है लेकिन फिर भी इतनी आबादी को मैनेज करना भी बहुत कठिन है। उदाहरण के तौर पर एफिल टावर देखने साल में लगभग सत्तर लाख लोग आते हैं, कुम्भ में समय बनारस में एक दिन में पचास लाख लोग आ जाते हैं तो इसमें आप इनको कैसे मैंनेज करेंगे? यह पश्चिम का सोफिस्टिकेटेट सिस्टम क्या अपने यहाँ चलेगा? नहीं चलेगा क्योंकि वह अपने यहाँ की स्थिति में यह बुरी तरह से चरमरा जायेगा।

अमेरिकन अंग्रेजी में इसे रेस्टरूम और भारत के सुलभ शौचालय, लेकिन इसकी पहली शुरुआत प्राचीन रोम सभ्यता में हुई थी जिसे जर्मनी के फ्रैंकफर्ट ने 1948, लन्दन ने 1383 ने अपनाया। यूरोप में बड़े पैमाने पर पब्लिक टॉयलेट इनस्टॉल करने की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हुई थी। भारत में बड़े पैमाने पर सुलभ शौचालय बिहार के बिंदेश्वर पाठकजी ने 1970 के दशक में शुरुआत की, आज लगभग पचीस करोड़ लोग इसका इस्तेमाल करते हैं और सुलभ इंटरनेशनल पब्लिक टॉयलेट के मामले में विश्व का सबसे बड़ा संगठन है। यह सरकारी और गैरसरकारी प्रयास भारत के स्वच्छ भारत अभियान के लिए एक अहम कड़ी है। इन टॉयलेट्स से बॉयोगैस, फर्टिलाइजर(खाद) बनाने की कोशिश ने विन्देश्वर पाठक को विश्व में एक चर्चित नाम बन दिया। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें विशेष डिप्लोमैटिक स्टेटस दिया है और यह एक प्रयास अनूठा है। 

साफ़ सफाई के लिए मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के कुछ वोलेंटियर्स से मेरी बात होती है तब वह बताते हैं कि भारत में सफाई को लेकर एक नयी चेतना आई है और अब लोग गन्दगी करने पर टोकने लगे हैं, जगह जगह कचरा पेटी है और स्थिति सुधर रही है। लेकिन आज भी भारत में 59 करोड़ लोग खुले में शौचालय करते हैं, रोजाना एक हज़ार से अधिक लोग हैजा और डायरिया से मर जाते हैं, लगभग ढाई करोड़ लड़कियों को स्कूलों में सेपरेट शौचालय की व्यवस्था नहीं मिलती। इस अभियान से गाँव गाँव में चेतना जाग रही है और लोग प्रश्न पूछ रहे हैं, मांग कर रहे हैं, स्कूल शौचालय बनाने के लिए मजबूर हो रहे हैं और अब यह आंकड़ा सुधार की ओर है। 

बहरहाल आप भी सफाई रखने पर पूरा ध्यान दीजिये और हाँ स्वचछता में ही ईश्वर का वास है। बहरहाल ट्रांसहडसन पाथ ट्रेन में बैठे बैठे इस पोस्ट को लिखा, अब मेरा स्टेशन आ गया है सो घर चला आये:) वैसे मुझे थ्री इडियट्स के चतुर रामलिंगम का संवाद याद आ रहा था , "नो प्लेस फॉर मूत्र विसर्जन इन दिस कंट्री"।

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8 टिप्पणियाँ:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन के साथ मेरी पोस्ट शामिल करने के लिए धन्यवाद.

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सोच ही नहीं है बस बैनर और पोस्टर हैं विसर्जन के लिये :) बहुत सुन्दर प्रस्तुति और आभार देव जी 'उलूक'की सोच 'सीन होता है फिल्म का होता है जिसमें कुछ गधे होते हैं जो सारे घोडो‌ को लाईन में लगा रहे होते हैं' को आज के बुलेटिन में जगह देने के लिये ।

Kavita Rawat ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन प्रस्तुति
आभार!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सुलभ शौचालय,
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सचमुच में दो नंबर का धंधा है। ;)

बढ़िया बुलेटिन देव बाबू !!

Arshia Arshia ने कहा…

सार्थक चयन पोस्टों का।
लज़ीज़ खाना को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार।

Vishwa Mohan ने कहा…

बढ़िया प्रयास !!

Wasudeo Thavkar ने कहा…

sunder ...................!!!!

shubham sharma ने कहा…

देव जी आपकी यह बुलेटिन बेहद सुन्दर है जिसमे आपने भारत में फैलने वाली गंदगी व इसके निवारण का वर्णन किया है......आप ऐसे ही लेखो को शब्दनगरी
के माध्यम से भी प्रस्तुत कर अन्य लोगो से साझा भी कर सकतें है.....

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