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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

तालिबान और खाप अथवा तालिवानी खाप ... ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार ब्लॉगर मित्रो,

क्या आप जानते है तालिबान को हिंदी में (भारत में) किस नाम से जाना जाता है ?
नहीं पता मैं बताता हूँ जनाब ...
"खाप" जी हाँ यही खाप जो हरयाणा में सबसे ज्यादा उग्र है, प्रखर है तालिबान से भी ज्यादा कट्टर है, बच के रहिएगा। इस के आगे मेरी कुछ भी लिखने की हिम्मत नहीं है । मैं खाप से बहुत डरता हूँ ... भई आजकल दिल्ली मे जो रहता हूँ ... अपनी मैनपुरी होती तो कोई डर न था ... अब परदेस मे ...आप तो समझते ही है ... ;-)

चलिये जाने दीजिये ... लीजिये आपके लिए आज का बुलेटिन प्रस्तुत है ।


हॉलीवुड की एक फिल्म में अफ़्रीकी मूल का एक पात्र 'मिस्टर कोल' अपने गोरे बॉस को कहता है, “मैं जानता हूँ कि पहले काले को मरना होगा.” रंगभेद के शिकार का ऐसा कहना मज़ेदार है न? 

गुवाहाटी में नाबालिक लड़की के साथ २० लोगों द्वारा की कई अश्लील छेड़खानी और मारपीट का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रतनपुर के पास खूंटाघाट घूमने आए एक प्रेमी जोड़े को चार हथियारबंद लोगों ने पकड़ा और प्रेमी के सामने प्रेमिका को निर्वस्त्र कर उससे परेड करवाई तथा अश्लील एमएमएस बनाकर उसे सैकड़ों लोगों को मुहैया करा दिया| अब यह एमएमएस मीडिया चैनलों की सुर्खियाँ बढ़ा रहा है| 


 दिल्ली सहारनपुर मार्ग पर एक चलती हुई मारुति वैन में जिस तरह से आग़ लगने से एक ही परिवार के १४ सदस्यों की मौत हो गयी वह अपने आप में बहुत ही दु:खद घटना है. इस घटना से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि हम नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए भी उस स्तर पर सचेत नहीं रहते हैं जितनी हमें सड़क पर निकलते समय हमेशा ही रखनी चाहिए. जिस गाड़ी में आग़ लगी उसमें आख़िर २० लोग कैसे बैठे थे और क्या बैठते समय किसी ने यह सोचा था कि इतनी बड़ी संख्या में एक साथ सफ़र करने पर कोई दुर्घटना भी हो सकती है ?


रचना चाहे कोई भी हो, आसान नहीं होती। किसी नयी रचना के लिए कुछ पुराना तोड़ना पड़ता है। जब कुछ ध्वस्त होता है तो रचना की जमीन बनती है। इसे दूसरी तरह से भी कह सकते हैं कि जब रचना होती है तो कुछ ध्वस्त होता है। अंकुर बाहर निकले, इसके लिए बीज को नष्ट होना होता है, उसी की ऊर्जा से अंकुर आसमान की ओर उठता है। कई बार नये पौधे को उगने का पथ प्रशस्त करने के लिए पूरा वृक्ष ही नष्ट हो जाता है। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है। 

जब इन्फ़ोसिस के पूर्व सीईओ नन्दन नीलकेणि ने बहुप्रचारित और अनमोल टाइप की “यूनिक आईडेंटिफ़िकेशन नम्बर” योजना के प्रमुख के रूप में कार्यभार सम्भाला था, उस समय बहुत उम्मीद जागी थी, कि शायद अब कुछ ठोस काम होगा, लेकिन जिस तरह से भारत की सुस्त-मक्कार और भ्रष्ट सरकारी बाबू प्रणाली इस योजना को पलीता लगाने में लगी हुई है, उस कारण वह उम्मीद धीरे-धीरे मुरझाने लगी है।



कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. और इसी में ‘रावण’ रिलीज़ भी हो जाती है. पोस्‍टर पहले रिलीज़ हुई थी, तब कुत्ते शांत थे, मगर मैं तब भी सन्‍न हुआ था कि कागज़ पर ये लाल, पीले, नीले की अलग-अलग शोभा तो ठीक है, मगर जिस चेहरे के आसरे ये रंग मुखरित, मर्मावस्‍थी हो रहे हैं, उस चेहरे के विविध(?)-भावों को ‘जुवेनाइल’ के खांचे में रखा जाये या मानसिक-व्‍याधि की परिधि में?



एकांत कभी-कभी सर्वाधिक भाता है
सिवा खुद के जब पास कोई नहीं होता
एकांत खुद की पहचान कराता है ।

एकांत कभी-कभी बिल्कुल नहीं भाता
जब पास दूसरी कोई आवाज़ नहीं होती
एकांत जीने की हर चाह को खाता है ।


उन्हें सिर्फ सत्ता चाहिए
शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जिस दिन देश के समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों में किसी न किसी स्त्री के साथ दुर्व्यवहार का समाचार प्रकाशित न होता हो। घरों, कार्यस्थलों, विद्यालयों, रेलों, बसों, मनोरंजन स्थलों और मार्गों पर कोई स्थान ऐसा नहीं जहाँ वे लिंगभेद के कारण उत्पीड़न का शिकार न होती हों। स्त्रियाँ आम तौर पर इस उत्पीड़न को सहती हैं और अक्सर दरकिनार करती हैं।


चलो किसी रोते हुए को हंसाया जाए

इस रविवार से हास्य का हमारा पसंदीदा कार्यक्रम आरंभ हुआ .हालाँकि इसे घर में बस हम ही देखते हैं . लेकिनपहले दिन मिमिकरी आर्टिस्ट ही नज़र आए. हालाँकि कल प्रसारित एपिसोड में हमारे ही एक युवा कवि मित्र दिल्ली के चिराग जैन ने हमारी ही स्टाइल में जोक्स सुनाकर खूब दिल बहलाया .
हास्य कवि वो कवि होते हैं जो पूर्ण रूप से न तो कविता करते हैं , न हास्य कलाकारों जैसी ड्रामेबाजी . बल्कि हास्य और कविता की मिली जुली प्रस्तुति करते हैं . अब पहले जैसे हास्य कवि तो नहीं रहे जैसे काका हाथरसी , हुल्लड़ मुरादाबादी , शैल चतुर्वेदी और ॐ प्रकाश आदित्य जी , जो महज़ अपनी हास्य कविताओं से खूब हंसाते थे , गुदगुदाते थे. आजकल के हास्य कवि चुटकलेबाज़ी का सहारा लेकर पहले हंसाते हैं , फिर कविता सुनाते हैं . उस पर कोई हँसे तो हंस ले वर्ना चुटकलों ने अपना काम तो कर ही दिया था .

चर्चामंच पर कुछ निर्भीकता दिखानी चाहिए
हमारे यहाँ जैसे ही किसी बलात्कार की रिपोर्ट मीडिया देता हैं सब जगह पहला सवाल होता हैं
समय क्या था
लड़की / महिला ने पहना क्या था
शराब पी रखी थी क्या
अकेली थी
हर किसी की अदालत मे मुजरिम वो लड़की / महिला हो जाती हैं तो खुद ही एक जुर्म का शिकार बन चुकी हैं
उसके "रेप हो जाने की वजह से " बाकी सब लड़कियों पर बंदिशों का दौर शुरू हो जाता हैं
लोग खाप पंचायत के कानून को गलत बता देते हैं लेकिन हमारे देश के हर घर मे आज भी एक अनलिखा कानून हैं लड़कियों के लिये जो कहता हैं 
समय से घर आ जाओ , अंधेरे में बाहर मत जाओ , रात को घर से किसी पार्टी में मत जाओ  , ये पहनो और ये मत पहनो , उन लड़कियों से दोस्ती मत करो जो "फास्ट " हैं.


लावारिस - बावारिस !
ये आम बात है लेकिन इतने हद जाना हर किसी की वश की  बात नहीं। आज घर के बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार करना आम बात है, उन्हें घर से बाहर निकाल देना भी अब कोई बड़ी बात नहीं रही। फिर भी कुछ इंसान ऐसे भी होते हैं वैसे तो उन्हें इंसान कहना ही गलत है लेकिन और क्या कहा जाय? जहाँ इंसानियत भी शर्मिंदा होकर मुंह फेर ले वहां हम किसे क्या कहें?


क्या 'ब्लॉगवुड' आबाद रहने के लिये 'आइटम' पर निर्भर हो गया है ?

एक पैटर्न देखा है शुरू से... जब कभी कोई विवाद चल रहा होता है, चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक, या फिर किसी खास ब्लॉगर या समूह के खिलाफ लामबंद हो बहिष्कार-बहिष्कार का खेल खेला जा रहा हो... अचानक से सोये पड़े ब्लॉगवुड में एक जान सी आ जाती है... खूब पोस्टें आती हैं, पाठक बढ़ते हैं, टिप्पणियाँ गति पकड़ लेती हैं, कुल मिलाकर वीराने में रौनक सी आ जाती है... और जब कहीं कोई विवाद नहीं हो रहा होता तो एक किसिम की वीरानगी सी आ जाती है अपने ब्लॉगवुड में... :(


फेयरनेस क्रीम में कितना फेयर ?
 एशियाई लोगों में अपने को गोरा दिखाने की चाह कितनी भारी पड़ सकती है इस बात का खुलासा विश्व स्वस्थ्य संगठन की एक ताज़ा रिपोर्ट में किया गया है जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत और विश्व के अन्य देशों में किस तरह से उन प्रतिबंधित रसायनों का दुरूपयोग किया जा रहा है जो मनुष्य के स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा असर डालते हैं. अभी तक जिस तरह से आम लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि गोरेपन की क्रीम लगाने से वे अधिक आकर्षक लगने लगेंगें अब उनके चेत जाने का समय आ गया है क्योंकि जिस तरह से इन उत्पादों में पारे के विभिन्न रूपों को प्रयोग किया जा रहा है व लम्बे समय में किडनी को ख़राब करने का काम भी करने में लगे हुए हैं और सबसे शर्मनाक बात यह भी है कि नियमों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हुए इन कंपनियों द्वारा कहीं पर भी इस बात का उल्लेख भी नहीं किया जा रहा है कि वे यहाँ पर पारे का उपयोग कर रही हैं. चूंकि पारे को इस तरह से इस्तेमाल में लिए जाने पर रोक है क्योंकि उससे विभिन्न रोग हो सकते हैं तो वहां पर इसका उपयोग चोरी छिपे किया जा रहा है.


वाह रे पत्रकार  ...वाह वाह रे पत्रकार  !
ये पराकाष्ठा है संवेदनहीनता की .गुवाहाटी  में एक ओर असामाजिक तत्व एक युवती की अस्मत तार तार करने में लगे थे और दूसरी ओर वहां उपस्थित एक स्थानीय टेलीविजन के पत्रकार महोदय इस हादसे की वीडियो बना रहे थे .गौरव ज्योति नियोग नाम के इस पत्रकार ने पूरी  मानवता  को शर्मसार  कर दिया है और आज की मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है .स्वयं कुछ करने का साहस नहीं था तो कम  से  कम पुलिस को ही सूचित कर देता .चैनल के एडिटर इन चीफ  का बयान  और भी  काबिल-ए-तारीफ  है .ये जनाब फरमाते हैं कि-''मैं अपने रिपोर्टर के साथ हूँ जिसने अपना काम किया है .''  भाई वाह !!



पीढ़ियों का अन्तराल महत्वपूर्ण नहीं होता, यदि पुरातन पीढ़ी वर्तमान परिवेश में भी अपनी प्रासंगिकता बनाये रहें. ऐसे ही पीढ़ी की एक जिंदादिल महिला हैं- कैप्टन डॉक्टर लक्ष्मी सहगल. उन्हें किताबों में पढ़ा, चित्...


मित्रो अब इस बुलेटिन को यही विराम देना चाहूँगा । जल्द ही दोबारा मुलाकात होगी | प्रणाम !

9 टिप्पणियाँ:

veerubhai ने कहा…

जिस देश का प्रधानमन्त्री विदेश में पूडल कहलाए इतालवी बेहरूपनी का उस देश में यही होगा खापों की मनमानी ,औरतों के साथ छेड़खानी ,राष्ट्री संपत्ति का नुकसान ,हरियाणा तो डिजर्व ही नहीं करता वहां मारुती जैसे कारखाने काम करें यह एक आदिम समाज है जहां लोग हुक्का पीते हुए फतवा ज़ारी करते हैं फलाने के लडके को पेड़ से लटका दो फलाने की लौंडिया को ज़िंदा ज़लादों .सारे अयातुल्ला खुमैनी के बाप हैं ये खापिए.बहुत बढ़िया रही ब्लॉग बुलेटिन .कृपया यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
शुक्रवार, 20 जुलाई 2012
क्या फर्क है खाद्य को इस्ट्यु ,पोच और ग्रिल करने में ?
क्या फर्क है खाद्य को इस्ट्यु ,पोच और ग्रिल करने में ?


कौन सा तरीका सेहत के हिसाब से उत्तम है ?
http://veerubhai1947.blogspot.de/
जिसने लास वेगास नहीं देखा
जिसने लास वेगास नहीं देखा

http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

shikha varshney ने कहा…

सच है अपने देश का तालिबान (खाप)ज्यादा डरावना है:(
बढ़िया बुलेटिन.

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आजाद हिंद फौज की महिला इकाई की पहली कैप्टन रहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लक्ष्मी सहगल की हालत गुरुवार रात दिल का दौरा पड़ने के बाद से गंभीर बनी हुई है।

डॉ. संतोष कुमार की अगुवाई में अस्पताल के चिकित्सकों की एक टीम कैप्टन सहगल की हालत की निगरानी कर रही है। चिकित्सकों का कहना है कि उनका दिल सामान्य ढंग से कार्य नहीं कर पा रहा है। उनकी हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है।

आइये हम सब मिल कर उनके शीघ्र स्वास्थ्य की दुआ करें !

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत बढ़िया बुलेटिन ... रुद्राक्ष ... आभार !

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन.....

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स ..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सूत्रों की बड़ी ही रोचक प्रस्तुति..

अजय कुमार झा ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तावना के साथ सुंदर लिंक्स संयोजन । बहुत अच्छा काम किया आपने रुद्राक्ष । बहुत ही अच्छी बुलेटिन

Bharat Bhushan ने कहा…

MEGHnet से रचना शामिल करने के लिए आपका आभार. हिंदी ब्लॉग्स का एक प्रकार का आर्काइव तैयार करना महत् कार्य है. रुद्राक्ष जी आपको शुभकामनाएँ.

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