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रविवार, 4 अगस्त 2019

भगवान को भेंट - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

बहुत पुरानी बात है, एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था । सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था जो भी जरुरी काम हो वह सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था।
वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था । वह सदा भगवान के चिंतन, भजन, कीर्तन, स्मरण तथा सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था ।
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एक दिन उस भक्त ने सेठ से श्री तीर्थ यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी। सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा,  भाई मैं तो हूं संसारी आदमी । हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता ।

तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए। यह भेंट मेरी ओर से श्री प्रभुजी के चरणों में समर्पित कर देना। भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर तीर्थ यात्रा पर निकल गया ।

कई दिन की यात्रा करने के बाद वह गन्तव्य तीर्थ पर पहुंचा । मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं ।

सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है । जोर-जोर से प्रभु जी की जय, प्रभुजी की जय से गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर संकीर्तन का आनंद लेने लगा ।
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फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजनों के इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे भी प्रतीत हो रहे हैं उसने सोचा कि क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ।

उसने उन सभी को उन सौ रुपए में से भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने में उसे कुल 98 रुपए खर्च करने पड़े ।

उसके पास दो रुपए बच गए तो  उसने सोचा कि  चलो अच्छा हुआ ,दो रुपए तीर्थ के मन्दिर जी के  प्रभु के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा। जब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा वह पैसे चढ़ा दिए। सेठ यह तो नहीं पूछेगा कि 100 रुपए चढ़ाए। सेठ अगर पूछेगा कि    पैसे चढ़ा दिये  तो मैं बोल दूंगा कि, पैसे चढ़ा दिए। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा ।

उस भक्त ने प्रभु के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया। प्रभुजी की छवि को निहारते हुए उनको अपने हृदय में विराजमान किया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए प्रभु जी के चरणो में चढ़ा दिए और बोला, यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं ।

उसी रात सेठ के पास स्वप्न मे प्रभु आए, सेठ को  आशीर्वाद दिया और बोले - सेठ तुम्हारे 98 रुपए मुझे मिल गए हैं। यह कहकर अंतर्ध्यान हो गए ।

सेठ जाग गया व सोचने लगा मेरा नौकर तो बड़ा ईमानदार है, पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी  कि उसने दो रुपए भगवान को कम चढ़ाए ? उसने दो रुपए का क्या खा लिया ? उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी ? ऐसा विचार सेठ करता रहा ।

काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा कि मेरे पैसे प्रभुजी को चढ़ा दिए थे ?

भक्त बोला - हां, मैंने पैसे चढ़ा दिए थे।

सेठ ने कहा पर तुमने 98 रुपए क्यों चढ़ाए  ? दो रुपए किस काम में प्रयोग किए। तब भक्त ने सारी बात बताई कि उसने 98 रुपए से संतो को भोजन करा दिया था। और प्रभु जी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे ।

सेठ सारी बात समझ गया व बड़ा खुश हुआ तथा भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला आप धन्य हो। आपकी वजह से मुझे प्रभुजी के दर्शन यहीं बैठे-बैठे हो गए ।

सन्तमत विचार - भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह 98 रुपए स्वीकार हैं जो जीव मात्र की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए का कोई महत्व नहीं जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए।

सादर आपका

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बुढ़ी नानी का चश्मा

Blogger of the Year 2019 : डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी व‍िजेता, मुकेश कुमार सिन्हा रहे उप विजेता

'मन' खुशी मुबारक !

पारो भाग (1)

अच्छा क्या है गरम या ठंडे पानी से नहाना ?

मिलना ''मैं गाय जैसे'' (मैग्सेसे) पुरस्कार का

३७२. घर में प्रकृति

विचार बुनते है ज़िंदगी

हम भारत के वासी हैं

सफ़र

ढिंचैक पूजा को मिला चमन जैसेतैसे पुरस्कार

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 अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!!

3 टिप्पणियाँ:

Malti Mishra ने कहा…

बहुत सुंदर संकलन, मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार

Anuradha chauhan ने कहा…

सुंदर बुलेटिन प्रस्तुति मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार

Amit Mishra 'मौन' ने कहा…

बहुत सुंदर संकलन... मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार

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