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शनिवार, 8 अगस्त 2015

पश्चाताप के आंसू

आदरणीय ब्लॉगर मित्रों नमस्कार,

आज की बुलेटिन कटूपहास के साथ एक सामजिक सन्देश देती मेरे द्वारा लिखी हुई नई लघुकथा  के रूप में आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कहानी का मुद्दा आप सभी को समझ आएगा और आप अपने आस पास में घटने वाली ऐसी घटनाओं को रोकने का प्रयास अवश्य करेंगे। 


लघुकथा: पश्चाताप के आंसू
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नीशू अभी-अभी बाहर से आवारागर्दी करके वापस लौटा था और घर के दरवाज़े से अन्दर दाख़िल हो ही रहा था कि उसे अपनी छोटी बहन रेवती के सुबक-सुबक कर रोने की आवाज़ आई। बहन को रोता सुन दौड़ा-दौड़ा कमरे में आया और पुछा, "क्या हुआ? ऐसे रो क्यों रही है? किसी ने कुछ कहा तुझे? बता मुझे मैं मुंह तोड़ दूंगा उसका - बता तो क्या हो गया?" - और बड़े ही विचिलित मन से और सवाल भरी नज़रों से रेवती की ओर देखता रहा।

"अब बोलेगी भी या टेसुए ही बहाए जाएगी, मेरा दिल बैठा जा रहा है। बता भी हुआ क्या है?"

रेवती ने आंसू थामते और सुबकते हुए कहा, "भैया...! कल से हम कॉलेज नहीं जायेंगे। हमें उसकी हरकतें पसंद नहीं। वो लड़का रोज़ हमें परेशान करता है। गंदे-गंदे जुमले कसता और इशारे भी करता है। आज तो हद ही हो गई हम स्कूटी पर मीना के साथ कॉलेज जा रहे थे और वो पीछे से अपनी मोटरसाइकिल पर आया और मेरा दुपट्टा ज़ोर से खींच कर ले भागा। देखो, मैं सड़क पर गिर भी गई मेरे कितनी चोट आई है, खून भी निकला कितना। मैं कल से नहीं जाऊँगी वरना वो कमीना फिर से परेशान करने आ जायेगा।"

इतना सुनते के साथ ही नीशू सन्न रह गया, मानो उस पर घड़ो पानी पड़ गया हो। ऐसे कमीनेपन में तो वो भी माहिर था। सारा दिन वो भी तो यही सब करता था अपने आवारा मित्रों के साथ मिलकर, मोहल्ले के चौराहे पर खड़े रहकर। आती-जाती, राह चलती लड़कियों को छेड़ना, फितरे कसना, परेशान करना, सीटियाँ बजाना, फ़िरकी लेना और भी ना जाने क्या-क्या। छिछोरपन में कोई कमी थोड़ी छोड़ी थी उसने कभी। उसकी करनी का नतीजा आज ख़ुदकी छोटी बहन के साथ हुए दुर्व्यवहार के रूप में उसके सामने था।

उसे यह अहसास और आभास कभी ना हुआ था कि, ऐसा कुछ उसकी बहन के साथ भी हो सकता है। अब उसे समझ में आया कि जिनके साथ वो बदसलूकी करता था वो भी किसी की बहन, बेटी, पत्नी या किसी के घर की इज्ज़त थीं। आज अपने आप से नज़रे मिलाने लायक नहीं रहा था वो, आत्मग्लानि होने पर उसका वजूद उसे धिक्कारने लगा और उसका दिल स्वयं अपने मुंह पर थूकने को करने लगा। शर्म से मुंह लटकाए, सर झुकाए, धक से वहीँ बहन के पास बैठ गया और पश्चाताप के आंसू उसकी आँखों में भर आए।

#तुषारराजरस्तोगी  #लघुकथा #सामाजिकसमस्या  #बदतमीज़ी  #छेड़छाड़  #लड़कियां  #पश्चाताप  #आंसू

आज की कड़ियाँ 

सद्गुणों का विरोधाभास - विकेश कुमार बडोला

नन्ही नन्ही चिड़ियाँ - अनीता

ज्यु ज्यूँ ज़िन्दगी - कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा

साक़ी - मिसरा राहुल

साध्वी प्राची की आवाज़ सुनो - वीरेंदर कुमार शर्मा

भींगी हुई आँखों से - अनामिका घटक

मन की पाबंदियाँ - प्रियंका जैन

दिवास्वप्न का मानस - उदय वीर सिंह

नावक और उसका तीर - अजित वडनेरकर

ज़िन्दगी क्या है - प्रीती सुराना

कहाँ है मेरे पद चिन्ह - उपासना सियाग

आज के लिए इतना ही अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी तब तक के लिए - सायोनारा

नमन और आभार
धन्यवाद्
तुषार राज रस्तोगी
जय बजरंगबली महाराज | हर हर महादेव शंभू  | जय श्री राम


8 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर लघुकथा के साथ सुंदर शनिवारीय अंक ।

कविता रावत ने कहा…

जब अपने पर गुजरती हैं तब अहसास होता है
बहुत अच्छी प्रेरक लघुकथा के साथ सार्थक बुलेटिन प्रस्तुति हेतु आभार

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सार्थक लघुकथा के साथ बढ़िया बुलेटिन प्रस्तुति तुषार भाई ... आभार |

nayee dunia ने कहा…

बहुत सुंदर -सार्थक लघु कथा कि अगर कोई दूसरे की बहन की इज़्ज़त नहीं करेगा तो उसकी खुद की बहन भी सुरक्षित नहीं रहेगी .....मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार ...

Harihar (विकेश कुमार बडोला) ने कहा…

धन्‍यवाद।

Tamasha-E-Zindagi ने कहा…

आप सभी गुणीजन का स्वागत है और हृदयतल से धन्यवाद - जय हो मंगलमय हो - हर हर महादेव

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

जब तक खुद पर नहीं पड़ती तब तक अक्ल नहीं आती।

http://bal-kishor.blogspot.com/ ने कहा…

प्रेरक लघु कथा ,बधाई .

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