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बुधवार, 5 दिसंबर 2012

प्रतिभाओं की कमी नहीं अवलोकन 2012 (4)



(पिछले वर्ष के अवलोकन को एक अंतराल के बाद हमने पुस्तक की रूपरेखा दी ..... इस बार भी यही कोशिश होगी . जिनकी रचनाओं का मैं अवलोकन कर रही हूँ , वे यदि अपनी रचना को प्रकाशित नहीं करवाना चाहें तो स्पष्टतः लिख देंगे . एक भी प्रति आपको बिना पुस्तक का मूल्य दिए नहीं दी जाएगी - अतः इस बात को भी ध्यान में रखा जाये ताकि कोई व्यवधान बाद में ना हो )

सुबह आती है 
पूरा दिन अपने साथ दौड़ता है 
रात सिरहाना बन पास आती है 
पर ..... एक दहशत हर आहट के संग चलती है 
आतंक के स्वर गुलमर्ग में ही नहीं 
अपने आस पास हैं !
कारण की कोई ज़रूरत नहीं 
मारना है, अपहरण करना है 
तो बिना कारण सब संभव है ....... 

इसी भय का एक अंश भावना पाण्डेय अपनी कहानी में लेकर आई हैं -

"खोलो दरवाजा "

बहुत सी बातें ... मन में चल रही है ,.फिलहाल एक हादसा जो हों सकता था मगर अच्छा हुआ जो होते होते रह गया उसे लिख रही हूँ...क्या पता ..कोई... कहीं ...सतर्क हों जाय..
.
      कल बड़ा गजब हुआ...पूरी बिल्डिंग में सिर्फ हम और रूद्र ही .दिन के करीब सवा बजे होंगे .गुडगाँव में चाचा  जी (ससुर जी )स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं जान कर तसल्ली हुई ,ऊपर वाले का शुक्रिया किया .और लग गई घर के काम निपटाने में ..आखिर में सीढ़ियों पर नीचे नजर डाली बड़ी गन्दी हों रही थी ...सीढियां बुहारते किरायेदार के दरवाजे पहुंची ..उफ्फ़।।। दरवाजा बंद  था मगर अजीब सी गंध ने जी खराब कर दिया .जलदी जलदी बुहारा और चली आई .रूद्र को टी वी देखना पसंद है मगर आज कल उस पर पाबन्दी  है (आँखें  कमजोर हों रही है ) इसलिए वह बेचारा अपने अदृश्य दोस्तों के साथ जंगल  सफारी खेल रहा था .तरस आ गया और  टी वी खोल दिया .रूद्र बहुत खुश हों गया .तभी बेल बजी और देखा जमादार खड़ा था ."कूड़ा दे दो ...." 
    "हम्म...भईया सुबह आ जाया करो ".कूड़ा दिया और आदतन जाली पर चिटकनी लगा दी खाना बना  ही रही थी की जोर दार आवाज हुई मानो कई  बम फूट रहे हों  ,भाग कर बालकोनी पहुंची सामने बनते विशाल मकान में ठेकेदार एक के बाद एक सामान दूसरे माले से नीचे फिंकवा रहा था .इतना शोर ...मैंने बालकोनी के दरवाजे खिड़की सब बंद कर दिए .सीढ़ी की तरफ का दरवाजा बंद करने आ ही रही थी की किसी ने जोर जोर से जाली पर हाथ मारना शुरू कर दिया था ...मैं चिढ गई थी ...दरवाजा पीटना सख्त ना पसंद है..बेल किसलिए  लगाई है ...लोगों को दिखती नहीं है क्या ...इस सोच से गन्दी सी शक्ल लिए (जब चिढ  जाती हूँ तो उस वक्त बिन मेकप हीरोइन  जैसी दिखती हूँ ) दरवाजे पर पहुंची तो देखा दो  सांवले गठीले  से  लम्बे लड़के सामने खड़े थे ,मैं कुछ बोलती उस से पहले उसने फिर जाली पीट ते हुए कहा "खोलो दरवाजा " मेरा हाथ चिटकनी पर गया ही था की अचानक हाथ वहीँ रुक  गए ऐसे लगा जैसे की कोई बोला "ये क्या कर रही हों ... पहचानती हों कौन हैं ये ?" मैं चैतन्य हों गई और कुछ पूछती  इस से पहले उस लड़के ने फिर बड़ी जोर से जाली पीटी ..इस बार लगा की अब जाली टूट जायेगी  .लड़का बोला  "चौधरी  को बुला बाहर  ", मैंने बोलना शुरू किया "यहाँ कोई चौधरी नहीं .र.. " दूसरा जो कुछ नीचे खड़ा था बात पूरी होने से पहले जोर से दहाडा "दरवाजा खोल " सुनते ही पता नहीं  क्या हुआ ...मैंने भी बेहद  ऊंची आवाज में  कहा  " बुलाऊँ  पोलिस को "
      तब साथ खड़े  लडके को बोलते हुए  "चल, चल, यहाँ चौधरी नहीं है "  तुरंत नीचे भागा और मैं दरवाजे पर एकाएक घटी इस घटना पर सन्न खड़ी थी  ".ये हुआ क्या  और मैंने कहा  क्या   "  सही में ...कुछ पल तो वहीँ खड़ी रह गई  ...फिर जैसे ही सामान्य हुई तुरंत दरवाजा बंद किया .और झट पट नवीन जी को फोन मिलाया ....आउट  ऑफ़ कवरेज ...फिर  ... बालकोनी का दरवाजा खोला ,झाँका ..देखा कुछ दूरी पर  ठेकेदार  ,मजदूर और जमादार आपस में बात कर रहे हैं...किरायेदार की बेटी ,दूर ...सड़क पर इस और आती दिखी ...मगर वे लडके कहीं  नहीं दिखे. मैं अन्दर चली आई ... रूद्र बोला "माँ देखो... बाल हनुमान आ रहा है...देखने दोगी ना ..प्लीज माँ ...प्लीज प्लीज " ,"ठीक है.. देख लो "कह कर बड़ा सा ताला ले कर नीचे गई ,किरायेदार की बेटी को अन्दर किया और मेनगेट पर  ताला लगा दिया .ऊपर आई तो नेट पर बहन ऑनलाइन थी उसकी चैट  रिंग बज रही थी ..उसे सब बताया ...वो बोली "बड़ी डरपोक हों यार ...अरे तुमसे पहले कोई रहता होगा यहाँ पर..उसका कोई मामला होगा  " ,"हम्म...हों सकता है " कह कर ये बात यहीं ख़तम हों गयी . शाम को मैंने आस पास जा कर पता किया तो पता चला की इस लाइन में क्या इस कालोनी में कोई चौधरी परिवार कभी नहीं रहा .....:(


दहशत में टुटा आदमी चलता है, बुनता है सपने,कहता है खुदा से अपनी बात .... देवांशु निगम ने धरती के कुछ स्पर्श मांगे हैं - कुछ इस तरह 


मुझे भीष्म की तरह इच्छा-मृत्यु नहीं चाहिए,
ना चाहिए कोई जीवेत शरदः शतं का वरदान,
गर दे सकता है तो खुदा मुझे नेमत दे ,
लम्हों को रोक सकने की!!!
वो एक लम्हा जब वो मेरे सबसे करीब हो,
मैं उसकी धड़कन सुन सकूं ,
उसे भी मेरे साँसें सुनाई दे रही हों,
हाँ बस वही लम्हा, थाम लूं, फ्रीज़ कर दूं |
और जब वो लम्हा गुज़रे ,
फिर गर तू मौत भी बख्शे तो नूर समझूंगा|
तू ही बता जब जिन्दगी खुद लम्हों में जीती है ,
तो क्या ज़रुरत है मुझे सौ बरस जीने की !!!!

यथार्थ के परिधान में लिपटा सत्य करता है आगाज़ रवि शंकर पाण्डेय की कलम से -

मै डरता हूँ पूर्वी वयार से 
  उन फूलों से 
 जो दोगले चरित्र का निर्माण करतें है 
दंभ भरतें हैं 
 यथार्थ को काटते है अपनी सुगंध से 
 सुगंध की दुनियां ख़्वाबों की दुनियां
  मित्र लौटो और देखो 
कैक्टस भी खड़ा है 
 नागफनी भी अड़ा है 
 फूलोँ का तो मौसम है 
 उसकी एक जात है 
 उसका व्यक्तित्व ऋतु चक्र की तरह बदलता है 
 उसकी एकता में भिन्नता है 
और मै 
 ऋतुओं से मुक्त 
 अपने ठेढ़ेपन में मस्त 
 अपने से होता त्रस्त
 अड़ा हूँ समस्याएं लिए 
मै ही तुम हो 
 मै समाज का नंगा सच हूँ 
 मेरे शारीर पर उगे कांटें 
 जिसे छुने से नारी क्रीडा का एहसास नहीं होगा 
 जिसे देखने से सहवास नहीं होगा 
शायद मै चुभ जाऊं हांथों में 
शायद मै धस जाऊं आँखों में 
इसलिए तुने कभी दृष्टि नहीं डाली 
 जिस दिन जड़ से उखड़ जाउंगा 
 कुछ कर जाउंगा 
 तब तुम्हे इस नंगे सच से अवगत कराऊंगा 
मै ही यथार्थ हूँ 
मै वो फूल नहीं जिसका आख्यान युग युगांतर से किया गया 
मै वो बयार नहीं जिससे चरित्र अपने आप पर शरमाया 
 मै तो अनदेखी अनछुवी बात हूँ 
 आँसुओं से गिरी बूंद हूँ 
 फ़िर भी निराश नहीं कर्मरत तैयार हूँ 
 देखता हूँ समय और समय मुझे 
 जब हम दोनों एक दिशा में होंगें 
 तब नयी दिशा देंगें 
 एक नए समाज की जो तंत्रों से मुक्त 
 मानवीयता से युक्त 
 तब मानव पैदा होंगें 
 मानवतावाद  में तब्दील होगा राष्ट्र 
 और फिर से जन मन गण होगा 
 नये  विश्व की स्थापना करेंगे 
 मानवतावाद के लिए मरेंगे 
करेंगे प्रतिवाद 
उस वाद का जो संवादों से रिक्त हो 

भय,चाहत,परिवर्तन के आगाज़ हमेशा साथ साथ चलते हैं - विरोधाभासित स्थितियां,प्रतिकूल परिस्थितियाँ ही अनुकूलताओं को जन्म देती हैं ....

16 टिप्पणियाँ:

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

भय,चाहत,परिवर्तन के आगाज़ हमेशा साथ साथ चलते हैं - विरोधाभासित स्थितियां,प्रतिकूल परिस्थितियाँ ही अनुकूलताओं को जन्म देती हैं .... !!

Akash Mishra ने कहा…

तीनों सुन्दर रचनाएँ , कहानी विशेष पसंद आयी |

सादर

देवांशु निगम ने कहा…

सबसे पहले धन्यवाद रश्मि जी आपकी इस श्रंखला में मेरी कविता को स्थान देने के लिए |

वर्षांत के चलते बहुत सारा काम आ गया है, फ्री होते ही सारे अंक और दिए हुए लिंक पढता हूँ !!!

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

Devanshu ki kahani behtareen lagi..:)
teeno rachna lajabab...

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

तीनों रचनाये अच्छी हैं,रचनाओं का चयन बहुत बढ़िया है .बधाई .

vandan gupta ने कहा…

कहानी के साथ सभी रचनायें शानदार

सदा ने कहा…

सुबह आती है
पूरा दिन अपने साथ दौड़ता है
... कहीं कुछ छूट न जाये
फिर भी छूट जाता है बहुत कुछ

चयन एवं प्रस्‍तुति अनुपम ...आभार आपका

नीलिमा शर्मा ने कहा…

एक हादसा जो हों सकता था मगर अच्छा हुआ जो होते होते रह गया khud ko safe karna sabse pahle jaruri hota hain .........bahut khoob likha aapne Bhavna jee


वो एक लम्हा जब वो मेरे सबसे करीब हो,
मैं उसकी धड़कन सुन सकूं ,
उसे भी मेरे साँसें सुनाई दे रही हों,
हाँ बस वही लम्हा, थाम लूं, फ्रीज़ कर दूं |.......... umda rachna .. har masoom dil ki yahi chahat hoti hain pyar main Devanshu jee



...भय,चाहत,परिवर्तन के आगाज़ हमेशा साथ साथ चलते हैं - विरोधाभासित स्थितियां,प्रतिकूल परिस्थितियाँ ही अनुकूलताओं को जन्म देती हैं .... very nice Ravi jee

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

हर बार की तरह ...नई सोच से मिलवाया है आपने ...आभार

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

सुन्दर और प्रभावशाली रचनाओं का वार्षिक लेखा जोखों का दस्तावेज़ होता है "प्रतिभाओं की कमी नहीं". वर्ष 2011 के उत्कृष्ट ब्लॉग रचनाओं का संकलन रश्मि प्रभा जी के संपादन में किताब स्वरुप में ज्योतिपर्व से प्रकाशित हुआ था। आशा है इस वर्ष भी "प्रतिभाओं की कमी नहीं 2012" पुस्तकार के रूप में ब्लॉग पाठकों के समक्ष दस्तावेज़ के रूप में आएगा। "प्रतिभाओं की कमी नहीं 2011" ज्योतिपर्व प्रकाशन के पास उपलब्ध है। प्रति मंगवाने के लिए jyotiparbprakashan @gmail.com पर लिख सकते हैं। डाक खर्च में छूट। या 09811721147 पर सीधे आर्डर कर सकते हैं।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बस ऐसे ही चलता रहे यह सफर ... नए - पुराने दोस्तो से सफर के दौरान ही दुआ सलाम करवाता हुआ !

Maheshwari kaneri ने कहा…

फिर एक नयी सोच..?रश्मि जी अच्छा लगा.. रचनाओं का चयन बहुत बढ़िया है ..कहानी का जवाब नही..

shikha varshney ने कहा…

क्या बात है, सुन्दर संकलन, तीनो रचनाएं लाजबाब.

रवि शंकर पाण्डेय ने कहा…

आदरणीय रश्मि जी -मेरी कविता के चयन के लिए आपका आभारी हूँ।आपके अक्षरों से अभिव्यक्त जिस सूक्ष्म शारीर को मैंने देखा उसके स्थुलाकृति के परिमाण का मापन तो मै नहीं कर सकता, लेकिन एक शब्द में मै यह दृढ़ता पूर्वक कह सकता हूँ, आपकी संवेदना शब्दों का बांग्मय है।............सादर

Unknown ने कहा…

रवि शंकर पाण्डेय जी की यथार्थ कविता अद्वितीय है ,निराशा में आशा की किरण कविता को जीवन्त बनाती है।।
सभी रचनाये सुन्दर एवं सारगर्भित !!!

Unknown ने कहा…

रवि शंकर पाण्डेय जी की यथार्थ कविता अद्वितीय है ,निराशा में आशा की किरण कविता को जीवन्त बनाती है।।
सभी रचनाये सुन्दर एवं सारगर्भित !!!

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