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गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

बेटा बेटी को जीने दो


बंद करो बोलना
"बेटी बचाओ"
दिलोदिमाग की नसें 
ऐंठने लगती हैं  .... 
पहले तो यह नारा नहीं था 
.... 
यह क्या तमाशा है !!!
इतनी जलन उसके आगे आने से ?
हमने तो कहा था 
कहते हैं 
बुद्धम शरणम गच्छामि 
फिर यह कहने में कौन सी कुंठा ?
यशोधरा शरणम गच्छामि !

बेटा बेटी को जीने दो 
सड़े गले लोगों का संहार करो 
वह बेटा हो या बेटी हो 
उसका बहिष्कार करो


सुनो ऐ नरम दिल लड़कियों
-----------------------------------
रुई के फाहों सी नरम दिल लड़कियों
जरा सा सख्त भी हो जाओ --वरना
खतम हो जाएगा तुम्हारा वज़ूद 
इसी तरह दोयम दर्जे का जीवन जीती रहोगी
याद करो कभी अपने ही घर में सुना होगा न
किसी को बार बार यह कहते
अपनी इज्जत करना सीखो --
जो अपनी इज्जत नहीं करता
दुनिया उसकी परवाह नहीं करती
सुनो ऐ नरम दिल बेवकूफ लड़कियों
कितनी भोली हो तुम नहीं समझी न ?
यह शब्द यह नसीहत यह सीख कुछ भी
तुम्हारे लिए नहीं थी अरे यह सब
तुम्हारे भाइयों के लिए कहा था
भले ही कहने वाली तुम्हारी माँ ही होगी
तुम्हारी नियति तो तय ही कर दी गई थी
सदियों पहले -- वो ही दोयम दर्जे वाली
सब जानते थे आज भी उन्हें पता है
रुई हल्की सी नमी से भीग जाती है
भारी बोझिल हो जाती है ---आंसुओं से
पर वो यह कैसे भूल गए ---कभी कभी
हल्की सी चिंगारी से रुई में आग भड़क जाती है
और भस्म हो जाता है पूरा का पूरा साम्राज्य
उसी रुई से तो बना है तुम्हारा नरम दिल
पर सुनो क्यों नहीं समझती तुम
जब तक तुम खुद नहीं समझोगी
कैसे समझाओगी सबको ----
अब तो समझो ---मत बहो अंधी नदी की धार में
जिसके कगार ढह रहे हों न जाने किस खाड़ी में
ले जाकर पटक देगी तुम्हे और फिर होगा वही
अथाह सागर में विलीन हो जाओगी --
तुम्हे खुद बनाना है अपना बाँध एकजुट हो कर
तभी तो तुम्हारी उर्जा से दिपदिपायेगा --
जगमगायेगा पूरा समाज --और
फिर ऐ रुई के फाहों सी नरम दिल लड़कियों
बस तनिक सा कठोर हो जाओ ---
अपना सम्मान करना सीख लो
--------दिव्या शुक्ला ---
पेंटिग गूगल से

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Shailja pathak 
कंगन लुटाने वाले सोहर भाई के लिए गाये गए
जब भाई घर की छत से कागज के हवाई जहाज बनाता
हम आंगन के परात भर पानी में कागज की नांव बहाते
जो हर कोने से टकरा कर भी सधी हुई सी चलती 
जब भाई नई मिली सायकिल पर कैची मारता हुआ रास्ते पर आगे बढ़ जाता हम मुस्कराते
अक्सर खड़ी हुई सायकिल के पीछे बैठ हम गीतों के देश की सैर करते फिर उतर जाते
वो पतंग उडाता हम मंझा सुलझाते
फटी पतंग को दुरुस्त करते
भाई फिर उड़ जाता
















भाई पिता का जूता पहन कमाने जाता
हम अम्मा की साड़ी में घर सँभालते
हमारे पास रसोई वाला खेल उसके पास डॉक्टर सेट
हमारी कपड़े की गुडिया उसकी बैटरी वाली मोटर
कमोबेश जिन्दगी का सबक सीखती सिखाती उम्र
एक लडकी थी बुआ
जिनसे परात भर पानी और सायकिल वाली यात्रा भी छीन ली गई
अब बस बड़ी सी साड़ी लपेट बुआ मंझे सुलझाती हैं......


जब
खो जाते हैं शब्द
तब भी
चलता ही है जीवन
जो कभी
टूट भी जाए
संवादों का पुल
तब भी
जुड़े ही रहते हैं
जो जुड़े हुए थे मन
कि
यही जुड़ाव
बनाये रखता है
सांसों का तारतम्य
और
उठते-गिरते
चलते रहते हैं हम
चलता रहता है जीवन !

सुनो बेटियों,
मत बढ़ाना अपने पाँव किसी पूजन-वूजन के लिए
इनकार कर देना बनने से देवी
और किसी को देवता बनाने से भी 
कि इन्सान होने से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं
माथे पर रोली लगाने को बढ़ते हाथों से कहना
हमें अपने सपनों को जीने की आज़ादी चाहिये
यह पूजा अर्चन नहीं...

3 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सटीक। बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

उम्दा, सदा की तरह

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