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बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और ब्लॉग बुलेटिन

सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को मेरा सादर नमस्कार।
रामचन्द्र शुक्ल (अंग्रेज़ी: Ramchandra Shukla, जन्म- 4 अक्टूबर, 1884, बस्ती ज़िला, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 1941 ई. भारत) बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे। उनकी द्वारा लिखी गई पुस्तकों में हिन्दी साहित्य का इतिहास प्रमुख है, जिसका हिन्दी पाठ्यक्रम को निर्धारित करने मे प्रमुख स्थान है।

रामचन्द्र शुक्ल जी का जन्म बस्ती ज़िले के अगोना नामक गाँव में सन् 1884 ई. में हुआ था। सन् 1888 ई. में वे अपने पिता के साथ राठ हमीरपुर गये तथा वहीं पर विद्याध्ययन प्रारम्भ किया। सन् 1892 ई. में उनके पिता की नियुक्ति मिर्ज़ापुर में सदर क़ानूनगो के रूप में हो गई और वे पिता के साथ मिर्ज़ापुर आ गये।

मिर्ज़ापुर के तत्कालीन कलक्टर ने रामचन्द्र शुक्ल को एक कार्यालय में नौकरी भी दे दी थी, पर हैड क्लर्क से उनके स्वाभिमानी स्वभाव की पटी नहीं। उसे उन्होंने छोड़ दिया। फिर कुछ दिनों तक रामचन्द्र शुक्ल मिर्ज़ापुर के मिशन स्कूल में चित्रकला के अध्यापक रहे। सन् 1909 से 1910 ई. के लगभग वे 'हिन्दी शब्द सागर' के सम्पादन में वैतनिक सहायक के रूप में काशी आ गये, यहीं पर काशी नागरी प्रचारिणी सभा के विभिन्न कार्यों को करते हुए उनकी प्रतिभा चमकी। 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का सम्पादन भी उन्होंने कुछ दिनों तक किया था। कोश का कार्य समाप्त हो जाने के बाद शुक्ल जी की नियुक्ति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक के रूप में हो गई। वहाँ से एक महीने के लिए वे अलवर राज्य में भी नौकरी के लिये गए, पर रुचि का काम न होने से पुन: विश्वविद्यालय लौट आए। सन् 1937 ई. में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए एवं इस पद पर रहते हुए ही सन् 1941 ई. में उनकी श्वास के दौरे में हृदय गति बन्द हो जाने से मृत्यु हो गई।


आज आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी के 133वीं जयंती पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं।


~ आज की बुलेटिन कड़ियाँ ~














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

4 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी के 133वीं जयंती पर हम सब उन्हें नमन करते हैं।
तोते की मिर्च 'उलूक' उठा लाया और उसे बुलेटिन में आपने जगह दी उसके लिये आभार हर्षवर्धन ।

डा0 हेमंत कुमार ♠ Dr Hemant Kumar ने कहा…

आचार्य शुक्ल के नाम के बिना हिंदी साहित्य का कोई विद्यार्थी हिंदी साहित्य पढने के बारे में सोच भी नहीं सकता ----आचार्य जी को हार्दिक नमन...फुलबगिया को इस ब्लॉग बुलेटिन में स्थान देने के लिए आभार....डा० हेमन्त कुमार

Harsh Wardhan Jog ने कहा…

जिनेवा स्विटज़रलैंड पर फोटो ब्लॉग शामिल करने के लिए धन्यवाद

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत बढ़िया बुलेटिन प्रस्तुति !

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