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रविवार, 26 फ़रवरी 2017

मनमोहक मनमोहन - ब्लॉग बुलेटिन

रक्तदान से बड़ा कोनो दान नहीं होता है. ई दान अइसा दान है, जिससे कोनो अनजान आदमी को नया जिन्नगी मिलता है अऊर उसके साथ एगो नया खून का रिस्ता बन जाता है. इहो कहावत है कि खून पानी से जादा गाढा होता है, जिसका अपबाद आजकल देखाई देने लगा है. इहो बचपन से पढ़ाया गया है अऊर समय समय पर सबलोग दोहराता रहता है कि खून अइसा चीज है जिसका रंग अमीर-गरीब, ऊँच-नीच अऊर जाति-धरम से नहीं बदलता है.

खैर, आज हम ई पोस्ट के माध्यम से उस महान आदमी को याद कर रहे हैं, जो एक आदमी के सरीर से दोसरा जरूरतमंद आदमी के सरीर में खून चढ़ाने के बिधि का आबिस्कार किया था अऊर हमको इस बात का गर्व है कि ऊ आदमी हमारे भारतवर्स का था. साल था १९७७ अऊर उस महान बैज्ञानिक का नाम था मनमोहन कीकूभाई देसाई. 

उनका एगो सिनेमा था “अमर अकबर एंथनी” जिसमें ई तीनों लोग मिलकर एगो बूढ़ी अंधी औरत को अपना खून देते हैं. खून देने का तरीका भी मेडिकल इतिहास में पहिला बार... तीनों के सरीर से खून निकलकर नीचे से ऊपर बोतल में जमा होता है अऊर ओहीं से डायरेक्ट ऊ बूढ़ी औरत के देह में चढ़ा दिया जाता है. मनमोहन देसाई जी का ई आबिस्कार पर तीन ठो फिलिमफेयर पुरस्कार मिला.

बहुत पहिले मसहूर ऐक्टर-डायरेक्टर आई. एस. जौहर एगो बात कहे थे सिनेमा के बारे में. उनका कहना था कि भारत में दू तरह का सिनेमा बनता है, एगो ख़राब अऊर दोसरा बहुत ख़राब. अपना बारे में ऊ बताते थे कि ऊ दोसरका कैटेगरी का सिनेमा बनाते थे माने बहुत ख़राब. मनमोहन देसाई का सबसे बड़ा खासियत एही था कि ऊ दिमाग वाला आदमी के लिये सिनेमा बनइबे नहीं करते थे. उनके सिनेमा में आपको दिमाग, तर्क अऊर बास्तबिकता से दूर दूर तक कोनो पाला नहीं पड़ने वाला है. तनिको दिमाग आप लगाए, त माथा में हेडेक होने लगेगा.

मनमोहन देसाई गुजराती थे अऊर बिजनेस का दांव-पेंच जानते थे. एही से उनके सिनेमा में आम से भी आम जनता के लिये सब तरह का मसाला मिलता था. बचपन में जुल्मी के अत्याचार से बिखरा हुआ परिबार, अलग अलग धरम का मेल, हीरो-हिरोइन का रोमांस अऊर सबसे जरूरी अऊर महत्वपूर्ण हिस्सा था मधुर संगीत. कल्याणजी आनंदजी से लेकर पंचम दा, लक्ष्मी-प्यारे, चाहे अन्नू मलिक... गाना ऐसा कि जनता के जुबान पर चढ जाए.

एतना बड़ा अऊर सफल फिलिम बनाने वाला आदमी होने के बादो, ऊ मुम्बई के चाली में रहते थे. एही वजह से उनको साधारण जनता का नब्ज पहचानना आता था. अमिताभ बच्चन भी एक बार कहीं बोल रहे थे कि जब ऊ कहानी सुनाते थे उनका हँसी निकल जाता था, मगर मन (प्यार से लोग उनको मन कहते थे) भाई का कन्भिक्सन के आगे ऊ भी चुप रह जाते थे. अऊर नतीजा में सिनेमा सुपर हिट.

जेतना अबिस्वास से भरा हुआ उनका सिनेमा का घटना होता था, ओतने अबिस्वास वाला उनका मौत भी हुआ. लोग कहता है कि ऊ अपना घर का रेलिंग से टिककर बतिया रहे थे, रेलिंग टूट गया अऊर ऊ गिरकर खतम हो गए. कोनो कोनो लोग आत्महत्या भी कहता है. एकदम सिनेमा जैसा मौत पाने वाला ई सो-मैन का आज जन्मदिन है.

अगर सिनेमा को मनोरंजन के एंगिल से देखें, त सायद मनमोहन देसाई एगो सच्चा फिलिमकार थे. छलिया, ब्लफ़ मास्टर, सच्चा झूठा, रामपुर का लक्ष्मण, आ गले लग जा, धरमवीर, नसीब जैसा अनगिनत सिनेमा ई बात का सबूत है.



 हैप्पी बर्थ डे मन अंकल!

                             - सलिल वर्मा 

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5 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर अन्दाज। यानि धाँसू प्रस्तुति ।

Swati Vallabha Raj ने कहा…

सुन्दर सूत्र संकलन ..अभिनन्दन...

Anita ने कहा…

देर से आने के लिए खेद है, मनमोहन देसाई के बारे में अनोखे अंदाज में रोचक प्रस्तुति..आभार पठनीय सूत्रों से सजे बुलेटिन के इस अंग में मुझे भी शामिल करने के लिए..

शिवम् मिश्रा ने कहा…

भले ही तर्कों के आधार पर मनमोहन देसाई जी की फ़िल्म कसौटी पर खरी न उतरती हो पर सम्पूर्ण परिवार के मनोरंजन की कसौटी पर उनकी फिल्में हमेशा ही खरी उतरती थीं |

उनको मेरा नमन |

सलिल दादा को प्रणाम |

Smita Singh ने कहा…

आभार आपका

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