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बुधवार, 30 अप्रैल 2014

पुराना- कुछ नया सा




थोड़ी विकृति सबके भीतर होती है 
थोड़ा स्वार्थ सबके अंदर पलता है 
क्रोध, झूठ,घृणा,साजिश की भावना 
विद्युत सी 
सबके अंदर कौंधती है 
भूख,प्यार,महत्वाकांक्षा 
इन्हीं रास्तों से गुजरती है 
… 
बिना किसी रुकावट के प्राप्य सम्भव ही नहीं !
रक्तबीज हमारी धमनियों में है 
न हो तो ईश्वर करेगा क्या ?
ईश्वर का कार्य है 
अन्याय का विनाश 
 अपने भीतर जो अन्यायी ख्याल पनपते हैं 
उनसे हम नज़रें चुरा सकते हैं 
ईश्वर नहीं !!


9 टिप्पणियाँ:

आशीष भाई ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति बुलेटिन की , आ. रश्मि जी व बुलेटिन को धन्यवाद !
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vandana gupta ने कहा…

bahut badhiya links sanjoye hain

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

क्या बात है!! बहुत अच्छी प्रस्तुति!!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर चित्र और एक अच्छी कविता के आगाज के साथ एक सुंदर बुलेटिन ।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

जय हो दीदी जय हो ... बेहद शानदार बुलेटिन ... :)

आशा जोगळेकर ने कहा…

बढिया लिंक्स की सुंदर प्रस्तुति।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बढ़िया लिंक्स ...आभार साझा करने का

sadhana vaid ने कहा…

बहुत सुंदर सार्थक सूत्र ! बहुत बढ़िया बुलेटिन !

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

सारगर्भित लिंख, आभार......

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