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गुरुवार, 27 जून 2013

हर बार सेना के योगदान पर ही सवाल क्यों - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम !

कल शाम टीवी देखते देखते एक अजीब ही ख़बर देखने को मिली ... मन क्रोध से भर गया ... जहां एक तरफ
उत्तराखंड में राहत आौर बचाव के दौरान हेलीकॉप्टर क्रैश में अपने साथियों को खो देने के बाद भी सेना के जवान लोगों को बचाने में जी-जान से जुटे हैं। दूसरी तरफ राहत कार्य का श्रेय लेने के होड़ में नेता लोग आपस में लड़ने पर उतारू हो गए । उत्तराखंड में फंसे आंध्रप्रदेश के लोगों को सुरक्षित निकाले का श्रेय लेने के चक्कर में बुधवार को कांग्रेस और टीडीपी के नेता आपस में भिड़ गए। टीवी पर साफ साफ दिखाया गया कि कैसे कांग्रेस के नेता हनुमंत राव और टीडीपी के नेता रमेश राव के बीच देहरादून के जॉलीग्रांट एयरपोर्ट पर गाली-गलौज तथा हाथापाई हो गई। बाद मे अर्चना दीदी से चैट पर जब इसी मुद्दे पर बात हुई तो उन्होने बताया कि उन्होने तो टीवी पर जब यह देखा तो उसकी फोटो भी मोबाइल से ले ली !

उधर, सेना के जवान लोगों को बचाने में जी-जान से जुटे हैं। हालांकि मौसम अभी भी उनका साथ नहीं दे रहा है। चारों तरफ धुंध और रुक-रुक कर बारिश होने के कारण बुधवार की सुबह बचाव कार्य कुछ देर से शुरू हो सका। इसी बीच सैनिकों का हौसला बढ़ाने आज सुबह वायु सेनाध्यक्ष एनएके ब्राउन गोचर पहुंचे। उन्होंने कहा, अंतिम व्यक्ति को बचाने तक सेना का ऑपरेशन जारी रहेगा।


इन बेशर्म नेताओं को सेना के जवानों से सबक लेना चाहिए जहां एक तरफ सेना के बड़े से बड़े अधिकारी भी इस समय राहत कार्यों मे जी जान से जुटे है दूसरी ओर यह स्वार्थी नेता है जो आपदा के समय भी अपनी राजनीति चमकने मे जुटे है ! 

और तो और इतना सब होने के बाद भी गाहे बेगाहे यह सवाल भी उठते रहते है कि सेना आखिर करती ही क्या है ... यकीन जनिएगा जब जब किसी 'बुद्धिजीवी' को सेना की उपयोगिता पर सवाल उठाता देखता हूँ ... बड़ी शिद्दत से खुद के 'बुद्धिजीवी' न होने पर बड़े गर्व की अनुभूति करता हूँ by god की कसम !!

शर्म से डूब मारना चाहिए उन लोगो को जो हमारे जीवन मे सेना के योगदान को नज़रअंदाज़ करते है ... कौन सा ऐसा नेता या राजनीतिक दल है अपने देश मे जो सेना का स्थान ले सके इतने बड़े पैमाने के राहत कार्यों के दौरान !? एक भी नहीं ... जी हाँ ... एक भी नहीं ... फिर बार बार सेना के योगदान पर सवाल क्यों उठाए जाते है !? सेना के बिना हम कुछ भी नहीं है ... और यह एक ऐसा तथ्य है जिसे एक बार नहीं कई बार साबित किया जा चुका है !!

सादर आपका 

शिवम मिश्रा 

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आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज है......................

Randhir Singh Suman at लो क सं घ र्ष !
*आज जिनका जन्मदिन है * आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज है आपसे भी खुबसूरत आपके अंदाज है | याद है बारिशो के दिन थे वो पंचम और पहाड़ी के नीचे वादी में धुंध से झाककर निकलती हुई रेल की पटरिया गुजरती थी | धुंध में ऐसे लग रहे थे हम जैसे दो पौधे पास बैठे हो हम बहुत देर पटरियों बैठे हुए उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे जिसको आना था पिछली सब लेकिन उसकी आमद का वक्त ढलता रहा | हम बहुत देर पटरियों पर बैठे हुए ट्रेन का इन्तजार करते रहे ट्रेन आई उसका वक्त हुआ और हम यू ही दो कदम चलकर धुंध पर पाँव रखकर गुम हो गये | मैं अकेला हूँ अन्त में -------- | *मुसाफिर हूँ यारो ना घर है ठिकाना मुझे चलते जाना ह... more »

मुस्कुराने का कर्ज़

आज Zee tv पर एक सीरियल या कहें रियलिटी शो देख रही थी Connected HUM TUM ...ये वही शो है ,जो मुझे भी ऑफर हुई थी और मैंने मना कर दिया था {अब ये बताने से क्यूँ चूकें हम :)} खैर हमें अपने निर्णय पर अफ़सोस तो पहले भी नहीं था और अब ये शो देखकर तो जैसे एक सुकून की सांस ले ली ,यूँ कैमरे का हर वक़्त अपनी ज़िन्दगी में झाँक कर देखना मंजूर नहीं था मुझे . वैसे जैसा मुझे बार बार आश्वस्त करने की कोशिश की थी उन्होंने... सच में इस शो में कोई मिर्च मिसाले नहीं हैं बल्कि औरतों के मन में क्या चलता रहता है ,क्या सोचती हैं, उनकी ज़िन्दगी क्या है ,किसी सिचुएशन पर कैसे रिएक्ट करती हैं...यही सब है. साथ म... more »

ताऊ तेल का सारा स्टाक खत्म !

ताऊ रामपुरिया at ताऊ डाट इन
ताऊ कुछ सोच में बैठा हुआ था. अब क्या सोच रहा था यह तो खुद ताऊ जाने, भगवान इस लिये नही जान सकते कि उनको आजकल सोचने की फ़ुरसत ही नही है....अब भगवान भी कहां तक और किस किस की सोचें? इस समय ताऊ जरूर उतराखंड त्रासदी में अपना नफ़ा नुक्सान और वाहवाही के बारे में ही सोच रहा होगा....पर फ़िर भी ताऊ के दिमाग का कोई भरोसा नही...... अचानक रामप्यारे अपने दांत दिखाता हुआ ब्रांड न्य़ू मोटरसाईकिल पर प्रगट हुआ और बोला - ताऊ, आजकल फ़िर से ब्लागिंग को ठंड लग गई है. ट्विटर, फ़ेसबुक के साथ तुलनात्मक अध्ययन और शोध कार्य भी प्रारंभ हो चुका है. मुझे लगता है इससे भी ब्लागिंग की ठंड दूर होने वाली नही है.... more »

दिलरुबाई ही लगे

शारदा अरोरा at गीत-ग़ज़ल
* हम वहाँ हैं जहाँ ,* *अपनी खबर भी पराई ही लगे * * **चिकने घड़े सा कर दिया * *ज़िन्दगी ये भी रुसवाई ही लगे * * **न जाते इधर तो किधर जाते * *हर शय शौदाई ही लगे * * **आईना किस को दिखाऊँ * *अपनी फितरत भी हरजाई ही लगे * * **यही बदा है , यही सही * *रात के पैर में बिवाई ही लगे * * **तेरा मुँह देख के जीते हैं * *आग अपनी लगाई ही लगे * * **इश्क में दर-बदर हर कोई * *दाँव पर सारी खुदाई ही लगे * * **शोला हो , शबनम हो * *ऐ वक्त , दिलरुबाई ही लगे * * *

घर पर छापिये अपनी ई-बुक booklet printing से और कागज बचार्इये

Abhimanyu Bhardwaj at MY BIG GUIDE
अगर आप ई-बुक पढने के शौकीन हैं, और अक्‍सरकर आप अपने प्रिन्‍टर से ई-बुक का प्रिन्‍ट आउट निकाल कर पढते भी हैं, लेकिन वह एक किताब या पुस्‍तक की तरह नहीं लगता है। वह सीधे सीधे ए4 पेज पर एक साइड खाली वाला प्रिन्‍ट निकलता है। जिससे काफी पेज भी खर्च होते हैं, और किताब वाला मजा भी नहीं आता है। मैं आज आपको एक ऐसा बडे काम का आसान तरीका बताने जा रहा हॅू जिससे आप घर पर ही अपनी किताब छाप सकते हैं, और पेज भी बचा सकते हैं। इस तरीके से आप किसी भी 40 पेज की ई-बुक को केवल 10 पेज में ही प्रिन्‍ट निकाल सकते हैं, जिससे पेज की भी बचत होगी और पढने और देखने में किताब वाला मजा भी मिलेगा। *यह तरीका उनके लि... more »

पेड़ तूने काटे नाम कहर पहाड़ का रख दिया

Neelima at Rhythm
तू क्या हैं /?? क्या होना चाहता था अभी ! इंसान के बोलने से पहले इश्वर खेल खेल गया ~~ कैसे तेल का दिया जलाऊ अपने आँगन में उनके घर का तो चिराग ही बुझ गया ~~ अभी तक सिर्फ पठारों में जीते थे हम अब तो सीने पर ही पत्थर रख दिया ~~ रोती हुए आवाज़े सिसकियो मैं बदल रही हैं लोग कहते हैं उसने अब सब्र कर लिया ~~ कोई देखे तो आकर उसके सूखे आंसुओ को जिसने पति बेटे के साथ पोते को भी खो दिया ~~ मातम पुरसी को जमा हैं बहुतेरे लोग बरसात का मौसम बीज बेबसी के बो गया ~~ दूर बैठ कर देखना त्रासदी को बहुत आसान हैं महसूस करना उस प्रलय को आंदोलित कर गया ~~ मेरे घर में बचे हैं बस अब... more »

लिखने का माध्यम और सरोकार !

संतोष त्रिवेदी at बैसवारी baiswari
कई बार यह बहस उठती है कि अभिव्यक्ति के लिए कौन-सा माध्यम उचित है या सबसे उत्तम है,पर मेरी समझ से मूल प्रश्न यह होना ही नहीं चाहिए। हर माध्यम की अपनी सम्प्रेषणता होती है और पहुँच भी। बदलते समय और नई तकनीक के साथ इसमें भी उत्तरोत्तर बदलाव हो रहा है। यह सहज और स्वाभाविक प्रकिया है। इससे,पहले वाले या परम्परागत माध्यमों की उपयोगिता या प्रासंगिकता खत्म नहीं हो जाती। यह व्यक्तिगत रूप से इसका उपयोग करने वाले पर निर्भर है कि उसे किस माध्यम में सहजता और सहूलियत होती है। माध्यमों के बदलने से लिखने वाले के सरोकार नहीं बदल जाते। इसलिए लेखक के सरोकार हर माध्यम से जुड़े होते हैं। इसलिए लेखक के... more »

एक बार फिर वो -- जो अब फेसबुकिया बन गए हैं।

डॉ टी एस दराल at अंतर्मंथन
अभी ब्लॉग पर अरविन्द मिश्र जी का लेख पढ़कर फिर वही मुद्दा मन में मचलने लगा कि क्यों ब्लॉगर्स ब्लॉगिंग छोड़कर फेसबुक आदि की ओर जा रहे हैं। लेकिन यह चर्चा यहीं जारी रहे। हमें तो कुछ दिन से फेसबुक पर सक्रियता से जो देखने को मिला , वह प्रस्तुत है इस हास्य व्यंग रचना के माध्यम से जिसमे हास्य कम, व्यंग ज्यादा नज़र आएगा लेकिन हालात पर खरा उतरेगा। १) वो सुबह सवेरे , मूंह अँधेरे उठती है , चाय नाश्ता बनाकर बच्चों को नहला धुलाकर, टिफिन लगाती है, बच्चों के साथ बच्चों के पिता का। फिर बिठा आती है, बच्चों को स्कूल बस में , अच्छे नागरिक बनाने की चाह में। फिर करती है पति को बाय बाय और बैठ जाती है ख... more »

सुकून मिलता है ....अतीत में !!!

Ashok Saluja at यादें...
*मैं देखता हूँ ,अपने अतीत में* *तूने डेरा अपना जमा रखा है * *दिल के हर टूटे हुए टुकड़े में * *तूने चेहरा अपना छुपा रखा है* *---अशोक "अकेला "* *सुकून मिलता है ....अतीत में !!!* ज्यों काफ़िर मुहँ से लगी छूटती नही ये यादों की लड़ी कभी भी टूटती नही कुछ अरसे के लिए हो जाता हूँ ,बेखबर फिर भी ये कभी मुझसे यूँ रूठती नही करने लगता हूँ याद बीती हुई यादें तभी जब कभी मुझे कोई ख़ुशी सूझती नही इन में समाई हैं मेरे सुख-दुःख की हवाएं जिन्हें आज की ज़हरीली हवा लूटती नही बिखर जाती है मेरी सोच अनेक यादों में वहाँ कोई भी आँख, शक से घूरती नही पलट के देखने दो मुझे यादों की तरफ चारों तरफ अब मेरी... more »

स्वराज या गुंडाराज – मर्ज़ी है आपकी क्योंकि देश है आपका

तुषार राज रस्तोगी at तमाशा-ए-जिंदगी
अपनी बात को मैं इन दो पंक्तियों के माध्यम से आरम्भ कर रहा हूँ *कुछ ज़बानों पर हैं ताले, कुछ तलवों में हैं छाले* *पर कहते हैं कहने वाले, के स्वराज चल रहा है * *किस हाल से हमारा यह समाज गुज़र रहा है ? * *'सब चलता है' के नारे पर स्वराज जल रहा है* स्वराज की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि आज भारत की पीड़ित और त्रस्त आम जनता देश में बदलाव की आस लगाये मुंह ताकती बैठी है | हिंसा, गरीबी, भुखमरी, शोषण, महंगाई, बेरोज़गारी, उंच नीच, नक्सलवाद, आर्थिक विषमता और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं की आग में जनता फतिंगों की तरह भुन रही है और हमारे लोकशाही पहलवान उन्हें दिन-बा-दिन और ज्यादा गर्म करते जा रहे हैं |... more »

कार्टून :- उत्‍तराखंड में भॉंडनृत्‍य

मृतकों की बेकद्री

*दस जून से देहरादून, कोटद्वार होते हुए सतपुली एकेश्‍वर पौड़ी गढ़वाल अपने गांव गया हुआ था। इस बीच 16 17 18 जून को जो हुआ उस पर और गढ़वाल के हालातों पर शायद मेरे पास फुर्सत में लिखने के लिए अभी कुछ नहीं है। अभी हतप्रभता हावी है। तब तक अपने मन का हाल नीचे के शब्दों के अनुसार प्रस्‍तुत है**: ** * वस्‍तु विनिमय के माध्‍यम मुद्रा यानी रुपए को जब साधन के बजाय साध्‍य मान लिया गया हो, जीवन की क्षुद्र सच्‍चाइयों व पीड़ांतक अनुभवों से नहीं गुजरे सत्‍ताधारकों को सुख-सुविधाओं वाले अपने सिद्धांत सब से उचित लगते हों तो ऐसी जीवन परिस्थितियों में केदारनाथ मन्दिर के प्राकृतिक ध्‍वस्‍तीकरण को संवेदनशील ... more »

जब अपना कोई रूठ गया...

परमजीत सिहँ बाली at ******दिशाएं******
बरसा बादल जग डूब गया, जब अपना कोई रूठ गया। निरव खग का सब कोलाहल, क्या पवन वेग से दोड़ेगी। क्या नदिया सरपट उछल उछल पर्वत की छाती फोड़ेगी। ये कैसा मन बोध मुझे मेरे सपनों को लूट गया। बरसा बादल जग डूब गया जब अपना कोई रूठ गया। प्रियतम का विरह ऐसा ही क्या होता सब के जीवन में , अमृत भी विष-सा लगता है तृष्णा में वारी पीवन में । क्रंदन करती हर दिशा लगे काला बादल ज्यों फूट गया। बरसा बादल जग डूब गया जब अपना कोई रूठ गया।

माँ - एक एहसास ...

noreply@blogger.com (दिगम्बर नासवा) at स्वप्न मेरे...........
उदासी जब कभी बाहों में मुझको घेरती है तू बन के राग खुशियों के सुरों को छेड़ती है तेरे एहसास को महसूस करता हूं हमेशा हवा बालों में मेरे उंगलियां जब फेरती है चहल कदमी सी होती है यकायक नींद में फिर निकल के तू मुझे तस्वीर से जब देखती है तू यादों में चली आती है जब बूढी पड़ोसन कभी सर्दी में फिर काढा बना के भेजती है “खड़ी है धूप छत पे कब तलक सोता रहेगा” ये बातें बोल के अब धूप मुझसे खेलती है तेरे हाथों की खुशबू की महक आती है अम्मा बड़ी बेटी जो फिर मक्की की रोटी बेलती है नहीं देखा खुदा को पर तुझे देखा है मैंने मेरी हर सांस इन क़दमों पे माथा टेकती है ... more »

फील्ड मार्शल सैम 'बहादुर' मानेकशॉ की ५ वीं पुण्यतिथि पर विशेष

शिवम् मिश्रा at बुरा भला
फील्ड मार्शल सैम 'बहादुर' मानेकशॉ *सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ* (३ अप्रैल १९१४ - २७ जून २००८) भारतीय सेना के अध्यक्ष थे जिनके नेतृत्व में भारत ने सन् 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय प्राप्त किया था जिसके परिणामस्वरूप बंगलादेश का जन्म हुआ था। *जीवनी* मानेकशा का जन्म ३ अप्रैल 1914 को अमृतसर में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका परिवार गुजरात के शहर वलसाड से पंजाब आ गया था। मानेकशा ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में पाई, बाद में वे नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए। वे देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी के पहले बैच के लिए चुने गए ४० छात्रों में से एक थे। वहां से... more »
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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

जय हिन्द की सेना !!!

18 टिप्पणियाँ:

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

सेना की निष्ठा पर सवाल उठाना गैर वाजिब और घटिया राजनीति है।

Vikesh Badola ने कहा…

सेना के दम पर तो नेता उछलकूद करते हैं।

Sanjay Tripathi ने कहा…

उत्तराखंड में बचावकार्य के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हेलीकाप्टर बैरकपुर एयरबेस का था.मेरी श्रीमतीजी वहाँ पढाने जाती हैं.उन्होने बताया कि कल पूरे एयरफोर्स स्टेशन पर गम का माहौल था.उत्तराखंड में सात - आठ हजार लोग लापता हैं.जिनके स्वजन काल के गाल में समा गए हैं या लापता हैं उनके दिलों पर क्या बीत रही है वही जानते हैं.हमारे नेताओं को जो वन अपमैनशिप में लगे हुए हैं खुद पर शर्म करनी चाहिए.

गौतम राजरिशी ने कहा…

हमारे हौसलों को ठीक से जब जान लेते हैं
अलग ही रास्ते फिर आँधी औ' तूफ़ान लेते हैं
-गौतम राजरिशी

shikha varshney ने कहा…

वो ह्रदय नहीं है पत्थर है , जिसमें सेना के लिए सम्मान नहीं.

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन |

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

कार्टून की भी बारी आई. धन्‍यवाद. :-)

अजय कुमार झा ने कहा…

युद्ध काल से शांति काल में आई ऐसी आपदा विपदा के समय या किसी भी अन्य कार्य/मिशन में यदि किसी के कंधों पर जिम्मेदारी देकर निश्चिंत हुआ जा सकता है तो वो सेना ही है । शेष तो मेजर गौतम ने कह ही दिया और क्या खूब कह दिया है । इसलिए सेना पर उंगली उठाना उनका नहीं अपना अपमान करना है ।

सभी पोस्ट झलकियां अच्छी हैं । सारगर्भित बुलेटिन शिवम भाई ।

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

सेना पर सवाल उठाने वालों के पीछे उनके निहित स्वार्थ है वर्ना देश सदैव अपनी सेना पर गर्व और भरोसा करता है ! और देश में सेना ही एक अकेला ऐसा संस्थान है जिसके प्रति देश के दिल में सम्मान है !!

Abhimanyu Bhardwaj ने कहा…

अगर हमारे देश की सेना न होती हो इस विपदा से निबटना बहुत ही मुश्किल होगा, अपनी जान की परवाह न करते हुए भी सेना के जवान दिन रात दूसरों की जान बचाने में लगे हुए हैं, उन्‍हें शत शत नमन।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत बेहतरीन लिंक्स मिले, आभार.

रामराम.

HARSHVARDHAN ने कहा…

सुन्दर और रोचक बुलेटिन।

मोबाइल के लिए एक बेहतरीन वेबसाइट!!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

चर्चा में मेहनत भी दिख रही है और बढ़िया लिनक्स भी। आभार।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

इन नेताओं को शर्म न आई है न आने वाली है ...
आज की चर्चा लाजवाब ... विस्तृत ... शुक्रिया मुझे भी शामिल करने का ...

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आप सब का बहुत बहुत आभार !

Ashok Saluja ने कहा…

शिवम् जी ,सुंदर और पढने लायक लिंक्स संजोय है आपने ....
आभार!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सबको अपने कार्य में लग जाना चाहिये..सुन्दर सूत्र..

Neelima ने कहा…

बेहतरीन लिंक्स

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