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सोमवार, 30 जनवरी 2012

भावों की अभिव्यक्ति कविता कहलाती है .... - ब्लॉग बुलेटिन

जैसा कि आप सब से हमारा वादा है ... हम आप के लिए कुछ न कुछ नया लाते रहेंगे ... उसी वादे को निभाते हुए हम एक नयी श्रृंखला शुरू कर रहे है जिस के अंतर्गत हर बार किसी एक ब्लॉग के बारे में आपको बताया जायेगा ... जिसे हम कहते है ... एकल ब्लॉग चर्चा ... उस ब्लॉग की शुरुआत से ले कर अब तक की पोस्टो के आधार पर आपसे उस ब्लॉग और उस ब्लॉगर का परिचय हम अपने ही अंदाज़ में करवाएँगे !
आशा है आपको यह प्रयास पसंद आएगा !

आज मिलिए ... रचना जी से ...


 

भावों की अभिव्यक्ति कविता कहलाती है .... यह कहना है रचना जी का . ब्लॉग तो यूँ कई हैं , पर मैंने भावों की गगरी उठाई है , जिसमें सृष्टि में बसी सारी खुशबू है - http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/ मुझे इस ब्लॉग से दूर रहने का दुःख है , क्योंकि मैं ब्लौगों की परिक्रमा करती हूँ , दिल से जीए एहसासों के हर कतरे संजोती हूँ और एहसासों के शानदार रंगमंच पर आपके आगे रख देती हूँ .
10 जनवरी 2006 से रचना जी ने पश्मीने की तरह अपने ख्यालों को बुना है . एक बुनकर ही जानता है कि बुनने की कला . कविता हो या कहानी , गीत या ग़ज़ल .... जीकर ही तराशे जा सकते हैं और यह ब्लॉग तराशा हुआ है . इसे पढ़ते हुए मैंने जाना और माना कि आग के अन्दर समंदर है , - डुबकी लगाओ , जलोगे नहीं , बल्कि मोती पाओगे .
याद है आपको मुगलेआज़म ? संगतराश ने जीवंत मूर्ति रख दी थी अकबर के आगे .... उसी संगतराश की याद आई है , जिसकी मूर्ति में प्राण थे !
http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/2006/10/woh-cheekh-cheekh-kar-khati-hae-mae.html इसमें उस नारी का रूप मिलता है , जो सबकुछ जानती है , अपमान का गरल आत्मसात करती है , पर अपने वजूद को भी बताती है . स्वयं के चक्रव्यूह से निकलने का अदम्य प्रयास !
ज़िन्दगी की आड़ी तिरछी राहें , वक्र रेखाओं में उलझे सरल ख्वाब यही कहते हैं -
" काश ज़िन्दगी भी एक स्लेट होती
जब चाह्ती लिखा हुआ पोछ्ती
और नया लिख लेती
चलो ज़िन्दगी ना सही
मन ही स्लेट होता
पोछ सकती , मिटा सकती
उन जज्बातो को
जो पुराने हो गये हें
पर ज़िन्दगी की चाक तो
भगवान के पास है
और मन पर पड़ी लकीरें हों
या सेलेट पर पड़ी खुंरसटे हों
धोने या पोछने से
नहीं हट्ती नहीं मिटती
पूरानी पड़ गयी स्लेट को
बदलना पड़ता है
विवश मन को
भुलाना होता है "... यही सार क्यूँ रह जाता है जीवन में ? तकदीरें बदलती हैं या नहीं , नहीं जानती - पर तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर को बदलने के क्रम में यही ख्याल रह जाते हैं पन्नों पर -

" कुछ साल ही सही
तुम्हारा साथ था
अब फिर वही दूरियां होगी
वही वक्त की कमी
वही परिवार के ज़िम्मेदारी
और मेरी ज़िन्दगी
एक बार फिर रुख़ बदलेगी
शायद ये ही आखरी मोड़ हो
विलीन होने से पहले "
.... ज़िन्दगी के हर पड़ाव को हर कोई जीना चाहता है , हथेलियों में बटोरना चाहता है एक घर , एक मीठी मुस्कान , एक मान - सम्मान , लेकिन .... आह ! यही कथा शेष रह जाती है ,
" रिश्तो की जमा पूंजी से
जिन्दगी का खाता तो
हमेशा ही खाली था
पर
सुना था कि
प्यार रिश्तो का
मुहताज नही होता
फिर क्यों मै
प्यार के सहारे
जिन्दगी की वैतरणी को
पार नहीं कर पायी "... यह सवाल ही पन्ने ढूंढता है . और भ्रम के पर्दों में ख़ुशी ढूंढता है ... कुछ इस तरह - " रुकी हुई घड़ी को चलाने के लिये
हम डाल देते है घड़ी में बैटरी
और खुश होते है कि
हमने समय को चला दिया..."
आँखों पर चश्मा चढ़ा लेने से , किस्म किस्म के मुखौटों में छुप जाने से जीवन का सच कहाँ बदलता है .... बगावत करके भी सलीम को अनारकली नहीं ही मिली . उसने भी सोचा होगा , तुमने भी सोचा होगा , कवयित्री की कलम भी यही कहती है =
" कभी कभी ज़िन्दगी में
ऐसा समय आता है
हर प्रश्न बेमानी हो जाता है
ज़िन्दगी खुद बन जाती है
एक प्रश्न बेमानी सा " ... कटु सत्य !
सत्य है इस भाव में भी - http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/2011/12/blog-post.html

2012 की दहलीज भी एक मन के साथ है ....

तुम्हारे बिना मेरी जिन्दगी
ना पूरी हैं ना अधूरी हैं
क्या कहीं क़ोई कमी हैं
नहीं , आखों में बस
एक नमी हैं...................... किसी को जानने समझने के लिए , उसके एहसासों के कमरे में एक पूरा दिन बिताइए . एक कमरा और है - http://rachnapoemsjustlikethat.blogspot.com/

मैंने ज़िन्दगी को हमेशा करीब से देखना चाहा - कभी डूबते उतराते पार निकल गई, कभी चोट लगी , कभी जली भी , पर बिना गहरे उतरे समंदर की अमीरी कहाँ दिखती है . !

रश्मि प्रभा 

38 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

आग के अन्दर समंदर है , - डुबकी लगाओ , जलोगे नहीं , बल्कि मोती पाओगे .
सच एक अलग ही रचना जी नज़र आयीं …………पर बिना गहरे उतरे समंदर की अमीरी कहाँ दिखती है .………यथार्थ यही है …………एक अलग व्यक्तित्व जो अपनी अलग पहचान बनाता है …………रचना जी के इस रूप से मिलवाने के लिये हार्दिक आभार्।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

ईमानदारी से कहूँ तो रचना जी को कभी पढ़ा नहीं, कभी मिला नहीं, दो एक बार बातें ज़रूर हुईं.. उनसे मेरा परिचय कई ब्लॉग पर उनके कमेन्ट के मार्फ़त है.. और ये इनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि इनको न पढते हुए भी मैं इनका बहुत बड़ा प्रशंसक रहा.. और आज भी हूँ!! इनके व्यक्तित्व, इनकी पृष्ठभूमि, इनकी अभिव्यक्ति, इनका विभिन्न विषयों पर ज्ञान और सबसे ऊपर इनका दृढता से अपनी बात कहने का अंदाज़!! जहां तमाम लोग डिप्लोमैटिक बातें कहकर निकल लेते हैं, वहाँ इन्होने आँखों में आँखें डालकर कहना सीखा है!! बहुत सीनियर हैं, इसलिए आदरणीय हैं!! अच्छा चुनाव इस एकल ब्लॉग के लिए!!

सदा ने कहा…

ज़िन्दगी की आड़ी तिरछी राहें , वक्र रेखाओं में उलझे सरल ख्वाब यही कहते हैं -
" काश ज़िन्दगी भी एक स्लेट होती
जब चाह्ती लिखा हुआ पोछ्ती
और नया लिख लेती
लेकिन जिनके लिए आपकी कलम लिखती है वो यहां ब्‍लॉग बुलेटिन पर सबके बीच अपनी खूबियों के साथ मिलते हैं रचना जी की तरह .. आभार आपका रचना जी को बधाई सहित शुभकामनाएं ।

vidya ने कहा…

शुक्रिया रश्मि दी...
रचना जी से परिचय करवाने के लिए आपका आभार..
बहुत अच्छा लगा उनकी रचनाएँ पढ़ कर.
शुभकामनाएँ.

रचना ने कहा…

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

in fact , rachna ji ke is kavi man ko hi maine jaana hai aur mujhe bahut khushi bhi hai is baat kee , unki kavitaaye man ko sirf chooti hi nahi , balki basti bhi jaati hai .

aapka aabhar is post ke liye aur is blog ke liye bhi .

गौतम राजरिशी ने कहा…

रचना दी तो अपनी ऑल टाइम फेवरिट हैं....

Sonal Rastogi ने कहा…

रचना जी को बराबर पढ़ती आ रही हूँ ..हाँ कवितायें पहलीबार पढ़ी आपको धन्यवाद

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रचना जी की कवितायेँ कई बार पढ़ीं हैं और समंदर से मोती ढूँढने का प्रयास भी किया है .. उनकी कविताओं में जीवन की गहन अभिव्यक्ति दिखाती है .. आभार

वाणी गीत ने कहा…

अपने उद्देश्य से जरा ना डगमगाने वाली रचनाजी की रचनाएँ मुझे हमेशा ही प्रिय है!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

कमाल है ... ऐसा तो अक्सर देखा या सुना है कि रचना जी के बारे में लोग कुछ कहने से बचते रहे है ... पर यहाँ तो वो खुद अपने बारे में कुछ कहने से बच रही है ... ;-)

खैर यह तो रही मजाक की बात ... रश्मि दीदी आपका बहुत बहुत आभार जो आपने रचना जी के इस रूप से हम सब का परिचय करवाया !

एक शेर याद आ रहा है ...

" हर आदमी में होते है दस - बीस आदमी ;
जिसे देखना कई बार देखना !! "

मनोज कुमार ने कहा…

रचना जी को हमेशा नारी समस्या उठाते हुए तेज़ तेवर महिला के रूप में ख्याति मिली। मैं भी बहुत दिन तक उनसे बात करने से भी कतराता था, पता नहीं किस बात पर लड़ पड़ें।

जब उनकी कविताएं पढ़ी तो उनके कवि हृदय का अहसास हुआ। कोमल भावनाओं से परिचय हुआ। उनका यह व्यक्तित्व ब्लॉग जगत में छुपा ही है। जिस तरह से एक दम ताज़ा बिम्बों को उठा लाती हैं वह ब्लॉग जगत के बहुत कम ही कविओं में पाया जाता है।

आपने एक बेहतरीन शख्शियत के बेहद खूबसूरत पक्ष को उजागर किया है। आभार इस प्रस्तुति के लिए।

dheerendra ने कहा…

कमेंट्स के माध्यम से एक दुसरे के पोस्ट पर आना जाना है,रचना जी की लेखनी का तो क्या कहने,उनकी रचनाये मुझे हमेशा अच्छी लगी,..
रश्मी जी,..आपने रचना जी का एकल ब्लॉग चुनाव करके पूरी तरह से न्याय किया है,और वे इसकी हकदार भी है,...सुंदर प्रस्तुति के लिए आभार,...

welcome to new post ...काव्यान्जलि....

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

" काश ज़िन्दगी भी एक स्लेट होती
जब चाह्ती लिखा हुआ पोछ्ती
और नया लिख लेती
..... kashh!!
ham jo sochte samajhte .. bina likhe hi log usko dekh pate, anubhav kar pate..:)
Rachna jee ke liye itna sab padh kar khushi hui...
abhar!

अनुपमा पाठक ने कहा…

एहसासों के इस कमरे तक की यात्रा के लिए आपकी कलम ने खूब प्रेरित किया है!
सुन्दर परिचय!

अरूण साथी ने कहा…

सुन्दर ब्लॉग का सम्मान करने के लिए हार्दीक धन्यवाद। इसी सकारात्मक भाव से आगे बढ़ते रहें है...शुभकामनाऐं...

shikha varshney ने कहा…

रचना जी की कविताएँ पहली बार पढ़ीं.एहसासों को बेहतरीन ढंग से कलम बढ किया है.आभार आपका.

shikha varshney ने कहा…

रचना जी की कविताओं से रूबरू कराने का बेहद शुक्रिया.उनके तेज तर्रार लेख ही पढ़े थे.एहसासों से लवरेज कवितायेँ पहली बार पढ़ीं.

सुज्ञ ने कहा…

रचना जी की कविताएं भी बहुत ही सुन्दर है। उनकी प्रखर प्रतिक्रियाओं से तो वाकिफ है, पर आपकी इस प्रस्तुति से कईं नए आयाम भी जानने को मिले!!
रश्मि जी इस ब्लॉग-बुले्टीन प्रस्तुति का आभार!!

Archana ने कहा…

पढ़ा है कई जगह और कई बार, ये ब्लॉग भी ..पर नियमित कभी नही...अच्छा लगा आज फ़िर मिलना रचना जी से ..

Maheshwari kaneri ने कहा…

रचना जी से मिलकर अच्छा लगा...

रचना ने कहा…

खोज लो मेरे शब्दों मे अपने को


जीवन के इस नाट्य मंच
असंख्य किरदार में बटा हैं जीवन
कहता हैं क़ोई तुम ये हो
कहता हैं क़ोई तुम वो हो
यहाँ तक भी कहने वाले कहते हैं
जैसी दिखती हो वैसी तो नहीं हो
क्यूँ समझने की चाहत रखता हैं
हर क़ोई दूसरो को
शब्दों में दूसरो को
अपने को अगर खोज लो
दूसरो को जीवन कुछ
आसाँ हो जाये
रखिये अभी कहीं से क़ोई आयेगा
और एक टिपण्णी फिर दे जाएगा
यहाँ सब अपने ही तो हैं
अपनों से कैसा दुराव छिपाव
ख़ैर
अगर खोज सको मेरे शब्दों मे अपने को
तो शब्द मेरे सार्थक हैं
कविता कभी मैने लिखी नहीं
लिखनी आती भी नहीं
बस शब्द हैं और उन शब्दों मे
मै नहीं आप हैं

http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/2012/01/blog-post_30.html

Shah Nawaz ने कहा…

रचना जी के बारे में इतना कुछ जानकार अच्छा लगा... बहुत-बहुत धन्यवाद रश्मि जी.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पहली बार कितना कुछ जाना..

NISHA MAHARANA ने कहा…

कभी कभी ज़िन्दगी में
ऐसा समय आता है
हर प्रश्न बेमानी हो जाता है .bilkul shi.

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

मन पर पड़ी लकीरें हों
या सेलेट पर पड़ी खुंरसटे हों
धोने या पोछने से
नहीं हट्ती नहीं मिटती
पूरानी पड़ गयी स्लेट को
बदलना पड़ता है
विवश मन को
भुलाना होता है "...
बहुत गहरी सोचवाली कवियत्री से मिलना , आपके प्रस्तुति के बदौलत समभ्व हो सका.... ! अभी जानना तो , बहुत कुछ बाकि है.... !!

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत खूब । रचना जी की जीवटता को सलाम । बहुत बार उनसे वैचारिक मतभेद रहा है , और खूब विचार विमर्श और बहस भी । एक कमाल की ब्लॉगर और अपने मुद्दे को पकड कर उस पर दृढ रहने वाली मित्र हैं वे । ब्लॉगिंग में और जीवन में भी उन्हें असीम शुभकामनाएं

mukti ने कहा…

रचना जी ब्लॉगजगत में औरतों के विरुद्ध अपमानजनक बातों का विरोध करने के लिए जानी जाती हैं, लेकिन उनका एक भावुक रूप भी है, जो उनकी कविताओं में दीखता है. मैं उनकी कविताओं को अक्सर पढ़ती रही हूँ. उनके बारे में इतना सब यहाँ साझा करने के लिए धन्यवाद !

Sadhana Vaid ने कहा…

बेहतरीन परिचय एवं बेमिसाल रचनाएं ! रचना जी के धारदार व्यक्तित्व से ब्लॉगजगत में कौन परिचित नहीं है ! बहुत अच्छा लगा उनकी संवेदनशील रचनाओं को पढ़ कर ! आभार आपका !

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

शब्दों में दूसरो को
अपने को अगर खोज लो
दूसरो को जीवन कुछ
आसाँ हो जाये.
@ ... इसे कुछ यूँ होना चाहिए.
"शब्दों में दूसरो के
अपने को अगर खोज लो
दूसरो का जीवन कुछ
आसाँ हो जाये"
________________
स्थूल मूल्यांकन :
रचना की भाषा
रचना के विचार
रचना की प्रतिक्रिया
रचना की तकरार .... कभी अपना संतुलन नहीं खोते.
मुझे लगता है संतुलन वही खोते हैं
जिनके ओर-छोर पर वजनदार
'आदरणीय' और 'जी' बैठे होते हैं.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

rachna, jisane khud ko siddh kiya hai. main use janati hoon agar vah sachchai par adi hai to phir use koi diga nahin sakata hai. apane aapko sthapit karne ka naam hai rachna. bahut sashakt lekhani kee malik hai, jo ek disha deta hai aur sambal bhi.

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत अच्छा लगा रचना जी के बारे में यह पोस्ट देखकर!

राजीव तनेजा ने कहा…

अपनी ब्लोगिंग के शुरुआती दिनों(2007)में रचना जी की कुछ कविताएँ पढ़ने का मौका मिला था...फिर ना जाने उनका कविताओं वाला ब्लॉग नज़रों से कैसे ओझल हो गया और तीखे एवं धारदार विचारों की बदौलत उनका 'नारी' ब्लॉग दिल औ दिमाग पर छा गया| आज पुन: इस ब्लॉग के माध्यम से उनके कविता पक्ष से रूबरू होने का मौक़ा मिला तो पुरानी यादें ताज़ा हो गयी|

कुमार राधारमण ने कहा…

सात-आठ शब्दों वाली उनकी कविता को पढ़कर अक्सर लगता था कि यह कोई कविता नहीं है। बस,कविता में भी हाथ आजमाने की कोशिश भर है। मगर उनकी अपेक्षाकृत लम्बी कविताएं उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक समझ को बयां करती हैं।
रचना जी को समझने के लिए,मैं उनकी विविध विषयक पोस्टों अथवा विभिन्न पोस्टों पर उनकी टिप्पणियों की बजाए,मैं उनकी कविताएं पढ़ना चाहूंगा जहां न तो मौसम पर बेकार के शब्दजाल से लोगों को भुलावा देने की कोशिश है,न ही पुरुष समाज के प्रति कोई भड़ास। ये कविताएं वास्तविक दुनिया से हमारा परिचय कराती हैं और आत्ममंथन के लिए प्रेरित नहीं,विवश करती है। प्रतीकों और बिम्बों का मकड़जाल भी यहां नहीं है जिनके लिए शब्दकोष का सहारा लेना पड़े। ये सीधे-सीधे हमारे जीवन के सरोकार से जुड़ी कविताएं हैं जिनकी उपेक्षा वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा है।

राजन ने कहा…

मुझे भी रचना जी के कविताएँ लिखने की बात काफी बाद में पता चली थी इससे पहले मैं भी उनके महिला संबंधी लेखन से ही परीचित था.पहली बार उनकी कविताएँ पढकर आश्चर्य भी हुआ कि उनकी तेज तर्रार लेखनी ऐसी कोमल भावनाओं को भी खूबसूरती से व्यक्त कर सकती हैं.

प्रतुल जी ने 'आदरणीय' और 'जी' वाली बात बिल्कुल सही कही हैं.

rashmi ravija ने कहा…

रचना जी की कविताएँ...आलेख..टिप्पणियाँ पढ़ती आई हूँ...
लेखन के हर विधा पर उनकी अच्छी पकड़ है

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

सुंदर चर्चा।

mamta ने कहा…

रचना को हम ब्लॉगिंग के शुरूआती जमाने से पढ़ते आ रहे है। रचना के लेखन वो चाहे कविता हो या लेख सभी मे उनके व्यक्तित्व की झलक मिलती है । ऐसा इस लिए कह रहे है क्यूंकि हम उनसे मिल चुके है।

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