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बुधवार, 18 जनवरी 2012

अंजुरि में कुछ कतरों को सहेज़ा है …………ब्लॉग बुलेटिन


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प्रस्तुतकर्ता image अनुपमा पाठक at 18 जनवरी 2012
जोड़ते हैं... जुड़ता भी है...
फिर टूट जाता है,
हमारा विश्वास हमसे
बारबार रूठ जाता है,
कोई एक किरकिरी आकर
सारा दृश्य बिगाड़ देती है
विद्रूपताओं का श्रोत किसी भी क्षण
बरबस फूट आता है!



रितु बंसल जी द्वारा
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Tuesday, 17 January 2012


शब्द बोलते हैं..
कोरे कागज़ पे आज ,सिमटी जैसे रात ;
के शब्द बोलते हैं ...
गहरे हैं जज़्बात ,जो लिखदी ऐसी बात ;
के शब्द बोलते हैं ...
कुछ उत्तर कुछ प्रतुत्तर ,कुछ खाली हालात ;
के शब्द बोलते हैं..
कुछ मन की आवाज़ ,कुछ मेरी तेरी बात ;
के शब्द बोलते हैं ..
कुछ अमृतवाणी ,कुछ गीतों की सौगात ;
के शब्द बोलते हैं ..
मिताली की कलम से
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ख़्वाब टूट गया...
कितनी मुद्दतों के बाद
कल रात मिले थे
जब ख़्वाबों में हम,
तुम्हारे अक्स को देखा
और हकीकत मान लिया मैंने...

अनुपमा त्रिपाठी की कलम से
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लो फिर आई है चिड़िया ........!!


भोर से पहले ही उठ जाती
सूखे सूखे त्रिण चुन लाती
बुलबुल सी उड़-उड़ ...
रे मन चुलबुल ...
बाग़ में चहचहाई  है चिड़िया
मन भाई है चिड़िया ..!!
लो ,फिर आई है चिड़िया....
राग विभास की आस .....
चुने हुए शब्द विन्यास ....
सींचती-उलीचती ....
घट भर-भर लायी है चिड़िया ...
सृष्टि पर बिखरा ...
सुरों के  रंगों का..तरंगों  का ..उमंगों  का   .
राग लालिल सा  लालित्य ..
बुन-बुन गुन लायी है चिड़िया ......
राग के ख्याल में खोयी  हुई ...
क्षमा जी की कलम से
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मेरी लाडली!
याद आ रही है वो संध्या ,जब तेरे पिताने उस शाम गोल्फ से लौटके मुझसे कहा,"मानवी जनवरी के९ तारीख को न्यू जर्सी मे राघव के साथ ब्याह कर ले रही है। उसका फ़ोन आया, जब मै गोल्फ खेल रहा था।"
मै पागलों की भाँती इनकी शक्ल देखती रह गयी! और फिर इनका चेहरा सामने होकरभी गायब-सा हो गया....मन झूलेकी तरह आगे-पीछे हिंदोले लेने लगा। कानोंमे शब्द गूँजे,"मै माँ को लेके कहाँ जानेवाली हूँ?"
तू दो सालकीभी नही थी तब लेकिन जब भी तुझे अंदेसा होता था की मै कहीं बाहर जानेकी तैय्यारीमे हूँ, तब तेरा यही सवाल होता था! तूने  कभी नही पूछा," माँ, तुम मुझे लेके कहाँ जानेवाली हो?" माँ तुझे साथ लिए बिना ना चली जाय, इस बातको कहनेका ये तेरा तरीका हुआ करता था! कहीं तू पीछे ना छोडी जाय, इस डरको शब्दांकित तू हरवक्त ऐसेही किया करती।

अनंत विजय अपने ब्लॉग में

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बार-बार वर्धा
दस ग्यारह महीने बाद एक बार फिर से वर्धा जाने का मौका मिला । वर्धा के महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के छात्रों से बात करने का मौका था । दो छात्रों - हिमांशु नारायण और दीप्ति दाधीच के शोध को सुनने का अवसर मिला । महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में यह एक अच्छी परंपरा है कि पीएच डी के लिए किए गए शोध को जमा करने के पहले छात्रों, शिक्षकों और विशेषज्ञों के सामने प्रेजेंटेशन देना पड़ता है । कई विश्वविद्यालयों में जाने और वहां की प्रक्रिया को देखने-जानने के बाद मेरी यह धारणा बनी थी विश्वविद्यालयों में शोध प्रबंध बेहद जटिल और शास्त्रीय तरीके से पुराने विषयों पर ही किए जाते हैं । मेरी यह धारणा साहित्य के विषयों के इर्द-गिर्द बनी थी । जब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों से मिलने और उनके शोध को सुनने का मौका मिला तो मेरी यह धारणा थोड़ी बदली । हिमांशु नारायण के शोध का विषय भारतीय फीचर फिल्म और शिक्षा से जुड़ा था जबकि दीप्ति ने इंडिया टीवी और एनडीटीवी का तुलनात्मक अध्ययन किया था ।

रवि रतलामी जी अपने ब्लॉग पर :-
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18 जनवरी 2012


विष्णु नागर का व्यंग्य : ईश्वर में विश्वास
किसी ने मुझसे पूछ लिया कि भाईसाहब आप ईश्वर में विश्वास क्यों करते हो? मेरा मूड उस समय कुछ खराब था. मैंने कह दिया कि छोटे भाई, मैं ईश्वर में विश्वास करता हूं या आदमी में या चूहे में या उच्च में, यह पूछनेवाले तुम कौन? तुम क्या लाटसाहब हो? यह मेरा अत्यंत व्यक्तिगत मामला है. तुम्हें मुझसे ऐसा सवाल पूछने का कोई हक नहीं है. फिर भी जैसा कि आप जानते हो, मैं बदतमीज भले ही हूं मगर अंतत: हूं तो एक भला आदमी ही. मैंने पहले तो उससे अपने इस व्यवहार की माफी मांगी और फिर उसे बता दिया कि मैं आखिर ईश्वर में विश्वास क्यों करता हूं और जब उसे ही बता दिया तो फिर आपको बताने में क्या दिक्कत है, सो बता देता हूं पेश है आपकी खिदमत में ईश्वर में विश्वास करने के मेरे अपने कारण-



अमरेंद्र अवधिया अपने ब्लॉग पर
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अदीबो! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ!

अदम गोंडवी साहब से अतिरिक्त लगाव का कारण यह जानकारी भी रही कि अदम जी ने एक जागरूक जनकवि का प्रमाण देते हुये अपनी जनभाषा में भी लिखा है। जैसे नागार्जुन ने हिन्दी और मैथिली दोनों में लिखा और जनकवि के उस धर्म को निभाया जो जनभाषा में बिना रचनाशील हुये कतई नहीं निभाया जा सकता। ऐसे ही अदम साहिब ने अवधी में भी रचना की और अपने जनकवि होने का प्रमाण दिया। चूँकि अवधी को लेकर आधुनिक अवधी समाज में वैसा गौरव-बोध नहीं है, जैसा कि मैथिलियों(उदाहरण-स्वरूप) में मैथिली को लेकर है, इसलिये अदम जी की अवधी रचनाएँ बहुधा अलक्षित ही रह गयी हैं। उन्हें सम्मुख लाना और उनकी रचनाशीलता से जनमन को अवगत कराना हमारी पीढ़ी का दायित्व है। फिलहाल मित्र हिमांशु वाजपेयी से मुझे अदम गोंडवी की कुछ अवधी पंक्तियाँ मिलीं :
“उल्फत की तलैया मा कोई गोता न मारै,
अरे ज्यूधारी कुआं है यू बहुत जान लीस है!”

मानव अपने ब्लॉग में :-
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दुबेजी...

(DUBEYJI TRIBUTE "DHAMAAL" 8th Jan.. 2012)
“मैं दुबेजी को सबसे ज़्यादा जानता हूँ... मैं उनके सबसे करीब था... मेरे और उनके संबंध बहुत निजी थे।“ यह वाक़्य सबसे मन में था... सारे लोग जो धमाल (दुबेजी की याद में आयोजित किया गया सेलिब्रेशन...) में बतौर अभिनेता हिस्सा ले रहे थे और जो दर्शकों में बैठे हुए थे.. सभी। ’पंडित सत्य देव दुबे...’ जिन्होंने ना जाने कितने लोगों को निजी तौर पर छुआ है। दुबेजी से सभी के मतभेद उतने ही थे जितना सभी उनसे प्रेम करते थे।
दीपक बबा अपने ब्लॉग पर
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जिंदगी सिसकती चलती है - जिंदगी के शोरो शराबे के बीच.
जिंदगी सिसकती चलती है - जिंदगी के शोरो शराबे के बीच.कसम से,
बड़ी ही बेकार बोझिल सी है ये जिंदगी... कसम से; नोटों की गड्डी माफिक  जितना भी गिनो ९९ या फिर १०१ ही निकलते हैं, कभी १०० क्यों नहीं... उन्हें १०० बनाने के लिए कई बार गिनना पढता है. थूक लगा लगा कर.. थूक न हुई, माना ग्रेस में दिए गए नम्बर हों, जिनके बिना श्याद ही इंटर हो पाती.
एकटक लगा कर देखते रहना - एक ही फिल्म को कितनी ही बार, टीवी पर;  और एक खास सीन पर पूछना ... यार ये हेरोइन कौन है... कसम से - कुछ अलग सा है... बता सकती हो क्या...
और वो भी झुनझुन्ना कर जवाब  देती, जैसे तुम्हे कुछ मालूम नहीं, कुछ भी नहीं, ये मुआ चेनल पिछले ३ महीने में कम से कम ८ बार ये फिल्म दिखा चूका है, और इसी सीन पर तुम प्रश्न दाग देते हो - इस हीरोइन का नाम क्या है... गज़ब की एक्टिंग है.... तंग आ गयी मैं तो,
सिगरेट पता नहीं चलता कब खत्म हो गयी, तुम बेकार में फिल्म की बारम्बारता का इतना ध्यान रखती हो, तो कम से कम सिगरेट के पैकेट का ध्यान रखा करो ... देखो, अब पता चला - ये 'लास्ट' थी, और अंतिम कश भी ढंग से नहीं लिया....  सही में, अरमान मन में रह गए, .... बिलकुल ..मालूम होता कि  लास्ट सिगरेट है तो फैंकने की जल्दी न करता ... और गोल्डन कश को कम से कम सिल्वर की तरह तो इस्तेमाल करता.

श्याम कोरी उदय जी अपने ब्लॉग में :-
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. पूरी अंधेरी रात बांकी है !
न खता, न कुसूर, ... तो क्या हुआ ?
बेपनाह मुहब्बत की, सजा तो मिलनी थी उसे !!
...
लो, उम्मीदों के आख़िरी चिराग भी बुझ गए हैं 'उदय'
और अभी, पूरी अंधेरी रात बांकी है !!
दोस्ती पर से, एतबार कुछ इस कदर टूटा है 'उदय'
अब यकीं नहीं होता, किसी से हो दोस्ती मुमकिन !

कविता रावत जी अपने ब्लॉग में :-
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काठमांडू की सैर : एक सुहाना सफ़र

हर दिन एक ही ढर्रे के बीच झूलती जिंदगी से जब मन ऊबने लगता है तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन के यात्रा वृतांत 'अथातो घुम्मकड़ जिज्ञासा' पाठ में पढ़ी पंक्तियाँ याद आ जाती हैं-
''सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ,
जिंदगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाँ"
ये पंक्तियां मुझे भी कुछ सुकूं भरे पल तलाशने के लिए उकसाती रहती है।  ऐसी ही एक कोशिश मेरी पिछले माह काठमांडू की यात्रा की रही। जिंदगी फिर उसी ढर्रे पर लौट आई है। इस यात्रा को याद कर ढर्रे से थोड़ा दूर जाना चाहती हूँ।

बचपन में जब गाँव की पहाड़ी घाटियों के ऊपर से तेज गड़गड़ाहट के साथ आसमान में कोई हवाई जहाज अपनी ओर ध्यान खींचता था तो बालमन उसके साथ ही उड़ान भरने लगता था ।  उस समय हवाई जहाज देखना भी किसी रोमांच से कम नहीं था, उसमें सफ़र करने की बात तो कोसों दूर थी ।
प्रवीण पांडे जी अपनी पोस्ट में
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रघुबीरजी और कूड़े का ढेर
चायपान आधुनिक जीवनशैली का अनिवार्य अंग बन चुका है, पहले मैं नहीं पीता था पर उस कारण से हर जगह पर इतने तर्क पीने पड़ते थे कि मुझे चाय अधिक स्वास्थ्यकारी लगने लगी। बहुतों के लिये यह दिन का प्रथम पेय होता है, जापानी तो इसको पीने में पूजा करने से भी अधिक श्रम कर डालते हैं, पर बहुतों के लिये कार्यालय से आने के बाद अपनी श्रीमतीजी के साथ बिताये कुछ एकांत पलों की साक्षी बनती है चाय।
जब चाय की चैतन्यता गले के नीचे उतर रही हो तो दृश्य में अपना स्थान घेरे कूड़े का ढेर बड़ा ही खटकने लगा रघुबीरजी को। यद्यपि बिजली के जिन खम्भों के बीच वह कूड़े का ढेर था वे सोसाइटी की परिधि के बाहर थे, पर जीवन के मधुरिम क्षणों को इतनी कर्कशता से प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ भला मन की परिधि के बाहर कहाँ जा पाती हैं? कई बार वहाँ से कूड़ा हटवाया गया, पर स्थिति वही की वही बनी रही। कहते हैं कि कूड़ा कूड़े को आकर्षित करता है और खाली स्थान और अधिक कूड़े की प्रतीक्षा में रहता है। बिना कायाकल्प कोई उपाय नहीं दिख रहा था, मन में निर्णय हो चुका था, रघुबीरजी कुछ अच्छे पौधे जाकर ले आये, समय लगाकर उन्हें रोपित भी कर दिया, मानसून अपने प्रभाव में था, कुछ ही दिनों में वह स्थान दर्शनीय हो गया, चाय पीने में अब पूरा रस आने लगा रघुबीर जी को।

ब्लॉग्स इन मीडिया पर आज की पोस्ट
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यारों की महफिल
जनवाणी में यारों की महफिल
18 जनवरी 2012 को जनवाणी के नियमित स्तंभ ‘ब्लॉगवाणी’ में यारों की महफिल और नैन नचैया
डॉ. शशि तिवारी जी जनोक्ति पर
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बात शर्म की नहीं कर्म की है !

जब एक देश का प्रधानमंत्री सरकारी कार्यक्रम में यह कहे कि कुपोषण देश के लिए ‘‘राष्ट्रीय शर्म’’शर्म है” तो बड़ा हास्यादपद एवं दिल को दुखाने वाला लगता है। हास्यादपद इसलिए कि शक्तिशाली देश का मुखिया कितना लाचार है? कितना बेबस है। लाचारी, बेबसी से देश नहीं चला करते है। जब जनता ईमानदारी से टैक्स अदा करती है तो उसे भी अधिकार है कि वो जाने ये सब कुछ क्यों हो रहा है? असली जिम्मेदार कौन है? उन्हें सजा क्यों नही दी जाती? हमारी गाढ़ी कमाई के लुटेरे कौन है? जब जनता ने लोकतंत्र में विश्वास जता जनप्रतिनिधियों को नियंता मान भेजा है फिर सरकार से ऐसे वक्तव्य आते है, मसलन महंगाई को हम काबू में नहीं कर पा रहे, मिलावटखोरों पर नकेल नहीं कस पा रहे, मुनाफाखोरों पर बस नहीं चल पा रहा, पेट्रोल कंपनियोंको छुटटा सांड की तरह छोड़ दिया है जो निरीह जनता को जब चाहे अपने सींगों से घायल कर रहा है, खाद्य पदार्थोंकी कीमतें आसमान छू रही है, चारों और भ्रष्टाचार का हाहाकार मचा हुआ है तब दिल दुखता है। ऐसे नाजुक मौंकोंपर जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी से भागते, बचते नजर आए तब लगता है ‘‘करे कोई भरे कोई’’ जब किसी परबस नहीं चलता तो क्यों नही सभी जिम्मेदार लोग इस्तीफा दे जनता के पाले में क्यों खड़े नहीं हो जाते। क्यों नहींअपने करम की जनता से माफी मांगते?
पूजा उपाध्याय अपने ब्लॉग में :-
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जान तुम्हारी सारी बातें, सुनती है वो चाँद की नानी

जान तुम्हारी सारी बातें
सुनती है वो चाँद की नानी
रात में मुझको चिट्ठी लिखना
सांझ ढले तक बातें कहना
जरा जरा सा हाथ पकड़ कर
इस पतले से पुल पर चलना
मैं थामूं तुम मुझे पकड़ना
इन्द्रधनुष का झूला बुनना
रात इकहरी, उड़ी टिटहरी
फुग्गा, पानी, धान के खेत
बगरो बुड़बक, कुईयाँ रानी
अनगढ़ बातें तुमसे कहना
कितने तुम अच्छे लगते हो
कहते कहते माथा धुनना
प्यार में फिर हो पागल जैसे
तुमसे कहना, तुमसे सुनना
सागर जी सोचालय में :-
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दुःख जिंदगी के शतरंज का एक विलक्षण ग्रैंड मास्टर है जो एक साथ कई खिलाडि़यों को बखूबी होल्ड पर रखता है
मैं गली में चल रहा होता हूं कि चार हाथ दूरी पर खड़ी दीवार खिसक कर मेरी कनपटी के पास आ गई मालूम होती है। एक झटके वो घूम जाती है। अगली होशमंद सांस में अपने बिस्तर पर ले रहा होता हूं। मेरी पलकों से गर्म मोम पिघल कर गिर रही है। कमरे कर दरवाज़े पर जो परदा है दरअसल वो मेरी खाल है। ऐसा लगता है कि मेरी चमड़ी किसी तेज़ चाकू से उतार कर लटका दिया गया है। मैं अपने बीवी को खोजने की कोशिश करता हूं। जब मैं अपने पैताने देखता हूं वो बहुत फिक्रमंद नज़र आती है। प्रेम में हारी, समर्पित एक दासी, गहरे खुदे बुनियाद वाली बामियान की मूर्ति सी। वो मुझे बचाने की मुहिम में लगी हुई है। मेरा बायां पैर उसने दोनों हाथों से पकड़ बहुत करीने से उसने अपने दोनों स्तनों के बीच लगाया हुआ है। ऐड़ी फेफड़ों की नली पर है और तलवे बीच के खाली जगह पर।अंगूठे और कानी उंगलियों पर उसके दाहिने और बाएं उभार की सरहदों को मैं महसूस कर पा रहा हूं जो संभवत: उंगलियों पर ही आ गई मालूम होती हैं। मैं अपना सर उठा कर अपनी पत्नी को देखने की कोशिश करता हूं। चूंकि मुझे बिना तकिए के लिटाया गया है इस कारण मुझे अपना सिर उठाने में और भी तकलीफ होती है। जबकि मैं सारे ख्याल से आरी हूं, मुझे लगता है कि इस वक्त मेरी बीवी किन जज्बातों से तारी होगी।

15 टिप्पणियाँ:

RITU ने कहा…

सहसा अपना ज़िक्र देख कर मन ख़ुशी से भर गया ..
सभी ब्लोग्स पढेंगे .
ऋतू बंसल .
kalamdaan.blogspot.com

अनुपमा पाठक ने कहा…

बेहद सुंदर प्रस्तुति!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

गजब अजय भाई गजब ... कमाल की कलाकारी ... आज सब की शिकायतें दूर हो गई होगी ... बेहद सुन्दर तरीके से सजी है आज की बुलेटिन ... जय हो ... जय हो !

अमरेन्द्र अवधिया ने कहा…

ब्लाग-बुलेटिन से पहली बार रू-ब-रू हो रहा हूँ संभवतः। अच्छी योजना है। कुछ पोस्टों तक झाँक आया, सुंदर चयन!

आभार आपको!

shikha varshney ने कहा…

बहुत बढ़िया है जी.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

इतना अधिक ढूढ़ने के लिये पढ़ना भी बहुत पड़ता होगा...आपके श्रम को नमन..

अमित श्रीवास्तव ने कहा…

उत्कृष्ट संकलन...

उदय - uday ने कहा…

behatreen ...

देव कुमार झा ने कहा…

बहुत सही अजय भईया..... लिंक्स भी बढिया... और ब्लागर्स के चित्र भी....
जय हो! जय हो!

कविता रावत ने कहा…

बहुत बढ़िया सचित्र लिंक्स से सजी बुलेटिन प्रस्तुति में अपनी ब्लॉग पोस्ट शामिल देख यात्रा की ताजगी का आभास कराने के लिए आभार!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

इन कतरों की मुखर जुबां है , कह रहे हैं - देखा अजय जी का कमाल ! मैं एक :) के साथ सर हिला रही हूँ और अंग्रेजी में कहा है - NO DOUBT

वन्दना ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर बुलेटिन लगाया है……पढते हैं धीरे धीरे।

दीपक बाबा ने कहा…

राम राम जी

सदा ने कहा…

बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स का चयन किया आपने ...आभार ।

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

कैसे आभार प्रकट करूँ ....इतने सुंदर लिंक्स के खुद को पा कर .. ....बहुत अच्छा लगता है ...!!बहुत बढ़िया संकलन है ...!!

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