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सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

भूत, वर्तमान और भविष्य

मनुष्य के मस्तिष्क की एक स्थिति होती है जिसमें वह अपने वर्तमान के लिए भूतकाल को दोषी देता है और अपने वर्तमान के कारण अपने भविष्य की अनिश्चितता को लेकर दुखी होता है.... डॉक्टर सुभाष चंद्रा जी के शो में किसी युवक ने प्रश्न किया कि ‘भूतकाल भ्रमित करे, भविष्य भरमाए, वर्तमान में जो जिए उसे जीना आ जाए-पर उसे implement कैसे करे?" इस प्रश्न पर डॉक्टर साहब ने जो मेडिटेशन करने और मस्तिष्क कंट्रोल करने की जो सलाह दी मैं उसे ख़ारिज नहीं करता लेकिन शायद इस अच्छे प्रश्न का यह सटीक उत्तर नहीं है... 

मेरे ऑन-साइट इंटरव्यू में मेरे मैनेजर ने एक प्रश्न पूछा था कि क्या मैं अपने आप को एक सफल व्यक्ति मानता हूँ, मैंने उसे उत्तर दिया हाँ उसके क्यों पूछने पर मैंने कहा क्योंकि मुझे रात में नींद बहुत अच्छी आती है.... मित्रों, मैं इस संसार में किसी भी अवसाद के दो सबसे बड़े कारण मानता हूँ... १) आर्थिक अनिश्चितता और बढ़ती हुई महंगाई में बजट और परिवार की जरूरतों के बीच सामंजस्य न बैठा पाने से २) किसी भी रिश्ते में (भले वह आपका अपना कोई रिश्तेदार हो या मित्र हो या कोई परिवारी कोई भी हो ) अपने हिस्से की ईमानदारी न निभा पाने की विफलता। सोच कर देखिएगा यदि आपकी आर्थिक स्थिति सुरक्षित है और आपने भविष्य के लिए प्लानिंग कर रखी है तो वर्तमान अपने आप भला लगने लगेगा। और रही बात किसी खराब हो चले रिश्ते की तो याद रखिये "वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा"... इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति का सभी को प्रसन्न रख पाना संभव ही नहीं है सो हर रिश्ते में अपने हिस्से की ईमानदारी रखिये और बाकी की चिंता करना बंद कर दीजिये।

बाकी तो जो है सो हइये है..... 
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आप सब को गांधी जयंती और शास्त्री जयंती की हार्दिक बधाइयाँ ... इन महापुरुषों से हम कुछ भी सीख पाएँ तो यह हमारा सौभाग्य ही होगा|

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1965 के जंग के दौरान ली गयी लाल बहादुर शास्त्री की कुछ तस्वीरें

जागरूक जनता ही करेगी स्वच्छ भारत का निर्माण

मेरी नजर से बूढी डायरी और अशोक जमनानी :)

रामलीला हो चुकी है

हैप्पी बर्थ डे टू यू बापू ‘उलूक’ दिन में मोमबत्तियाँ जलाता है

कुछ भी लिखा,ब्लॉग की खातिर ..

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साख कायम रखनी है तो फर्जी खबरों से निपटना होगा

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

आविष्कार हो या परिवर्तन लाभ-हानि होते ही हैं !


तर्क, मान्यता , तर्क  ... कुछ समय बाद मान्यताओं की धज्जियाँ और कुतर्क 
कभी रुका है क्या ?
जो कुछ सोलहवीं सदी में था 
वह सतरहवीं में था क्या ?  .... वक़्त के साथ आविष्कार, परिवर्तन आदि होते ही रहते हैं , 
और आविष्कार हो या परिवर्तन 
लाभ-हानि होते ही हैं !


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